श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
महावीरी व्याख्या चौ. ३२: राम-रसायन तुम्हरे पासा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-रसायन तुम्हरे पासा।
सादर हौ रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ—राम-रसायन ▸ श्रीरामरसका भाण्डागार (भण्डार)।
अर्थ—हे पवननन्दन! रामप्रेमरसका भण्डार आपके ही पास है एवं
आप निरन्तर आदरपूर्वक रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास्य भावमें रहते हैं।
यद्वा, हे आदरणीय रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास हनुमान्जी! आपके पास
रामप्रेमरसका भवन अर्थात् राघवचरित्र निरन्तर निवास करता है।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जी रामभक्ति-रसके आचार्य ही हैं। अत एव इन्होंने
श्रीराघवसे अनपायनी भक्ति माँगी—
नाथ भगति तव अति सुखदायिनि।
देहु कृपा करि सो अनपायनि ॥
—रा.च.मा. ५-३४-३
इन्हें गोस्वामीजीने रसाइनी (संस्कृत: रसायनी) शब्दसे संबोधित किया है।
यथा—राम की रजाइ तें रसाइनी समीरसूनू (क. ५-२५)।
७१
चौ. ३३: तुम्हरे भजन राम को पावै महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥
शब्दार्थ— भजन ▸ सेवा, शरणागति।
अर्थ— हे कपिकुल-तिलक! आपके भजनसे साधक श्रीरामभद्रजूको पा
जाता है और प्रभुको पाकर वह अनेक जन्मोंके दुःखोंको भूल जाता है।
व्याख्या— आपका भजन भगवत्प्राप्तिमें साधन है क्योंकि भगवद्भक्ति
दर्शनके लिए ज्ञान और वैराग्य इन दो नेत्रोंकी आवश्यकता होती है।
यथा—ज्ञान बिराग नयन उरगारी (रा.च.मा. ७-१२०-१४)। और आप
स्वयं ज्ञान-वैराग्य-रूप हैं। यथा—ज्ञानिनामग्रगण्यम् (रा.च.मा. ५-
मङ्गलाचरण श्लोक ३) और बिरागी पवनकुमार सो (क. ५-१)। अतः
आञ्जनेयके भजनसे निश्चित श्रीरामरूपकी प्राप्ति हो जाती है। राघव सुखसिन्धु
हैं, अतः उन्हें प्राप्त कर व्यक्ति अनेक जन्मोंके दुःखोंको उन्हीं आनन्द-
सिन्धुकी एक लहरमें विलीन कर देता है, जैसे जटायु—निरखि राम
छबि-धाम मुख बिगत भई सब पीर (रा.च.मा. ३-३२)।
७२
महावीरी व्याख्या चौ. ३४: अंत-काल रघुबर-पुर जाई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अंत-काल रघुबर-पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई॥ ३४ ॥
शब्दार्थ—रघुबर-पुर ▸ श्रीसाकेतलोक।
अर्थ—हे राम-दूत! आपके भजनके प्रतापसे वह साधक इसी भौतिक
शरीरसे भगवान् श्रीरामभद्रका दर्शन करके शरीरावसान (अन्तकाल)के
समय श्रीसाकेतलोक जाकर पुनः मर्त्यलोकमें जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ
श्रीहरिका भक्त ही कहलाता है। अर्थात् पुनर्जन्ममें भी उसके भक्तिके संस्कार
धूमिल नहीं होते।
व्याख्या—इसी शरीरसे साधक इसी लोकमें इन्हीं चक्षुओंसे श्रीरामजूके
कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्प-दलन सगुण साकार नीलनीरधरश्याम लोकाभिराम
श्रीविग्रहका दर्शन करता है और अन्तकालमें वह मोक्ष नहीं चाहता।
क्योंकि—सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं (रा.च.मा. ६-११२-७)। फिर
प्रारब्धका क्षय करके शरीरको विसर्जित कर अपनी इच्छानुसार
श्रीसाकेतलोकमें विश्राम कर पुनः भगवल्लीलारसकी अनुभूतिकी लालसासे
भगवान् श्रीराघवके अवतार-कालमें संसारमें आकर किसी भाग्यशालिनी
माँकी कोखको पवित्र कर रघुनाथजीकी प्रतीक्षामें निरत रहता है। यथा—
