शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
द्वादशोऽध्यायः] रसादिशोधनमारणकल्पना 209
द्वादशोऽध्यायः] रसादिशोधनमारणकल्पना 209
तत्पश्चात् जब उसमें से गरम-गरम बहुत-सा धूम निकलने
लगे तो उसका गोला बनाकर ताम्रपात्र में रख दें, फिर तत्काल
इस पात्र को धान्य (गेहूँ आदि) के ढेर में तीन दिन तक रखें,
तत्पश्चात् उसमें से निकाल कर खरल में डालकर तथा धूप में
रखकर तुलसी के रस की तीन बार भावना दें फिर सुखाकर
त्रिकटु (सोंठ-मरिच-पीपल) के क्वाथ की तीन बार भावना
दें। इसी प्रकार अडूसा, गिलोय तथा चित्ता के रस की क्रमशः
एक-एक बार भावना दें, तत्पश्चात् लोहे की कड़ाही में डालकर
त्रिफला के रस, सम्भालू, अनार का छिलका, कमलनाल,
भाँगरा, कटसरैया, पलाश की छाल, केला के कन्द का रस,
विजयसार का क्वाथ, नील, मुण्डी का रस तथा बबूर (कीकर)
की फलियों का रस इन सबकी तीन बार भावना दें, फिर
नागबला (गंगेरन) का रस, शतावर, गोखरू तथा पातालगरुड़ी
(जलजमनी), इन औषधियों के रस की तीन-तीन बार भावना
दें। यह 'लोहरसायन' तैयार हो गया। इसमें से एक कोल
(आधा कर्ष या आधा तोला) भर लेकर मधु तथा घी के
साथ प्रातःकाल चाटना चाहिये और इसके अनुपान में त्रिफला
का क्वाथ एक पल (4 तोला) पीना चाहिये। इस प्रकार तीन
मास तक सेवन करने पर अकाल वली (झुर्रियाँ) तथा पलित
(बालों का पकना) का विनाश हो जाता है। यह औषध
पिप्पली तथा मधु के साथ खाने से मन्दाग्नि, श्वास, कास,
पाण्डुरोग, कफरोग तथा वातव्याधि को नष्ट करती है, इसमें
कोई भी सन्देह नहीं है। गिलोय के सत्त्व तथा मधु के साथ
खाने से वातरक्त मूत्रदोष (मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राघात आदि),
ग्रहणीरोग, बवासीर तथा अण्डवृद्धि को जीतती है। बल,
वर्ण, वीर्य तथा आयु को बढ़ाती है। कुछ काल तक सेवन
करने से सभी प्रकार के रोगों को जीतती है। इसका नाम
'लोहरसायन' है। स्मरण रहे कि लोह अथवा लोहयुक्त
औषधियों का सेवन करने वाला मनुष्य कोहड़ा तिलतैल,
उड़द की बनी वस्तुएँ, राई, मद्य तथा खट्टे पदार्थों का परित्याग
कर दें।
वक्तव्य-यह उत्तम रसायन है। भानुपाक द्वारा एक प्रकार
को लोहभस्म तैयार करने की यह उत्तम विधि है।
जैपाल-शुद्धि की विधि
(जैपालं रहितं त्वगङ्कुररसज्ञाभिर्मले माहिषे
निक्षिप्तं त्र्यहमुष्णतोयविमलं खल्वे सवासोऽर्दितम्।
लिप्तं नूतनखर्परेषु विगतस्नेहं रजः सन्निभं
निम्बूकाम्बुविभावितं च बहुशः शुद्धं गुणवान् भवेत् ।। २91 ।।)
जैपाल (जमालगोटा) को लेकर छिलका अंकुर तथा
जीभी से रहित करके भैंस के गोबर में तीन दिन तक दबा दें,
तत्पश्चात् उष्ण जल से धोकर तथा मोटे कपड़े में पोटली
बाँधकर खरल में पीसे, फिर उसे (पोटली में से निकाल
थोड़ा जल डालकर पीसने के पश्चात्) नवीन खपरों (मिट्टी
के बर्तनों) के ठीकरों पर लीप दें, जब इसका स्नेह (तैल)
दूर हो जाये और वह चूर्ण जैसा हो जाये तो कई बार (सात
बार) नींबू के रस को भावना देकर सुखा लें। इस प्रकार
जैपाल शुद्ध तथा गुणवान् हो जाता है।
वक्तव्य-जैपाल उग्र विरेचन द्रव्य है। अशुद्ध जैपाल
खाने से वमन, घबराहट तथा रक्तातिसार हो जाता है, अतः
इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिये। इसके अनुपान
में चीनी का शर्बत (शर्करीदक) तथा गुलकन्द अवश्य देना
चाहिये।
विष-शुद्धि की विधि
(विषं तु खण्डशः कृत्वा वस्त्रखण्डेन बन्धयेत्।
गोमूत्रमध्ये निक्षिप्य स्थापयेदातपे त्र्यहम् ।। २92 ।।
गोमूत्रं च प्रदातव्यं नूतनं प्रत्यहं बुधैः।
त्र्यहेऽतीते समुद्धृत्य शोषयेन्मृदु पेषयेत् ।। २93 ।।
शुद्ध्यत्येवं विषं तच्च योग्यं भवति चार्तिजित्।
खण्डीकृत्यं विषं वस्त्रपरिबद्धं तु दोलया ।। २94 ।।
