शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
घटने का निश्चय कर तदनुसार उसकी चिकित्सा करनी
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द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 273
वक्तव्य—उक्त लक्षणों को देखकर रक्त के बिगड़ने तथा
घटने का निश्चय कर तदनुसार उसकी चिकित्सा करनी
चाहिये।
वातदूषित रक्त के लक्षण
अरुणं फेनिलं रूक्षं परुषं तनु शीघ्रगम्।
अस्कन्दि सूचिनिस्तोदि रक्तं स्याद् वातदूषितम्।। 8 ।।
वायु से दूषित रक्त अरुण (कालापन लिये लाल), फेनिल
(झागवाला), रूक्ष (उचित स्निग्धता से रहित), परुष
(खरखरा), तनु (पतला), शीघ्रगामी (अधिक गतिशील),
अस्कन्दी (देर से जमने वाला) तथा सूची निस्तोदी (सुई के
चुभने की-सा पीड़ा करने वाला) होता है।
पित्तदूषित रक्त के लक्षण
पित्तेन पीतं हरितं नीलं श्यावं च विस्रकम्।
अस्कन्द्युष्णं मक्षिकाणां पिपीलानामनिष्टकम् ।। 9 ।।
पित्त से दूषित रक्त पीला हरा नाला काला दुर्गन्धियुक्त न
जमने वाला, उष्ण तथा चींटियों तथा मक्खियों का अप्रिय
होता है।
कफदूषित रक्त के लक्षण
शीतलं बहलं स्निग्धं गैरिकोदकसंनिभम्।
मांसपेशीप्रभं स्कन्दि मन्दगं कफदूषितम् ।। 10 ।।
कफ से दूषित रक्त शीत (इसमें रक्त का ताप सौ 100
डिग्री से घट जाता है), बहल (गाढ़ा), स्निग्ध (अधिक
स्निग्ध), गेरू घुले हुये जल जैसा, मांसपेशियों जैसा, शीघ्र
जमने वाला तथा मन्दगामी होता है।
द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण
द्विदोषदुष्टं संसृष्टं त्रिदुष्टं पूतिगन्धकम्।
सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते।। 11 ।।
दो-दो दोषों से दूषित रक्त में दो-दो दोषों के सम्मिलित
लक्षण पाये जाते हैं, तीन दोषों से दूषित रक्त अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त
तथा सभी दोषों के उक्त लक्षणों से युक्त तथा काँजी जैसा
होता है।
वक्तव्य—यहाँ दो-दो दोषों का नामतः उल्लेख नहीं
किया गया है, अतः आप रक्त परीक्षणकाल में दोषों का
नाम-निर्धारण स्वयं कर लें।
विषदूषित रक्त के लक्षण
विषदुष्टं भवेच्छ्यावं नासिकोन्मार्गरं तथा।
विस्रं काञ्जिकसङ्काशं सर्वकुष्ठकरं बहु ।। 12 ।।
विष से दूषित रक्त काला, नाक से निकलने वाला,
दुर्गन्धियुक्त, काँजी जैसा, सभी प्रकार के कुष्ठों का उत्पादक
तथा मात्रा में अधिक होता है।
शुद्ध रक्त के लक्षण
इन्द्रगोपप्रभं ज्ञेयं प्रकृतिस्थमसंहतम्।
बीरबहूटी की कान्ति वाला तथा असंहत (तरल या
ग्रन्थियों से रहित) रक्त शुद्ध होता है।
वक्तव्य—यहाँ पर शुद्ध रक्त के लक्षणों की परिचायिका
एक पंक्ति इस प्रकार उपलब्ध होती है। यथा—'गुञ्जाफलसवर्णं