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोक्ष सुख त्यागि॥
—रा.च.मा. ४-२६
७३
चौ. ३५: और देवता चित्त न धरई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ ३५ ॥
शब्दार्थ—सर्ब सुख ▸ लौकिक एवं पारलौकिक अनुकूलता।
अर्थ—जो भक्त किसी अन्य देवताको अपने चित्तमें न धारण कर केवल
हनुमान्जीकी सेवा करता है, वह समस्त सुखोंको प्राप्त कर लेता है। यद्वा, जो
अन्य किसी देवताको अपने चित्तमें नहीं धारण करता, वह भी हनुमान्जीकी
सेवा करके समस्त सुखोंकी प्राप्ति कर लेता है।
व्याख्या—देवता-विमुखको नास्तिक कहा जाता है, तथा उसे सुखकी
प्राप्ति नहीं होती क्योंकि इष्ट भोगोंको देने वाले देवता ही हैं। यथा—इष्टान्
भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः (भ.गी. ३-१२)। पर वह
भी हनुमत्कृपासे सर्वसुखका अधिकारी हो सकता है क्योंकि समस्त देव
उन्हींकी कृपाकी अपेक्षा रखते हैं। यथा—देवी देव दानव दयावने ह्वै
जोरैं हाथ बापुरे बराक कहा और राजा राँक को (ह.बा. १२)। अथवा,
अनन्य निष्ठासे सेवा करनेपर हनुमान्जी समस्त सुख प्रदान करते हैं।
७४
महावीरी व्याख्या चौ. ३६: संकट कटै मिटै सब पीरा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥
शब्दार्थ—बलबीरा ▸ बलसे युक्त वीर।
अर्थ—जो अतुलनीय-बलयुक्त वीर श्रीहनुमान्जी महाराजका स्मरण
करता है, उसके समस्त संकट कट जाते हैं तथा सभी पीड़ाएँ मिट जाती
हैं।
व्याख्या—हनुमान्जीके स्मरणसे श्रीशिव-पार्वती एवं श्रीसीता-राम-
लक्ष्मण प्रसन्न होकर साधकके पञ्चक्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष,
और अभिनिवेश) को हर लेते हैं। यथा—
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि
लोकपाल सकल लखन राम जानकी।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि
तुलसी तमाहि ताहि काहू बीर आन की।
केसरी-किसोर बंदीछोर के नेवाजे सब
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की।
बालक ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की॥
—ह.बा. १३
७५
चौ. ३७: जय जय जय हनुमान गोसाईं महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ—गोसाईं ▸ इन्द्रियोंके स्वामी।
अर्थ—हे गोसाईं हनुमान्जी महाराज! आपकी जय हो! जय हो!! जय
हो!!! आप गुरुदेवकी भाँति वात्सल्यपूर्ण कृपा करें।
व्याख्या—हनुमान्जी सच्चिदानन्द हैं, इसलिए गोस्वामीजी तीन बार
जय शब्दका प्रयोग करते हैं। प्रथम जयसे हनुमान्-चालीसा ग्रन्थका
उपक्रम किया था। पुनः जयसे उपसंहार करके उनसे कृपाकी याचना
कर रहे हैं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं अर्थात् कठोर कृपा न करें। जीवपर दो
ही कृपा कर सकते हैं—गुरु एवं गोविन्द। गोविन्दकी कृपामें कठोरताके
साथ कोमलता होती है, जैसे असुरोंके निग्रह में। किन्तु गुरुकृपा निरन्तर
कोमलतासे ओत-प्रोत रहती है। यथा—
एक शूल मोहि बिसर न काऊ।
गुरु कर कोमल शील सुभाऊ॥
—रा.च.मा. ७-११०-२
अतः प्रभो! गुरुदेवकी भाँति कृपा करके आप मुझे श्रीरामप्रेमका ज्ञान
कराएँ।
७६
बजरंग बाण, मारुति स्तोत्र एवं श्री हनुमान जी की आरती
महावीरी व्याख्या चौ. ३८: जो शत बार पाठ कर कोई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥
शब्दार्थ—बंदि ▸ लौकिक तथा पारलौकिक बन्धन।
