सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

148 शाङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

Here is the complete text transcribed from the image:

148 शाङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
वाला है। इसके सेवन से शुक्र की वृद्धि होती है और दुर्बल
इन्द्रियों वाले मनुष्य का उचित रूप से पोषण होता है। इसके
सेवन से मनुष्य सब रोगों से रहित हो जाता है और ऐसा पुष्ट
होता है जैसा जल से सींचा हुआ वृक्ष। इस घृत का नाम
'कामदेव' है, जो अत्यन्त गुणवान् है।
वक्तव्य- इस पाठ में-'पचेच्चैव घृताढकम्' तथा
'घृताढकं विपाचयेत्' दो बार कहा गया है। इसमें सन्देह
करने की आवश्यकता नहीं, घृत एक ही आढक डालना
चाहिये। यह योग चक्रदत्त रक्तपित्ताधिकार में भी है, जिसको
देखने से आपके सन्देह की निवृत्ति हो जायेगी।
पानीयकल्याणक घृत
त्रिफला द्वे निशे कौन्ती सारिवे द्वे प्रियङ्गुका।
शालिपर्णी पृश्निपर्णी देवदार्व्येलवालुकम्।। 38।।
नतं विशाला दन्ती च दाडिमं नागकेशरम्।
नीलोत्पलैला मञ्जिष्ठा विडङ्गं कुष्ठपद्मकम्।। 39 ।।
जातिपुष्पं चन्दनं च तालीसं बृहती तथा।
एतैः कर्षसमैः कल्कैर्जलं दत्त्वा चतुर्गुणम्।। 40 ।।
घृतप्रस्थं पचेद्धीमानपस्मारे ज्वरे क्षये।
उन्मादे वातरक्ते च कासे मन्दानले तथा।। 41 ।।
प्रतिश्याये कटीशूले तृतीयक-चतुर्थके।
मूत्रकृच्छ्रे विसर्पे च कण्डूपाण्ड्वामये तथा।। 42 ।।
विषद्वये प्रमेहेषु सर्वथैवोपयुज्यते।
वन्ध्यानां पुत्रदं भूतयक्षरक्षोहरं स्मृतम् ।। 43 ।।
हरड़, बहेड़ा, आँवला, दारूहल्दी, हल्दी, सम्भालू के
बीज अथवा पत्ते, सारिवा, कृष्णसारिवा, प्रियंगु, शालपर्णी,
पिठवन, देवदारु, एलुवा (सुगन्धित द्रव्य), तगर, इन्द्रायण
की जड़, दन्ती, अनारदाना, नागकेसर, नीलकमल, इलायची,
मजीठ, वायविडंग, कूठ, पद्मकाठ, जाती (चमेली) के फूल,
सफेद चन्दन, तालीस पत्र तथा बनभण्टा की जड़ इन सबको
एक-एक तोला लेकर तथा कल्क बनाकर एक प्रस्थ (तीन
पाव चार तोला) घृत में डाल दें और घी से चौगुना जल
डालकर विधिपूर्वक पाक करे। तैयार होने पर इसका प्रयोग
अपस्मार (मिरगी), ज्वर (जीर्णज्वर), क्षय (यक्ष्मा), उन्माद,
वातरक्त, कास, मन्दाग्नि, प्रतिश्याय, कमर की पीड़ा, तृतीयक
एवं चतुर्थक ज्वर, मूत्रकृच्छ्र, खुजली, पाण्डुरोग स्थावर तथा
जंगम विष और प्रमेहों में किया जाता है। यह घृत बन्ध्याओं
को पुत्र देता है और भूत, यक्ष तथा राक्षसों को हरता है।
वक्तव्य- भूत, यक्ष तथा राक्षसों के आवेश से जो उन्माद
आदि रोग हो जाते हैं, उनमें इसका प्रयोग करना चाहिये।
बन्ध्याओं के गर्भाशय तथा डिम्ब के विकारों को दूर करके
यह गर्भाधान शक्ति देता है।
अमृता घृत
अमृताक्वाथकल्काभ्यां सक्षीरं विपचेद् घृतम्।
वातरक्तं जयत्याशु कुष्ठं जयति दुस्तरम्।। 44 ।।
गिलोय का क्वाथ तथा कल्क करके दुग्ध सहित घृत
का परिपाक कर लें। यह घृत वातरक्त तथा दुःसाध्य कुष्ठ को
जीतता है।
वक्तव्य- इस घृत में द्रव्यों के परिमाण का उल्लेख नहीं
किया गया है, अतः इसका पाक इस प्रकार करना चाहिये-घृत
एक सेर गुडूची कल्क एक पाव, गुडूची क्वाथ तीन सेर और
दुग्ध एक सेर। यहाँ चरक तथा सुश्रुत का भी मत है।
महापञ्चतिक्त घृत
सप्तच्छदः प्रतिविषा शम्याकः कटुरोहिणी।
पाठा मुस्तमुशीरं च त्रिफला पर्पयस्तथा।। 45 ।।
पटोलनिम्बमञ्जिष्ठाः पिप्पली पद्मकं शठी।
चन्दनं धन्वयासश्च विशाले द्वे निशे तथा।। 46 ।।
गुडूची सारिवे द्वे च मूर्वा वासा शतावरी।
त्रायन्तीन्द्रयवा यष्टी भूनिम्बश्चाक्षभागिकाः ।। 47 ।।
घृतं चतुर्गुणं दद्याद् घृतादामलकीरसः।
द्विगुणः सर्पिषश्चात्र जलमष्टगुणं भवेत्।। 48 ।।
तत्सिद्धं पाययेत् सर्पिर्वातरक्तेषु सर्वथा।
कुष्ठानि रक्तपित्तं च रक्तांशांसि च पाण्डुताम्।। 49 ।।
हृद्रोगगुल्मवीसर्पप्रदरं गण्डमालिकाम्।
क्षुद्ररोगान् ज्वराँश्चैव महातिक्तामिदं जयेत् ।। 50 ।।
छतिवन, अतीस, अमलतास की गुद्दी, कुटकी, पाठा,
नागरमोथा, खस, हरड़, बहेड़ा, आँवला, पित्तपापड़ा, परवल
की पत्ती, नीम की छाल, मजीठ, पीपल, पद्मकाठ, कचूर,
सफेद चन्दन, धमासा, इन्द्रायण का जड़, हल्दी, दारूहल्दी,
गिलोय, सारिवा, कृष्णसारिवा, मरोड़फली, अडूसा, शतावर,
त्रायमाणा, इन्द्रजौ, मुलहठी तथा चिरायता-ये सब द्रव्य 1-1
तोला, सभी द्रव्यों से चौगुना (1 सेर 9 छटाँक 3 तोला) घृत,
घी से दुगुना आँवला का स्वरस और घी से आठ गुना जल।
औषधियों का कल्क बनाकर सब वस्तुओं को एक साथ
मिलाकर परिपाक करे, तैयार होने पर छानकर रख लें। इस

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 149

घृत को वातरक्त में अवश्य पिलाना चाहिये। यह घृत कुष्ठ,
रक्तपित्त, रक्तार्श (खूनी बवासीर), पाण्डुरोग, हृद्रोग, गुल्म,
विसर्प, प्रदर, गण्डमाला, क्षुद्ररोग (शीतला आदि रोगों) तथा
ज्वरों (जीर्णज्वरों) को जीतता है। इसका नाम 'महापञ्चतिक्त
घृत' है।
वक्तव्य-उक्त योग का वर्णन चरक चि० अ० 7 में है।
वहाँ 'आमलकी रसः' के स्थान में 'अमृतबलानाम्' पाठ
दिया है।

कासीसादि घृत
कासीसं द्वे निशे मुस्तं हरितालं मनःशिलाम्।
कम्पिल्लकं गन्धकं च विडङ्गं गुगुलुं तथा।।51।।
सिक्थकं मरिचं कुष्ठं तुत्थकं गौरसर्षपान्।
रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासं रक्तचन्दनम्।।52।।
इरिमेदं निम्बपत्रं करञ्जं सारिवां वचाम्।
मञ्जिष्ठां मधुकं मांसीं शिरीषं लोध्रपद्मकम्।।53।।
हरीतकीं प्रपुन्नाटं चूर्णयेत् कार्षिकान् पृथक्।
ततस्तच्चूर्णमालोड्य त्रिंशत्पलमिते घृते।।54।।
स्थापयेत् ताम्रपात्रे च घर्मे सप्तदिनावधि।
अस्याभ्यङ्गेन कुष्ठानि दद्रूपामाविचर्चिकाः।।55।।
शूकदोषा विसर्पाश्च विस्फोटा वातरक्तजाः।
शिरःस्फोटोपदंशाश्च नाडीदुष्टव्रणानि च।।56।।
शोथो भगन्दरश्चैव लूताः शाम्यन्ति देहिनाम्।
शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं घृतम्।।57।।
हीरा, कासीस, हल्दी, दारुहल्दी, नागरमोथा, हरिताल,
मैनसिल, कवीला, गन्धक, वायविडंग, मोम, मरिच, कडुवा
कूट, तूतिया, सफेद सरसों, रसवत, सिन्दूर, राल, लालचन्दन,
खैरसार, (कत्था), नीम के पत्ते (सूखे), करञ्ज के पत्ते या
बीज, सारिवा, वच, मजीठ, लोध्र, पद्माकाठ, हरड़ तथा चक्रमर्द
(चकवड़ या बनाड़) के बीज प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण (1½
सेर) घृत में मिलाकर और ताम्रपात्र में डालकर सात दिनों
तक धूप में रखना चाहिये। इसके अभ्यंग (मालिश) से कुष्ठ,
दाद, पामा खुजली, विचर्चिका, शूकदोष, विसर्प, वातरक्त-
जनित विस्फोट (फफोले या फुन्सियाँ), शिर के फोड़े, उपदंश,
नाड़ीव्रण, दुष्टव्रण, शोथ (फोड़ों के आसपास का), भगन्दर
तथा लूता (मकड़ी) के विकार शान्त हो जाते हैं। यह घृत
शोधन (व्रण को शुद्ध करने वाला), रोपण (घाव को भरने
वाला) तथा त्वचा के दागों को मिटाने वाला है।


वक्तव्य-यह 'कासीसादि घृत' एक उत्तम मलहम है।
उक्त द्रव्यों का अत्यन्त बारीक चूर्ण कर लेना चाहिये। कासीस,
हरताल, मैनसिल, गन्धक, तथा तूतिया को पृथक्-पृथक्
भली-भाँति पीसना चाहिये। रसवत तथा गूगल को जल में
विलीन करके काष्ठ औषधियों के चूर्ण में मिला या मसलकर
धूप में सुखा लेना चाहिये। मोम को पोटली में बाँधकर घी में
पिघला लिया जाता है। फिर सब द्रव्यों के चूर्ण को मिलाकर
धूप में रख देना चाहिये। व्रणों के शोधन में तो इसी प्रकार
लगाना ही चाहिये, किन्तु व्रण-रोपण के समय इसमें समान
भाग घृत और मिलाकर थोड़ा कपूर मिलाकर लगाना चाहिये।
यह वस्तुतः लेखन या शोधन मलहम है, अतएव लगता भी
है। कभी-कभी तो इतना लगता है कि रोगी सहन भी नहीं
कर सकता। इसलिये इसमें और घी तथा कपूर मिला लेना
चाहिये। इसमें मिलाने के लिए करञ्ज के बीजों को भूनकर
उनका चूर्ण बनाना चाहिये। इस घृत का केवल बाहरी प्रयोग
ही किया जाता है।

जात्यादि घृत
जातीनिम्बपटोलं च द्वे निशे कटुरोहिणी।
मञ्जिष्ठा मधुकं सिक्थं करञ्जोशीरसारिवाः।।58।।
तुत्थं च विपचेत् सम्यक्कल्कैरेभिर्घृतं बुधः।
अस्य लेपात् प्ररोहन्ति सूक्ष्मनाडीव्रणा अपि।।59।।
मर्माश्रिताः क्लेदिनश्च गम्भीराः सरुजो व्रणाः।
चमेली, नीम एवं परवल के पत्ते, दारुहल्दी, हल्दी,
कुटकी, मजीठ, मुलेठी, मोम, करञ्ज के पत्ते अथवा बीज,
खस, सारिवा, एवं तूतिया-इन सब द्रव्यों का मोम को छोड़कर
कल्क बनाकर तथा कल्क से चौगुने घृत में डालकर, घृत से
चौगुना जल डालकर पाक करे। जब पाक सिद्ध हो जाये तो
इसमें मोम डाल दें। मोम के पिघल जाने पर उसे गरम-गरम
छान लें। इस घृत के लेप से सूक्ष्म नासूर भी भर जाते हैं और
मर्मस्थानों में आश्रित, सड़े हुये, गहरे एवं पीड़ायुक्त व्रण
(घाव) भी शान्त हो जाते हैं।
वक्तव्य-इस मलहम में भिगोई हुई बत्ती नासूर के घाव
में चढ़ायी जाती है। अन्य व्रणों में यह कपड़े पर चुपड़ कर
लगा दी जाती है।

षड्बिन्दु घृत
चित्रकः शङ्खिनी पथ्या कम्पिल्लस्त्रिवृतायुगम्।।60।।
वृद्धदारुश्च शम्पाको दन्ती दन्तीफलं तथा।

150 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे

[Header]
150 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे

[Left Column]
कोशातकी देवदाली नीलिनी गिरिकार्णिका ।। 61 ।।
सातला पिप्पलीमूलं विडङ्गं कटुकी तथा।
हेमक्षीरी च विपचेत् कल्कैरेभिः पिचून्मितैः ।। 62 ।।
घृतप्रस्थं स्नुहीक्षीरं षट्पले तु पलद्वयम्।
अर्कक्षीरस्य मतिमांस्तत्सिद्धं गुल्मकुष्ठहृत् ।। 63 ।।
हन्ति शूलमुदावर्त्त शोथाध्मानं भगन्दरम्।
शमयत्युदराण्राष्टौ निपीतं बिन्दुसङ्ख्यया ।। 64 ।।
गोदुग्धेनोष्ट्रदुग्धेन कौलत्थेन शृतेन वा।
उष्णोदकेन वा पीत्वा बिन्दुवेगैर्विरेचयेत् ।। 65 ।।
एतद् बिन्दुघृतं नाम नाभिलेपाद् विरेचयेत्।
चीता की जड़, शंखपुष्पी (शंखाहुली), हरड़, कबीला,
सफेद निसोत, कालीनासोत, विधारा, अमलतास, दन्ती,
जमालगोटा, कड़वी तोरई, वन्दाल, नील के पत्ते, गिरिकर्णिका
(इसपन्द), सतवन, पीपलामूल, वायविडंग, कुटकी एवं चोक
(सत्यानाशी की जड़)-इन सब द्रव्यों को एक-एक कर्ष
(1-1 तोला) लेकर कल्क बनायें। घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4
तोला), सेहुण्ड (थूहर) का दूध छः पल (24 तोला) और
मदार (आक) का दूध दो पल (8 तोला), इन सबको एक
साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। जब पाक सिद्ध हो जाये
तो छानकर रख लें। यह घृत वायुगोला एवं कुष्ठ को हरता है,
शूल, उदावर्त्त, शोथ, अफरा, भगन्दर एवं आठ प्रकार के
उदररोगों को शान्त करता है। इसकी मात्रा बूँदों को गिनकर
निर्धारित की जाती है। गाय का दूध, ऊँटनी का दूध, कुलथी
का क्वाथ एवं उष्ण जल में डालकर पीने से बिन्दुओं की
संख्या (गिनती) के अनुसार विरेचन (दस्त) होते हैं, अतएव
इसका नाम 'बिन्दुघृत' है और यह उदर पर लेप करने से भी
विरेचन करता है।
वक्तव्य-इस 'षड्बिन्दु घृत' में सभी द्रव्य दस्तावर हैं।
अतः यह घृत उच्चकोटि का विरेचक है। इसकी मात्रा बिन्दु
या बूँद के परिमाण में दी जाती है। यद्यपि कहा गया है कि
जितने बिन्दु पीयें जायें उतने दस्त होते हैं, किन्तु दस्तों
की-संख्या कोष्ठ की मृदुता तथा क्रूरता पर निर्भर करती है।
एरण्ड के तेल की भाँति यह भी उदर पर लगाने से विरेचन
कराता है। एक बात का भली-भाँति स्मरण रखना चाहिये
कि औषधियाँ शरीर में किसी भी मार्ग से प्रविष्ट होकर उसी
अवयव पर अपना प्रभाव डालती हैं, जहाँ पर आवश्यकता
होती है। देखने में आता है कि सेर दो सेर जमालगोट को
शुद्ध करते समय निरन्तर दो-तीन दिन तक छीलने वाले

