शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
| ४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे |
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[बायाँ स्तम्भ]
योग, छठे में-चूर्ण बनाने का विधि, कुछ प्रसिद्ध चूर्णयोग, सातवें में-गुटिका (गोलियाँ) तथा कतिपय योग, आठवें में-अवलेह निर्माण-विधि, कुछ प्रसिद्ध च्यवनप्राश आदि अवलेह योग, नवें में-स्नेह (घी-तेल आदि) पाक-विधि तथा कुछ चिकित्सोपयोगी स्नेह योग, दसवें में-सन्धान-विधि, आसव, अरिष्ट, सिरका आदि के निर्माण की विधि तथा कुछ प्रसिद्ध आसव-अरिष्टयोग एवं परस्पर भेद-विवरण, ग्यारहवें में-विविध प्रकार की धातुओं के शोधन तथा मारण की विधि और बारहवें में-रस (पारद), गन्धक का शोधन-मारण तथा सिद्ध रसयोगों का वर्णन किया गया है।
उत्तरखण्ड के अध्याय
स्नेहपानं स्वेदविधिरुर्वमनं च विरेचनम् ॥ १० ॥
ततस्तु स्नेहवस्तिः स्यात् ततश्चापि निरूहणम्।
ततश्चाप्युत्तरो वस्तिस्ततो नस्यविधिर्मतः ॥ ११ ॥
धूमपानविधिश्चैव गण्डूषादिविधिस्तथा।
लेपादीनां विधिः ख्यातस्तथा शोणितविस्रुतिः ॥ १२ ॥
नेत्रकर्मप्रकारश्च खण्डः स्यादुत्तरस्त्वयम्।
उत्तरखण्ड में तेरह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्नेहपान-विधि, स्नेहपाक-विधि और कुछ स्नेहयोग; दूसरे में-स्वेदन (शरीर से पसीना निकालने की) विधि, स्वेदन के विविध भेद; तीसरे में-वमन (उलटी कराने की) विधि, वामक (वमनकारक) योगों का वर्णन, वमन के लक्षण; चौथे में-विरेचन (दस्त कराने की) विधि, विरेचक योगों का वर्णन, विरेचन के लक्षण; पाँचवें में-अनुवासनवस्ति, उसकी विधि; अनुवासन योग; छठे में-निरूहणवस्ति, उसकी विधि, निरूहण योग; सातवें में-उत्तरवस्ति (यह वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में और स्त्रियों की योनि में दी जाती है), उत्तरवस्ति-विधि, उत्तरवस्ति में प्रयुक्त होने वाले योग; आठवें में-नस्य (नाक द्वारा ली जाने वाली औषधि) विधि, विविध नस्य योग; नवें में-धूमपान-विधि तथा उसके विविध योग; दसवें में-गण्डूष (कुल्ले करने की) विधि, विविध गण्डूष योग, कवल-धारण-विधि, अनेक प्रकार के कवल योग; ग्यारहवें में-लेप का विधि, विविध प्रकार के रोगों में प्रयुक्त होने वाले लेपयोग; बारहवें में-रक्तस्राव-विधि, रक्त-परिचय, रक्तस्रावहर योग तथा तेरहवें में-नेत्ररोगों की चिकित्सा-विधि नेत्ररोग-नाशक विविध योग आदि दिये गये हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
अध्यायों तथा श्लोकों की गणना
द्वात्रिंशत्सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता ॥ १३ ॥
षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।
प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता में बत्तीस अध्याय हैं (पूर्वखण्ड में ७, मध्यमखण्ड में १२ और उत्तरखण्ड में १३) और श्लोकों की संख्या २६०० (छब्बीस सौ) है।
