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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

चतुर्थपटलः । ( ९१ )
सुशीतलम् ॥ २ ॥ तस्योर्ध्वं तु शिखासूक्ष्मा
चिद्रूपा परमाकला ॥ तया सहितमात्मा-
नमेकीभूतं विचिन्तयेत् ॥ ३ ॥
टीका-ब्रह्मयोतिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम-
बाणके समान कोटिसूर्यके सदृश प्रकाश और कोटि
चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और
उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू-
पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन
करै ॥ २ ॥ ३ ॥
मूलम्-गच्छतिब्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण
वै॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी-
तलम्॥४॥अमृतं तद्धि स्वर्गस्थं परमान-
न्दलक्षणम्॥ श्वेतरक्तं तेजसाढ्यं सुधाधा-
राप्रवर्षिणम् ॥ ५ ॥ पीत्वा कुलामृतं दि-
व्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ॥
टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा
क्रमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसे
प्रस्थान करताहै और स्वर्गस्थ अमृत परम आनन्द-
का लक्षण श्वेत रक्त-वर्ण कोटि सूर्यके सदृश तेज
प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल सुधाधारा-

(९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
वर्षी दिव्यकुलामृतको पान करके फिर योनिमंडल-
में स्थित होजाताहै ॥ ४ ॥ ५ ॥
मूलम्-पुनरेव कुलं गच्छेन्मात्रायोगेन ना-
न्यथा ॥ सा च प्राणसमाख्याता ह्यस्मि-
स्तन्त्रे मयोदिता ॥ ६ ॥
टीका-फिर ब्रह्मयोनिसे प्राणायामयोग करके प्राण
कुलमंडलमें जाताहै इस तंत्रमें जो हमने कहाहै हे देवी !
उस ब्रह्मयोनिको प्राणके समान कहते हैं ॥ ६ ॥
मूलम्-पुनः प्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादि-
शिवात्मकम् ॥ ७ ॥ योनिमुद्रा पराह्येषा
बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः ॥ तस्यास्तु
बन्धमात्रेण तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ८ ॥
टीका-फिर तीसरे बार काल अग्नि आदि शिवा-
त्मक जीव प्रस्थानपूर्वकं चंद्रमण्डलमें दिव्य अमृत-
पान करके फिर ब्रह्मयोनिमें लय होजाता है हे देवी !
इस बन्धको योनिमुद्रा कहते हैं केवल बन्धमात्रसे
संसारमें असाध्य कोई वस्तु नहीं है अर्थात् सब सिद्ध
होसक्ताहै ॥ ७ ॥ ८ ॥
मूलम्-छिन्नरूपास्तु ये मन्त्राः कीलिताः
स्तंभिताश्च ये ॥ दग्धा मन्त्राः शिरोहीना

चतुर्थपटलः । (९३)
मलिनास्तु तिरस्कृताः ॥ ९ ॥ मन्दा बा-
लास्तथा वृद्धाः प्रौढा यौवनगर्विताः ॥ भे-
दिनो भ्रमसंयुक्ताः सप्ताहं मूर्च्छिताश्च
ये ॥ १० ॥ अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वी-
र्याः सत्त्ववर्जिताः॥ तथा सत्त्वेन हीनाश्च
खण्डिताः शतधाकृताः ॥ ११ ॥
विधानेन च संयुक्ताः प्रभवन्त्याचिरेण
तु ॥ सिद्धिमोक्षप्रदाः सर्वे गुरुणा वि-
नियोजिताः ॥ १२ ॥ यद्यदुच्चरते योगी
मंत्ररूपं शुभाशुभम्॥ तत्सिद्धिं समवाप्नो-
ति योनिमुद्रानिबन्धनात् ॥ १३ ॥ दीक्ष-
यित्वा विधानेन अभिषिच्य सहस्रधा ॥
ततो मंत्राधिकारार्थमेषा मुद्रा प्रकी-
र्त्तिता ॥ १४ ॥

टीका-जो मन्त्र छिन्नरूप हैं और कीलित हैं स्तम्भि-
त हैं और जो मन्त्र दग्ध हैं शिरहीन हैं मलीन हैं और
जिनका अनादर है और मन्द हैं बाल हैं वृद्ध हैं प्रौढ हैं
और जो यौवनगर्वित हैं और भेदित हैं भ्रमसंयुक्त हैं
सप्ताहसे मूर्च्छित हैं और जो शत्रुके पक्षमें हैं निर्वीर्य हैं

