शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें210 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
वक्तव्य-रसशास्त्र में जहाँ-जहाँ विष का प्रयोग करने
का विधान आया है, वहाँ-वहाँ इसी प्रकार से शुद्ध किया
हुआ विष प्रयुक्त किया जाता है। विष के टुकड़े सरौता से
काटने चाहिये। कूटने से उसका कुछ भाग अत्यन्त सूक्ष्म हो
जाता है, जो गोमूत्र में घुल जाता है नष्ट हो जाता है। ध्यान
दें-विष को जितनी सावधानी से शुद्ध कीजिये, वह शुद्ध होने
पर लगभग आधा रह जाता है। विष नाम से दो ही विषों का
उपयोग होता है-1. मीठा तेलिया (वत्सनाभ) का और
2. सिंगिया।
अहिफेन-शोधन-'शृंगवेररसैर्भाव्यं अहिफेनं
त्रिसप्तधा। तत्संयुक्तैषु योगेषु योजयेत् तद्विधानतः'।।
अर्थात् अफीम को अदरक के रस की 21 बार भावना देने से
वह शुद्ध हो जाती है। इसे आवश्यकतानुसार योगों में प्रयुक्त
किया जा सकता है।
वक्तव्य-अफीम दो प्रकार की मिलती है-1 कच्ची,
जो किसानों के यहाँ मिलती है और 2. पक्व, जो ठेकेदारों के
यहाँ से मिलती है। इनमें कच्ची अफीम अधिक उपयोगी
होती है।
भंगा-शोधन-'बब्बूलत्वक् कषायेण भङ्गां संस्वेद्य
शोषयेत्। गोदुग्धभावनां दत्त्वा शुष्कां सर्वत्र योजयेत्'।।
अर्थात् भाँग को बबूल की छाल के काढ़े में स्वेदन करके
सुखा लें, फिर गोदुग्ध की भावना देकर और सुखाकर योगा
में प्रयुक्त करें।
विषमुष्टि-शोधन-'दोलायन्त्रेण संस्वेद्य काञ्जिके
प्रहरद्वयम्। किञ्चिदाज्येन सम्मृष्टो विषमुष्टिर्विशुध्यति'।।
अर्थात् काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा दो पहर तक स्वेदन कर घी
में कुछ भून लेने पर कुचिला शुद्ध हो जाता है।
लांगली-शोधन-'लाङ्गली शुद्धिमायाति दिन
गोमूत्रसंस्थिता'। अर्थात् लाङ्गली (कलिहारी) के कन्द को
एक दिन 'गोमूत्र' में रखें तो वह 'शुद्ध' हो जाती है।
गुञ्जा-शोधन-'गुञ्जा काञ्जिकसंस्विन्ना प्रहरात्
शुद्ध्यति ध्रुवम्'। गुञ्जा (घुँघची) को एक पहर तक 'काञ्जी'
में रखकर दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करें, तो वह शुद्ध हो जाती है।
करवीर-शोधन-'दोलायन्त्रेण गोदुग्धे शोधयेत्
करवीरकम्'। करवीर (कनेर) को दोलायन्त्र द्वारा गोदुग्ध
में डालकर शुद्ध करें।
अर्क-सेहुण्डदुग्ध-शोधन-'चिञ्चापत्ररसे प्रस्थे
वस्त्रपूते पलद्वयम्। रौद्रयन्त्रे स्नुहीक्षीरं भावयेत् यत्नतः
सुधीः।। अमुमेव विधिं कुर्यात् अर्कदुग्धविशोधने।' अर्थात्
सेहुण्ड (थूहर) के 2 पल दूध को इमली के पत्तों के 1 सेर
रस से भावना दें, तो वह शुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अर्क
(आक या मदार) के दुग्ध को भी शुद्ध करें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का बारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 12 ।।
मध्यमखण्ड समाप्त।