सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

चतुर्थपटलः । ( ९७ )
रीम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं स
माचरेत् ॥ २३ ॥
टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें जो
ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके
अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है ॥ २३ ॥
मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे-
चरी ॥ जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति-
स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे
शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा
णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५ ॥
टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा,
महाबन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल-
बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा
और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें
अतिउत्तम हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥
अथ महामुद्राकथनम् ।
मूलम्-महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्म-
मवल्लभे ॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च
कपिलाद्याः पुरा·गताः ॥ २६ ॥
५