वक्तव्य- इसका स्पष्टीकरण आलेख में देखें।
मान-परिभाषा
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ॥ १४ ॥
अतः प्रयोगकार्यार्थं मानमत्रोच्यते मया।
मान (परिमाण, नाप या तौल) के बिना औषधद्रव्यों की युक्ति (प्रयोग या व्यवहार) कहीं भी नहीं की जा सकती है। इसलिये प्रयोग करने के लिए मेरे द्वारा यहाँ विविध मानों का वर्णन किया जा रहा है।
वक्तव्य- आयुर्वेदीय आर्षसंहिताओं में दिये गये मागध तथा कालिङ्ग मानों की तुलना आधुनिक मानों के साथ हो सके, इसके लिए उक्त प्राचीन मानों का परिचय यहाँ दिया जा रहा है। वैसे आर्षग्रन्थों में दिये गये इन आर्यमानों की सत्ता मुगलशासन काल में ही समाप्त हो चली थी। आज जिन नाप-तौलों का व्यवहार है, उनसे हमें प्राचीन मानों का समन्वयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। आचार्य भावमिश्र ने इस प्रकरण को शार्ङ्गधरसंहिता से प्रायः उद्धृत किया है-आप जरा मिला कर देखें-भा० प्र० निघण्टु मानपरिभाषा-प्रकरण।
मागधमान-परिभाषा
त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिंशता परमाणुभिः ॥ १५ ॥
त्रसरेणुस्तु पर्यायेनाम्ना वंशी निगद्यते।
विद्वानों ने तीस परमाणुओं का एक त्रसरेणु स्वीकार किया है। 'त्रसरेणु' का ही पर्याय 'वंशी' कहा जाता है।
वक्तव्य- यद्यपि यहाँ तीस परमाणु परिमित एक परिमाण का नाम 'त्रसरेणु' है, तथापि इसका पारिभाषिक अर्थ इस प्रकार है-त्रस=चर या चल या चलायमान जो रेणु=धूल का कण। 'त्रसः च असौ रेणुः च=त्रसरेणुः'। इसका अन्यत्र परिचय इस प्रकार है-'जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते' ॥ -मनुस्मृति ८.१३२। तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १.३६१।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 5
परमाणु-परिचय
जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।। 16 ।।
तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स कथ्यते ।
खिड़की या झरोखे में से भीतर की ओर आयी हुई सूर्य
की किरणों के प्रकाश में जो सूक्ष्म (छोटे से छोटे) धूलिकण
(उड़ते हुये-से) दिखलायी पड़ते हैं, उनमें से किसी एक का
तीसवाँ भाग परमाणु कहा जाता है।
वक्तव्य-पृथिवी, जल आदि के सबसे छोटे भाग को
'परमाणु' कहते हैं। यह अणु से भी परमलघु होता है, अतएव
इसे परमाणु कहते हैं। आत्मतत्त्व को भी 'अणोरणीयान्'
कहा गया है।
वंशी का मान
जालान्तरगतैः सूर्यकरैर्वंशी विलोक्यते ।। 17 ।।
जिसे ऊपर त्रसरेणु कहा गया है, उसे ही 'वंशी' भी कहा
जाता है। इस परिमाण को झरोखे के भीतर गयी हुई सूर्य-किरणों
द्वारा देखा जा सकता है।
वक्तव्य-चरक का पौतवमान 'वंशी' या 'ध्वंसी' से
प्रारम्भ होता है। खिड़की से भीतर की ओर आयी हुई
सूर्य-किरणों में जो उड़ते हुये धूल के कण दिखलायी देते हैं,
उन तीस परमाणुओं की एक 'वंशी' (त्रसरेणु) होती है, इसी
को 'ध्वंसी' भी कहते हैं। दूसरे आचार्य ध्वंसी का अर्थ धूल