अर्थ—यदि कोई इसका १०० बार पाठ श्रद्धा एवं भक्तिसे करेगा, उसके
लौकिक एवं पारलौकिक बन्धन छूट जाएँगे एवं उसे महासुखकी प्राप्ति
होगी।
व्याख्या—यहाँ शत शब्द १०८का बोधक है तथा बार शब्द दिन एवं
संख्याका वाचक है। कोई शब्द सर्वसाधारणके लिए अधिकार-समर्पक है,
अर्थात् कोई भी मनुष्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, इतरधर्मी कोई भी)
यदि हनुमान्-चालीसाका १०८ बार प्रतिदिनके क्रमसे १०८ दिन तक पाठ
करे तो निश्चित उसका अनिष्ट बन्धन छूट जाएगा। इस हनुमान्-चालीसाको
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने समस्त प्राणिमात्रको तुलसीदल-प्रसाद-
रूपमें वितरित किया है। यह फलश्रुति है।
७७
चौ. ३९: जो यह पढ़े हनुमान-चलीसा
महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥
शब्दार्थ—गौरीसा ▸ भगवान् शिव।
अर्थ—अब गोस्वामीजी भविष्यत्कालमें वर्तमानकालका दर्शन कर
बोल रहे हैं कि जो इस हनुमान्-चालीसाको पढ़ेगा, उसको अवश्य लौकिक
तथा पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होगी। इस विषय-प्रतिज्ञाके साक्षी भगवान्
शिव हैं।
व्याख्या—हनुमान्-चालीसा लौकिक तथा पारलौकिक सिद्धियोंकी
प्रदाता है, इस प्रतिज्ञामें शिवजीका साक्ष्य देते हैं। जैसे विनयपत्रिकामें
श्रीराम-नाम प्रतीत करते समय शिवजीको साक्षी-रूपमें उपस्थित किया
है। यथा—शंकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो (वि.प.
२२६-६)।
७८
महावीरी व्याख्या चौ. ४०: तुलसीदास सदा हरि-चेरा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुलसीदास सदा हरि-चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥
शब्दार्थ—हरि-चेरा ▸ श्रीरामजीके सेवक।
अर्थ—हे कीशनाथ श्रीहनुमान्जी महाराज! आप निरन्तर भगवान्
श्रीरामके कैङ्कर्यमें निरत रहते हैं, अतः उसी कृपालुतावश तुलसीदासके
हृदयमें निवास कीजिए। यद्वा गोस्वामीजी कहते हैं कि आञ्जनेय! आप
निरन्तर भगवद्भक्तके हृदयमें निवास कीजिए। अथवा, मैं तुलसीदास निरन्तर
हरि अर्थात् वानरश्रेष्ठ आपश्रीका सदैव दास हूँ; हे नाथ! आप मेरे हृदयमें
श्रीराम-लक्ष्मण-सीता सहित निवास कीजिए।
व्याख्या—अन्तमें गोस्वामीजी अपने हृदयमें निवास करनेके लिए किंवा
वैष्णवजनोंके लिए हनुमान्जीसे प्रार्थना करते हैं। हरि-चेरा शब्दका नाथ,
हृदय, तथा तुलसीदास शब्दसे अन्वय करनेपर उपर्युक्त तीनों अर्थ संगत
हो जाते हैं। अर्थात् नाथ सदा हरि-चेरा तुलसीदास हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे प्रथम अर्थ; तथा तुलसीदास नाथ हरि-चेरा हृदय
महँ सदा डेरा कीजै—इस अन्वयसे द्वितीय अर्थकी पुष्टि हो जाती है। यहाँ
(दूसरे अर्थ में) तुलसीदास शब्दके साथ कहत इस बाहरी क्रियाको जोड़ना
पड़ता है, जैसे अन्यत्र। यथा—शरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल
(रा.च.मा. २-२२६)। तुलसीदास सदा हरि-चेरा नाथ हृदय महँ डेरा
कीजै—इस अन्वयसे तृतीय अर्थकी पुष्टि होती है।
७९
दो.: पवनतनय संकट-हरन महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
पवनतनय संकट-हरन मंगल-मूरति-रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप॥
शब्दार्थ—पवनतनय ▸ पवनके पुत्र। सुर-भूप ▸ देवताओंके राजा।
अर्थ—हे पवनके पुत्र! समस्त संकटोंको हरनेवाले मङ्गलमूर्ति-रूप!!
