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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 356 में से

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पृष्ठ 196

160 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
हींग, तुम्बुल तथा सोंठ का कल्क (1 पाव) बनाकर
उसे 1 सेर कडुवा तैल में डालकर विधिपूर्वक पकायें। इस
तैल को कान में डालने से कर्णशूल (कान का दुखना) नष्ट
हो जाता है।
बिल्व तैल
बालबिल्वानि गोमूत्रे पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ।। 173 ।।
साजक्षीरं च नीरं च बाधिर्यं हन्ति पूरणात्।
बेलगिरी (1 पाव) को गोमूत्र द्वारा पीसकर कल्क बना
लें, 1 सेर कडुवा तेल और बकरी का दूध एवं जल दोनों
मिलाकर 4 सेर, इन सबको एक साथ यथाविधि पकायें। यह
तैल कान में डालने से बधिरता (बहरापन) को नष्ट करता है।
क्षार तैल
बालमूलकशिम्बीनां क्षारः क्षारयुगं तथा ।। 174 ।।
लवणानि च पञ्चैव हिङ्गु शिग्रु महौषधम्।
देवदारु वचा कुष्ठं शतपुष्पा रसाञ्जनम् ।। 175 ।।
ग्रन्थिकं भद्रमुस्तं च कल्कैः कर्षमितैः पृथक् ।
तैलप्रस्थं च विपचेत् कदलीबीजपूरयोः ।। 176 ।।
रसाभ्यां मधुशुक्तेन चातुर्गुण्यमितेन च।
पूयस्रावं कर्णनादं शूलं बधिरतां कृमीन् ।। 177 ।।
अन्यांश्च कर्णजान् रोगान् मुखरोगांश्च नाशयेत्।
कच्ची मूलियों के टुकड़ों का क्षार, जौखार, सज्जीखार,
सेंधा नमक, सोंचर नमक, बिरिया नमक, समुद्र नमक, साँभर
नमक, हींग, सहिजन की जड़ की छाल, सोंठ, देवदारु, वच,
कूठ, सौंफ, रसवंत, पीपलामूल तथा नागरमोथा प्रत्येक द्रव्य
1-1 तोला लेकर कल्क बनायें; सरसों का तेल एक प्रस्थ
(64 तोला), केले की जड़ का रस, बिजौरा नींबू का रस
तथा मधुशुक्त (तीनों द्रव पदार्थ तेल से चौगुने अर्थात् 4
प्रस्थ) मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तैल
कान में डालने से पूयस्राव (कान में से पीब का जाना),
कर्णनाद (विविध प्रकार की ध्वनियाँ सुनायी पड़ना), शूल
(कान की पीड़ा), बधिरता, कृमि (कान में उत्पन्न हुये कृमि),
अन्यान्य कर्णरोग तथा मुखरोगों को विनष्ट करता है।
पाठादि तैल
पाठा द्वे च निशे मूर्वा पिप्पलीजातिपल्लवैः ।। 178 ।।
दन्त्या च तैलं संसिद्धं नस्यं स्याद् दुष्टपीनसे।
पाठा, हल्दी, दारुहल्दी, मरोड़फली, पिप्पली, चमेली
के पत्र तथा दन्ती के कल्क से सिद्ध किये हुये कटुतैल की
नस्य देने से दुष्ट पीनस (बिगड़े हुये जुकाम) का विनाश हो
जाता है।
व्याघ्री तैल
व्याघ्रीदन्तीवचाशिग्रुतुलसीव्योषसैन्धवैः ।। 179 ।।
कल्कैश्च पाचनं तैलं पूतिनासागदापहम्।
कण्टकारी, दन्ती, वच, सहिजन की छाल, तुलसी के
पत्ते, सोंठ, मरिच, पीपल तथा सेंधा नमक इन सब द्रव्यों का
कल्क (1 पाव), कटुतैल 1 सेर में डालकर पाक करें। यह
तैल आमकफ का पाचन करता है, पूतिनास (नाक में से
दुर्गन्ध आना) तथा नासास्राव (नाक से पानी जाना) को नष्ट
करता है।
कुष्ठादि तैल
कुष्ठं बिल्वकणाशुण्ठीद्राक्षाकल्ककषायवत् ।। 180 ।।
साधितं तैलमाज्यं वा नस्यात् क्षवथुनाशनम्।
कूठ, बेलगिरी, पीपल, सोंठ तथा मुनक्का के कल्क-
रूपी कषाय के साथ सिद्ध किया हुआ तैल अथवा घी की
नस्य लेने से क्षवथु (अधिक छींकें आना) रोग को नष्ट करता
है।
गृहधूम तैल
गृहधूमकणादारुक्षारनक्ताह्वसैन्धवैः ।। 181 ।।
सिद्धं शिखरिबीजैश्च तैलं नाशार्शांसि हितम्।
गृहधूम (रसोई घर में जो जाले लगे रहते हैं), पीपल,
देवदारु, जौखार, करञ्ज के पत्र सेंधा नमक तथा अपामार्ग
(चिरचिटा) के बीज, इन द्रव्यों के कल्क से पकाया हुआ
तैल नाशार्श (नासिका की बवासीर) के लिए लाभदायक
होता है।
वक्तव्य-उक्त चारों तैल केवल कल्क डालकर ही बनाये
जाते हैं।
वज्री तैल
वज्रीक्षीरं रविक्षीरं द्रवं धत्तूरचित्रजम् ।। 182 ।।
महिषीविङ्भवं द्रावं सर्वांशं तिलतैलकम्।
पचेत् तैलावशेषं च गोमूत्रेऽथ चतुर्गुणे ।। 183 ।।
तैलावशेषं पक्त्वा च तत्तैलं प्रस्थमात्रकम्।
गन्धकाग्निशिलातालं विडङ्गातिविषाविषम् ।। 184 ।।
तिक्तकोशातकीकुष्ठवचामांसीकटुत्रयम् ।
पीतदारु च मञ्जिष्ठां च स्वर्जिकार्जुनजीरकम् ।। 185 ।।