पद्मालक्तकसन्निभम्'। अर्थात् गुंजाफल के सदृश वर्ण वाले,
लाल कमल तथा लाक्षारस के समान वर्ण वाले रक्त को
प्रकृतिस्थ (शुद्ध) समझना चाहिये। विशेष अध्ययन के लिये
देखे-च० सू० अ० 24 तथा सु० सू० अ० 14 ।
रक्तस्राव के योग्य रोग
शोथे दाहेऽङ्गपाके च रक्तवर्णेऽसृजः स्रुतौ ।। 13 ।।
वातरक्ते तथा कुष्ठे सपीडे दुर्जयेऽनिले।
पाणिरोगे श्लीपदे च विषदुष्टे च शोणिते ।। 14 ।।
ग्रन्थ्यर्बुदापचीक्षुद्ररोगरक्ताधिमन्थेषु ।
विदारीस्तनरोगेषु गात्राणां सादगौरवे ।। 15 ।।
रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायां पूतिघ्राणास्यदेहके।
यकृत्प्लीहविसर्पेषु विद्रधौ पिटिकोद्गमे ।। 16 ।।
कर्णौष्ठघ्राणवक्त्राणां पाके दाहे शिरोरुजि।
उपदंशे रक्तपित्ते रक्तस्रावः प्रशस्यते ।। 17 ।।
शोथ (व्रणशोथ), दाह, अंगपाक (किसी अवयव का
पाक होना) रक्तवर्ण के रक्तस्राव (लोहितस्राव में नहीं),
वातरक्त कुष्ठ पीड़ायुक्त दुःसाध्य वातरोग, पाणिरोग (बाहुरोग),
श्लीपद, विषदूषित रक्त, ग्रन्थि, अर्बुद, अपची तथा क्षुद्र
रोगों, रक्तजनित अधिमन्थ (नेत्ररोग विशेष), विदारी (प्लेग
की ग्रन्थि), स्तन रोगों की शिथिलता तथा भारीपन, रक्तजनित
अभिष्यन्द (दुःखती आँख), तन्द्रा, नाक, मुख तथा शरीर से
दुर्गन्धि आने पर, यकृत् विकार, प्लीहावृद्धि, विसर्प विद्रधि,
फुन्सियों के उत्पन्न होने, कान, ओठ, नाक एवं मुखपाक,
दाह, शिरोरोग, उपदंश तथा रक्तपित्त में रक्तस्राव कराना प्रशस्त
(हितकर) है।
वक्तव्य—उक्त पाठ में दाह शब्द दो बार आया है। अतः
एक दाह का अर्थ विदाह है, देखें—'विदाहश्चान्नपानस्थः'
च० सू० अ० 24 श्लोक 13। उक्त श्लोकों को च० सू० अ०
24 तथा सु० सू० अ० 20 में देखें।
274 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
[वाम स्तम्भ]
रक्तस्राव की विधियाँ
एषु रोगेषु शृङ्गैर्वा जलौकालाम्बुकैरपि।
अथवाऽपि शिरामोक्षैः कुर्याद् रक्तस्रुतिं नरः।। 18 ।।
उक्त रोगों में शृंग (सिंगी) से, जलौका (जोंक) से, अलाबु (तुम्बी या गिलास) से अथवा सिरावेध से रक्तस्राव करें।
किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये
न कुर्वीत सिरामोक्षं कृशस्यातिव्यवायिनः।
क्लीबस्य भीरोर्गर्भिण्याः सूतिकापाण्डुरोगिणाम् ।। 19 ।।
पञ्चकर्मविशुद्धस्य पीतस्नेहस्य चार्शसाम्।
सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् ।। 20 ।।
छर्द्यतीसारदुष्टानामतिस्विन्नतनोरपि ।
ऊनषोडशवर्षस्य गतसप्ततिकस्य च ।। 21 ।।
आघातस्रुतरक्तस्य शिरामोक्षो न शस्यते।
एषां चात्यायिके रोगे जलौकाभिस्तु निर्हरेत् ।। 22 ।।
तथा च विषदुष्टानां शिरामोक्षोऽपि शस्यते।
