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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

चतुर्थपटलः । ( १०९ )
टीका-इस जालन्धरबन्धके प्रभावसे बुद्धिमान्
योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय-
के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है ॥ ६२ ॥
मूलम्-जालन्धरो बन्ध एष सिद्धानां सि-
द्धिदायकः॥ अभ्यासः क्रियते नित्यं यो-
गिना सिद्धिमिच्छता ॥ ६३ ॥
टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला
है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ-
भ्यास करना उचित है ॥ ॥ ६३ ॥
अथ मूलबन्धः ।
मूलम्-पादमूलेन संपीड्य गुदमार्गेषु य-
न्त्रितम् ॥६४॥ बलादपानमाकृष्य क्रमा-
दूर्ध्वं सुचारयेत् ॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो
जरामरणनाशनः ॥ ६५ ॥
टीका-पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु-
ञ्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक-
र्षण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात् प्राणके साथ
सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका
नाश करनेवाला ह ॥ ६४ ॥ ६५ ॥
मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-