( ९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
सत्वरहित हैं खण्डितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे
युक्त होके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध
होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षप्रद
होजाताहै योगीसे जो मन्त्र शुभ वा अशुभरूप उच्चा-
रण होताहै सो सब योनिमुद्राके बन्धनमात्रसे सिद्ध
होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि-
तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रधा
शिष्यको करे ॥९॥ १० ॥११॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥
मूलम्-ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि
घातयेत् ॥ नासौ लिप्यति पापेन योनि-
मुद्रानिबन्धनात् ॥ १५ ॥
टीका-यदि एक सहस्र ब्रह्महत्याकरके और त्रैलो-
क्यकाभी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे
तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिप्त न
होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ॥ १५ ॥
मूलम्-गुरुहा च सुरापी च स्तेयी च गुरुत-
ल्पगः ॥ एतैः पापैर्न बध्येत योनिमुद्रा-
निबन्धनात् ॥ १६ ॥
टीका-गुरुघातक मद्यपाई चोर गुरुकी शय्यामें
रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकसेभी साधक यो-
निमुद्राके बन्धप्रभावसे बन्धायमान नहोगा ॥ १६॥

चतुर्थपटलः । ( ९५ )
मूलम्-तस्मादभ्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष-
कांक्षिभिः ॥ अभ्यासाज्जायते सिद्धिर्-
भ्यासान्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १७ ॥
टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य
अभ्यास करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही-
से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
मूलम्-संविदंलभतेऽभ्यासाद्योगोभ्यासात्प्र-
वर्तते ॥ मुद्राणां सिद्धिरभ्यासादभ्यासा-
द्वायुसाधनम् ॥ १८ ॥ कालवञ्चनमभ्या-
सात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्धिः
कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ॥ १९ ॥
टीका-अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होताहै और अभ्याससे
योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध
होती हैं और अभ्याससे वायुका साधन होताहै और
अभ्याससे मनुष्य कालसे बचताहै और अभ्याससे
मृत्युंजय होजाताहै और अभ्यासयोगसे वाक्यसिद्धि
और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि,
सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हेतुसे आ-
लस्यको छोडके जिस वस्तुमें मनुष्य अभ्यास करेगा
वह अवश्य सिद्ध होजायगा ॥ १८ ॥ १९ ॥

( ९६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मूलम्-योनिमुद्रा परं गोप्या न देया यस्य
कस्यचित् ॥ सर्वथा नैव दातव्या प्राणैः
कण्ठगतैरपि ॥ २० ॥
टीका-यह योनिमुद्रा परमगोपनीय है अनधिका-
रीको कदापि न दे यह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि
कण्ठगत प्राण होजायँ तो भी देना उचित नहीं है ॥२०॥
मूलम्--अधुना कथयिष्यामि योगसिद्धि-
करं परम् ॥ गोपनीयं सुसिद्धानां योगं
परमदुर्लभम् ॥ २१ ॥
टीका-हे देवी ! अब जो योग कहेंगे वह परमसिद्धिका
देनेवाला है सिद्ध लोगोंको इस परम दुर्लभ योगको
गोप्य रखना उचितहै ॥ २१ ॥
मूलम्-सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कु-
ण्डली ॥ तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते
ग्रन्थयोपि च ॥ २२ ॥
टीका-गुरूके प्रसादसे निद्रिता कुण्डलिनी देवी जब
जागृत होती है तब सर्व पद्म और सर्व ग्रंथी वेधित हो
जाती हैं अर्थात् सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्र-
पर्यंत संचार करने लगजाताहै ॥ २२ ॥
मूलम्-तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्व-

चतुर्थपटलः । ( ९७ )
रीम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं स
माचरेत् ॥ २३ ॥
टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें जो
ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके
अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है ॥ २३ ॥
मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे-
चरी ॥ जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति-
स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे
शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा
णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५ ॥
टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा,
महाबन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल-
बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा
और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें
अतिउत्तम हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥
अथ महामुद्राकथनम् ।
मूलम्-महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्म-
मवल्लभे ॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च
कपिलाद्याः पुरा·गताः ॥ २६ ॥
५