[Right Column]
व्यक्ति को दस्त लग जाते हैं, मूत्रल पदार्थों का पेट पर लेप
करने से मूत्रबन्ध खुल जाता है, इत्यादि। तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का जहाँ पर औषधि का प्रयोग किया जाता है, उस
स्थान से जहाँ पर रोग है भले ही सीधा सम्बन्ध न हो, तथापि
औषधि का प्रभाव उसी स्थान पर होता है, जहाँ पर रोग
होता है।
त्रिफला घृत
त्रिफलाया रसप्रस्थं प्रस्थं वासारसोद्भवम् ।। 66 ।।
भृङ्गराजरसप्रस्थं प्रस्थमाजं पयः स्मृतम्।
दत्त्वा तत्र घृतप्रस्थं कल्कैः कर्षमितैः पृथक् ।। 67 ।।
त्रिफला पिप्पली द्राक्षा चन्दनं सैन्धवं बला।
काकोली क्षीरकाकोली मेदा मरिचनागरम् ।। 68 ।।
शर्करा पुण्डरीकं च कमलं च पुनर्नवा।
निशायुग्मं च मधुकं सर्वैरेभिर्विपाचयेत् ।। 69 ।।
नक्तान्ध्यं नकुलान्ध्यं च कण्डूं पिल्लं तथैव च।
नेत्रस्त्रावं च पटलं तिमिरं काचकं जयेत् ।। 70 ।।
अन्येऽपि प्रशमं यान्ति नेत्ररोगाः सुदारुणाः।
त्रैफलं घृतमेतद्धि पाने नस्यादिषूचितम् ।। 71 ।।
त्रिफला का रस या क्वाथ एक प्रस्थ (64 तोला), अडूसा
का रस एक प्रस्थ, भाँगरा का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध
एक प्रस्थ, इन सब द्रवों में एक प्रस्थ घृत डालकर निम्नलिखित
द्रव्यों का कल्क डालकर परिपाक करना चाहिये। वे द्रव्य
हैं-हरड़, बहेड़ा, आँवला, पिप्पली, मुनक्का, सफेद चन्दन,
सेंधा नमक, बरियारा, काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में
अश्वगन्धा दो कर्ष), मेदा (शतावरी), मरिच, सोंठ, खाँड,
नीलकमल, पुनर्नवा, दारुहल्दी एवं हल्दी प्रत्येक द्रव्य 1-1
तोला। इस घृत का सेवन करने से नक्तान्ध्य (रतौन्धी),
नकुलान्ध्य (नेवला के समान आँखें चमकती हैं और दिखलायी
नहीं पड़ता), आँख की खुजली, पिल्ल (नामक नेत्ररोग
देखें-वा० उ० अ० 16), नेत्रस्राव (उलका), पटलगत रोग,
तिमिर (धुन्ध) एवं काच (मोतिया) नामक रोग को जीतता
है। इसके सेवन से और भी भयानक नेत्ररोग शान्त हो जाते
हैं। इसका नाम 'त्रिफला घृत' है। इसका प्रयोग पीने, नस्य,
नेत्र-तर्पण आदि में किया जाता है।
गौराद्य घृत
द्वे हरिद्रे स्थिरा मूर्वा सारिवा चन्दनद्वयम्।
मधुपर्णी च मधुकं पद्मकेशरपद्मकैः ।। 72 ।।

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 151

उत्पलोशीरमेदाभिस्त्रिफलापञ्चवल्कलैः ।
कल्कैः कर्षमितैरेतैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७३ ॥
विसर्पलूताविस्फोटविषकीटव्रणापहम् ।
गौराद्यमिति विख्यातं सर्पिर्विषहरं परम् ॥ ७४ ॥

हल्दी, दारुहल्दी, शालपर्णी, सारिवा, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, गिलोय, मुलेठी, कमलकेसर, पद्माकाठ, रक्तकमल, खस, मेदा (अभाव में शतावरी), हरड़, बहेड़ा, आँवला, पञ्चवल्कल (वट, गूलर, पाकर, पीपल एवं वेतस की छाल) प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष लेकर एवं कल्क बनाकर एक प्रस्थ घृत (64 तोला) तथा घृत से चौगुना जल डालकर परिपाक करना चाहिये। यह घृत विसर्प, लूता, विस्फोट (बड़ी माता), कीट विष (कीड़ों के काटने पर) एवं व्रणों को नष्ट करता है। इसका नाम 'गौराद्य घृत' है। यह उत्तम विषनाशक है।

वक्तव्य-गौराद्य घृत का पाठ चक्रदत्त के व्रणशोथाधिकार में भी है, किन्तु द्रव्यों में कुछ हेर-फेर है। इस घृत का प्रायः बाहरी प्रयोग किया जाता है।

मयूर घृत
बलामधूकरास्नाभिर्दशमूलफलत्रिकैः ।
पृथग्द्विपलिकैरेभिर्द्रोणनीरेण पाचयेत् ॥ ७५ ॥
मयूरं पक्षपित्तान्त्रयकृत्पादास्यवर्जितम्।
पादशेषं शृतं नीत्वा क्षीरं दत्त्वा च तत्समम् ॥ ७६ ॥
घृतप्रस्थं पचेत् सम्यग्जीवनीयैः पिचून्मितैः ।
तत्सिद्धं शिरसः पीडां मन्यापृष्ठग्रहं तथा ॥ ७७ ॥
अर्दितं कर्णनासाक्षिजिह्वागलरुजो जयेत्।
पाने नस्ये तथाभ्यङ्गे कर्णपूरेषु युज्यते ॥ ७८ ॥
हेमन्तकालशिशिरवसन्तेषु च शस्यते।

बरियारा, मुलेठी, रास्ना, दशमूल एवं त्रिफला प्रत्येक द्रव्य (8-8 तोला) लेकर जौकुट करके एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में डालकर रख दें। प्रातःकाल इसमें पंख, पित्ताशय, आँतड़ी, यकृत, पाँव एवं मुखरहित मोर (अर्थात् मोर के मांस) को डालकर क्वाथ करे। जब चतुर्थांश अवशिष्ट रह जाये तो छान लें, तत्पश्चात् इस क्वाथ के समान भाग अर्थात् एक आढक (3 सेर 16 तोला) दूध डालकर और जीवनीयगण के प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर और कल्क बनाकर तथा एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) घृत लेकर सबको एक साथ मिलाकर परिपाक करना चाहिये। जब सिद्ध हो जाये तो छानकर रख लेना चाहिये। यह घृत शिर की पीड़ा को, मन्याग्रह (वातव्याधि), पृष्ठग्रह (पीठ की जकड़न), अर्दित (लकवा) तथा कान, नाक, आँख, जीभ एवं केश सम्बन्धी रोगों को जीतता है। पीने में, नस्य में, अभ्यंग (मालिश) में एवं कर्णपूरण (कान में डालने) में इस घृत का प्रयोग किया जाता है। हेमन्त (मार्गशिर एवं पौष), शिशिर (माघ एवं फाल्गुन) तथा वसन्त (चैत्र एवं वैशाख) ऋतु में इस घृत का सेवन करना उत्तम है।

फल घृत
त्रिफला मधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी ॥ ७९ ॥
विडङ्गं पिप्पली मुस्ता विशाला कट्फलं वचा।
द्वे मेदे द्वे च काकोल्यौ सारिवे द्वे प्रियङ्गुका ॥ ८० ॥
शतपुष्पा हिङ्गु रास्ना चन्दनं रक्तचन्दनम्।
जातीपुष्पं तुगाक्षीरी कमलं शर्करा तथा ॥ ८१ ॥
अजमोदा च दन्ती च कल्कैरेतैश्च कार्षिकैः ।
जीवद्वत्सैकवर्णाया घृतप्रस्थं च गोः क्षिपेत् ॥ ८२ ॥
चतुर्गुणेन पयसा पचेदारण्यगोमयैः ।
सुतिथौ पुष्यनक्षत्रे मृद्भाण्डे ताम्रजे तथा ॥ ८३ ॥
ततः पिबेच्छुभदिने नारी वा पुरुषोऽथवा।
एतत्सर्पिर्नरः पीत्वा स्त्रीषु नित्यं वृषायते ॥ ८४ ॥
पुत्राननुत्पादयेद्धीमान् वन्ध्यापि लभते सुतम् ।
अनायुषं या जनयेद् या च सूता पुनः स्थिता ॥ ८५ ॥
पुत्रं प्राप्नोति सा नारी बुद्धिमन्तं शतायुषम् ।
एतत्फलघृतं नाम भारद्वाजेन भाषितम् ॥ ८६ ॥
अनुक्तं लक्ष्मणामूलं क्षिपेत् तत्र चिकित्सकः ।

हरड़, बहेड़ा, आँवला, मुलेठी, कूठ-मीठा, दारुहल्दी, हल्दी, कुटकी, वायविडंग, पीपल, नागरमोथा, इन्द्रायण की जड़, कायफल, वच, मेदा, महामेदा (अभाव में शतावरी दूनी), काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में दूनी अश्वगन्धा), सारिवा, कृष्णसारिवा, फूलप्रियंगु, सौंफ, हींग, रास्ना, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, चमेली के फूल, वंशलोचन, कमल, चीनी, अजमोदा तथा दन्ती (जमालगोटा) प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर कल्क बना लें। जीवित बछड़े वाली एक वर्ण की गाय का घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तथा घृत से चौगुना दूध लेकर इन सब वस्तुओं को एक साथ मिलाकर जंगली उपलों (कण्डों या गोहरों) की अग्नि द्वारा उत्तम तिथियों (नन्दा, भद्रा, जया तथा पूर्णा तिथियाँ) में पुष्यनक्षत्र के दिन मिट्टी अथवा ताम्र के पात्र में परिपाक करना आरम्भ करें। जब तैयार हो जाये तो किसी शुभ दिन में

152 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे

152 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे

स्त्री अथवा पुरुष इस घृत का सेवन करना प्रारम्भ करें। इस
घी को पीकर कुछ सप्ताहों तक मनुष्य प्रतिरात्रि स्त्रियों में वृष
के समान मैथुन सामर्थ्य प्राप्त कर पुत्रों को उत्पन्न कर सकता
है। इस घृत को पीकर बन्ध्या स्त्री भी पुत्र को जन्म दे सकती
है। जो स्त्री अल्पायु (छोटी ही आयु में मर जाने वाली)
सन्तान को उत्पन्न करती है अथवा जो स्त्री एक ही सन्तान
पैदाकर पुनः गर्भवती नहीं होती है, वह भी बुद्धिमान् शतायु
(सौ वर्ष जीने वाले) पुत्र को जनती है। इस घृत का नाम
'फल घृत' है। इसका उपदेश सर्वप्रथम महर्षि भारद्वाज ने
किया। यद्यपि इसमें कहा नहीं है, तथापि चिकित्सक का
कर्तव्य है कि इस घी में 'लक्ष्मणा' नामक औषधि की जड़
का प्रयोग अवश्य करें।

वक्तव्य-उक्त घृत पुरुषों के शुक्रदोषों को तथा स्त्रियों
के योनिरोगों (गर्भाशय, आर्तव आदि) को दूर करता है।
लक्ष्मणा को कल्क द्रव्यों के साथ ही पीस डालना चाहिये।
खेद है कि लक्ष्मणा जैसी दिव्य औषधि आज सन्देह में पड़
गयी है। कुछ लोगों का कथन है कि 'पुत्रक या पुतली या
गुड़िया के आकार वाले लाल-लाल तथा छोटे-छोटे बिन्दुओं
से युक्त पत्रों तथा बकरे की-सी गन्ध वाली एक औषधि का
नाम लक्ष्मणा है। श्रीभावमिश्र ने अपने भावप्रकाश, निघण्टु में
दोनों का ही उल्लेख किया है।

दूसरा फल घृत
त्रिफलां द्वे सहचरे गुडूचीं सपुनर्नवाम् ।। 87 ।।
शुकनासां हरिद्रे द्वे रास्नां मेदां शतावरीम्।
कल्कीकृत्य घृतप्रस्थं पचेत् क्षीरे चतुर्गुणे ।। 88 ।।
तत्सिद्धं पाययेन्नारीं योनिशूलनिपीडिताम् ।
पीडिता चलिता या च निःसृता विवृता च या ।। 89 ।।
पित्तयोनिश्च विभ्रान्ता षण्ढयोनिश्च या स्मृता।
प्रपद्यन्ते हि ताः स्थानं गर्भं गृह्णन्ति चासकृत् ।। 90 ।।
एतत्फलघृतं नाम योनिदोषहरं परम्।

हरड़, बहेड़ा, आँवला, कटसरैया (लाल पुष्प वाली),
पियावांसा (पीतपुष्पका), गिलोय, पुनर्नवा, सोनापाठा, हल्दी,
दारुहल्दी, रास्ना, मेदा एवं शतावर-इन सब द्रव्यों को (4
पल या 16 तोला) लेकर कल्क बना लें फिर एक प्रस्थ (64
तोला) घी तथा घी से चौगुना दूध लेकर और सबको एक
साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। जब पाक सिद्ध हो
जाये तो यह घृत योनिशूल से पीड़ित स्त्री को पिलाना चाहिये।
पीड़िता (विलुप्ता) अर्थात् जिस योनि में सर्वदा पीड़ा होती

