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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 609 में से

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पृष्ठ 554

उपसंहार वर्णन् ४८५
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण का
उपसंहार रूप २४ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
श्लोकाः स्वकृप्ता इह वेद नाग
पक्षाक्षि संख्य (२२८४) अथ भूपपक्षाः (२१६)
ग्रन्थान्त रोत्थाः खख बाण पक्षाः (२५००)
सम्भूय भव्याय भवन्तु दक्षाः । १५६ ।
इस ग्रन्थ में मेरे लिखे २२८४ तथा दूसरे ग्रन्थों के २१६ श्लोक इस प्रकार
कुल २५०० श्लोक हैं । यह अति सुन्दर भाव से लिखे शुभ श्लोक सुन्दर फल
दें ।
भीमस्यापि पराजयोयुधि भवेद् बुद्धि भ्रमः स्यान्मुनेः
वादाचित् कतयाप्यतोऽल्प विदुषा मा सादृशां का कथा
तस्माद् यद् यद शुद्ध मत्र गणितं यद्वा सहार्थं पदं
तत् सर्व परिशोधयन्तु कृतिनः कृत्वानुकंपां मयि । १५७ ।
कभी कभी युद्ध में भीम भी पराजित होते हैं । तथा मुनियों का भी बुद्धिभ्रम
हो जाता है । फिर मेरे जैसे कम बुद्धि वाले पण्डित का क्या कहना है । अतः
जहां गणित में अशुद्धि है या जहां पुनरावृत्ति है उसे विद्वान् लोग स्वंय संशोधन
कर लें ।
ब्रह्माण्ड खण्ड भण्ड स्थिरतर धरणी मण्डल भ्रान्ति सौण्ड
प्रौदण्डे लण्डदन्ता वल बल दलना कुण्ठ कण्ठीरवः श्रीः
सोऽयं नीलाद्रि सिहान्वय वदन दरी निर्गतः प्राप्त दुर्गः
स्फीत स्वख्यातिरस्तु प्रथम विगणित स्कन्ध सारः प्रबन्धः । १५८ ।
सिद्धान्त दर्पण एक प्रबन्ध या ग्रन्थ हैं । ज्योतिष के तीन स्कन्धों में गणित
का यह स्कन्ध सार है । इसका तत्व समझना बहुत कठिन है । नीलाद्रि सिंह के
वंश की मुख रूपी गुहा से यह ग्रन्थ सिंह के रूप में बाहर निकला है । अखण्ड
ब्रह्माण्ड में पृथ्बी स्थिर है, उसका भ्रमण अस्वीकार करने वाले इंगलैण्ड के
पण्डितों के हाथी समान दांतों का बल सिंह के समान दलन करे ।
वेलोद्य दसित गोत्रे सूत्रामादि स्तवावली पात्रे
गात्रंमम सुपवित्रे निपततु पुरुषोत्तम क्षेत्रे । १५९ ।
तीर्थ राज समुः के तट पर नीताचल खड़ा है । इन्द्र और देवताओं का स्तोत्र
पात्र के रूप रखकर जगन्नाथ की उससे पूजा होती है । उसी पुरुषोत्तम क्षेत्र में
मेरा देहावसान हो ।