( ९८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-हे प्रिये पार्वती ! इस तन्त्रमें महामुद्रा जो हम
कहतेहैं इसको लाभ करके पूर्व कपिलआदिक सिद्ध-
वरको सिद्धि प्राप्त भई ॥ २६ ॥
मूलम्--अपसव्येन संपीड्य पादमूलेन सा-
दरम् ॥ गुरूपदेशतो योनिं गुदमेढ्रान्तरा-
लगाम् ॥२७॥ सव्यं प्रसारितं पादं धृत्वा
पाणियुगेन वै ॥ नवद्वाराणि संयम्य चि-
बुकं हृदयोपरि ॥ २८ ॥ चित्तं चित्तपथे
दत्त्वा प्रभवेद्वायुसाधनम् ॥ महामुद्रा भ-
वेदेषा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ २९ ॥वामाङ्गे-
न समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ॥ प्रा-
णायामं समं कृत्वा योगी नियतमा-
नसः ॥ ३० ॥
टीका-वामपादके एडीसे गुदा और मेढ़के मध्यमें
जो योनि है उसको आदरसहित गुरुके उपदेशपूर्वक
पीडितकरे अर्थात् दबावे और दक्षिणपाद प्रसारके अ-
र्थात् लम्बा करके दोनों हाथोंसे धरे और नवद्वारोंको रोक
करके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयपर स्थित करे और
चित्तवृत्तिको चैतन्यमें स्थिर करके वायुका साधन कर-
ना उचित है यह महामुद्रा सर्वतन्त्रोंके प्रमाणसे गो-

चतुर्थपटलः । ( ९९ )
प्यहै पहिले वामांगसे अभ्यास करके फिर दक्षिण अं-
गसे अभ्यास करे योगी स्थिरबुद्धिको उचित है कि, इस
प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७॥२८॥२९॥३०॥
मूलम्--अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो-
ऽपि सिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं
बिन्दुमारणम् ॥३१॥जीवनन्तु कपायस्य
पातकानां विनाशनम् ॥ कुण्डलीतापनं
वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ॥ ३२ ॥ सर्वरो-
गोपशमनं जठराग्निविवर्धनम् ॥ वपुषा
कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥ ३३॥
वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाञ्च मा-
रणम्॥ एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य
योगिनः ॥ ३४ ॥ भवेदभ्यासतोऽवश्यं
नात्र कार्या विचारणा ॥
टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा-
यगा और इस महामुद्राके प्रभावसे सर्व नाडीका च-
लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी-
वनको आकर्षित रक्खेगा और सर्व पातकका नाश हो-
जायगा और कुण्डलिनीको हठात् उठाय वायुको ब्रह्मर-
न्ध्रमें प्रवेश करेगा और ज़ठराग्नि प्रज्वलित होके सर्वरो-

(१००) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी
और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और
सुखसहित वाञ्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका
निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो-
गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है
निश्चय है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि-
ते ॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ-
न्ति योगिनः ॥ ३५ ॥
टीका-हेसुरपूजिते देवी ! यह मुद्रा यत्न करके गो-
पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स-
मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥
मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां म-
योदिता ॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया
यस्य कस्यचित् ॥ ३६ ॥
टीका-हेदेवी ! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको
कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको
गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको
अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है ॥ ३६ ॥
अथ महाबन्धकथनम् ।
मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमूरु-

चतुर्थपटलः । ( १०१ )
परि ॥ ३७ ॥ गुदयोनिं समाकुंच्य कृत्वा
चापानमूर्ध्वगम् ॥ योजयित्वा समानेन
कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥ ३८ ॥ बन्धयेदू-
र्ध्वगत्यर्थं प्राणापानेन यः सुधीः ॥ कथि-
तोऽयं महाबन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥
॥ ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं
याति योगिनः ॥ उभाभ्यां साधयेत्प-
द्भ्यामेकैकं सुप्रयत्नतः ॥ ४० ॥
टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात् फैलाके
दक्षिणचरणको वाम ऊरूपर स्थित करके और गुदा
और योनिको आकुञ्चन करके अपानको ऊर्ध्व करके
समानवायुके साथ सम्बन्ध करके और प्राणवायुको
अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके ऊर्द्धगतिके हेतु
बुद्धिमान् साधकके प्रति कहाहै और यह महाबन्ध
सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका
रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों
मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अंगसे यत्न करके
करना उचितहै ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥
मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुषुम्नामध्य-
सङ्गतः॥अनेन वपुषः पुष्टिर्दृढबन्धोऽस्थि-