निम्नलिखित व्यक्तियों का शिरावेध (शिरामोक्ष) नहीं करना चाहिये-कृश, अतिमैथुनशील, नपुंसक, भीरु (डरपोक), गर्भवती, प्रसूता, पाण्डुरोगी जो पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, नस्य, निरूहण, अनुवासन) से शुद्ध हो चुका है जिसने स्नेहपान किया है, जो अर्शारोग, सर्वाङ्गशोथ, उदररोग, श्वास, कास, कै एवं अतिसार से पीड़ित हो, जिसको अत्यन्त स्वेदन हो चुका हो, जिसकी अवस्था सोलह से कम और सत्तर से अधिक हो और जिसका चोट लगने के कारण रक्त निकल गया हो। यदि इन रोगियों का रक्त निकालना अत्यन्त आवश्यक हो तो इनका रक्त जोंक से निकालना चाहिये और यदि ये लोग विष से पीड़ित हों तो ‘सिरावेध’ भी प्रशस्त है।
**वक्तव्य—**जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि उक्त व्यक्तियों का ‘सिरावेध’ करना उचित नहीं है, तथापि विशेष परिस्थत में इनका भी जोंक द्वारा रक्त निकाला जा सकता है और विष-विकारों में तो सिरामोक्ष भी किया जा सकता है।
रक्तस्रावण यन्त्र
गोशृङ्गेण जलौकाभिरलाबुभिरपि त्रिधा ।। 23 ।।
वातपित्तकफैर्दुष्टं शोणितं स्रावयेद् बुधः।
द्विदोषाभ्यां तु सन्दुष्टं त्रिदोषैरपि दूषितम् ।। 24 ।।
शोणितं स्रावयेद् युक्त्या शिरामोक्षैः पदैस्तथा।
विद्वान् चिकित्सक वायु से दूषित रक्त को गोशृंग (सिंगी)...
[दक्षिण स्तम्भ]
...से, पित्त से दूषित रक्त को जोंक से तथा कफ से दूषित रक्त को अलाबु (तुम्बी) से निकालें और द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रोगियों का युक्तिपूर्वक सिरामोक्ष अथवा पद (पच्छ) से रक्तस्राव करें।
शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण
गृह्णाति शोणितं शृङ्गं दशाङ्गुलमितं बलात् ।। 25 ।।
जलौका हस्तमात्रं तु तुम्बी च द्वादशाङ्गुलम्।
पदमङ्गुलमात्रस्य शिरा सर्वाङ्गशोधिनी ।। 26 ।।
शृंग (सिंगी) दस अंगुल तक के रक्त को, जोंक एक हाथ (24 अंगुल) तक के रक्त को, तुम्बी बारह अंगुल तक के रक्त को तथा पद (पच्छ) एक अंगुल तक के रक्त को निकाल देता है और सिरावेध सम्पूर्ण शरीर को शुद्ध कर देता है अर्थात् सम्पूर्ण शरीर के अशुद्ध रक्त को निकाल देता है।
**वक्तव्य—**रक्तस्राव के सिंगी, जोंक, तुम्बी आदि साधनों द्वारा शरीर के उन-उन अवयवों से जो रक्तविकार से पीड़ित हैं रक्त निकलवाना चाहिये और सम्पूर्ण शरीरगत रक्तविकार ये सिरावेध कराना आवश्यक है। शरीर के भीतरी अवयवों (हृदय, मस्तिष्क आदि) जिनमें उक्त साधन प्रयुक्त नहीं किये जा सकते हैं, उनमें सिरावेध का ही प्रयोग करना चाहिये।
रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी
शीते निरन्ने मूर्च्छायां तन्द्राभीतिमदश्रमौः।