करते हैं। देखें-च० क० अ० 12.87।
मरीचि आदि के मान
षड्वंशीभिर्मरीचिः स्यात् ताभिः षड्भिस्तु राजिका।
तिसृभी राजिकाभिश्च सर्षपः प्रोच्यते बुधैः ।। 18 ।।
छः त्रसरेणुओं की एक 'मरीचि' होती है; छः मरीचियों
की एक राजिका (राई) होती है और तीन राजिकाओं (राइयों)
का एक सर्षप (गौरसर्षप या पीली सरसों) होता है।
वक्तव्य-तेज धूप में बालू या अभ्रक के जो लघुतम
कण दूर से चमकते हुये दिखलायी देते हैं, उनको 'मरीचि'
कहते हैं। इसी से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध शब्द है- मृग-
मरीचिका। इसका अर्थ होता है-मृगतृष्णा। यह मरीचि त्रसरेणु
या वंशी से छः गुना भारी होता है।
यव आदि के मान
यवोऽष्टसर्षपैः प्रोक्तो गुञ्जा स्यात् तच्चतुष्टयम्।
षड्भिस्तु रक्तिकाभिः स्यान्माषको हेमधान्यकौ ।। 19 ।।
आठ सर्षप (सरसों) का एक 'जौ' होता है, चार 'जौ'
की एक 'गुञ्जा' इसी को रत्ती (रक्तिका) या घुंघची भी कहते
हैं और छः रत्ती का एक 'माशा' होता है। इसके पर्याय हैं-
हेम तथा धान्यक।
वक्तव्य-गुञ्जा (घुंघची) वर्णभेद से लाल मुख वाली
तथा काले मुख वाली होती है। लोक-व्यवहार में दोनों को ही
रत्ती कहते हैं। वास्तव में लाल मुख वाली रत्ती (रक्तिका)
को ही सुनार तौल के लिए प्रयुक्त करते हैं। इसकी गणना
उपविषों में है। इसे बाहर से सुन्दर तथा भीतर से विषमयं
देखकर कवियों ने इसकी तुलना स्त्रियों के हृदयों से की है।
यह मान शार्ङ्गधराचार्य-सम्मत है, दूसरे आचार्य 5 रत्ती, 7
रत्ती अथवा 10 रत्ती का एक माशा मानते हैं।
शाण आदि के मान
माषैश्चतुर्भिः शाणः स्याद्धरणः स निगद्यते ।
टङ्कः स एव कथितस्तद्द्वयं कोल उच्यते ।। 20 ।।
क्षुद्रको वटकश्चैव द्रुङ्क्षणः स निगद्यते ।
चार माशा का एक 'शाण' होता है, उसे 'धरण' तथा
'टंक' भी कहते हैं। दो शाण का एक 'कोल' कहा जाता है।
इसी के पर्याय हैं-क्षुद्रक, वटक तथा द्रंक्षण।
कर्ष का मान तथा पर्याय
कोलद्वयं च कर्षः स्यात् स प्रोक्तः पाणिमानिका ।। 21 ।।
अक्षं पिचुः पाणितलं किञ्चित्पाणिश्च तिन्दुकम् ।
बिडालपदकं चैव तथा षोडशिका मता ।। 22 ।।
करमध्यो हंसपदं सुवर्णं कवलग्रहः ।
उदुम्बरं च पर्यायैः कर्ष एव निगद्यते ।। 23 ।।
दो कोल का एक 'कर्ष' होता है। इसके पर्याय हैं-
पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्, पाणि, तिन्दुक,
बिडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह
तथा उदुम्बर।
वक्तव्य-मानों के परिमाणों में समय-समय पर अन्तर
आये हैं, जिसका इतिहास साक्षी है। इसी प्रकार यहाँ दिये गये
कर्ष के पर्यायों में एक 'सुवर्ण' शब्द है। इस 'सुवर्ण' का
परिमाण विष्णु, मनु, याज्ञवल्क्य, सुश्रुत तथा कौटिल्य 16
माशा= 1 सुवर्ण मानते हैं। चरक, लीलावती, शार्ङ्गधर,
भावप्रकाश आदि में यह सुवर्ण शब्द 1 कर्ष=1 तोला का
पर्याय माना गया है। दीपिका व्याख्या युक्त (संवत् 1966 में
