शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः। (१०७)
टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह
महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग
भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥
मूलम्-मुद्रैषा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो
ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्धं
मन्यते हि सः ॥ ५७ ॥
टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त
ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतब्रह्माभी गत
भावको प्राप्तहों क्षणार्ध प्रतीत होगा ॥ ५७ ॥
मूलम्-गुरूपदेशतो मुद्रां यो वेत्ति खेचरी-
मिमाम् ॥ नानापापरतो धीमान्स याति
परमां गतिम् ॥ ५८ ॥
टीका-गुरूपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ
होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान्
साधक परमगतिको प्राप्तहोगा अर्थात् मोक्ष होजा-
यगा ॥ ५८ ॥
मूलम्-सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मिन्क-
स्मिन्न दीयते ॥ प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन
मुद्रेयं सुरपूजिते ॥ ५९ ॥
टीका-हे सुरपूजिते पार्वती ! यह खेचरीमुद्रा प्राणके