युतानां न स्रवेद् रक्तं तथा विण्मूत्रसङ्गिनाम् ।। 27 ।।
शीतकाल में, भोजन न करने पर अर्थात् भूखे मनुष्य का, मूर्च्छा में और तन्द्रा, भय, मद तथा श्रम (थकावट) से युक्त मनुष्यों का, पुरीष तथा मूत्र के निरोध से पीड़ित मनुष्यों का रक्त उचित रूप से नहीं निकलता है।
रक्तस्रावकारक उपाय
अप्रवर्तितरक्ते च कुष्ठत्रिकटुसैन्धवैः।
मर्दयेद् व्रणवक्त्रं च तेन सम्यक् प्रवर्तते ।। 28 ।।
यदि उचित रूप से रक्तस्राव न हो तो व्रण (घाव जो कि रक्तस्राव कराने के लिए किया गया है) के मुख को कूठ, त्रिकटु एवं सेंधा नमक के चूर्ण से मर्दन करें। ऐसा करने से रक्त भली-भाँति निकलने लगता है।
रक्तस्राव का समय
तस्मान्न शीते नात्युष्णे न स्विन्ने नातितापिते।
पीत्वा यवागूं तृप्तस्य स्रावयेच्छोणितं बुधः।। 29 ।।
इसलिए न शीतकाल, न अत्यन्त उष्णकाल, न स्वेदन...
द्वादशोऽध्यायः] शोणितस्रावविधिः 275
होने पर और न ही शरीर के अत्यन्त सन्तप्त होने पर रक्तस्राव
कराना उचित है। इससे विपरीत दशा में भी 'यवागू' पिलाकर
रक्तस्राव कराना चाहिये।
रक्तातिस्राव-परिहार
अतिस्विन्नस्योष्णकाले तथैवातिशिराव्यधात्।
अतिप्रवर्तते रक्तं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम्।।३०।।
अत्यन्त स्वेदन होने पर तथा उष्णकाल में तथा सिरा के
अधिक कट जाने से रक्त अधिक निकलने लगता है। ऐसी
स्थिति में निम्नलिखित प्रतिकार (उपाय) करना चाहिये।
रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा
अतिप्रवृत्ते रक्ते च लोध्रसर्जरसाञ्जनैः।
यवगोधूमचूर्णैर्वा धवधन्वन्गैरिकैः।।३१।।
सर्पनिर्मोकचूर्णैर्वा भस्मना क्षौमवस्त्रयोः।
मुखं व्रणस्य बध्वा च शीतैश्चोपचरेद् व्रणम्।।३२।।
विध्येदूर्ध्वं शिरां तां च दहेत् क्षारेण वाग्निना।
रक्त की अतिप्रवृत्ति होने पर लोध, राल और रसवत के
चूर्ण से अथवा जौ, तथा गेहूँ के चूर्ण से अथवा धाय के फल,
धामिन तथा गेरू के चूर्ण से अथवा साँप की केंचुली के चूर्ण
से अथवा रेशमी तथा सूती वस्त्र की भस्म से व्रण के मुख को
अवचूर्णित करें अर्थात् उक्त चूर्णों की व्रण पर बुरक दें अथवा
व्रण पर कपड़े की गद्दी रखकर बाँध दें अथवा शीतद्रव्यों
(शीतल जल तथा बर्फ आदि) से उपचार करें अथवा (इतने
पर भी रक्त न रुके तो) उसी। को थोड़ी दूर ऊपर से वेध दे
अथवा क्षार से या अग्नि से सिरा का दाह कर दें।
रक्त्तरोधन के उपाय
व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम्।।३३।।
व्रणास्यं पाचयेत् क्षारो दाहः सङ्कोचयेच्छिराम्।
कषायरस (युक्त द्रव्य) व्रण का सन्धान (घाव को बन्द)
कर देता है, शीत द्रव्य रक्त को जमा देता है, क्षार व्रण के मुख
