सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार वर्णन ४५५
बघेल क्षत्रिय वंश क्षीर समुद्र के समान शुभ्र है जिसमें लक्ष्मी का निवास
है । इसी में पूर्ण चन्द्र के समान नृसिंह का उदय हुआ था । उनके औरस पुत्र
श्रीश्यामबन्धु अत्यन्त विद्वान्, दीनबन्धु के चरण नखों में अपना अज्ञान एवं अंधकार
दूर करने वाले थे । उन्होंने उड़ीसा में निवास किया, सिंह उपाधि धारण की
तथा भरद्वाज कुल कमल के लिये सूर्य के समान थे ।
तज्जः श्रीमघुसूदनाभिध महापात्रोद् गुरोदीक्षितो
विद्यामुद्यत खंगराय सुपदादानन्द मिश्राद् गतः
सोऽहं ब्रह्म गिरीश माधवपदावासः स्वधर्माधमः
सिद्धान्त प्रथनं चकार यदिदं स्यात्कृष्ण पादार्पितम् । १४८ ।
मैं इन्हीं श्यामबन्धु सिंह का पुत्र हूँ । अपने गुरु की श्री मधुसूदन महापात्र
से मैंने दीक्षा ली है । खडंगा (खङ्गराय) आनन्द मिश्र के पास मैं ने शिक्षा ली
है । ब्रह्मा, विष्णु और महेश का चरण ही मेरा आश्रय है । अपने कालधर्म का
पालन करने में मैने बराबर त्रुटि की है । तथापि प्रभु की दया से सिद्धान् पूर्ण कर
पाया, यह उन्हीं भगवान के चरणों में अर्पण कर रहा हूँ ।
यातांग त्रिनवाब्धि (४९३६) वत्सर कलौ जन्मोभवन्मामकं
वेतोषर्बुध (३४) वर्ष केण च मया ग्रन्थोऽप्यमाविष्कृत
सन्तः सन्ततमत्रसन्त गणिते सन्तोष वन्तो गुणं
गृहान्तः परिहृत्य दोष गणका नास्ते न यत् सर्ववित् । १४९ ।
कलि वर्ष ४९३६ में मेरा जन्म हुआ । ३४ वर्ष की अवधि में मैंने ग्रन्थ रचना
समाप्त की । मेरे इस गणित ग्रन्थ के दोषों में छोड़कर केवल गुणों को ही पण्डित
ग्रहण करें । क्योकि कोई भी मनुष्य सर्वज्ञ नही होता है ।
सिद्धान्तानुदिता अपिह गदिता ये ये विशेषा मया
ते हेया नव कल्पना इति सति र्मभृत् प्रभूणां क्वचित्
दृक् सिद्धयै किल लल्ल भास्कर शतानन्दाच भट्टादिभिः
स्वग्रन्थेषु यदिरीता बहुमता ईदृक् विशेषा नवाः । १५० ।
विद्वानों से मेरी प्रार्थना है कि इस ग्रन्थ की कई नयी बातों को केवल नया
होने के कारण तिरस्कार नहीं करें । दृक् सिद्धि के लिये लल्ल, भास्कर, शतानन्द
तथा आर्यभट्ट आदि ने भी अपने ग्रन्थों में कई नयी बातें लिखी हैं । और लोग
उन्हें मानते हैं । मैमे यदि ऐसा किया उसमें क्या दोष है ?
सिद्धान्ताध्ययनं विनापि गगनाभागो न भोगोडुभिः
सार्द्धवासनया यदीयहृदयेऽनत्यतदाविष्कृते
सिद्धान्त प्रमुंखे प्रकाशनवल स्पष्टाधिकार द्वयो
युक्तं दर्पण केऽत्र गोलगणित ख्यात्योत्तराद्धं गतम् । १५१ ।