समस्त देवताओंके अधिष्ठान-स्वरूप श्रीहनुमान्जी महाराज!!! आप श्रीराम,
श्रीलक्ष्मण, एवं माँ मैथिलीके साथ हमारे हृदयमें निवास करें।
व्याख्या—चार विशेषण देकर श्रीहनुमान्जीको ही मन, बुद्धि, अहंकार,
एवं चित्तको शुद्ध करनेमें सहायक सिद्ध करते हैं और पश्चात् राम, लक्ष्मण,
एवं सीताजीके सहित हृदयमें विश्राम करनेकी प्रार्थना करके सर्वतोभावेन
श्रीमन्मारुतिके ही श्रीचरणकमलकी शरणागतिको ही परम पुरुषार्थ बताकर
ग्रन्थको विश्राम दे रहे हैं।
॥ उपसंहारः ॥
सुमिरि राम-सिय-चरन-कमल गुरु-पद-रज शिर धरि।
चऊद्वार उत्कल-थल मारुतसुतहि ध्यान करि॥
संबत नभ-फल-ख-दृग सुमाधव शिव शनिवारा।
शुक्ल दूज हनुमान-चलीसा मति अनुसारा॥
जुगुति-शास्त्र-सिद्धान्तमय वैष्णव-रीति-भगति-भरी।
नाम महावीरी ललित लघु व्याख्या गिरिधर करी॥
॥ श्रीहनुमते नमः ॥
८०
The provided image is completely blank (contains no text or content). Please provide an image containing the text you would like transcribed.
The uploaded image is completely blank (white), and contains no visible text to transcribe. Please upload an image containing the text you would like transcribed.
पद्यार्धानुक्रमणी
इस अनुक्रमणीमें श्रीहनुमान्-चालीसाके सभी ८६ पद्यार्ध (तीन दोहोंके छः दल
और चालीस चौपाइयोंकी अस्सी अर्धालियाँ) अकारादिक्रमसे सूचित हैं। प्रत्येक
पद्यार्धके बाद कोष्ठकमें पद्य-संख्या और पूर्वार्ध/उत्तरार्ध दिए गए हैं। पद्य-संख्याके लिए
मङ्गलाचरण-दोहाको म.दो., चौपाईको चौ., और उपसंहार-दोहाको उ.दो.—इस
प्रकारसे संकेतित किया गया है। तत्तत् पद्यार्धकी प्रस्तुत संस्करणमें महावीरी व्याख्याकी
पृष्ठ-संख्या दाहिनी ओर दिखाई गई है।
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा (चौ. २, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . १९
अंत-काल रघुबर-पुर जाई (चौ. ३४, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता (चौ. ३१, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं (चौ. १३, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
अस बर दीन्ह जानकी माता (चौ. ३१, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९
असुर-निकंदन राम-दुलारे (चौ. ३०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८
आपन तेज सम्हारो आपे (चौ. २३, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
और देवता चित्त न धरई (चौ. ३५, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
और मनोरथ जो कोइ लावै (चौ. २८, पूर्वार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५
कंचन-बरन बिराज सुबेसा (चौ. ४, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कबि कोबिद कहि सकें कहाँ ते (चौ. १५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
काँधे मूँज-जनेऊ छाजै (चौ. ५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
कानन कुंडल कुंचित केसा (चौ. ४, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २४
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा (चौ. ४०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७९
कुमति-निवार सुमति के संगी (चौ. ३, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . २१
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं (चौ. ३७, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६
चारिउ जुग परताप तुम्हारा (चौ. २९, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
छूटहिं बंदि महा सुख होई (चौ. ३८, उत्तरार्ध). . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
पद्यार्धानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
जनम जनम के दुख बिसरावै (चौ. ३३, उत्तरार्ध) ....................... ७२
जपत निरंतर हनुमत बीरा (चौ. २५, उत्तरार्ध) ....................... ६२
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते (चौ. १५, पूर्वार्ध) ....................... ४३
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर (चौ. १, उत्तरार्ध) ....................... १७
जय जय जय हनुमान गोसाईं (चौ. ३७, पूर्वार्ध) ....................... ७६
जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर (चौ. १, पूर्वार्ध) ....................... १७
