सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

( १०४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाच-
क्रमें जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्ध्रको छोडदेते हैं
तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य
करना उचित है ॥ ४६ ॥
मूलम्-महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधव-
र्जितौ ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति
त्रितयं क्रमात् ॥ ४७ ॥
टीका-महामुद्रा और महाबन्ध विना वेधके निष्फ-
ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल
नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक क्रम-
से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे ॥ ४७ ॥
मूलम्-एतत्त्रयं प्रयत्नेन चतुर्वारं करोति
यः ॥ षण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव
न संशयः ॥ ४८ ॥
टीका-जो यह मुद्रा बन्ध वेध तीनोंका अभ्यास
यत्न करके रात्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छःमास-
में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है ॥४८॥
मूलम्-एतत्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना-
ति नेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे
सिद्धिं सम्यगलभन्ति वै ॥ ४९ ॥