रहती है, चलिता (प्रस्रंसिनी) अर्थात् जो अपने स्थान से
खिसक जाती है, निःसृता अर्थात् भग-प्रदेश से बाहर निकल
आयी हो, विवृता (महा्योनि) अर्थात् जिसके मुख में संकोचन
शक्ति न रह जाये। पित्तदोष से होने वाले पाँच योनि-विकार,
विभ्रान्ता (योनि के मुख का घूम जाना) तथा षण्ढयोनि,
जिससे स्त्री को न आर्तव ही होता है और न स्तन-वृद्धि ही
होती है इस प्रकार की जो योनियाँ (गर्भाशय) होती हैं, वे
अपने स्थान को प्राप्त हो जाती हैं अर्थात् उक्त विकारों से
रहित हो जाती हैं और बार-बार गर्भ को धारण करती हैं। इस
घृत का नाम भी 'फल घृत' है और यह सभी प्रकार के
योनिदोषों को हरता है।

वक्तव्य-इस योग में भी जीवित बछड़े तथा एकवर्ण
वाली गाय का घी तथा दूध लेना चाहिये। इसे पकाने के लिए
वनकण्डों का ही उपयोग करना चाहिये। यहाँ योनि का
अभिप्राय गर्भाशय से है। इस योनि में कल्क के परिमाण का
उल्लेख नहीं है, अतः परिभाषा के अनुसार स्नेह से चतुर्थांश
कल्क लेना चाहिये।

पञ्चतिक्त घृत
वृषनिम्बामृताव्याघ्रीपटोलानां शृतेन च ।। 91 ।।
कल्केन पक्वं सर्पिस्तु निहन्याद् विषमज्वरान् ।
पाण्डुं कुष्ठं विसर्प च कृमीनशांसि नाशयेत् ।। 92 ।।

अडूसा, नीम की छाल, गिलोय, कण्टकारी तथा परवल
की पत्ती के क्वाथ तथा कल्क के साथ मिलाकर पकाया
हुआ घृत सेवन करने से विषमज्वरों को नष्ट करता है और
पाण्डुरोग, कुष्ठ, विसर्प, कृमि तथा अर्श को नष्ट करता है।

वक्तव्य-परिभाषा में कही गयी विधि के अनुसार ही
इस घृत को बनाना चाहिये। यहाँ तक घृतों के निर्माण का
वर्णन किया गया है। इससे आगे तैलों का निर्माण बतलाया
जायेगा। यदि आप तैलों को सुन्दर तथा रक्तवर्ण का बनाना
चाहें तो तैयार हो जाने पर अथवा पकते समय थोड़ी 'रतनजोत'
डाल दें।

लाक्षादि तैल
लाक्षाढकं क्वाथयित्वा जलस्य चतुर्राढकैः।
चतुर्थांशं शृतं नीत्वा तैलप्रस्थे विनिक्षिपेत् ।। 93 ।।
मस्वाढकं च गोदध्नस्तत्रैव विनियोजयेत्।
शतपुष्पामश्वगन्धां हरिद्रां देवदारु च ।। 94 ।।
कटुकीं रेणुकां मूर्वा कुष्ठं च मधुपष्टिकाम्।
चन्दनं मुस्तकं रास्नां पृथक् कर्षप्रमाणतः ।। 95 ।।

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 153

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 153

[बायाँ स्तम्भ]
चूर्णयेत् तत्र निक्षिप्य साधयेन्मृदुवह्निना।
अस्याभ्यङ्गात्प्रशाम्यन्ति सर्वेऽपि विषमज्वराः ॥ ९६ ॥
कासश्वासप्रतिश्यायत्रिकपृष्ठग्रहास्तथा ।
वातं पित्तमपस्मारमुन्मादं यक्षराक्षसान् ।। ९७ ।।
कण्डूं शूलं च दौर्गन्ध्यं गात्राणां स्फुरणं जयेत्।
पुष्टगर्भा भवेदस्य गर्भिण्यभ्यङ्गतो भृशम् ।। ९८ ।।
एक आढक (3 सेर 3 पाव 4 तोला) पीपल या बेर
(बेरी की लाही = लाख) को चार आढक जल में क्वथित
करे, चौथायी शेष रहने पर छानकर क्वाथ को एक प्रस्थ (64
तोला) तिल के तैल में डाल दें और इसी में गाय के दही का
जल एक आढक मिला दें, फिर सौंफ, असगन्ध, हल्दी,
देवदारु, कुटकी, सम्भालू के बीज, मरोड़फली, कूठ, मुलेठी,
सफेदचन्दन, नागरमोथा तथा रास्ना प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला
परिमाण में लेकर पीसकर कल्क बना लें। फिर सबको एक
साथ मिलाकर मन्दाग्नि द्वारा विधिपूर्वक परिपाक करें। इस
तैल के अभ्यंग (मालिश) से सब प्रकार के विषमज्वर तथा
कास, श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम) तथा कमर और पीठ का
जकड़न आदि शान्त हो जाते हैं। इस तैल (मालिश करने) से
वात-विकार, पित्त-विकार, अपस्मार (मिरगी), उन्माद
(पागलपन), यक्ष तथा राक्षस के आवेश (भूतबाधा), कण्डू
(खुजली), शूल (उदर की पीड़ा या हड्डियों की पीड़ा),
शरीर की दुर्गन्धि (बगलगन्ध आदि) तथा अंगों के स्फुरण
(फड़कना) को जीतता है और इसके निरन्तर अभ्यंग
(मालिश) करने से गर्भिणी का गर्भ पुष्ट होता है।
वक्तव्य-लाही या लाख का क्वाथ बहुत बड़े बरतन
(कड़ाही) में करना चाहिये और बराबर हिलाते या चलाते
रहना चाहिये अन्यथा लाही नीचे लगकर जल जायेगी। यह
स्मरण रखना चाहिये कि लाख काष्ठ औषधियों के समान
नहीं पकती, अपितु वह पिघल जाती है।
अङ्गारक तैल
(मूर्वा लाक्षा हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठा सेन्द्रवारुणी।
बृहती सैन्धवं कुष्ठं रास्ना मांसी शतावरी ।। ९९ ।।
आरनालाढके तत्र तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
तैलमङ्गारकं नाम सर्वज्वरविमोक्षणम् ।। १०० ।।)
मरोड़फली, लाही (लाख), दारुहल्दी, हल्दी, मजीठ,
इन्द्रायण की जड़, बनभण्टा, सेंधा नमक, कूठ, रास्ना, जटामांसी
तथा शतावर-इन सब द्रव्यों का कल्क (एक कुडुव या 16

[दायाँ स्तम्भ]
तोला) बना लें। आरनाल (काँजी) एक आढक (3 सेर या
16 तोला) और तिलतैल एक प्रस्थ (64 तोला), इन सबको
एक साथ मिलाकर अच्छी तरह परिपाक करें। इस तैल का
नाम 'अंगारक तैल' है। इसकी मालिश करने से सभी प्रकार
के ज्वरों से मुक्ति मिलती है।
वक्तव्य-काँजी कई प्रकार से बनायी जाती है, किन्तु
गुण सबका प्रायः समान ही होता है, क्योंकि सबका सन्धान
एक ही प्रकार से किया जाता है। आरनाल नामक काँजी के
निर्माण की विधि यह है- 'अरनालं तु गोधूमैरामैः स्यात्त्रिस्रुतैः
कृतैः। पक्वैर्वा सन्धितैस्तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः' ।। अर्थात् कच्चे
अथवा पके गेहूँ की काँजी को 'आरनाल' कहा जाता है।
किसी द्रव्य (पकोड़े, मूली, गाजर, राई, नमक, मिरच आदि)
को जल में डालकर दो तीन दिन तक रख देने से एक विशेष
प्रकार की गन्ध और रस की उत्पत्ति हो जाने पर 'काँजी'
तैयार हो जाती है।
नारायण तैल
अश्वगन्धां बलां बिल्वं पाटलां बृहतीद्वयम्।
श्वदंष्ट्राऽतिबला निम्बं स्योनाकं च पुनर्नवा ।। १०१ ।।
प्रसारिणीमग्निमन्थं कुर्याद् दशपलं पृथक् ।
चतुर्गुणे जले पक्त्वा पादशेषं शृतं नयेत् ।। १०२ ।।
तैलाढकेन संयोज्य शतावर्या रसाढकम्।
क्षिपेत् तत्र च गोक्षीरं तैलात् तस्माच्चतुर्गुणम् ।। १०३ ।।
शनैर्विपाचयेद्देभिः कल्कैर्द्विपलिकैः पृथक् ।
कुष्ठैला चन्दनं मूर्वा वचामांसी ससैन्धवैः ।। १०४ ।।
अश्वगन्धाबलारास्नाशतपुष्पेन्द्रदारुभिः ।
पर्णीचतुष्टयेनैव तगरेण च साधयेत् ।। १०५ ।।
तत्तैलं नावनऽभ्यङ्गे पाने बस्तौ च योजयेत् ।
पक्षाघातं हनुस्तम्भं मन्यास्तम्भं गलग्रहम् ।। १०६ ।।
खल्लत्वं बधिरत्वं च गतिभङ्गं कटिग्रहम् ।
गात्रशोषेन्द्रियध्वंसावसृक्शुक्रज्वरक्षयान् ।। १०७ ।।
अन्त्रवृद्धिं कुरण्डं च दन्तरोगं शिरोग्रहम् ।
पार्श्वशूलं च पाङ्गुल्यं बुद्धिहानिं च गृध्रसीम् ।। १०८ ।।
अन्यांश्च विषमान् वाताञ्जयेत् सर्वाङ्गसंश्रयान् ।
अस्य प्रभावाद् वन्ध्यापि नारी पुत्रं प्रसूयते ।। १०९ ।।
मर्त्यो गजो वा तुरगस्तैलादस्मात् सुखी भवेत् ।
यथा नारायणो देवो दुष्टदैत्यविनाशनः ।। ११० ।।
तथैवं वातरोगाणां नाशनं तैलमुत्तमम् ।

154 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

154 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
असगन्ध, बरियारा, बेल की गुदी, पाढल, बनभण्टा,
कण्टकारी, गोखरू, कंची, नीम की छाल, सोनापाठा, पुनर्नवा,
गन्धप्रसारिणी एवं अरणी प्रत्येक द्रव्य दस-दस पल (40-40
तोला) परिमित लेकर एवं जौकुट कर (आठ पहर तक भिगा
दें) चार द्रोण (51 सेर 16 तोला) जल में डालकर क्वाथ
करें। जब चतुर्थांश शेष रह जाये तो छानकर उस क्वाथ को
ले लें, फिर इस क्वाथ को एक आढक (3 सेर 16 तोला)
तिलतैल में मिला दें और उसमें शतावरी का स्वरस एक
आढक (3 सेर 16 तोला) डाल दें और तेल से चौगुना गाय
का दूध डालकर धीरे-धीरे पाक करें। तैयार होने पर उसमें
कूट, इलायची, सफेद चन्दन, बरियारा, जटामांसी, छरीला,
सेंधव नमक, असगन्ध, वच, रास्ना, सौंफ, देवदारु, शालपर्णी,
पृश्निपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी एवं तगर प्रत्येक द्रव्य दो-दो
पल (8-8 तोला) लेकर एवं कल्क बनाकर और उक्त तैल
में डालकर अत्यन्त मन्द आँच से उसका पाक करें। इस तैल
को नस्य, अभ्यङ्ग (मालिश), पीने एवं वस्ति (पिचकारी)
में प्रयुक्त करना चाहिये। यह तैल पक्षाघात (अर्द्धांग), हनुस्तम्भ
(मुख का खुला या बन्द रह जाना), मन्यास्तम्भ (गर्दन की
जकड़न), गलग्रह (गले की रुकावट), खल्ली (हाथ-पाँव
की ऐंठन), बधिरता (बहिरापन), गतिभंग (खञ्ज एवं
कलायखञ्ज का होना), कटिग्रह (कमर की जकड़न), गात्रशोष
(अंगों का सूखना), इन्द्रियध्वस (ज्ञानेन्द्रियों का दुर्बल हो
जाना), रक्तगत एवं शुक्रगत वातविकार, जीर्णज्वर, क्षय,
आन्त्रवृद्धि (आँत उतरना), अण्डवृद्धि, दन्तरोग, शिरोरोग,
पार्श्वशूल (पसली का दर्द), पंगुता, बुद्धि का ह्रास, गृध्रसी
एवं अन्यान्य भयानक एवं समस्त शरीर में होने वाले वायु के
रोगों को जीतता है। इसके प्रभाव से बन्ध्या (बाँझ) स्त्री भी
पुत्र उत्पन्न करती है। वातरोग से पीड़ित मनुष्य, हाथी एवं
घोड़ा भी इस तैल से सुखी हो जाता है। जैसे भगवान् नारायण
दुष्ट दैत्यों का विनाश करते हैं, वैसे ही यह उत्तम 'नारायण
तैल' वातरोगों का विनाश करता है।
वक्तव्य-यह नारायण तैल आयुर्वेद का सर्वश्रेष्ठ अतएव
सुप्रसिद्ध योग है। कल्क द्रव्यों में से सुगन्धित द्रव्यों को
अलग भी रख लिया जाता है और परिपाक हो जाने पर छानने
के पश्चात् पीसकर डाल दिया जाता है। दो-तीन सप्ताह में
तैल सुगन्धित हो जाता है अथवा सुगन्धि के लिए निम्नलिखित
द्रव्यों का प्रयोग भी किया जाता है।
सुगन्धितद्रव्य प्रयोग-विधि-'समङ्गानखकङ्कोल-
नलिकाजातिकोषकम् । त्वक्कुन्दुरुष्ककर्पूरतुरुष्कश्रीनिवास-
कम्। स्पृक्काकुङ्कुमस्तूरीं दद्यादत्रावतारिते' ।। अर्थात् मजीठ
अथवा नेत्रबाला, नाखूना, शीतलचीनी, नलिका (नालुका
नामक सुगन्धित द्रव्य) इनका वेदनायुक्त अंग पर लेप करने
से बहुत लाभ होता है। जावित्री, दालचीनी, कुन्दुरुष्क, कर्पूर,
तुरुष्क, श्रीनिवास, असवर्ग, केशर एवं कस्तूरी आदि सुगन्धित
द्रव्य पकाकर उतारे हुये तैल में डालना चाहिये।
वक्तव्य-तेलों को लाल रंग देने के लिये 'रतनजोत'
डाली जाती है। रतनजोत पाँच तोला को 20 तोला तैल में
पकाकर रख लेना चाहिये। इस प्रकार तैल का रंग तैयार हो
जाता है। इसे आवश्यकतानुसार तैल को रंगीन करने के लिए
काम में लाना चाहिये।
वारुणी तैल
(वारुण्या औत्तरं मूलं कुट्टितं तु पलत्रयम् ।। 111 ।।
पलद्वादशकं तैलं क्षणं वह्नौ विपाचितम् ।
निष्कत्रयं भक्तयुक्तं सेवेतास्माद् विनश्यति ।। 112 ।।
हस्तकम्पः शिरःकम्पः कम्पो मन्याशिराभवः ।)
इन्द्रायण की उत्तम (जो घुनी न हो) जड़ का चूर्ण तीन
पल (12 तोला), तैल बारह पल (48 तोला) दोनों को
मिलाकर अग्नि पर चढ़ाकर थोड़ी देर तक पकायें, जब चूर्ण
तैल पर तैरने लगे और लाल-सा हो जाये तो उतार कर
छानकर रख लें (इस तैल की मात्रा तीन निष्क या शाण या
बारह आना भर है)। इसे भात के (एक-दो ग्रास में मिलाना
चाहिये, अन्यथा सब भात कडुवा हो जायेगा) साथ मिलाकर
खाना चाहिये। इससे हाथ का, शिर का और मन्या एवं शिराओं
का काँपना या फड़कना नष्ट हो जाता है।
वक्तव्य-इसका प्रभाव वातव्याधि के रूप में हुये कम्पन
को ठीक करते देखा जाता है, किन्तु वृद्धावस्था के कारण
उत्पन्न कम्पन में नहीं।
बलादि तैल
बलामूलकषायेण दशमूलशृतेन च ।। 113 ।।
कुलत्थयवकोलानां क्वाथेन पयसा तथा।
अष्टाष्टभागयुक्तेन भागमेकं च तैलकम् ।। 114 ।।
गणेन जीवनीयेन शतावर्येन्द्रदारुणा ।
मञ्जिष्ठाकुष्ठशैलैयतगरागुरुसैन्धवैः ।। 115 ।।