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं (चौ. १९, उत्तरार्ध) ................... ५२
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई (चौ. ३४, उत्तरार्ध) ....................... ७३
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू (चौ. १८, पूर्वार्ध) ....................... ४९
जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा (चौ. ३९, पूर्वार्ध) ....................... ७८
जो शत बार पाठ कर कोई (चौ. ३८, पूर्वार्ध) ....................... ७७
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा (चौ. ३६, उत्तरार्ध) ....................... ७५
तासु अमित जीवन फल पावै (चौ. २८, उत्तरार्ध) ....................... ६५
तिन के काज सकल तुम साजा (चौ. २७, उत्तरार्ध) .................... ६४
तीनों लोक हाँक ते काँपे (चौ. २३, उत्तरार्ध) ....................... ५९
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा (चौ. १६, पूर्वार्ध) ....................... ४५
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई (चौ. १२, उत्तरार्ध) .................... ४०
तुम रक्षक काहू को डर ना (चौ. २२, उत्तरार्ध) ....................... ५८
तुम्हरे भजन राम को पावै (चौ. ३३, पूर्वार्ध) ....................... ७२
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (चौ. १७, पूर्वार्ध) ....................... ४७
तुलसीदास सदा हरि-चेरा (चौ. ४०, पूर्वार्ध) ....................... ७९
तेज प्रताप महा जग-बंदन (चौ. ६, उत्तरार्ध) ....................... २७
दुर्गम काज जगत के जे ते (चौ. २०, पूर्वार्ध) ....................... ५३
नारद सारद सहित अहीशा (चौ. १४, उत्तरार्ध) ....................... ४२
नासै रोग हरै सब पीरा (चौ. २५, पूर्वार्ध) ......................... ६२
पवनतनय संकट-हरन मंगल-मूरति-रूप (उ.दो., पूर्वार्ध) ................. ८०
प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया (चौ. ८, पूर्वार्ध) ....................... ३१
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं (चौ. १९, पूर्वार्ध) ....................... ५२
बरनउँ रघुबर-बिमल-जस जो दायक फल चारि (म.दो. १, उत्तरार्ध) ......... १२
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार (म.दो. २, उत्तरार्ध) ......... १५
८४
महावीरी व्याख्या पद्यार्धानुक्रमणी
बिकट रूप धरि लंक जरावा (चौ. ९, उत्तरार्ध) ................................. ३३
बिद्यावान गुणी अति चातुर (चौ. ७, पूर्वार्ध) ................................. २९
बुद्धि-हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार (म.दो. २, पूर्वार्ध) ................. १५
भीम रूप धरि असुर सँहारे (चौ. १०, पूर्वार्ध) ................................. ३५
भूत पिशाच निकट नहिं आवै (चौ. २४, पूर्वार्ध) ................................ ६१
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै (चौ. २६, उत्तरार्ध) .............................. ६३
महाबीर जब नाम सुनावै (चौ. २४, उत्तरार्ध) ................................. ६१
महाबीर बिक्रम बजरंगी (चौ. ३, पूर्वार्ध) ................................... २१
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई (चौ. १२, पूर्वार्ध) ................................ ४०
राम-काज करिबे को आतुर (चौ. ७, उत्तरार्ध) ................................. २९
रामचंद्र के काज सँवारे (चौ. १०, उत्तरार्ध) ................................. ३५
राम-दुआरे तुम रखवारे (चौ. २१, पूर्वार्ध) ................................. ५४
राम-दूत अतुलित-बल-धामा (चौ. २, पूर्वार्ध) ................................ १९
राम मिलाय राज-पद दीन्हा (चौ. १६, उत्तरार्ध) .............................. ४५
राम-रसायन तुम्हरे पासा (चौ. ३२, पूर्वार्ध) ................................. ७१
राम-लखन-सीता-मन-बसिया (चौ. ८, उत्तरार्ध) ................................ ३१
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप (उ.दो., उत्तरार्ध) ................... ८०
लंकेश्वर भए सब जग जाना (चौ. १७, उत्तरार्ध) .............................. ४७
लाय सँजीवनि लखन जियाये (चौ. ११, पूर्वार्ध) .............................. ३९
