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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

( १०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
पञ्जरे ॥ ४१ ॥ संपूर्णहृदयो योगी भव-
न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी-
न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम् ॥ ४२ ॥
टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें
स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट
रहेंगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ
अर्थात् बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोषसे
पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा-
बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसी
बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब
सिद्ध करलेगा ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
अथ महावेधकथनम् ।
मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने-
श्वरि॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य
वायुना ॥ स्फिचौ संताडयेद्धीमान्वेधो-
ऽयं कीर्तितो मया ॥ ४३ ॥
टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी ! अपान और प्राणको एक
करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके
बुद्धिमान् दोनों स्फिच् अर्थात् पार्श्वको ताडन करे
इसको हमने वेध कहा है ॥ ४३ ॥