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 155

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 155

वचापुनर्नवामांसीसारिवाद्ययपत्रकैः ।
शतपुष्पाश्वगन्धाभ्यामेलया च विपाचयेत् ।। 116 ।।
गर्भार्थिनीनां नारीणां नराणां क्षीणरेतसाम्।
व्यायामक्षीणगात्राणां सूतिकानां च युज्यते ।। 117 ।।
राजयोग्यमिदं तैलं सुखिनां च विशेषतः ।
बलातैलमिति ख्यातं सर्ववातामयापहम् ।। 118 ।।
बरियारा की जड़ का क्वाथ 8 सेर, दशमूल का क्वाथ 8
सेर, कुलथी, जौ एवं बेरी की छाल का क्वाथ 8-8 सेर, दूध
(गाय का) 8 सेर, तिल का तैल 1 सेर और जीवनीयागण
(जीवन्ती, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, काकोली, क्षीरकाकोली,
जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा और मुलेठी) के द्रव्य,
शतावर, देवदारु, मजीठ, कूठ, छड़ीला, तगर, अगुरु, सेंधा
नमक, वच, पुनर्नवा, जटामांसी, सारिवा, अनन्तमूल, तेजपत्ता
सौंफ, असगन्ध एवं छोटी इलायची इन सब द्रव्यों का कल्क
1 पाव अर्थात् तैल से चतुर्थांश। उक्त सब क्वाथ दूध, तैल
एवं कल्क को एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना
चाहिये। गर्भाधान की अभिलाषिणी स्त्रियों को, क्षीणशुक्र
पुरुषों को, अति व्यायाम से शुष्क शरीर वालों को एवं प्रसूता
स्त्रियों को इस तैल का सेवन (खाने एवं लगाने में) करना
चाहिये। यह तैल राजाओं तथा सुखी मनुष्यों के सेवन करने
योग्य है। इसका नाम 'बलादि तैल' है। यह उक्त सभी रोगों
को नष्ट करता है।

प्रसारिणी तैल
प्रसारणीपलशतं जलद्रोणेन पाचयेत्।
पादशिष्टः शृतो ग्राह्यस्तैलं दधि च तत्समम्।। 119 ।।
काञ्जिकं च समं तैलात् क्षीरं तैलाच्चतुर्गुणम् ।
तैलात् तथाष्टमांशेन सर्वकल्क़ानि योजयेत् ।। 120 ।।
मधुकं पिप्पलीमूलं चित्रकः सैन्धवं वचा।
प्रसारिणी देवदारु रास्ना च गजपिप्पली ।। 121 ।।
भल्लातः शतपुष्पा च मांसी चैभिर्विपाचयेत् ।
एतत् तैलं वरं पक्वं वातश्लेष्मामयाञ्जयेत् ।। 122 ।।
कौब्जं पङ्गुत्वखञ्जत्वे गृध्रसीमर्दितं तथा।
हनुपृष्ठशिरोग्रीवाकटिस्तम्भान् विनाशयेत् ।। 123 ।।
अन्यांश्च विषमान् वातान् सर्वान्राशु व्यपोहति ।
प्रसारिणी सौ पल (पल को छटाँक भर भी मान लिया
जाये तो 6¼ सेर) को जौकूट करके एक द्रोण (अब द्रोण को
16 सेर मान लीजिये) जल में डालकर क्वाथ करे, चतुर्थांश
शेष रहने पर क्वाथ ले लें। क्वाथ के समान तेल (4 सेर),
उतना ही दही, उतनी ही काँजी और तैल से चौगुना दूध (16
सेर) तथा तेल से अष्टमांश (आधा सेर) निम्नलिखित सब
द्रव्यों का कल्क। कल्क द्रव्य ये हैं-मुलेठी, पीपलामूल,
चीता की जड़, सेंधा नमक, वच, प्रसारिणी, देवदारु, रास्ना,
गजपीपल, भिलावा, सौंफ एवं जटामांसी। उक्त सब पदार्थों
को एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह उत्तम तैल
वात तथा कफ रोगों को जीतता है और कुब्जता (कुबड़ापन),
पंगुपन, लंगड़ापन, गृध्रसी, अर्दित (लकवा) तथा हनु
(जबड़े), पीठ, शिर, गर्दन एवं कमर की जकड़न को नष्ट
करता है और अन्यान्य कष्टसाध्य सभी प्रकार के वातरोगों को
दूर करता है।
वक्तव्य—इस तैल के लगाने से भिलावे के कारण
किसी-किसी को रक्त वर्ण का शोथ हो जाता है, परन्तु घबराना
नहीं चाहिये। दो-तीन दिन में वह शोथ स्वयं शान्त हो जाता
है।

माषादि तैल
माषो यवातसी क्षुद्रा मर्कटी च कुरण्टकः ।। 124 ।।
गोकण्टष्टुण्डुकश्चैषां कुर्यात् सप्तपलं पृथक् ।
चतुर्गुणाम्बुना पक्त्वा पादशेषं शृतं नयेत् ।। 125 ।।
कार्पासास्थीनि बदरं शणबीजं कुलत्थकम् ।
पृथक्चतुर्दशपलं चतुर्गुणजले पचेत् ।। 126 ।।
चतुर्थांशावशिष्टं च गृह्णीयात् क्वाथमुत्तमम् ।
प्रस्थैकं छागमांसस्य चतुःषष्टिपले जले ।। 127 ।।
निक्षिप्य पाचयेद्धीमान् पादशेषं शृतं नयेत्।
तैलप्रस्थे ततः सर्वान् क्वाथानेतान् विनिक्षिपेत् ।। 128 ।।
कल्कैरेभिश्च विपचेदमृताकुष्ठनागरैः ।
रास्नापुनर्नवैरण्डैः पिप्पल्या शतपुष्पया ।। 129 ।।
बलाप्रसारिणीभ्यां च मांस्या कटुकया तथा।
पृथगर्धपलैरेतैः साधयेन्मृदुवह्निना ।। 130 ।।
हन्यात् तैलमिदं शीघ्रं ग्रीवास्तम्भापबाहुकौ ।
अर्द्धाङ्गशोषमाक्षेपमूरुस्तम्भापतानकौ ।। 131 ।।
शाखाकम्पं शिरःकम्पं विश्वाचीमदितं तथा।
माषादिकमिदं तैलं सर्ववातविकारनुत् ।। 132 ।।
उड़द, जौ, तीसी (अलसी), कण्टकारी, किवाँच के
बीज, कटसरैया, गोखरू एवं टेंटू प्रत्येक सात-सात पल
(28-28 तोला) लेकर जौकूट कर (आठ पहर भिगोने के

156 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
पश्चात्) चौगुने जल में पकाकर चतुर्थांश क्वाथ ले लें। कपास
के बिनौले, बेर का फल, सन के बीज एवं कुलथी प्रत्येक
14-14 पल (56-56 तोला) लेकर तथा जौकूट करके सब
द्रव्यों से चौगुने जल में पकायें, चौथाई शेष रहने पर क्वाथ
को छान लें और बकरे का मांस एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला)
लेकर चौसठ पल (3 सेर 16 तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश
शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इन सब (तीनों)
क्वाथों को एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तिल तेल में डाल दें
और गिलोय, कूठ, सोंठ, रास्ना, पुनर्नवा, एरण्ड की जड़,
पीपल, सौंफ, बरियारा, गन्धप्रसारिणी, जटामांसी एवं कुटकी
प्रत्येक आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर कल्क बनाकर
उक्त क्वाथ-मिश्रित तेल में डालकर मन्द-मन्द आँच से सिद्ध
करें। यह तेल ग्रीवास्तम्भ एवं अपबाहुक, अर्द्धांगशोष
(पक्षाघात), आक्षेपक, ऊरुस्तम्भ एवं अपतानक
(हिस्टीरिया), शाखाओं (टाँगों एवं बाहों) के कम्पन, शिर
के कम्पन, विश्वाची, अर्दित (लकवा) तथा वायु के सभी
रोगों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है। इसका नाम 'माषादि तैल'
है।
शतावरी तैल
शतावरी बलायुग्मं पण्यौ गन्धर्वहस्तकः।
अश्वगन्धा श्वदंष्ट्रंश्च बिल्वः काशः कुरण्टकः।।133।।
एतान् सार्धपलान्भागान् कल्कयेच्च विपाचयेत्।
चतुर्गुणेन नीरेण पादशेषं भृतं नयेत्।।134।।
नियोज्य तैलप्रस्थे च क्षीरप्रस्थं विनिक्षिपेत्।
शतावरीरसप्रस्थं जलप्रस्थं च योजयेत्।।135।।
शतावरीदेवदारुमांसीतगरचन्दनम् ।
शतपुष्पा बला कुष्ठमेला शैलेयमुत्पलम्।।136।।
ऋद्धिर्मेदा च मधुकं काकोली जीवकस्तथा।
एषां कर्षसमैः कल्कैस्तैलं गोमयवह्निना।।137।।
पचेत् तेनैव तैलेन नरः स्त्रीषु वृषायते।
नारी च लभ्यते पुत्रं योनिशूलं च नश्यति।।138।।
अङ्गशूलं शिरःशूलं कामलां पाण्डुतां गरम्।
गृध्रसीप्लीहशोषांश्च मेहान् दण्डपातानकम्।।139।।
सदाहं वातरक्तं च वातपित्तगदार्दितम्।
असृग्दरं तथाध्मानं रक्तपित्तं च नश्यति।।140।।
शतावरीतैलमिदं कृष्णात्रेयेण भाषितम्।
ॐ नारायण्यै स्वाहा।
उत्तराभिमुखो भूत्वा खनेत् खदिरशंकुना।।141।।
ॐ सर्वव्याधिनाशिन्यै स्वाहा। इत्युत्पाटनमन्त्रः।
ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा। इति पाचनमन्त्रः।
शतावर, बरियारा, अतिबला (कंघी), शालपर्णी, पिठवन,
एरण्ड की जड़, असगन्ध, गोखरू, बेलगिरी, कास (काही)
की जड़ तथा कटसरैया प्रत्येक द्रव्य को डेढ़-डेढ़ पल (6-6
तोला) लेकर भली-भाँति पीसकर सब द्रव्यों की अपेक्षा
चौगुने (6-6 पल) जल में डालकर क्वाथ करें, जब चतुर्थांश
शेष रह जाये तो क्वाथ को छानकर ले लें, फिर इस क्वाथ को
एक प्रस्थ तिलतैल (64 तोला) में मिलाकर एक प्रस्थ (64
तोला) गाय का दूध मिला दें, शतावर का रस एक प्रस्थ (64
तोला), एक प्रस्थ (64 तोला) जल भी उसी में मिला दें
और शतावर, देवदारु, जटामांसी, तगर, श्वेतचन्दन, सौंफ,
बरियारा, कूठ, बड़ी इलायची, छड़ीला, कमल, ऋद्धि (अभाव
में बाराहीकन्द), मेदा (अभाव में शतावर), मुलेठी, काकोली
(अभाव में असगन्ध) तथा जीवक (अभाव में विदारीकन्द)
प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला लेकर इनका कल्क बनाकर तैल में
मिला दें, फिर इसका गोहरों का अग्नि से पाक करें। तैयार हो
जाने पर छानकर रख लें। इस तैल को शिर पर लगाने से
मनुष्य स्त्रियों में मैथुन-सामर्थ्य प्राप्त करता है, स्त्री पुत्र को
प्राप्त करती है, उसका योनिशूल भी नष्ट हो जाता है। इस तैल
के प्रयोग से अंगशूल, शिरःशूल, कामला (पीलिया),
पाण्डुरोग, गरनामक विषविशेष, गृध्रसी, प्लीहाविकृति, शोष,
प्रमेह, दण्डापातानक, दाहयुक्त वातरक्त, वात तथा पित्त के
रोग, अर्दित (मुख का लकवा), आध्मान (अफारा) तथा
रक्तपित्त नष्ट हो जाता है। इस तैल का नाम 'शतावरी तैल' है।
यह महर्षि कृष्णात्रेय का कहा हुआ है। इस तैल का पाक
करते समय 'ॐ नारायण्यै स्वाहा' इस मन्त्र का पाठ करना
चाहिये। शतावरी को अथवा सभी औषधियों को उत्तर दिशा
की ओर मुख करके खैर की लकड़ी के शंकु (कीले) से,
(लोह आदि के शस्त्र का उपयोग नहीं करना चाहिये) 'ॐ
सर्वव्याधिविनाशिन्यै स्वाहा' इस मन्त्र का जप करते हुये
उखाड़ना चाहिये। इसे पीते समय 'ॐ कुमारजीविन्यै स्वाहा'
इस मन्त्र का पाठ करना चाहिये।
वक्तव्य—हमारा विचार है कि मन्त्रों का दिव्य प्रभाव
औषधियों और उनके सेवकों पर पड़ता है। कहा भी है
'सिद्धवैद्यस्तु मान्त्रिकः' अर्थात् मन्त्र का ज्ञाता सिद्धवैद्य
होता है। अनेक रोगों को मन्त्रों द्वारा अच्छा होते भी देखा ही
जाता है।

