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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

( १०६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान् साधक संयोजित करे
अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती ! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश
करके यह खेचरीमुद्रा कही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
मूलम्-सिद्धीनां जननी ह्येषा मम प्राणा-
धिकप्रिया ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्पी-
यूषं प्रत्यहं पिबेत् ॥ तेन विग्रहसिद्धिः
स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ५४ ॥
टीका-यह खेचरीमुद्रा सर्वसिद्धिकी माता है और
हेदेवी ! हमको प्राणसेभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ-
सके अभ्याससे नित्य अमृतपान करताहै उस कारणसे
शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात् नाश नहीं होता और
मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै ॥ ५४ ॥
मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां
गतोऽपि वा ॥ खेचरी यस्य शुद्धा तु स
शुद्धो नात्र संशयः ॥ ५५ ॥
टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी
अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह
सर्वदा शुद्ध है इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
मूलम्-क्षणार्धं कुरुते यस्तु तीर्त्वा पापम-
हार्णवम् ॥ दिव्यभोगान्प्रभुक्त्वा च
सत्कुले स प्रजायते ॥ ५६ ॥