३. तृतीय पटल: प्राणायाम, पवन-विजय व यौगिक सिद्धियाँ

( १०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
पञ्जरे ॥ ४१ ॥ संपूर्णहृदयो योगी भव-
न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी-
न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम् ॥ ४२ ॥
टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें
स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट
रहेंगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ
अर्थात् बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोषसे
पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा-
बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसी
बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब
सिद्ध करलेगा ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
अथ महावेधकथनम् ।
मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने-
श्वरि॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य
वायुना ॥ स्फिचौ संताडयेद्धीमान्वेधो-
ऽयं कीर्तितो मया ॥ ४३ ॥
टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी ! अपान और प्राणको एक
करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके
बुद्धिमान् दोनों स्फिच् अर्थात् पार्श्वको ताडन करे
इसको हमने वेध कहा है ॥ ४३ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०३ )
मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग-
वः ॥ ग्रंथिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथिं भि-
नत्त्यसौ ॥ ४४ ॥
टीका-बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व
ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्नारन्ध्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको
भेदन करताहै ॥ ४४ ॥
मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो-
पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण
नाशिनी ॥ ४५ ॥
टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित
करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि-
नी वायुसिद्धि होजायगी ॥ ४५ ॥
मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति
वायुताडनात् ॥ कुण्डल्यपि महामाया
कैलासे सा विलीयते ॥ ४६ ॥
टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके
ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि-
नी देवी कैलास अर्थात् ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प-
र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा,
विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे

( १०४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाच-
क्रमें जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्ध्रको छोडदेते हैं
तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य
करना उचित है ॥ ४६ ॥
मूलम्-महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधव-
र्जितौ ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति
त्रितयं क्रमात् ॥ ४७ ॥
टीका-महामुद्रा और महाबन्ध विना वेधके निष्फ-
ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल
नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक क्रम-
से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे ॥ ४७ ॥
मूलम्-एतत्त्रयं प्रयत्नेन चतुर्वारं करोति
यः ॥ षण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव
न संशयः ॥ ४८ ॥
टीका-जो यह मुद्रा बन्ध वेध तीनोंका अभ्यास
यत्न करके रात्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छःमास-
में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है ॥४८॥
मूलम्-एतत्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना-
ति नेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे
सिद्धिं सम्यगलभन्ति वै ॥ ४९ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०५ )
टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते
हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके
जानलेनेसे साधकलोगोंको सर्वसिद्धिलाभ होती है ॥४९॥
मूलम्--गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि-
मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धिः
स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः ॥ ५० ॥
टीका-सिद्धाकांक्षी साधकको उचित है कि, यह
सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोप्य रक्खे इनको प्रकाश
करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है ॥ ५० ॥
अथ खेचरीमुद्राकथनम् ।
मूलम्-भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढां
सुधीः ॥ ५१ ॥ उपविश्यासने वज्रे नानो-
पद्रववर्जितः ॥ लम्बिकोर्ध्वं स्थिते गर्ते
रसनां विपरीतगाम् ॥ ५२ ॥ संयोजये-
त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्रैषा
खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः ॥५३॥
टीका-बुद्धिमान् साधक दोनों भ्रू अर्थात् भ्रुकुटी-
के मध्यमें दृढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना-
उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात् सिद्धासनसे स्थित
होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप

( १०६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान् साधक संयोजित करे
अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती ! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश
करके यह खेचरीमुद्रा कही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
मूलम्-सिद्धीनां जननी ह्येषा मम प्राणा-
धिकप्रिया ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्पी-
यूषं प्रत्यहं पिबेत् ॥ तेन विग्रहसिद्धिः
स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ५४ ॥
टीका-यह खेचरीमुद्रा सर्वसिद्धिकी माता है और
हेदेवी ! हमको प्राणसेभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ-
सके अभ्याससे नित्य अमृतपान करताहै उस कारणसे
शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात् नाश नहीं होता और
मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै ॥ ५४ ॥
मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां
गतोऽपि वा ॥ खेचरी यस्य शुद्धा तु स
शुद्धो नात्र संशयः ॥ ५५ ॥
टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी
अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह
सर्वदा शुद्ध है इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
मूलम्-क्षणार्धं कुरुते यस्तु तीर्त्वा पापम-
हार्णवम् ॥ दिव्यभोगान्प्रभुक्त्वा च
सत्कुले स प्रजायते ॥ ५६ ॥