को पका देता है और दाह शिरा को संकुचित कर देता है। इन
क्रियाओं से रक्त रुक जाता है।
अग्निदाह-विधि
वामाण्डशोथे दक्षस्य करस्याङ्गुष्ठमूलजाम्।।३४।।
देहेच्छिरां व्यत्यये तु वामाङ्गुष्ठशिरां दहेत्।
शिरादाहप्रभावेण मुष्कशोथः प्रणश्यति।।३५।।
विषूच्यां पार्ष्णिदाहेन जायतेऽग्नेः प्रदीपनम्।
सङ्कुचन्ति यतस्तेन रसश्लेष्मबहाः शिराः।।३६।।
यदा वृद्धिर्यकृत्प्लीह्नोः शिशोः सञ्जायतेऽसृजः।
तदा तत्स्थानदाहेन सङ्कुचन्त्यसृजः शिराः।।३७।।
अण्डवृद्धि वाले रोगी के यदि बायें अण्डकोश में सूजन
हो तो दाहिने हाथ के अँगूठे के मूल की शिरा पर और यदि
दाहिने अण्डकोश में सूजन हो तो बायें अँगूठे के मूल की
शिरा पर दाहकर्म करें। सिरादाह के प्रभाव से शीघ्र ही
अण्डकोश का शोथ नष्ट हो जाता है। विसूची (हैजा) में
पार्ष्णि (एड़ी) में दाहकर्म करने से अग्नि दीप्त हो जाती है,
क्योंकि इससे रस तथा कफ के वहने वाली सिरायें संकुचित
हो जाती हैं। जब किसी बालक के यकृत् तथा प्लीहा रक्त के
दोष से बढ़ जाते हैं तो उस स्थान (यकृत् तथा प्लीहा) पर
दाहकर्म करने से रक्तवाही सिरा सकुचित हो जाती है। जिसके
कारण यकृत् और प्लीहा भी संकुचित होकर अपने वास्तविक
रूप को धारण कर लेते हैं।
वक्तव्य-आजकल बड़े-बड़े नगरों में चिकित्सा करने
वाले पढे-लिखे चिकित्सक भी दाह कर्म को नहीं कर रहे
हैं। उन्हें चाहिये कि चिकित्साशास्त्र के इस महत्त्वपूर्ण एवं
सुप्रसिद्ध कर्म को पुनः प्रारम्भ कर आयुर्वेद की इस देन का
यथासम्भव प्रचार करें। हर्ष का विषय है कि देहातों में रहने
वाले परम्परागत ग्रामीण वैद्य इस दाहकर्म को आज भी
सफलतापूर्वक करते हैं। इस अग्निकर्म को 'गुल लगाना' भी
कहते हैं। इसमें लोहे की सलाई अथवा ताँबे के पैसे अथवा
सोने की सलाई को तपाकर उचित स्थान पर लगा देते हैं,
जिससे फफोला उठता है और दो-तीन दिन में फूट कर
निकल जाता है और रोग शान्त हो जाता है। किन्तु इसके लिए
यथाविधि कर्माभ्यास अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिये। देखें-सु०
सू० अ० 12।
अधिक रक्तस्राव का निषेध
रक्ते दुष्टेऽवशिष्टेऽपि व्याधिर्नैव प्रकुप्यति।
अतः स्राव्यं सावशेषं रक्तं नातिक्रमो हितः।।३८।।
आन्ध्यमाक्षेपकं तृष्णां तिमिरं शिरसो रुजम्।
पक्षाघातं श्वासकासौ हिक्कां दाहं च पाण्डुताम्।।३९।।
कुरुतेऽतिस्रुतं रक्तं मरणं वा करोति च।
दूषित रक्त के कुछ अवशिष्ट रह जाने पर भी व्याधि का
प्रकोप (वृद्धि) नहीं होता है, इसलिये सावशेष (कुछ शेष
रखकर) रक्तस्राव कराना उचित होता है, क्योंकि रक्तस्राव
विधि में अतिक्रम (अतियोग) हितकर नहीं होता। रक्त के