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 157

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 157
काशीसादि तैल
कासीसं लाङ्गली कुष्ठं शुण्ठी कृष्णा च सैन्धवम्।
मनःशिलाश्ममारश्च विडङ्गं चित्रको द्रुमः ।। 142 ।।
दन्ती कोशातकीबीजं हेमाह्वा हरितालकम्।
कल्कैः कर्षमितैरेतैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।। 143 ।।
स्नुह्यर्कपयसी दद्यात् पृथग् द्विपलसम्मित ।
चतुर्गुणं गवां मूत्रं दत्त्वा सम्यक् प्रसाधयेत् ।। 144 ।।
कथितं खरनादेन तैलमर्शोविनाशनम्।
क्षारवत्पातयत्येतददर्शोस्यभ्यङ्गतो भृशम् ।। 145 ।।
वलीर्न दूषयत्येतत् क्षारकर्मकरं स्मृतम्।
हीराकसीस, कलिहारी, कूठ, सोंठ, पीपल, सेंधा नमक,
मैनसिल, कनेर की जड़ अथवा पत्ते, वायविडंग, चीता की
जड़, कुरैया की छाल, दन्ती, कडुई तोरई के बीज, सत्यानाशी
की जड़, हरिताल प्रत्येक द्रव्य एक कर्ष लेकर कल्क बना
लें। तिलतैल एक प्रस्थ (64 तोला), सेहुण्ड (थूहर) तथा
आक का दूध दो-दो पल (8-8 तोला) और तैल की अपेक्षा
चौगुना (4 प्रस्थ या 3 सेर 16 तोला) गोमूत्र-इन सबको एक
साथ मिलाकर भली-भाँति पाक करना चाहिये। यह तैल
महर्षि खरनाद का कहा हुआ है और अर्श (बवासीर के
मस्सों) को नष्ट करता है। बार-बार अभ्यंग (मालिश) करने
से बवासीर के मस्सों को क्षार के समान गिरा देता है और
वलियों (गुदवलियों, जिनमें मस्से या मासांकुर होते हैं) को
दूषित या खराब भी नहीं करता है, तथापि क्षार का कार्य तो
करता ही है।
वक्तव्य-अर्श की चिकित्सा के चार उपाय हैं-1. भेषज
(खाने की औषधियाँ), 2. क्षार (मस्सों पर क्षार लगाना),
3. अग्नि (मस्सों को अग्नि से जला देना) और 4 शस्त्र द्वारा
ऑपरेशन करना या काट देना। उक्त तैल के लगाने से मांसांकुर
सूखकर झड़ जाते हैं और क्षार, अग्नि तथा शस्त्रक्रिया की
आवश्यकता ही नहीं पड़ती। महर्षि खरनाद की संहिता आज
दुर्भाग्य से अप्राप्य है। यह योग उसी संहिता का है। यह भी
एक मलहम है।
पिण्ड तैल
मञ्जिष्ठासारिवासर्जयरष्टीसिक्थैः पलोन्मितैः ।। 146 ।।
पिण्डाख्यं साधयेत्तैलमैरण्डं वातरक्तनुत्।
मजीठ, सारिवा, राल, मुलेठी तथा मोम प्रत्येक एक-एक
पल लेकर एरण्ड तैल 20 पल सिद्ध करें। इस तैल का नाम
'पिण्ड तैल' है। इस तेल को लगाने से वातरक्त को नष्ट
करता है।
वक्तव्य-मोम के बिना प्रत्येक द्रव्य का कपड़छन चूर्ण
बना लें और मोम को तैल में पिघलाकर सब द्रव्य मिला दें,
एक प्रकार की 'मलहम' तैयार हो जायेगी। अर्थात् अन्यान्य
तैलों के समान इस तैल का कल्क पृथक् नहीं किया जाता।
अतएव उसका नाम 'पिण्ड तैल' है।
अर्क तैल
अर्कपत्ररसे पक्वं हरिद्राकल्कसंयुतम् ।। 147 ।।
नाशयेत् सार्षपं तैलं पामां कच्छू विचर्चिकाम्।
हल्दी के कल्क से युक्त तथा आक के पत्तों के रस में
पका हुआ सरसों का तैल पामा (खुजली), कच्छू (अण्डकोष
की खुजली और पामा का ही भयानक रूप) तथा विचर्चिका
को नष्ट करता है।
वक्तव्य-उक्त तैल परिभाषानुसार बना लेना चाहिये।
सरसों का तैल 1 सेर, हल्दी का कल्क 1 पाव और आम के
पत्तों का रस 4 सेर।
मरिचादि तैल
मरिचं हरितालं च त्रिवृतं रक्तचन्दनम् ।। 148 ।।
मुस्तं मनःशिला मांसी द्वे निशे देवदारु च।
विशाला करवीरं च कुष्ठमर्कपयस्तथा ।। 149 ।।
तथैव गोमयरसं कुर्याति कर्षमितान् पृथक्।
विषं चार्धपलं देयं प्रस्थं च कटुतैलकम् ।। 150 ।।
गोमूत्रं द्विगुणं दद्याज्जलं च द्विगुणं भवेत्।
मरिचाद्यमिदं तैलं सिद्धं कुष्ठहरं परम् ।। 151 ।।
जयेत्कुष्ठानि सर्वाणि पुण्डरीकं विचर्चिकाम्।
पामां श्वित्राणि रक्तं च कण्डूं कच्छूं प्रणाशयेत् ।। 152 ।।
मरिच, हरिताल, निसोत, लालचन्दन, नागरमोथा,
मैनसिल, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, इन्द्रायण की
जड़, कनेर के पत्र, कूठ, मदार (आक) का दूध तथा गोबर
का रस प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष तथा आवेष (मीठा तेलिया)
2 कर्ष लेकर कल्क बनायें तथा सरसों का तैल एक प्रस्थ
(64 तोला), गोमूत्र दो प्रस्थ तथा जल दो प्रस्थ, सबको एक
साथ मिलाकर विधिपूर्वक परिपाक करें। इस तैल का नाम
'मरिचादि तैल' है। इस तैल को लगाने से कुष्ठ के घावों
को नष्ट कर सब प्रकार के कुष्ठों को जीतता है तथा पुण्डरीक
नामक कुष्ठ, विचर्चिका स्राव युक्त खुजली, पामा, श्वेत
दाग (फुलबहरी), रक्तविकार, खुजली तथा कच्छू को नष्ट
करता है।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

158 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे


[बायाँ स्तम्भ]

वक्तव्य—'मरिचादि तैल' का निर्माण सरसों के तैल से ही किया जाता है।
त्रिफलादि तैल
त्रिफलारिष्टभूनिम्बं द्वे निशे रक्तचन्दनम्।
एतै सिद्धमरूंषीणां तैलमभ्यञ्जने हितम् ।। 153 ।।
त्रिफला, नीम के पत्र, चिरायता, दारुहल्दी, हल्दी तथा लालचन्दन—इन द्रव्यों के कल्क तथा क्वाथ से पकाया हुआ सरसों का तैल मालिश करने से अरूंषिका (शिर के फोड़ों) को नष्ट करता है।
वक्तव्य—उक्त तैल केवल कल्क द्वारा भी सिद्ध किया जाता है। इसे मीठी आँच पर पकाना चाहिये। अरूंषिका नामक फुन्सियाँ शिर में होती हैं, जिनका पीला-पीला तथा दुर्गन्धियुक्त मवाद (पीब) निकल कर वहीं पर जम जाता है।
निम्बबीज तैल
भावयेन्निम्बबीजानि भृङ्गराजरसेन हि।
तथासनस्य तोयेन तत्तैलं हन्ति नस्यतः।। 154 ।।
अकालपलितं सद्यः पुंसां दुग्धान्नभोजिनाम्।
नीम के बीजों को भाँगरा के रस की तथा विजयसार के क्वाथ की भावना दें और इसके पश्चात् उन बीजों का तैल निकाल लें। इस तैल की नस्य लेने से दूध-भात खाने वाले मनुष्यों का अकाल पलित (जवानी में ही बालों का सफेद हो जाना) शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
वक्तव्य—नीम के बीजों का तैल दो प्रकार से निकाला जाता है—1. बादामरोगन निकालने की विधि से भली-भाँति पीसकर धूप में रख देने से तैल निकल आता है और 2. कोल्हू द्वारा जैसे सरसों तथा तिल आदि का तैल निकाला जाता है। इसकी नस्य का प्रयोग प्रतिदिन वर्षों तक करना चाहिये। इसमें नमक का सर्वथा त्याग करके केवल दूध के साथ भात तथा रोटी का सेवन करना चाहिये।
यष्टीमधुक तैल
यष्टीमधुकक्षीराभ्यां नवधात्रीफलैः शृतम् ।। 155 ।।
तैलं नस्यकृतं कुर्यात् केशाञ्श्मश्रूणि सङ्घशः।
मुलेठी, गाय का दूध तथा नवीन या ताजे आँवले, इन द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक पकाये हुये तैल के (नस्य) प्रयोग से केश तथा श्मश्रु (दाढ़ी तथा मोंछ) सघन (घने) हो जाते हैं।


[दायाँ स्तम्भ]

वक्तव्य—इस तैल का पाक यथाविधि करना चाहिये। यह तैल इन्द्रलुप्त (दाढ़ी-मोंछों के बालों का गिरना), खालित्य (शिर के बालों का उखड़ जाना) और शरीर के किसी भी स्थान के बालों के उखड़ जाने पर मालिश करने पर भी बहुत लाभ करता है। मुलेठी और आवलों का कल्क 1 सेर, तिल तैल चार सेर तथा गाय का दूध सोलह सेर मिलाकर पाक करें। इस प्रकार 'आँवले का तेल' तैयार किया जाता है।
करञ्ज तैल
करञ्जश्चित्रको जाती वरवीरश्च पाचितम् ।। 156 ।।
तैलमेभिर्द्रुतं हन्यादभ्यङ्गादिन्द्रलुप्तकम्।
करञ्ज के पत्र, चीता के पत्र, चमेली के पुष्प एवं कनेर के पत्र—इन द्रव्यों से पकाया हुआ तैल अभ्यंग (मालिश) करने से शीघ्र ही 'इन्द्रलुप्त' को नष्ट करता है।
वक्तव्य—करञ्ज, चीता तथा कनेर के पत्रों के कल्क को तैल में डालकर यथाविधि मन्द-मन्द अग्नि से पाक करें, पाक हो जाने पर उसमें चमेली के फूल डालकर एक सप्ताह धूप में रख देने से उक्त सुगन्धित तेल तैयार हो जाता है।
नीलिकादि तैल
नीलिका केतकीकन्दं भृङ्गराजः कुरण्टकः ।। 157 ।।
तथार्जुनस्य पुष्पाणि बीजकात् कुसुमान्यपि।
कृष्णास्तिलाश्च तगरं समूलं कमलं तथा ।। 158 ।।
अयोरजः प्रियङ्गुश्च दाडिमत्वग्गुडूचिका।
त्रिफला पद्मपङ्कश्च कल्कैरेभिः पृथक्पृथक् ।। 159 ।।
कर्षमात्रैः पचेत् तैलं त्रिफलाक्वाथसंयुतम्।
भृङ्गराजरसेनैव सिद्धं केशस्थिरीकृतम् ।। 160 ।।
अकालपलितं हन्ति दारुणं चोपजिह्विकाम्।
नील के पत्र, केवड़े का कन्द, भाँगरा, कुरैया के पत्र, अर्जुन वृक्ष के फूल, विजयसार के फूल, काले तिल, तगर, कमल, कमल की जड़, लोहे का चूर्ण, प्रियंगु, देशी अनार का छिलका, गिलोय, त्रिफला एवं पद्मपङ्क (कमलों की जड़ का कीचड़) प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (तोला) लेकर कल्क बना लें। तिल तैल (72 तोला), त्रिफला का क्वाथ (तैल की अपेक्षा दुगुना) एवं भाँगरा का स्वरस (तैल से दुगुना)—इन द्रव्यों को एक साथ मिलाकर पाक करें। यह तैल मालिश करने से केशों को स्थिर करता (उखड़ने नहीं देता) है, अकालपलित, दारुणक (रूसी) और उपजिह्विका नामक रोग को नष्ट करता है।

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 159

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 159
वक्तव्य-यह एक प्रकार का 'कल्प' है। इसके सेवन से (कुछ महीनों तक निरन्तर लगाने से) बाल जड़ से काल हो जाते हैं।
होना), प्रहर्ष (दन्तहर्ष), विद्रधि (गलविद्रधि), कृमिदन्तक (दाँतों में कीड़ा लगना), दन्तस्फुरण (दाँतों की सुरसुराहट), दौर्गन्ध्य (दाँतों की दुर्गन्धि) तथा जीभ, तालु एवं ओठ के रोगों को नष्ट करता है।
भृङ्गराज तैल
भृङ्गराजरसैर्नैव लोहकिट्टं फलत्रिकम् ।। 161 ।।
सारिवां च पचेत् कल्कैस्तैलं दारुणनाशनम्।
अकालपलितं कण्डूमिन्द्रलुप्तं च नाशयेत् ।। 162 ।।
भाँगरा का रस (4 सेर), लोहकिट्ट (मण्डूर का चूर्ण अथवा लोहचूर्ण), त्रिफला एवं सारिवा (इनका कल्क 1 पाव) और तिल का तैल (1 सेर) सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल दारुण (रूसी), अकालपलित, शिर की खुजली एवं इन्द्रलुप्त रोग को नष्ट करता है।
वक्तव्य-इरिमेद एक प्रकार का खैर ही है। इसे 'दुर्गन्धि' या 'विट्खदिर' कहा जाता है। उक्त तैल मुखरोगों की उत्तम तथा प्रसिद्ध औषधि है। इसमें भी सुगन्धित द्रव्यों को तैल सिद्ध होने के बाद डालना चाहिये।
जात्यादि तैल
(जातीनिम्बपटोलानां नक्तमालस्य पल्लवाः ।। 168 ।।
सिक्थं समधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी।
मञ्जिष्ठा पद्मकं लोध्रमभया नीलमुत्पलम् ।। 169 ।।
तुत्थकं सारिवाबीजं नक्तमालस्य दापयेत्।
एतानि समभागानि पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ।। 170 ।।
नाडीव्रणे समुत्पन्ने स्फोटके कच्छूरोगिषु ।
सद्यः शस्त्रप्रहारेषु दग्धविद्धेषु चैव हि ।। 171 ।।
नखदन्तक्षते देहे व्रणे दुष्टे प्रशस्यते।)
इरिमेदादि तैल
इरिमेदत्वचं क्षुण्णा पचेच्छतपलोन्मिताम्।
जलद्रोणे ततः क्वाथं गृह्णीयात् पादशेषितम् ।। 163 ।।
तैलस्यार्धाढकं दत्त्वा कल्कैः कर्षमितैः पचेत्।
इरिमेदलवङ्गाभ्यां गैरिकागुरुपद्मकैः ।। 164 ।।
मञ्जिष्ठालोध्रमधुकैर्लाक्षान्यग्रोधमुस्तकैः ।
त्वग्जातीफलकर्पूरकङ्कोलखदिरैस्तथा ।। 165 ।।
पतङ्गधातकीपुष्पसूक्ष्मैलानागकेसरैः ।
कट्फलेन च संसिद्धं तैलं मुखरुजं जयेत् ।। 166 ।।
प्रदुष्टमांसं पलितं शीर्णदन्तं च सौषिरम्।
श्यावदन्तं प्रहर्षं च विद्रधिं कृमिदन्तकम् ।। 167 ।।
दन्तस्फुरणदौर्गन्ध्यं जिह्वाताल्वोष्ठजां रुजम्।
चमेली के पत्र, नीम के पत्र, परवल के पत्र, करञ्ज के पत्र, मोम, मुलेठी, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, कुटकी, मजीठ, पद्मकाठ, लोध, हरड़, नीलोत्पल (नीलोफर), तूतिया, सारिवा तथा करञ्ज के बीज प्रत्येक द्रव्य को समान भाग (1-1 तोला) लेकर और कल्क बनाकर तैल (सबसे चौगुना अर्थात् 72 तोला) में पकायें। यह तैल नाड़ीव्रण (नासूर) में, स्फोटक (बड़ी माता के घावों) में, कच्छूरोग (भयानक खुजली) में, सद्यः शस्त्र-क्षत (तत्काल के घावों) में, दिग्दविद्ध (विष में बुझाये हुये बाण आदि के घावों) में, नाखून एवं दाँतों के घावों में तथा शरीर के दूषित व्रणों (घावों) में उत्तम माना जाता है।
खैर की छाल का चूर्ण सौ पल (5 सेर) लेकर एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में डालकर क्वाथ करें, चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इस क्वाथ में तिल का तैल एक आढक (3 सेर 16 तोला), खैर की छाल, लौंग, गेरू, अगरचन्दन, पद्मकाठ, मजीठ, लोध, मुलेठी, लाही (लाख), बड़ की छाल, नागरमोथा, दालचीनी, जायफल, कपूर, शीतलचीनी, खैरसार (कत्थ), पतंग, धाय का फूल, छोटी इलायची, नागकेसर तथा कायफल' प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (1-1 तोला) लेकर उसका कल्क बनाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल मुख के सभी रोगों को जीतता है। दुष्टमांस (मांस विकृति) से होने वाला ओष्ठरोग, चलित (दाँतों का हिलना), शीर्णदन्त (अकाल में दाँतों का गिरना), सौषिर (मसूड़ों का फूलना), श्यावदन्त (दाँत का काला
वक्तव्य-यह तैल नासूर में अत्यन्त उपयोगी है, क्योंकि जहाँ पर नासूर के भीतर और पिण्डतैल आदि नहीं पहुँचाये जा सकते अथवा बहुत कठिनता से पहुँचाये जा सकते हैं, वहाँ पर यह तैल तरल होने के कारण सरलतापूर्वक पहुँचाया जा सकता है। इसके प्रभाव से भीतर से घाव धीरे-धीरे भर जाता है।
हिंग्वादि तैल
हिङ्गुतुम्बुरुशुण्ठीभिः कटुतैलं विपाचयेत् ।। 172 ।।
तस्य पूरणमात्रेण कर्णशूलं प्रणश्यति।

