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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 356 में से

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पृष्ठ 223

द्वादशोऽध्यायः
रसादिशोधनमारणकल्पना


पारद के गुण
पारदः सर्वरोगाणां जेता पुष्टिकरः स्मृतः।
सुज्ञेन साधितः कुर्यात् संसिद्धिं देहलोहयोः॥१॥
पारद (पारा) सम्पूर्ण रोगों को जीतता है, शरीर को पुष्ट
करता है और बुद्धिमान् कार्यकर्त्ता द्वारा सिद्ध (तैयार) किया
हुआ शरीर एवं धातुओं पर सिद्धि या सफलता को प्रदान
करता है।
वक्तव्य-पारद सुप्रसिद्ध खनिज द्रव्य है, इसे शिववीर्य
भी कहते हैं। इसकी उपासना ईश्वर का उपासना के समान है।
इटली, स्पेन तथा संयुक्तराज्य अमेरिका आदि देशों में अत्यन्त
गहरे (2450 फीट तक के) पारद कूप हैं, उनमें से,
पारद-मिश्रित खनिजों में से तथा हिंगुल (शिंगरफ) से पारद
प्राप्त किया जाता है।
पारद के नाम
रसेन्द्रः पारदः सूतो हरजः सूतको रसः।
मुकन्दश्चेति नामानि ज्ञेयानि रसकर्मसु॥२॥
रसशास्त्र के विद्वान् पारद के निम्नलिखित नाम स्वीकार
करते हैं-रसेन्द्र, पारद, सूत, हरज, सूतक एवं रस।
वक्तव्य-उक्त नामों के अतिरिक्त इसके और भी बहुत
से नाम हैं, उनको निघण्टुओं में देखें।
ग्रहानुसार धातु नाम
ताम्रतारारनागाश्च हेमवङ्गौ च तीक्ष्णकम्।
कांस्यकं कान्तलोहं च धातवो नव ये स्मृताः॥३॥
सूर्यादीनां ग्रहाणां ते कथिता नामभिः क्रमात्।

  1. ताम्र (ताँबा), 2. तार (चाँदी), 3. आर (पीतल),
  2. नाग (सीसा), 5. हेम (सोना), 6. वंग (कली), 7.
    तीक्ष्णक (तीक्ष्णलोह या फौलाद), 8. कांस्यक (काँसा)
    एवं 9. कान्तलोह (चुम्बक)-ये नौ द्रव्य 'धातु' माने जाते

हैं। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा
केतु इन नामों के क्रम से उक्त धातुओं के नाम कहे गये हैं।
पारद की शोधन-विधि
राजीरसोनमूषायां रसं क्षिप्त्वा विबन्धयेत्॥४॥
वस्त्रेण दोलिकायन्त्रे स्वेदयेत् काञ्जिकैस्त्र्यहम्।
दिनैकं मर्दयेत् सूतं कुमारीसम्भवैर्द्रवैः॥५॥
तथा चित्रकजैः क्वाथैर्मर्दयेदेकवासरम्।
काकमाचीरसैस्तद्वद् दिनमेकं च मर्दयेत्॥६॥
त्रिफलायास्तथा क्वाथै रसो मर्द्यः प्रयत्नतः।
ततस्तेभ्यः पृथक्कुर्यात् सूतं प्रक्षाल्य काञ्जिकैः॥७॥
ततः क्षिप्त्वा रसं खल्वे रसादर्धं च सैन्धवम्।
मर्दयेन्निम्बुकरसैर्दिनमेकमनारतम् ॥८॥
ततो राजी रसोनश्च मुख्यश्च नवसादरः।
एतै रससमैस्तद्वत् सूतो मर्द्यस्तुषाम्बुना॥९॥
ततः संशोष्य चक्राभं कृत्वा लिप्त्वा च हिङ्गुना।
द्विस्थालीसम्पुटे धृत्वा पूरयेल्लवणेन च॥१०॥
अधः स्थाल्यां ततो मृद्भां दद्याद् दृढतरां बुधः।
विशोष्याग्निं विधायाधो निषिञ्चेदम्बुनोपरि॥११॥
ततस्तु कुर्यात् तीव्राग्निं तदधः प्रहरत्रयम्।
एवं निपातयेदूर्ध्वं रसो दोषविवर्जितः॥१२॥
अथोर्ध्वपिठरीमध्येग्नो ग्राह्यो रसोत्तमः।
राई तथा लहसुन के कल्क का मूषायन्त्र बनायें, फिर
इसमें पारद डालकर और कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र द्वारा
काञ्जी में तीन दिन तक स्वेदन करें। तत्पश्चात् इसमें से पारद
को निकालकर घीकुआर के रस में, चीता के रस में, मकोय
के रस में और त्रिफला के रस में एक-एक दिन भली-भाँति
मर्दन करें। इसके पश्चात् उक्त द्रवों में से पारद को पृथक् कर
काञ्जी से धो दें और खरल में डालकर और पारद की अपेक्षा