चतुर्थपटलः। (१०७)
टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह
महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग
भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥
मूलम्-मुद्रैषा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो
ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्धं
मन्यते हि सः ॥ ५७ ॥
टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त
ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतब्रह्माभी गत
भावको प्राप्तहों क्षणार्ध प्रतीत होगा ॥ ५७ ॥
मूलम्-गुरूपदेशतो मुद्रां यो वेत्ति खेचरी-
मिमाम् ॥ नानापापरतो धीमान्स याति
परमां गतिम् ॥ ५८ ॥
टीका-गुरूपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ
होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान्
साधक परमगतिको प्राप्तहोगा अर्थात् मोक्ष होजा-
यगा ॥ ५८ ॥
मूलम्-सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मिन्क-
स्मिन्न दीयते ॥ प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन
मुद्रेयं सुरपूजिते ॥ ५९ ॥
टीका-हे सुरपूजिते पार्वती ! यह खेचरीमुद्रा प्राणके

( १०८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
बराबर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस
मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ॥ ५९ ॥
अथ जालन्धरबन्ध ।
मूलम्-बद्धागलशिराजालं हृदये चिबुकं
न्यसेत् ॥ बन्धो जालन्धरः प्रोक्तो देवाना-
मपि दुर्लभः ॥६०॥ नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां
सहस्रकमलच्युतम्॥पिबेत्पीयूषविस्तारं
तदर्थं बन्धयेदिमम् ॥ ६१ ॥
टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको बांधके
चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा-
लन्धरबन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभि-
स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत
स्रवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल-
न्धरबन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित
सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो-
तीहै इस जालन्धरबन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत
सूर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिरं-
जीव रहताहै ॥ ६० ॥ ६१ ॥
मूलम्-बन्धेनानेन पीयूषं स्वयं पिबति बु-
द्धिमान् ॥ अमरत्वञ्च सम्प्राप्य मोदते
भुवनत्रये ॥ ६२ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०९ )
टीका-इस जालन्धरबन्धके प्रभावसे बुद्धिमान्
योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय-
के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है ॥ ६२ ॥
मूलम्-जालन्धरो बन्ध एष सिद्धानां सि-
द्धिदायकः॥ अभ्यासः क्रियते नित्यं यो-
गिना सिद्धिमिच्छता ॥ ६३ ॥
टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला
है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ-
भ्यास करना उचित है ॥ ॥ ६३ ॥
अथ मूलबन्धः ।
मूलम्-पादमूलेन संपीड्य गुदमार्गेषु य-
न्त्रितम् ॥६४॥ बलादपानमाकृष्य क्रमा-
दूर्ध्वं सुचारयेत् ॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो
जरामरणनाशनः ॥ ६५ ॥
टीका-पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु-
ञ्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक-
र्षण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात् प्राणके साथ
सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका
नाश करनेवाला ह ॥ ६४ ॥ ६५ ॥
मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-

( ११० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
कल्पितम् ॥ बन्धेनानेन सुतरां योनिमुद्रा
प्रसिद्ध्यति ॥ ६६ ॥
टीका-इस कल्पितबन्धसे अपान और प्राणको
एक करे और इसी मूलबन्धके प्रभावसे योनिमुद्रा
आपही सिद्ध होजायगी ॥ ६६ ॥
मूलम्-सिद्धायां योनिमुद्रायां किं न सिध्य-
ति भूतले ॥ बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने
विजितानिलः ॥ पद्मासने स्थितो योगी
भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥ ६७ ॥
टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्धलोगोंको
इस संसारमें सब सिद्ध होसक्ताहै इस मूलबन्धके प्रसा-
दसे वायुको योगी जीतके पद्मासनस्थित होके भूमिको
त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥ ६७ ॥
मूलम्-सुगुप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम-
भ्यसेत् ॥ संसारसागरं तर्तुं यदिच्छेद्व्यो-
गिपुंगवः ॥ ६८ ॥
टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने-
की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस
मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है ॥ ६८ ॥
अथ विपरीतकरणी मुद्रा ।
मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वा खे नयेच्चरणद्व-