160 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

160 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
हींग, तुम्बुल तथा सोंठ का कल्क (1 पाव) बनाकर
उसे 1 सेर कडुवा तैल में डालकर विधिपूर्वक पकायें। इस
तैल को कान में डालने से कर्णशूल (कान का दुखना) नष्ट
हो जाता है।
बिल्व तैल
बालबिल्वानि गोमूत्रे पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ।। 173 ।।
साजक्षीरं च नीरं च बाधिर्यं हन्ति पूरणात्।
बेलगिरी (1 पाव) को गोमूत्र द्वारा पीसकर कल्क बना
लें, 1 सेर कडुवा तेल और बकरी का दूध एवं जल दोनों
मिलाकर 4 सेर, इन सबको एक साथ यथाविधि पकायें। यह
तैल कान में डालने से बधिरता (बहरापन) को नष्ट करता है।
क्षार तैल
बालमूलकशिम्बीनां क्षारः क्षारयुगं तथा ।। 174 ।।
लवणानि च पञ्चैव हिङ्गु शिग्रु महौषधम्।
देवदारु वचा कुष्ठं शतपुष्पा रसाञ्जनम् ।। 175 ।।
ग्रन्थिकं भद्रमुस्तं च कल्कैः कर्षमितैः पृथक् ।
तैलप्रस्थं च विपचेत् कदलीबीजपूरयोः ।। 176 ।।
रसाभ्यां मधुशुक्तेन चातुर्गुण्यमितेन च।
पूयस्रावं कर्णनादं शूलं बधिरतां कृमीन् ।। 177 ।।
अन्यांश्च कर्णजान् रोगान् मुखरोगांश्च नाशयेत्।
कच्ची मूलियों के टुकड़ों का क्षार, जौखार, सज्जीखार,
सेंधा नमक, सोंचर नमक, बिरिया नमक, समुद्र नमक, साँभर
नमक, हींग, सहिजन की जड़ की छाल, सोंठ, देवदारु, वच,
कूठ, सौंफ, रसवंत, पीपलामूल तथा नागरमोथा प्रत्येक द्रव्य
1-1 तोला लेकर कल्क बनायें; सरसों का तेल एक प्रस्थ
(64 तोला), केले की जड़ का रस, बिजौरा नींबू का रस
तथा मधुशुक्त (तीनों द्रव पदार्थ तेल से चौगुने अर्थात् 4
प्रस्थ) मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तैल
कान में डालने से पूयस्राव (कान में से पीब का जाना),
कर्णनाद (विविध प्रकार की ध्वनियाँ सुनायी पड़ना), शूल
(कान की पीड़ा), बधिरता, कृमि (कान में उत्पन्न हुये कृमि),
अन्यान्य कर्णरोग तथा मुखरोगों को विनष्ट करता है।
पाठादि तैल
पाठा द्वे च निशे मूर्वा पिप्पलीजातिपल्लवैः ।। 178 ।।
दन्त्या च तैलं संसिद्धं नस्यं स्याद् दुष्टपीनसे।
पाठा, हल्दी, दारुहल्दी, मरोड़फली, पिप्पली, चमेली
के पत्र तथा दन्ती के कल्क से सिद्ध किये हुये कटुतैल की
नस्य देने से दुष्ट पीनस (बिगड़े हुये जुकाम) का विनाश हो
जाता है।
व्याघ्री तैल
व्याघ्रीदन्तीवचाशिग्रुतुलसीव्योषसैन्धवैः ।। 179 ।।
कल्कैश्च पाचनं तैलं पूतिनासागदापहम्।
कण्टकारी, दन्ती, वच, सहिजन की छाल, तुलसी के
पत्ते, सोंठ, मरिच, पीपल तथा सेंधा नमक इन सब द्रव्यों का
कल्क (1 पाव), कटुतैल 1 सेर में डालकर पाक करें। यह
तैल आमकफ का पाचन करता है, पूतिनास (नाक में से
दुर्गन्ध आना) तथा नासास्राव (नाक से पानी जाना) को नष्ट
करता है।
कुष्ठादि तैल
कुष्ठं बिल्वकणाशुण्ठीद्राक्षाकल्ककषायवत् ।। 180 ।।
साधितं तैलमाज्यं वा नस्यात् क्षवथुनाशनम्।
कूठ, बेलगिरी, पीपल, सोंठ तथा मुनक्का के कल्क-
रूपी कषाय के साथ सिद्ध किया हुआ तैल अथवा घी की
नस्य लेने से क्षवथु (अधिक छींकें आना) रोग को नष्ट करता
है।
गृहधूम तैल
गृहधूमकणादारुक्षारनक्ताह्वसैन्धवैः ।। 181 ।।
सिद्धं शिखरिबीजैश्च तैलं नाशार्शांसि हितम्।
गृहधूम (रसोई घर में जो जाले लगे रहते हैं), पीपल,
देवदारु, जौखार, करञ्ज के पत्र सेंधा नमक तथा अपामार्ग
(चिरचिटा) के बीज, इन द्रव्यों के कल्क से पकाया हुआ
तैल नाशार्श (नासिका की बवासीर) के लिए लाभदायक
होता है।
वक्तव्य-उक्त चारों तैल केवल कल्क डालकर ही बनाये
जाते हैं।
वज्री तैल
वज्रीक्षीरं रविक्षीरं द्रवं धत्तूरचित्रजम् ।। 182 ।।
महिषीविङ्भवं द्रावं सर्वांशं तिलतैलकम्।
पचेत् तैलावशेषं च गोमूत्रेऽथ चतुर्गुणे ।। 183 ।।
तैलावशेषं पक्त्वा च तत्तैलं प्रस्थमात्रकम्।
गन्धकाग्निशिलातालं विडङ्गातिविषाविषम् ।। 184 ।।
तिक्तकोशातकीकुष्ठवचामांसीकटुत्रयम् ।
पीतदारु च मञ्जिष्ठां च स्वर्जिकार्जुनजीरकम् ।। 185 ।।

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161
देवदारु च कर्षांशं चूर्णं तैले विनिक्षिपेत्।
वज्रतैलमिदं ख्यातमभ्यङ्गात् सर्वकुष्ठनुत्।। 186।।
सेहुण्ड (थूहर) का दूध, आक (मदार) का दूध, धतूरे
के पत्तों का रस, चीता के पत्तों का रस तथा भैंस के गोबर का
रस (1-1 पाव लें) और सबके समान सरसों का तेल (1¼
सेर) मिलाकर पाक करें, तत्पश्चात् जब तेलमात्र शेष रह जाये
तब उसमें चौगुना (5 सेर) गोमूत्र डालकर पाक करें। अन्त
में गन्धक, चित्रक, मैनसिल, हरताल, वायविडंग, अतीस,
विष (मीठा तेलिया), कड़वी तोरई, कूठ, वच, जटामांसी,
सोंठ, पीपल, मरिच, दारुहल्दी, मुलेठी, सज्जीखार, सफेद
जीरा तथा देवदारु प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1¼-1¼ तोला उक्त
तैल में डालकर रख दें। इस तैल का नाम 'वज्री तैल' है।
इसकी मालिश करने से सभी प्रकार के कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते
हैं।
वक्तव्य-उक्त तैल में डालने के पूर्व गन्धक आदि द्रव्यों
का चूर्ण कपड़छन कर लेना चाहिये और इसे धूप में रख देना
चाहिये। एक मास के पश्चात् दद्रु, पामा आदि पर लगाना
चाहिये। उक्त तैल में 'प्रस्थ' का अर्थ 'सेर' और इसी के
अनुसार 'कर्ष' का अर्थ 'सवा तोला' किया गया है। यह
तैल-निर्माण का हमारा दृष्टिकोण है।
करवीरादि तैल
करवीरशिखादन्तीत्रिवृत्कोशातकीफलम् ।
रम्भाक्षारोदके तैलं प्रशस्तं लोमशातनम्।। 187।।
कनेर के पत्ते, चीता की जड़, दन्ती, कड़वी तोरई के
फल, इन द्रव्यों का कल्क (1 पाव) कदलीक्षार-मिश्रित
जल 4 सेर और तेल 1 सेर-सबको मिलाकर विधिपूर्वक
पाक करें। यह तैल उत्तम रोमशातन (बाल सफा करने
वाला) है।
चन्दनादि तैल
(चन्दनाम्बुनखैर्याम्यं यष्टीशैलेयपद्मकम्।
मञ्जिष्ठा सरलं दारु सेव्यैलं पूतिकेसरम्।। 188।।
पत्रकैलं मुरा मांसी कङ्कोलं वनिताम्बुदम्।
हरिद्रा सारिवा तिक्ता लवङ्गागुरुकुङ्कुमम्।। 189।।
त्वग्रेणुनलिका चेति तैलं मस्तु चतुर्गुणम्।
लाक्षारसमसं सिद्धं ग्रहघ्नं बलवर्धनम्।। 190।।
अपस्मारज्वरोन्मादकृत्यालक्ष्मीविनाशनम् ।
आयुःपुष्टिकं चैव वशीकरणमुत्तमम्।। 191।।
विशेषात् क्षयरोगघ्नं रक्तपित्तहरं परम्।)
श्वेतचन्दन, नेत्रबाला, नाखूना, कूठ, मुलेठी, छड़ीला,
पद्माकाठ, मजीठ, सरल (चीड़) का बुरादा, देवदारु, खस,
बड़ी इलायची, पूति (गन्धमार्जार का अण्डकोष जिसे
जुन्दवेदस्तर कहा जाता है), नागकेसर, तेजपत्ता, छोटी
इलायची, मरोड़फली, जटामांसी, शीतलचीनी, फूलप्रियंगु,
नागरमोथा, हल्दी, सारिवा, तिक्ता (कुटकी अथवा मुश्कदाना),
लौंग, अगरु, केशर, दालचीनी, रेणु (मेवड़ी के बीज) तथा
नालुका (दालचीनी का-सा गन्धद्रव्य), प्रत्येक द्रव्य 1-1
तोला लेकर कल्क बनायें। कल्क की अपेक्षा चौथाई तेल
तथा तेल की अपेक्षा चौगुना दही का पानी और तेल के
समान भाग लाक्षारस (लाही का क्वाथ) इन सबको एक
साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। यह तेल ग्रह (भूत-प्रेत
बाधा) नाशक है, बलवर्द्धक है, मिरगी, ज्वर, उन्माद, कृत्या
(मारण-मोहन आदि तान्त्रिक क्रिया) तथा अलक्ष्मी (अशोभा
या बदसूरती) का विनाशक है, आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक तथा
उत्तम वशीकरण (सुगन्धित होने के कारण दूसरों को मोहित
करने वाला) है। विशेषरूप से यह क्षयरोग को नष्ट करता है
और रक्तपित्त को हरता है।
वक्तव्य-उक्त तेल अत्यन्त सुगन्धित होता है, परन्तु
पकाने से सुगन्धि कुछ घट जाती है। अतः द्रवद्रव्यों में पहले
तेल को पकाकर तत्पश्चात् सम्पूर्ण सुगन्धित द्रव्यों का चूर्ण
डालकर अत्यन्त धीमी आँच से केवल इतना गर्म करना
चाहिये जिससे सुगन्धि तेल में विलीन हो सके और पाक
समाप्त होने के बाद भी उक्त द्रव्यों को तैल में ही पड़े रहने
देना चाहिये, जिससे उनका सार तैल में घुलता रहे। दूसरे
सुगन्धित तैल इसके सामने तुच्छ हैं, क्योंकि वे तैल प्रायः
मिट्टी के तेल में बनाये जाते हैं और उन्हें सेण्ट डालकर
सुगन्धित किया जाता है। इस तैल का प्रयोग नपुंसकता पर
भी बहुत लाभदायक प्रमाणित हुआ है।
वचा तैल
(वचां शठीं हरिद्रे द्वे देवदारुमहौषधी।। 192।।
हरीतकीमतिविषामुस्तकेन्द्रयवान् समान्।
एतान् दशपलान् भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्।। 193।।
चक्रमर्दरसैस्तैलं कटुकं मृदुनाऽग्निना।
पादशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत्।। 194।।
एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।)
वचा, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, सोंठ, हरड़,

162 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

अतीस, नागरमोथा तथा इन्द्रजौ इन सबको दस-दस पल
(40-40 तोला) लेकर जौकुट करके चार द्रोण (51 सेर 16
तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर कटुतैल (1
आढक या 3 सेर 16 तोला) तथा चक्रमर्द (पवाड़) का रस
(1 आढक अर्थात् तैल के समान भाग) मिलाकर मन्द-मन्द
अग्नि से विधिपूर्वक पाक करें और तेलमात्र शेष रह जाने
पर छान लें। इस तेल में (तेल से चतुर्थांश) सिन्दूर डालकर
थोड़ा पकायें। उसमें ज्योंही कालापन आ जाये त्योंही
उतार लें। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट करता
है।

निर्गुण्डी लांगली तैल
निर्गुण्डीस्वरसे तैलं लाङ्गलीमूलकल्कितम् ।। 195 ।।
तैलं नस्यान्निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।
निर्गुण्डी (सम्भालू) का स्वरस (4 सेर), तेल (1 सेर)
और कलिहारी का कल्क (9 पाव) इन सबको एक साथ
मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तेल नस्य-विधि
से प्रयोग करने से भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट कर
देता है।