लील्यो ताहि मधुर फल जानू (चौ. १८, उत्तरार्ध) .............................. ४९
शंकर स्वयं केसरीनंदन (चौ. ६, पूर्वार्ध) ................................... २७
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि (म.दो. १, पूर्वार्ध)............... १२
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये (चौ. ११, उत्तरार्ध) ................................ ३९
संकट कटै मिटै सब पीरा (चौ. ३६, पूर्वार्ध) ................................. ७५
संकट तें हनुमान छुड़ावै (चौ. २६, पूर्वार्ध) ................................. ६३
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा (चौ. १४, पूर्वार्ध) ................................ ४२
सब-पर राम राय-सिरताजा (चौ. २७, पूर्वार्ध) ................................ ६४
सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना (चौ. २२, पूर्वार्ध) .............................. ५८
सहसबदन तुम्हरो जस गावैं (चौ. १३, पूर्वार्ध) ................................ ४१
सादर हौ रघुपति के दासा (चौ. ३२, उत्तरार्ध) ................................ ७१
८५
साधु संत के तुम रखवारे (चौ. ३०, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६८
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते (चौ. २०, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५३
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा (चौ. ९, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई (चौ. ३५, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै (चौ. ५, पूर्वार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६
है परसिद्ध जगत-उजियारा (चौ. २९, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६६
होत न आज्ञा बिनु पैसारे (चौ. २१, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४
होय सिद्धि साखी गौरीसा (चौ. ३९, उत्तरार्ध) . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८
शब्दानुक्रमणी
इस अनुक्रमणीमें श्रीहनुमान्-चालीसामें प्रयुक्त सभी शब्द अकारादिक्रमसे सूचित
हैं। तत्तत् शब्दके अवयवी दोहा अथवा चौपाईकी महावीरी व्याख्याकी प्रस्तुत
संस्करणमें पृष्ठ-संख्या (अथवा पृष्ठ-संख्याएँ) दाहिनी ओर दिखाई गई है (अथवा
गई हैं)। पाठकोंकी सुविधाके लिए रघुबर-बिमल-जस आदि दीर्घ समासोंका प्रायः
विग्रह करके रघुबर, बिमल, और जस आदि घटक पदोंको स्वतन्त्र रूपसे सूचित
किया गया है। जिन समासोंका संज्ञाके रूपमें व्यवहार है अथवा जिनके पश्चात् तद्धित
प्रत्ययका विधान है (यथा रघुबर, बजरंगी, पवनतनय इत्यादि), उन समासोंको प्रायः
यथावत् (समस्त रूपमें) सूचित किया गया है।
अंजनिपुत्र . . . . . . . . . . . . . . . १९ आपे . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९
अंत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३ आवै . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६१
अचरज . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ उजागर . . . . . . . . . . . . . . . १७
अति . . . . . . . . . . . . . . . . . . २९ उजियारा . . . . . . . . . . . . . . . ६६
अतुलित . . . . . . . . . . . . . . . १९ उपकार . . . . . . . . . . . . . . . ४५
अनुग्रह . . . . . . . . . . . . . . . . ५३ उर . . . . . . . . . . . . . . . . . . ३९
अमित . . . . . . . . . . . . . . . . . ६५ और . . . . . . . . . . . . . . ६५, ७४
अरु . . . . . . . . . . . . . . . . . . २६ कंचन . . . . . . . . . . . . . . . . २४
अष्ट . . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९ कंठ . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
अस . . . . . . . . . . . . . . ४१, ६९ कटै . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७५
असुर . . . . . . . . . . . . . . ३५, ६८ कपीश . . . . . . . . . . . . . . . . १७
अहीशा . . . . . . . . . . . . . . . . ४२ कबि . . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
आज्ञा . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४ कर . . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
आतुर . . . . . . . . . . . . . . . . . २९ करई . . . . . . . . . . . . . . . . . ७४