कलकत्ता से) प्रकाशित हनुमन्नाटक में 'सुवर्ण' शब्द का
परिचय देते हुये टीकाकार ने लिखा है-'सुवर्णं दशमाषकम्'।
6 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
इसके अनुसार श्रीराम ने जो अँगूठी सीताजी के लिए भेजी
थी, वह दस माशे की थी।
किञ्चित्पाणिश्च-कुछ टीकाकार इसे एक पद, शेष दो
पद मानते हैं। दो पद मानने वालों का पक्ष युक्तिसंगत तथा
व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है, क्योंकि किञ्चित् और पाणि:
ये दोनों पद स्वतन्त्र हैं। आचार्य वृन्द ने भी कर्ष के पर्यायों में
'किञ्चित्' तथा 'पाणि:' को अलग-अलग स्वीकार किया
है। देखें-'किञ्चिच्च कर्षपर्यायः शुक्तिरर्धपलं तथा।
सान्निध्यान्मधुनो मानं व्योषादेर्मिलितस्य च'।। च० चि० अ०
12.50-52। कंसहरीतकी की टिप्पणी में श्रीजयदेव
विद्यालंकार ने इसे उद्धृत किया है।
कर्ष-मागधमान के अनुसार 96 रत्ती=1 रुपया का एक
तोला होता है।
आधा पल तथा पल का मान
स्यात् कर्षाभ्यामर्धपलं शुक्तिरष्टमिका तथा।
शुक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिराम्रं चतुर्थिका ।। 24 ।।
प्रकुञ्चः षोडशी बिल्वं पलमेवात्र कीर्त्यते ।
दो कर्ष (तोला) का एक 'अर्धपल' होता है। उसी को
शुक्ति तथा अष्टमिका भी कहते हैं। दो शुक्ति का एक 'पल'
होता है; ऐसा जानना चाहिये। 'पल' के पर्याय ये हैं-मुष्टि,
आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व।
प्रसृति आदि के मान
पलाभ्यां प्रसृतिर्ज्ञेया प्रसृतश्च निगद्यते ।। 25 ।।
प्रसृतिभ्यामञ्जलिः स्यात् कुडवोऽर्धशरावकः।
अष्टमानं च स ज्ञेयः कुडवाभ्यां च मानिका ।। 26 ।।
शरावोऽष्टपलं तद्वज्ज्ञेयमत्र विचक्षणैः ।
दो पल की एक 'प्रसृति' होती है और उसी को 'प्रसृत'
अथवा पसर भी कहते हैं। दो प्रसूत की एक 'अंजलि' होती
है। उसी को कुडव, अर्धशरावक तथा अष्टमान कहते हैं। दो
कुडव की एक 'मानिका' होती है। उसी को मान-विशेषज्ञ
'शराव' एवं 'अष्टपल' भी कहते हैं।
वक्तव्य-'अष्टपल' शब्द की सार्थकता यह है कि इस
मान में आठ पल होते हैं।
प्रस्थ तथा आढक के मान
शरावाभ्यां भवेत् प्रस्थश्चतुःप्रस्थैस्तथाढकम् ।। 27 ।।
भाजनं कंसपात्रं च चतुःषष्टिपलं च तत् ।
दो 'शराव' का एक 'प्रस्थ' होता है। चार प्रस्थ का एक
'आढक' होता है। यह चौंसठ पल का होता है। आढक के
पर्यायवाचक नाम ये हैं-भाजन और कंसपात्र।
द्रोण तथा शूर्प के मान
चतुर्भिराधकैर्द्रोणः कलशो नल्वणोन्मनौ ।। 28 ।।
उन्मानश्च घटो राशिर्द्रोणपर्यायवाचकाः ।
द्रोणाभ्यां शूर्पकुम्भौ च चतुःषष्टिशरावकाः ।। 29 ।।
चार आढक का एक 'द्रोण' होता है। द्रोण के पर्यायवाचक
नाम-कलश, नल्वण, उन्मन, उन्मान, घट तथा राशि हैं। दो
द्रोण का एक 'शूर्प' होता है, उसी को 'कुम्भ' भी कहते हैं।
'शूर्प' तथा 'कुम्भ' ये दोनों परिमाण में 64-64 शराव के
होते हैं।
द्रोणी तथा खारी के मान
शूर्पाभ्यां च भवेद् द्रोणी वाहो गोणी च सा स्मृता ।