चक्रमर्द तैल
(चक्रमर्दक मूलस्य कल्कं कृत्वा विपाचयेत् ।। 196 ।।
केशराजरसे तैलं कटुकं मृदुनाग्निना।
पाकशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत् ।। 197 ।।
एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।)
चकवड़ की जड़ का कल्क (1 पाव) बनाकर भाँगरा
के रस (4 सेर) में कड़वा तेल (1 सेर) डालकर तीनों को
एक साथ मन्द अग्नि में पाक करें। जब तेल मात्र अवशिष्ट
रह जाये तो तेल को छान लें। इस तेल में चतुर्थांश सिन्दूर
डालकर थोड़ा पकाकर उतार लें (यह काले रंग का मलहम
तैयार हो जाता है)। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही
शान्त कर देता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकार के छोटे-बड़े
फोड़ों या घावों पर यह आश्चर्यजनक कार्य करता है। इसमें
एक विशेषता यह है कि यह सूखा-सा रहता है और थोड़ा
गर्म करने से ढीला हो जाता है, जिससे लगाने में सरलता
होती है।

वक्तव्य-यह चक्रमर्द तेल अत्यन्त उपयोगी है। अतः
हमने यहाँ इसे उद्धृत किया है।

धत्तूर तैल
(धत्तूररसमादाय हयमारान्तिकारसम् ।। 198 ।।
भृङ्गराजरसश्चैव सारिणी निम्बपत्रकम्।
शोभाञ्जनश्वित्रकश्च अश्वगन्धा प्रसारिणी ।। 199 ।।
शिरीषः कुटजोऽनन्ता शाल्मली नक्तपत्रकम्।
रविप्रियो महानिम्बो डिण्डिघोषा महेरणा ।। 200 ।।
बला ज्योतिष्मती चैव श्यामाकश्चक्रमर्दकः।
एतैस्तु रसमादाय तैलतुल्यं च दीयते ।। 201 ।।
देवदारु हरिद्रे द्वे मांसी कुष्ठं सचन्दनम्।
मरिचं त्रिवृता दन्ती हरितालं मनःशिला ।। 202 ।।
कम्पिल्लको गन्धकश्च खदिरः पिप्पली वचा।
रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासो रक्तचन्दनम् ।। 203 ।।
इरिमेदस्तथा तुम्बी मञ्जिष्ठा सिन्दुवारकः।
करवीरजटा रास्ना विश्वा श्रेष्ठा च पौष्करम् ।। 204 ।।
शठी तालीसपत्रं न प्रियङ्गुः रेणुका तथा।
चातुर्जातकसञ्झीरं कङ्कोलं जातिपत्रिका ।। 205 ।।
ज्योतिष्मती च पलिका विषस्य द्विपलं भवेत्।
आढकं कटुतैलस्य गोमूत्रं च चतुर्गुणम् ।। 206 ।।
मृत्पात्रे लोहपात्रे च शनैर्मृद्वग्निना पचेत्।
मज्जाश्रितं त्वग्गतं च वातं चास्थिगतं तथा ।। 207 ।।
ऊरुग्रहं चाढ्यवातं कृच्छ्रं दण्डापतानकम्।
कुब्जत्वं चाथ शोथं च पक्षाघातं तथार्दितम् ।। 208 ।।
हनुस्तम्भं शिरःकम्पं मूर्च्छितं दृष्टिविभ्रमम्।
अपस्मारं तथोन्मादं तथा चैवाऽपतन्रकम् ।। 209 ।।
आक्षेपकं चास्थिभग्नं सन्धिभग्नं च नाशयेत्।)

इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे घृततैलकल्पना नाम
नवमोऽध्यायः ।। 9 ।।

धतूरा के पत्तों का रस, कनेर के पत्तों का रस, भाँगरा का
रस, रक्तवर्ण की पुनर्नवा, नीम के पत्ते, सहजन की छाल,
चीता, असगन्ध, गन्धप्रसारिणी, सिरस, कुरैया, जवासा, सेमल,
करञ्ज के पत्ते, लाल कमल, बकायन, ऐरण्ड की जड़, सलई
वृक्ष की छाल, बरियारा, मालकंगुनी, काली निसोत तथा
चक्रमर्द-इन द्रव्यों का रस तथा क्वाथ लेकर समान भाग तेल
में मिला दें, फिर इसमें देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी,
कूठ, सफेद चन्दन, मरिच, निसोत, दन्ती, हरिताल, मैनसिल,
कबीला, गन्धक, खैरसार, पीपल, वच, रसवत, सिन्दूर,

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 163

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 163

गन्धाविरोजा, लालचन्दन, दुर्गन्धित खैर, कड़वी तुम्बी, मजीठ,
सम्भालू के पत्ते, कनेर की जड़, रास्ना, सोंठ, हरड़, पोहकरमूल,
कचूर, तालीसपत्र, फूलप्रियंगु, रेणुका, दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, अंजीर, शीतलचीनी, जावित्री
तथा मालकंगुनी प्रत्येक एक-एक पल और विष (मीठा
तेलिया) दो पल (8 तोला) लेकर कल्क बनायें। कटुतैल
एक आढक (3 सेर 16 तोला) और तेल की अपेक्षा चतुर्गुण
गोमूत्र, इन सबको मिट्टी अथवा लोहे के पात्र में एक साथ
मिलाकर धीरे-धीरे मन्द-मन्द अग्नि से पकाना चाहिये। यह
तेल मज्जागत वायु, त्वचागत वायु, अस्थिगत वायु, ऊरुग्रह,
आढ्यवात (आमवात), कष्टप्रद दण्डागतानक, कुबड़ापन,
शोथ, पक्षाघात, अर्दित (मुख-प्रदेश का लकवा), हनुस्तम्भ
(मुँह खुला अथवा बन्द रह जाना), शिरःकम्प, मूर्च्छा, दृष्टि
की विकृति, अपस्मार, उन्माद, अपतन्त्रक (हिस्टीरिया),
आक्षेपक, अस्थिभग्न तथा सन्धिभग्न को नष्ट करता है।

कटुतैल की मूर्च्छन-विधि—बड़ी हरड़, हल्दी,
नागरमोथा, कच्चे बेल की गुदी, दाड़िम, नागकेसर, कालाजीरा,
नेत्रबाला, नालुका तथा बहेड़ा (1-1 तोला), मजीठ आठ
कर्ष, जल एक आढक, कटुतैल एक प्रस्थ, सबको मिलाकर
पकायें। इससे तेल का 'आमदोष' दूर हो जाता है। सभी तेलों
को यथासम्भव उक्त विधि से शुद्ध कर लें, उसके बाद तेल
पाक करना चाहिये।

तेल की गन्धवृद्धि—कूठ आदि गन्ध द्रव्य, हींग आदि
निर्यास द्रव्य और चमेली आदि के फूल यदि तेल में गन्धवृद्धि
के लिए डालने हों, तो तेल का पाक हो जाने के बाद ही इन्हें
डालना चाहिये। यह प्रक्षेप 'पत्रकल्क' कहा जाता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का नवाँ अध्याय समाप्त।।9।।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

आसवारिष्टकल्पना

दशमोऽध्यायः
आसवारिष्टकल्पना
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
सन्धान-कल्पना
द्रवेषु चिरकालस्थं द्रव्यं यत्सन्धितं भवेत्।
आसवारिष्टभेदैस्तु प्रोच्यते भेषजोचितम्॥१॥
जल आदि द्रवपदार्थ में गुड़, धाय के फूल आदि द्रव्यों
के चिरकाल (जितने समय में सन्धान हो) तक पड़े रहने से
सन्धान (विशेष प्रकार के रस एवं गन्ध आदि की उत्पत्ति)
होने के कारण जो सन्धित द्रव प्रस्तुत होता है, उसके आसव,
अरिष्ट, सीधु एवं सुरा आदि नाम हैं और ये द्रव औषधियों
(जिनके योग से ये आसव-अरिष्ट आदि बनाये जाते हैं) के
अनुसार कार्य करते हैं।
वक्तव्य-उक्त सभी द्रव मादक होने के कारण 'मद्य'
कहे जाते हैं, क्योंकि सभी में मादक तत्त्व अवश्य होता है।
आजकल उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इनके 'अर्क' निकालने
की विधि का उल्लेख नहीं पाया जाता। केवल
'भैषज्यरत्नावली' नामक संग्रह-ग्रन्थ में 'मृतसञ्जीवनी सुरा'
के निर्माण की विधि में 'मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराख्येऽपि
यन्त्रके'। (ज्वराधिकार), कहकर अर्क निकालने का विधान
किया गया है। मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र वे ही यन्त्र हैं,
जिनकी सहायता से अर्क निकाले जाते हैं। उपयोगी तथा
आवश्यक द्रव्यों का सन्धान करके उक्त यन्त्रों द्वारा जो 'अर्क'
या 'सारद्रव' निकाला जाता है, उसी को 'शराब' या 'मद्य'
कहा जाता है। सन्धान कितने समय में हो जाता है, इसका
निश्चित निर्देश नहीं किया जा सकता। अतः आचार्य शार्ङ्गधर
ने केवल 'चिरकालस्थ' कहना ही उचित समझा, क्योंकि
देश तथा काल के भेद से सन्धान का समय भी भिन्न-भिन्न
होता है। यथा-शीतदेश में यदि एक मास में सन्धान होता है,
तो उष्ण देश में वही 15 दिनों में हो जाता है।
एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार 'मद्यसार'
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
(स्प्रिट) में औषधियाँ डालकर और कुछ समय तक पड़ी
रहने देकर औषध (टिंचर) तैयार किये जाते हैं और आयुर्वेद
की पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान
करके अर्थात् मद्यसार उत्पन्न करके औषधियाँ (आसव, अरिष्ट
आदि) तैयार कर ली जाती हैं। आसव, अरिष्ट तथा मद्य के
योग से निर्मित औषध मध्यांश के कारण शीघ्र ही अपना
प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। यथा-'आशुत्वाच्चाशुकर्मकृत्'
देखें-सु० उ० अ० 47, श्लोक 5।
आसव तथा अरिष्ट का भेद
यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः।
अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मानं पलोन्मितम्॥२॥
अपक्व (कच्चे) औषध एवं जल के योग से सन्धान
करके जो मद्य तैयार किया जाता है, वह 'आसव' कहलाता
है और औषध एवं जल का क्वाथ करके जो मद्य तैयार किया
जाता है, वह 'अरिष्ट' कहलाता है। इन दोनों की साधारण
मात्रा एक पल (4 तोला) है।
वक्तव्य-आसव एवं अरिष्ट के नामकरण सम्बन्धी उक्त
परिभाषा की आज्ञा का पालन चरक तथा सुश्रुत में नहीं किया
गया है। सम्भव है कि उक्त संहिताओं के निर्माताओं ने उस
पर ध्यान न दिया हो, अस्तु! उक्त संहिताओं में इस परिभाषा
के विरुद्ध बहुत से उदाहरण मिलते हैं। चरक तथा सुश्रुत में
आसव एवं अरिष्टों के पान का समय तथा विधि वही है, जो
मद्यपान की कही गयी है। देखें-च० चि० अ० 24।
अरिष्टों में जल, गुड़ तथा मधु का मान
अनुक्तमानारिष्टेषु द्रवद्रोणे तुलां गुड़म्।
क्षौद्रं क्षिपेद् गुडादर्धं प्रक्षेपं दशमांशकम्॥३॥
जिन अरिष्टों (आसव, सुरा आदि) में द्रव्यों के मान
(तौल) का उल्लेख न हो, उनमें इस प्रकार द्रव्यों का योग

दशमोऽध्यायः ]
आसवारिष्टकल्पना
165

करना चाहिये। यथा-एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) द्रव में एक तुला (5 सेर) गुड़, मधु आधा (2½ सेर) और प्रक्षेप द्रव्य द्रव की अपेक्षा दशमांश (1¼ सेर 2½ तोला)।

वक्तव्य-अरिष्ट क्वाथ रस द्वारा बनाये जाते हैं, इसलिये क्वाथ द्रव्यों के अतिरिक्त उसमें जो द्रव्य डाले जाते हैं, उनका मान दशमांश होना चाहिये, क्योंकि उन्हीं को 'प्रक्षेप' कहा जाता है। अरिष्ट को (अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणैः। सु०सू०अ० 45.194) उत्तम मानने का कारण भी यही है कि उसमें क्वाथ्य द्रव्य का सार बहुत अधिक रहता है। आसव तथा सुरा आदि में भी प्रधान द्रव्यों के अतिरिक्त प्रक्षेप द्रव्यों का मान द्रव का दसवाँ भाग ही होना चाहिये। प्रधान द्रव्य तो द्रव की अपेक्षा चतुर्थांश डालना चाहिये।

सीधु का लक्षण
ज्ञेयः शीतरसः सीधुरपक्वमधुरद्रवैः ।
सिद्धः पक्वरसः सीधुः सम्यक्वमधुरद्रवैः ॥4॥

अपक्व (अग्नि से न पकाये हुये), मधुर (मीठे) द्रवों (ईख का रस आदि) के सन्धान से बना हुआ द्रव 'शीतरस सीधु' (कच्चा सिरका) कहलाता है और पकाये हुये मधुर द्रव्यों का सन्धित द्रव 'सीधु' कहा जाता है।

वक्तव्य-ईख के रस तथा अंगूर आदि के रस को बर्तन में डालकर रख दिया जाता है। प्रत्येक दो-तीन सप्ताह के पश्चात् छानकर दूसरे बर्तन में रख लिया जाता है। इसी प्रकार बार-बार जाला पड़ने पर छान लेना चाहिये, जब जाला पड़ना बन्द हो जाये और द्रव इतना निर्मल हो जाये कि उसमें दर्शक का प्रतिबिम्ब दिखलायी पड़ने लगे, तो समझना चाहिये कि सिरका तैयार हो गया है। अब इसे धीरे से छानकर बोतलों में भरकर रख दें।

सुरा आदि का लक्षण
परिपक्वान्नसन्धानसमुत्पन्नां सुरां जगुः ।
सुरामण्डः प्रसन्ना स्यात् ततः कादम्बरी घना ।।5।।
तदधो जगलो ज्ञेयो मेदको जगलाद् घनः ।
पक्वोऽसौ हृतसारः स्यात् सुराबीजं च किण्वकम् ।।6।।

परिपक्व (पके हुये) अन्न (चावल तथा जौ आदि) के सन्धान से (खमीर उठने से) बनी हुई मद्य को 'सुरा' कहा जाता है। सुरा के निम्नलिखित भेद हैं, यथा-1. सुरा का मण्ड (शत प्रतिशत मद्यांश) प्रसन्ना (स्प्रिट्) कहलाता है, 2. कादम्बरी प्रसन्ना की अपेक्षा घनी या गाढ़ी या जलीयांश युक्त होती है, इसमें मद्यांश कुछ कम होता है। 3. कादम्बरी की अपेक्षा निम्न श्रेणी के मद्य को 'जगल' कहा जाता है, 4. जगल से भी घन या गाढ़ी मद्य को 'मेदक' कहा जाता है। 5. जिसमें मद्य की थोड़ी गन्धमात्र रहती है और सुरा के बीज (जिनसे सुरा बनायी जाती है) को 'किण्वक' कहा जाता है।