आपन . . . . . . . . . . . . . . . . . ५९ करहु . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६
शब्दानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
करिबे . . . . . . . . . . . . . . . . . २९ गावैं . . . . . . . . . . . . . . . . ४१
कलेश . . . . . . . . . . . . . . . . . १५ गुण . . . . . . . . . . . . . . . . १७
कहाँ . . . . . . . . . . . . . . . . . ४३ गुणी . . . . . . . . . . . . . . . . २९
कहाई . . . . . . . . . . . . . . . . . ७३ गुरुदेव . . . . . . . . . . . . . . . ७६
कहि . . . . . . . . . . . . . ४१, ४३ गोसाईं . . . . . . . . . . . . . . . ७६
काँधे . . . . . . . . . . . . . . . . २६ गौरीसा . . . . . . . . . . . . . . . ७८
काँपे . . . . . . . . . . . . . . . . ५९ चरन . . . . . . . . . . . . . . . . १२
काज . . . . . . . . २९, ३५, ५३, ६४ चरित्र . . . . . . . . . . . . . . . ३१
कानन . . . . . . . . . . . . . . . २४ चलीसा . . . . . . . . . . . . . . ७८
काल . . . . . . . . . . . . . . . . ७३ चातुर . . . . . . . . . . . . . . . २९
काहू . . . . . . . . . . . . . . . . ५८ चारि . . . . . . . . . . . . . . . . १२
की . . . . . . . . . . . . . . . . . ७६ चारिउ . . . . . . . . . . . . . . . ६६
कीजै . . . . . . . . . . . . . . . . ७९ चित्त . . . . . . . . . . . . . . . ७४
कीन्हा . . . . . . . . . . . . . . . ४५ चेरा . . . . . . . . . . . . . . . . ७९
कीन्ही . . . . . . . . . . . . . . . ४० छाजै . . . . . . . . . . . . . . . २६
कुंचित . . . . . . . . . . . . . . . २४ छुड़ावै . . . . . . . . . . . . . . . ६३
कुंडल . . . . . . . . . . . . . . . २४ छूटहिं . . . . . . . . . . . . . . . ७७
कुबेर . . . . . . . . . . . . . . . . ४३ जग . . . . . . . . . . . . . २७, ४७
कुमति . . . . . . . . . . . . . . . २१ जगत . . . . . . . . . . . . . ५३, ६६
कृपा . . . . . . . . . . . . . . . . ७६ जनम . . . . . . . . . . . . . . . ७२
के २१, ३५, ५३, ६४, ६८, ६९, ७१, जनेऊ . . . . . . . . . . . . . . . . २६
७२ जन्म . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
केसरीनंदन . . . . . . . . . . . . . २७ जपत . . . . . . . . . . . . . . . ६२
केसा . . . . . . . . . . . . . . . २४ जब . . . . . . . . . . . . . . . ६१
को . . . . . . . . . २९, ३१, ५८, ७२ जम . . . . . . . . . . . . . . . . ४३
कोइ . . . . . . . . . . . . . . . ६५ जय . . . . . . . . . . . . . १७, ७६
कोई . . . . . . . . . . . . . . . ७७ जरावा . . . . . . . . . . . . . . . ३३
कोबिद . . . . . . . . . . . . . . . ४३ जलधि . . . . . . . . . . . . . . ५२
क्रम . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ जस . . . . . . . . . . . . . १२, ४१
गये . . . . . . . . . . . . . . . . ५२ जहाँ . . . . . . . . . . . . . ४३, ७३
८८
महावीरी व्याख्या शब्दानुक्रमणी
जाई . . . . . . . . . . . . . . . ७३ दायक . . . . . . . . . . . . . . १२
जानकी . . . . . . . . . . . . . ६९ दासा . . . . . . . . . . . . . . ७१
जाना . . . . . . . . . . . . . . ४७ दिखावा . . . . . . . . . . . . . ३३
जानिकै . . . . . . . . . . . . . १५ दिगपाल . . . . . . . . . . . . . ४३
जानू . . . . . . . . . . . . . . ४९ दीन्ह . . . . . . . . . . . . . . ६९
जियाये . . . . . . . . . . . . . ३९ दीन्हा . . . . . . . . . . . . . . ४५
जीवन . . . . . . . . . . . . . . ६५ दुआरे . . . . . . . . . . . . . . ५४
जुग . . . . . . . . . . . . . ४९, ६६ दुख . . . . . . . . . . . . . . . ७२
जे . . . . . . . . . . . . . . . . ५३ दुर्गम . . . . . . . . . . . . . . ५३
जो . . . १२, ६३, ६५, ७५, ७७, ७८ दुलारे . . . . . . . . . . . . . . ६८
जोजन . . . . . . . . . . . . . . ४९ दूत . . . . . . . . . . . . . . . १९
ज्ञान . . . . . . . . . . . . . . १७ देवता . . . . . . . . . . . . . . ७४
डर . . . . . . . . . . . . . . . ५८ देहु . . . . . . . . . . . . . . . १५
डेरा . . . . . . . . . . . . . . . ७९ धरई . . . . . . . . . . . . . . ७४
तनु . . . . . . . . . . . . . . . १५ धरि . . . . . . . . . . . . . ३३, ३५