द्रोणीचतुष्टयं खारी कथिता सूक्ष्मबुद्धिभिः ।। 30 ।।
चतुःसहस्रपलिका षण्णवत्यधिका च सा।
दो शूर्प की एक 'द्रोणी' होती है। उसी को 'वाह' तथा
'गोणी' भी कहा जाता है। तीक्ष्ण बुद्धि वाले विद्वानों ने चार
द्रोणी की एक 'खारी' कही है। इस एक 'खारी' में चार हजार
छियानबे (4096) पल होते हैं।
भार तथा तुला के मान
पलानां द्विसहस्रं च भार एकः प्रकीर्तितः ।। 31 ।।
तुला पलशतं ज्ञेया सर्वत्रैवैष निश्चयः ।
दो हजार पल का एक 'भार' होता है और एक सौ पल
की एक 'तुला' होती है। यही निश्चय सभी को स्वीकार है।
क्रमशः चतुर्गुण के मान
माषटङ्काक्षबिल्वानि कुडवः प्रस्थमाढकम् ।। 32 ।।
राशिर्गोणी खारिकेति यथोत्तरचतुर्गुणाः ।
माष (माशा), टंक, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक,
राशि, गोणी तथा खारी ये परिमाण क्रमशः उत्तरोत्तर चौगुने
होते हैं।
**वक्तव्य-**यहाँ तक जिस मान का वर्णन किया गया है,
उसे 'मागधमान' कहते हैं। यह मान बिहार प्रान्त में प्रचलित
होने के कारण 'मागधमान' कहा जाता है। सभी प्रकार के
मान विद्वानों द्वारा निर्धारित एवं आदृत होते हैं। उनमें से
किसी एक मान का विधिवत् प्रयोग करना तथा कराना चाहिये।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 7
द्रव आदि द्रव्यों का मान
गुञ्जादिमानमारभ्य यावत् स्यात् कुडवस्थितिः ।। ३३ ।।
द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।
एक 'रत्ती' की तौल से लेकर 'कुडव' तक के सभी द्रव
(तरल, जलीय), आर्द्र (गीले औषधद्रव्य) तथा सूखे द्रव्यों
का मान सम (समान) ही होता है। अर्थात् निर्दिष्ट मात्रा के
बराबर ही द्रव्य या द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये।
द्विगुण मान-व्यवहार
प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः ।। ३४ ।।
मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित् स्मृतम् ।
प्रस्थ आदि (प्रस्थ मान है आदि में जिसके, अर्थात्-
शराव के मान से प्रारम्भ कर द्रव तथा आर्द्र=गीले, हरे अथवा
जो भली-भाँति सूखे न हों) द्रव्यों को परिमाण में दूना लेना
चाहिये, किन्तु जिस द्रव्य को तुला-परिमाण में लेने को कहा
गया हो, उसे कहीं भी दूने परिमाण में नहीं लिया जाता है।
वक्तव्य-उपर्युक्त 33 तथा 34 श्लोकों द्वारा जिस विषय
का प्रतिपादन किया गया है, वह कुछ सन्दिग्ध-सा प्रतीत
होता है, क्योंकि महर्षि आत्रेय ने रत्ती या प्रस्थ आदि मानों
का उल्लेख न करके केवल सूखे द्रव्यों की तुलना में द्रव
(जलीय) तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों को ही दूना लेने की
आज्ञा दी है। यथा-‘शुष्कद्रव्येष्विदं मानमेवमादिप्रकीर्तितम् ।
द्विगुणं तद् द्रवेष्विष्टं तथा सद्योद्धृतेषु च।।-च० क० अ०
12.98। महर्षि सुश्रुत ने भी इसी विषय का समर्थन इस प्रकार
किया है-‘शुष्काणां त्विदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणम्'
