शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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बराबर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस
मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ॥ ५९ ॥
अथ जालन्धरबन्ध ।
मूलम्-बद्धागलशिराजालं हृदये चिबुकं
न्यसेत् ॥ बन्धो जालन्धरः प्रोक्तो देवाना-
मपि दुर्लभः ॥६०॥ नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां
सहस्रकमलच्युतम्॥पिबेत्पीयूषविस्तारं
तदर्थं बन्धयेदिमम् ॥ ६१ ॥
टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको बांधके
चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा-
लन्धरबन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभि-
स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत
स्रवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल-
न्धरबन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित
सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो-
तीहै इस जालन्धरबन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत
सूर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिरं-
जीव रहताहै ॥ ६० ॥ ६१ ॥
मूलम्-बन्धेनानेन पीयूषं स्वयं पिबति बु-
द्धिमान् ॥ अमरत्वञ्च सम्प्राप्य मोदते
भुवनत्रये ॥ ६२ ॥