तासु . . . . . . . . . . . . . . ६५ धामा . . . . . . . . . . . . . . १९
ताहि . . . . . . . . . . . . . . ४९ ध्यान . . . . . . . . . . . . . . ६३
तिन . . . . . . . . . . . . . . ६४ ध्वजा . . . . . . . . . . . . . . २६
तिहुँ . . . . . . . . . . . . . . १७ न . . . . . . . . . . . . . . ५४, ७४
तीनों . . . . . . . . . . . . . . ५९ नव . . . . . . . . . . . . . . . ६९
तुम . . ४०, ४५, ५४, ५८, ६४, ६८ नहिं . . . . . . . . . . . . . . . ६१
तुम्हरे . . . . . . . . . . ५३, ७१, ७२ ना . . . . . . . . . . . . . . . ५८
तुम्हरो . . . . . . . . . . . ४१, ४७ नाईं . . . . . . . . . . . . . . . ७६
तुम्हारा . . . . . . . . . . . . . ६६ नाथ . . . . . . . . . . . . . . . ७९
तुम्हारी . . . . . . . . . . . . . ५८ नाम . . . . . . . . . . . . . . . ६१
तुलसीदास . . . . . . . . . . . ७९ नामा . . . . . . . . . . . . . . १९
ते . . . . . . . . . . . . ४३, ५३, ५९ नारद . . . . . . . . . . . . . . ४२
तें . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ नासै . . . . . . . . . . . . . . . ६२
तेज . . . . . . . . . . . . . २७, ५९ नाहीं . . . . . . . . . . . . . . ५२
दाता . . . . . . . . . . . . . . ६९ निकंदन . . . . . . . . . . . . . ६८
८९
शब्दानुक्रमणी महावीरी व्याख्या
निकट . . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बरन . . . . . . . . . . . . . . . . २४
निज . . . . . . . . . . . . . . . . १२ बरनउँ . . . . . . . . . . . . . . . . १२
निधि . . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बल . . . . . . . . . . . . . . १५, १९
निरंतर . . . . . . . . . . . . . . ६२ बलबीरा . . . . . . . . . . . . . . . ७५
निवार . . . . . . . . . . . . . . . २१ बसहु . . . . . . . . . . . . . . . . ८०
पढ़ै . . . . . . . . . . . . . . . . . ७८ बसिया . . . . . . . . . . . . . . . ३१
पद . . . . . . . . . . . . . . . . . ४५ बहुत . . . . . . . . . . . . . . . . ४०
पर . . . . . . . . . . . . . . ४९, ६४ बार . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७
परताप . . . . . . . . . . . . . . . ६६ बिकट . . . . . . . . . . . . . . . . ३३
परसिद्ध . . . . . . . . . . . . . . ६६ बिकार . . . . . . . . . . . . . . . . १५
पवनकुमार . . . . . . . . . . . . . १५ बिक्रम . . . . . . . . . . . . . . . . २१
पवनतनय . . . . . . . . . . . . . . ८० बिद्या . . . . . . . . . . . . . . . . १५
पवनसुत . . . . . . . . . . . . . . १९ बिद्यावान . . . . . . . . . . . . . . २९
पाठ . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७ बिनु . . . . . . . . . . . . . . . . . ५४
पावै . . . . . . . . . . . . . . ६५, ७२ बिभीषन . . . . . . . . . . . . . . . ४७
पासा . . . . . . . . . . . . . . . . ७१ बिमल . . . . . . . . . . . . . . . . १२
पिशाच . . . . . . . . . . . . . . . ६१ बिराज . . . . . . . . . . . . . . . २४
पीरा . . . . . . . . . . . . . . ६२, ७५ बिराजै . . . . . . . . . . . . . . . २६
पैसारे . . . . . . . . . . . . . . . . ५४ बिसरावै . . . . . . . . . . . . . . . ७२
प्रताप . . . . . . . . . . . . . . . . २७ बीरा . . . . . . . . . . . . . . . . . ६२
प्रभु . . . . . . . . . . . . . . ३१, ५२ बुद्धि . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
प्रिय . . . . . . . . . . . . . . . . . ४० बुधि . . . . . . . . . . . . . . . . . १५
फल . . . . . . . . . . . . १२, ४९, ६५ ब्रह्मादि . . . . . . . . . . . . . . . ४२
बंदन . . . . . . . . . . . . . . . . २७ भए . . . . . . . . . . . . . . . . . ४७
बंदि . . . . . . . . . . . . . . . . . ७७ भगत . . . . . . . . . . . . . . . . ७३
बचन . . . . . . . . . . . . . . . . ६३ भजन . . . . . . . . . . . . . . . . ७२
बजरंगी . . . . . . . . . . . . . . . २१ भरतहिं . . . . . . . . . . . . . . . ४०
बज्र . . . . . . . . . . . . . . . . . २६ भाई . . . . . . . . . . . . . . . . . ४०
बड़ाई . . . . . . . . . . . . . . . . ४० भानू . . . . . . . . . . . . . . . . . ४९
बर . . . . . . . . . . . . . . . . . ६९ भीम . . . . . . . . . . . . . . . . ३५
९०