इति।-सु० चि० अ० 31.7। यही कारण है कि कविराज
गंगाधरराय ने भी आयुर्वेदीयपरिभाषा नामक लघुकाय ग्रन्थ
में कहा है-‘तत्तु न सम्यक्, युक्तिविरोधात् च'। यह विचारणीय
विषय है।
कुडवमान-मापक पात्र
मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् ।। ३५ ।।
विस्तीर्णं च तथोच्चं च तन्मानं कुडवं वदेत् ।
मिट्टी, वृक्ष (लकड़ी), बाँस, लोहा (ताँबा, पीतल, काँच)
आदि से बना हुआ वह पात्र, जो चार अंगुल चौड़ा तथा उतना
ही ऊँचा हो, उसमें जितना द्रव-द्रव्य समा सके, वह 'कुडव'
होता है, अर्थात् इस नाप से निर्मित पात्र को 'कुडवपात्र'
कहते हैं।
वक्तव्य-इस प्रकार के परिमाणमापक पात्र 'द्रव्यमान'
के अन्तर्गत आते हैं। आचार्य शार्ङ्गधर ने छोटे मानों के पात्रों
का परिमाण नहीं बतलाया है और न आगे इससे बड़े मानों के
परिमाणों का ही उल्लेख किया है। इस संकेत से आप अपनी
बुद्धि से छोटे तथा बड़े मानों की कल्पना स्वयं कर सकते हैं।
इस प्रकार के पात्र द्रव-द्रव्यों को नापने के उपयोग में लाये
जाते हैं। दूध, तेल आदि द्रव पदार्थ बेचने वालों के पास इस
प्रकार नापने के अनेक पात्र आपको दिखलायी देंगे।
इस प्रकार के पात्रों से सभी द्रव-द्रव्यों का समान रूप से
व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, क्योंकि सभी द्रव्यों का
गुरुत्व परस्पर भिन्न होता है। ध्यान दें-यदि एक कुडवपात्र
में 16 तोला दूध आता है, तो मधु उससे डेढ़ गुना अधिक
आयेगा और घी उससे भी कुछ अधिक आयेगा। इन
व्यवहारोचित विषयों का ज्ञान आप अपने अध्ययनकाल में
गुरुजनों से प्राप्त करें।
योग-नामकरण-विधि
यदौषधं तु प्रथमं यस्य योगस्य कथ्यते ।। ३६ ।।
तन्नाम्नैव स योगो हि कथ्यतेऽत्र विनिश्चयः ।
जिस योग के आरम्भ में सर्वप्रथम जिस औषध द्रव्य का
नाम होता है, वह औषधयोग उसी औषधद्रव्य के नाम से
कहा जाता है। शार्ङ्गधरसंहिता में प्रायः यही निश्चय किया
गया है।
वक्तव्य-प्रस्तुत संहिता में अधिकांश योग ऐसे ही हैं,
जैसा कि ऊपर कहा गया है; किन्तु कुछ योग ऐसे भी प्राप्त हैं,
जो उक्त प्रकार से किये गये निश्चय के विपरीत हैं, जैसे-
सुदर्शन चूर्ण, ज्वरघ्नीगुटिका, नारायणतैल, लोकनाथरस,
लघुलॉकनाथरस आदि। इसका समर्थन हम शास्त्रीय दृष्टि से
इस प्रकार करते हैं-‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'। आचार्य
शार्ङ्गधर ने उक्त निश्चय प्राचीन संहिताओं में दिये गये
योगनाम-निर्धारण प्रकार को देखकर ही किया होगा, क्योंकि
उनमें भी अधिकांश योगों के नाम उक्त सिद्धान्त पर ही रखे
गये हैं; कुछ स्वतन्त्र-रूप से भी हैं। यह सामान्य-विशेष का
सिद्धान्त सभी क्षेत्रों में देखा जाता है।
मात्रा-विचार
स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। ३७ ।।
प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् ।
मात्रा का कोई निश्चित परिमाण नहीं है और न किया ही
जा सकता है। इसलिये काल (समय), अग्नि (जठराग्नि,