वक्तव्य-सुरा सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाली जाती है, तो उसमें से पहले जो अर्क (सार द्रव) प्राप्त होता है, वह बहुत स्वच्छ होता है। अतएव उसे प्रसन्ना कहते हैं। इसमें जलीयांश बिल्कुल नहीं होता अथवा बहुत कम होता है, अतः इसमें जल मिलाकर पीया जाता है। कादम्बरी आदि में कुछ-कुछ जल का अंश रहता है, अतएव वे निम्न श्रेणी की सुरायें कही जाती हैं। प्राचीनकाल में भले ही सुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस एवं मनुष्य इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों (देखें-च० चि० अ० 24), किन्तु हम तो यही कहेंगे कि 'मद्यविक्रयसन्धान-दानादानानिनाचरेत्' (वा०सू०अ० 2.40)। अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना और लेना नहीं करना चाहिये।

वारुणी का लक्षण
यत्तालखर्जूररसैः सन्धिता सा हि वारुणी।

जो मद्य ताल (ताड़) तथा खजूर के रस का सन्धान करके तैयार किया जाता है, उसे 'वारुणी' कहा जाता है।

वक्तव्य-ताड़ तथा खजूर पर जहाँ हरे पत्र लगे रहते हैं, वहाँ एक पात्र लटका दिया जाता है वह रात भर में उक्त वृक्षों के रस से भर जाता है। इस रस को वारुणी कहा जाता है। वृक्ष से उतारते समय यह रस मीठा होता है और चार-पाँच प्रहर के पश्चात् खट्टा हो जाता है।

शुक्त बनाने की विधि
कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च ।। 7 ।।
यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।

कन्द (सूरण या जिमीकन्द), आदि मूल (मूली, गाजर, आलू आदि) तथा फल (लौकी, सेम, किवाँच) आदि पदार्थों को तथा स्नेह युक्त (राई तथा तेल के बड़े, पकौड़े आदि) तथा नमक को द्रव (जल तथा इक्षुरस आदि) में डालकर जो सन्धान किया जाता है, उसे 'शुक्त' कहा जाता है।

वक्तव्य-यह शुक्त दो-तीन दिन में तैयार हो जाता है और इसे 'काञ्जी' कहा जाता है। जैसे-गाजर तथा आलू आदि की काञ्जी।

166 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
विनष्ट तथा चुक्र लक्षण
विनष्टमम्लतां यातं मद्यं वा मधुरद्रवम् ।। ४ ।।
विनष्टः सन्धितो यस्तु तच्चुक्रमभिधीयते ।
मद्य अथवा इक्षुरस आदि मधुर द्रव जब खट्टे हो जाते हैं
तो उन्हें 'विनष्ट' (मर गया या बिगड़ गया) कहा जाता है,
किन्तु यदि विनष्ट होने पर भी उसमें सन्धान (खमीर) हो
जाये तो उसे 'चुक्र' कहा जाता है।
मधुशुक्त बनाने की विधि
जम्बीराणां फलरसः प्रस्थैकः कुडवोन्मितम् ।। ९ ।।
माक्षिकं तत्र दातव्यं पलैका पिप्पली स्मृता।
एतदेकीकृतं सर्वं मृद्भाण्डे च निधापयेत् ।। १० ।।
यवाम्भो मधुसंयुक्तं शृङ्गबेरगुडान्वितम् ।
धान्यराशौ त्रिरात्रिस्र्थं मधुशुक्तमुदाहृतम् ।। ११ ।।
जम्बीरी नींबूओं का रस एक प्रस्थ (64 तोला), मधु
एक कुडव (16 तोला) और पिप्पली एक पल (4 तोला)
इन सब को मिट्टी के पात्र में भरकर तीन अथवा सात दिन
तक रख दें। इस प्रकार 'मधुशुक्त' तैयार हो जाता है। जौ का
क्वाथ (एक प्रस्थ-64 तोला), मधु (एक कुडव=16 तोला),
शृंगबेर तथा गुड़ दोनों एक-एक पल (4-4 तोला) मिट्टी के
पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके तीन दिन तक
धान्यराशि (गेहूँ आदि के ढेर अथवा भूसी में) दबाकर रख
दें। इसे भी 'मधुशुक्त' कहा जाता है।
वक्तव्य- उक्त दोनों विधियों से 'मधुशुक्त' बनाया जाता
है।
गुड़शुक्त का लक्षण
गुदाम्बुना सतैलेन कन्दमूलफलैस्तथा।
सन्धितं चाम्लतां यातं गुड़शुक्तं तदुच्यते ।। १२ ।।
गुड़ (1 पाव), जल (2 सेर), तेल युक्त पदार्थ राई एवं
बड़े आदि, कन्द (आलु, जिमीकन्द आदि) मूल (मूली,
गाजर आदि) एवं फलों (लौकी आदि) के संयोग से जो
सन्धान करके अम्लद्रव (खट्टा जल) तैयार किया जाता है,
उसे 'गुड़शुक्त' कहा जाता है।
वक्तव्य- यह भी एक प्रकार की काञ्जी ही है। इसमें
यद्यपि नमक डालने की चर्चा नहीं की गयी, फिर भी नमक
अवश्य डालना चाहिये।
शुक्त का लक्षण
एवमेवेक्षुशुक्तं स्यान्मृद्वीकासम्भवं तथा।
इसी प्रकार ईख के रस, मुनक्का या अंगूर के रस का भी
'शुक्त' बनाया जाता है।
तुषाम्बु तथा सौवीर का लक्षण
तुषाम्बु सन्धितं ज्ञेयमामैर्विदलि तैरयवैः ।। १३ ।।
यवैस्तु निस्तुषैः पक्ववैः सौवीरं सन्धितं भवेत् ।
कच्चे एवं दले हुये जौ का सन्धान करने से जो द्रव
तैयार किया जाता है उसे 'तुषाम्बु' कहा जाता है। तुष रहित
(छड़े हुये) परिपक्व जौ का सन्धान करने से जो द्रव तैयार
किया जाता है, वह 'सौवीर' होता है।
वक्तव्य- 'तुषाम्बु' तथा 'सौवीर' ये दोनों नाम जौ की
मद्य के हैं। इसका प्रचार पर्वतीय प्रदेशों (नैनीताल, शिमला
आदि) में बहुत अधिक देखने में आता है, किन्तु कुछ लोग
इन्हें 'काञ्जी' का भेद मानते हैं। सुश्रुत ने कहा है- 'षड्रात्रात्
सप्तरात्राद् वा ते च पेये प्रकीर्तिते'। (सु० सू० अ० 44
श्लोक 45)। अर्थात् ये दोनों मद्य छः-सात दिन में पीने
योग्य हो जाते हैं।
काञ्जिक का लक्षण
कुल्माषधान्यमण्डादि सन्धितं काञ्जिकं विदुः ।। १४ ।।
षण्डाकी सन्धिता ज्ञेया मूलकैः सर्षपादिभिः ।
कुल्माष (उबाले हुये गेहूँ तथा चना आदि) तथा धान्यों
(चावल तथा जौ आदि) के माँड (राई, नमक, हल्दी आदि
के सन्धान) से बना हुआ द्रव 'काञ्जिक' या 'काञ्जी' कहा
जाता है। मूली तथा सरसों या राई आदि से बनायी हुई काञ्जी
को 'षण्डाकी' जानना चाहिये।
वक्तव्य- उक्त द्रवों का सन्धान दो-चार दिन में ही हो
जाता है। आसव से षण्डाकी तक के सम्बन्ध में अधिक
परिचय प्राप्त करने के लिए देखें-च० सू० अ० 26, च०
चि० अ० 24 एवं सु० सू० अ० 45।
सुरा या मद्य-योनि (जिन द्रव्यों से सुरा बनायी जाती
है), संस्कार (जिन विधियों से तैयार की जाती है) और नाम
(जिन संज्ञा) आदि भेदों के कारण सुरा बहुत प्रकार की होने
पर भी एक ही प्रकार की कही जाती है, क्योंकि मद सबमें
समान होता है।
होमियोपैथिक में औषध-निर्माण विधि- तत्-तत्
रोगनाशक औषध द्रव्यों को उत्तम सुरा (स्प्रिट) में डालकर
रख दिया जाता है और कुछ समय के बाद छानकर उस सुरा
का प्रयोग किया जाता है। इस विधि का उल्लेख च० चि०

वारुणी (सुरा) में आसव बनायें। क्या उक्त चिकित्सापद्धति

दशमोऽध्यायः] आसवारिष्टकल्पना 167
अ० 15 श्लोक 99 में मिलता है। जैसे 'देवदारुव-
चामुस्तनागरातिविषाऽभयाः। वारुण्यामासुताः'। अर्थात्
देवदारु, बालवच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस एवं हरड़ का
वारुणी (सुरा) में आसव बनायें। क्या उक्त चिकित्सापद्धति
का मूल आधार यही तो नहीं है?
उशीरासव निर्माण-विधि
उशीरं बालकं पद्मं काश्मरीं नीलमुत्पलम्।
प्रियंगुं पद्मकं लोध्रं मञ्जिष्ठां धन्वयासकम् ।। 15 ।।
पाठां किराततिक्तं च न्यग्रोधोदुम्बरं शठीम्।
पर्पटं पुण्डरीकं च पटोलं काञ्चनारकम् ।। 16 ।।
जम्बूशाल्मलिनिर्यासं प्रत्येकं पलसम्मितान्।
भागान् सुचूर्णितान् कृत्वा द्राक्षायाः पलविंशतिम् ।। 17 ।।
धातकीं षोडशपलां जलद्रोणद्वये क्षिपेत्।
शर्करायास्तुलां दत्त्वा क्षौद्रस्यैकतुलां तथा ।। 18 ।।
मासैकं स्थापयेद् भाण्डे मांसीमरिचधूपिते।
उशीरासव इत्येष रक्तपित्तविनाशनः ।। 19 ।।
पाण्डुकुष्ठप्रमेहार्शःकृमिशोथहरस्तथा ।
खस, नेत्रबाला, लाल कमल, गम्भार की छाल,
नीलकमल (नीलोफर), फूल प्रियंगु, पद्माकाष्ठ, लोध, मजीठ,
धमासा, पाठा, चिरायता, बरगद की छाल, गूलर की छाल,
कचूर, पित्तपापड़ा, सफेदकमल, परबल की पत्ती, कचनार
की छाल, जामुन की छाल तथा सेमल की गोंद (मोचरस)
प्रत्येक द्रव्य का 4-4 तोला चूर्ण, द्राक्षा (मुनक्का) बीस पल
(80 तोला या 1 सेर), धाय के फूल सोलह (64 तोला),
जल दो द्रोण (25 सेर 2 पाव 8 तोला), शर्करा (खाँड़) एक
तुला (5 सेर) तथा मधु आधी तुला (2½ सेर)-इन सब
द्रव्यों को जटामांसी तथा मरिच से धूप दिये हुये पात्र में
डालकर एक मास-पर्यन्त रख छोड़ना चाहिये (इसके पश्चात्
निर्मल द्रव को छानकर बोतलों में भर दें)। इस औषध का
नाम 'उशीरासव' है। यह रक्तपित्त का विनाश करता है और
पाण्डुरोग, कुष्ठ, प्रमेह, अर्श, कृमि तथा शोथ को हरता है।
कुमार्यासव
(सुपक्वरससंशुद्धं कुमार्याः पत्रमाहरेत् ।। 20 ।।
यत्नेन रसमादाय पात्रे पाषाणमृन्मये।
द्रोणे गुडतुलां दत्त्वा घृतभाण्डे निधापयेत् ।। 21 ।।
माक्षिकं पक्वलोहं च तस्मिन्नर्धतुलां क्षिपेत्।
कटुत्रिकं लवङ्गं च चातुर्जातकमेव च ।। 22 ।।
चित्रकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं गजपिप्पली।
चविकं हपुषा धान्यं क्रमुकं कटुरोहिणी ।। 23 ।।
मुस्ता फलत्रिकं रास्ना देवदारु निशाद्वयम्।
मूर्वा मधुरसा दन्ती मूलं पुष्करसम्भवम् ।। 24 ।।
बला चातिबला चैव कपिकच्छूस्त्रिकण्टकम्।
शतपुष्पा हिङ्गुपत्री आकल्लकमूटिङ्गणम् ।। 25 ।।
पुनर्नवाद्वयं लोध्रं धातुमाक्षिकमेव च।
एषां चार्धपलं दत्त्वा धातक्यास्तु पलाष्टकम् ।। 26 ।।
पलं चार्धपलं चैव पलद्वयमुदाहृतम् ।
वपुर्वयःप्रमाणेण बलवर्णाग्निदीपनम् ।। 27 ।।
बृंहणं रोचनं वृष्यं पक्तिशूलनिवारणम्।
अष्टावुदरजान् रोगान् क्षयमुग्रं च नाशयेत् ।। 28 ।।
विंशतिं मेहजान् रोगानुदावर्तमपस्मृतिम् ।
मूत्रकृच्छ्रमपस्मारं शुक्रदोषं तथाश्मरीम् ।। 29 ।।
कृमिजं रक्तपित्तं च नाशयेत् तु न संशयः।)
घीकुआर के परिपक्व रसयुक्त तथा साफ सुथरे पत्तों का
संग्रह करें, प्रयत्न के साथ उनका रस निकालकर पत्थर अथवा
घृतलिप्त मृत्तिका पात्र में डाल दें। उक्त रस एक द्रोण (12
सेर 3 पाव 4 तोला), गुड़ एक तुला (5 सेर), मधु आधा
तुला (2½ सेर), लोहभस्म आधी तुला (2½ सेर), सोंठ,
मरिच, पीपल, लौंग, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता,
नागकेसर, चीता का जड़, पीपलामूल, वायविडंग, गजपीपल,
चाव, हाऊबेर, धनियाँ, सुपारी, कुटकी, नागरमोथा, हरड़,
बहेड़ा, आँवला, रासना, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, मरोड़फली,
मुलेठी, दन्ती, पोहकरमूल, बरियारा, अतिबला, कंची, किवाँच
के बीज, गोखरू, सौंफ, हिङ्गपत्री, अकरकरा, उतंगण, पुनर्नवा,
रक्तपुनर्नवा, लोध, सोनामाखी की भस्म (भस्म-निर्माण-विधि
शा० सं० म० खं० अ० 11 में देखें) प्रत्येक द्रव्य आधा-आधा
पल (2-2 तोला) तथा धाय के फूल आठ पल (32 तोला)
इन सब द्रव्यों को उक्त घीकुआर के रस में घोलकर और पात्र
का मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त पड़ा रहने दें। जब
तैयार हो जाये तो स्वच्छ द्रव छानकर बोतलों में भर दें।
इसका नाम 'कुमार्यासव' है। इसकी मात्रा एक पल (4 तोला),
आधा पल (2 तोला) अथवा दो पल (8 तोला) तक रोगी
के शरीर और आयु को देखकर निश्चित की जाती है। यह
आसव बल, वर्ण तथा अग्नि को बढ़ाता है, धातुवर्द्धक है,
रुचिकर है, शुक्रवर्द्धक है, परिणामशूल का विनाशक है,
आठ प्रकार के उदररोगों, भयानक क्षयरोग, बीस प्रकार के