अजापयसि संस्विन्नं यामतः शुद्धिमाप्नुयात्।
अजादुग्धाभावतस्तु गव्यक्षीरेण शोधयेत् ।। 295 ।।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे रसादिशोधनमारणकल्पना
नाम द्वादशोऽध्यायः ।। 12 ।।
विष (मीठा तेलिया अथवा सिंगिया) को छोटा-छोटा
काटकर कपड़े के टुकड़े में ढीली पोटली बना लें, फिर उसे
गोमूत्र में लटका कर तीन दिन तक धूप में रख छोड़ें और
प्रतिदिन पुराना मूत्र निकालकर ताजा मूत्र डालते रहें, तत्पश्चात्
तीन दिन व्यतीत हो जाने पर उसे निकाल कर सुखा लें और
धीरे-धीरे पीस लें। इस प्रकार विष शुद्ध होकर योगों में
मिलाने योग्य तथा रोगनाशक हो जाता है। अथवा विष के
टुकड़े बनाकर तथा कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र द्वारा बकरी
के दूध में एक पहर तक स्वेदन करने से भी वह शुद्ध हो जाता
है। अथवा बकरी के दूध के अभाव में उक्त विधि से गाय के
दूध में भी उसे शुद्ध किया जा सकता है।
210 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
वक्तव्य-रसशास्त्र में जहाँ-जहाँ विष का प्रयोग करने
का विधान आया है, वहाँ-वहाँ इसी प्रकार से शुद्ध किया
हुआ विष प्रयुक्त किया जाता है। विष के टुकड़े सरौता से
काटने चाहिये। कूटने से उसका कुछ भाग अत्यन्त सूक्ष्म हो
जाता है, जो गोमूत्र में घुल जाता है नष्ट हो जाता है। ध्यान
दें-विष को जितनी सावधानी से शुद्ध कीजिये, वह शुद्ध होने
पर लगभग आधा रह जाता है। विष नाम से दो ही विषों का
उपयोग होता है-1. मीठा तेलिया (वत्सनाभ) का और
2. सिंगिया।
अहिफेन-शोधन-'शृंगवेररसैर्भाव्यं अहिफेनं
त्रिसप्तधा। तत्संयुक्तैषु योगेषु योजयेत् तद्विधानतः'।।
अर्थात् अफीम को अदरक के रस की 21 बार भावना देने से
वह शुद्ध हो जाती है। इसे आवश्यकतानुसार योगों में प्रयुक्त
किया जा सकता है।
वक्तव्य-अफीम दो प्रकार की मिलती है-1 कच्ची,
जो किसानों के यहाँ मिलती है और 2. पक्व, जो ठेकेदारों के
यहाँ से मिलती है। इनमें कच्ची अफीम अधिक उपयोगी
होती है।
भंगा-शोधन-'बब्बूलत्वक् कषायेण भङ्गां संस्वेद्य
शोषयेत्। गोदुग्धभावनां दत्त्वा शुष्कां सर्वत्र योजयेत्'।।
अर्थात् भाँग को बबूल की छाल के काढ़े में स्वेदन करके
सुखा लें, फिर गोदुग्ध की भावना देकर और सुखाकर योगा
में प्रयुक्त करें।
विषमुष्टि-शोधन-'दोलायन्त्रेण संस्वेद्य काञ्जिके
प्रहरद्वयम्। किञ्चिदाज्येन सम्मृष्टो विषमुष्टिर्विशुध्यति'।।
अर्थात् काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा दो पहर तक स्वेदन कर घी
में कुछ भून लेने पर कुचिला शुद्ध हो जाता है।
लांगली-शोधन-'लाङ्गली शुद्धिमायाति दिन
गोमूत्रसंस्थिता'। अर्थात् लाङ्गली (कलिहारी) के कन्द को
एक दिन 'गोमूत्र' में रखें तो वह 'शुद्ध' हो जाती है।
गुञ्जा-शोधन-'गुञ्जा काञ्जिकसंस्विन्ना प्रहरात्
शुद्ध्यति ध्रुवम्'। गुञ्जा (घुँघची) को एक पहर तक 'काञ्जी'
में रखकर दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करें, तो वह शुद्ध हो जाती है।
करवीर-शोधन-'दोलायन्त्रेण गोदुग्धे शोधयेत्
करवीरकम्'। करवीर (कनेर) को दोलायन्त्र द्वारा गोदुग्ध
में डालकर शुद्ध करें।
अर्क-सेहुण्डदुग्ध-शोधन-'चिञ्चापत्ररसे प्रस्थे
वस्त्रपूते पलद्वयम्। रौद्रयन्त्रे स्नुहीक्षीरं भावयेत् यत्नतः
सुधीः।। अमुमेव विधिं कुर्यात् अर्कदुग्धविशोधने।' अर्थात्
सेहुण्ड (थूहर) के 2 पल दूध को इमली के पत्तों के 1 सेर
रस से भावना दें, तो वह शुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अर्क
(आक या मदार) के दुग्ध को भी शुद्ध करें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का बारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 12 ।।
मध्यमखण्ड समाप्त।