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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

८२ ] [ श्री शारदा तिलक
इन्द्रमग्निं यमं रक्षोवरुणं पवनं विधुम् ।
ईशानं पन्नगाधीशमधऊर्ध्वं पितामहम् । ११४
पीतो रक्तोऽसितो धूम्रः शुक्लो धूम्रसितावुभौ ।
गौरोऽरुणः क्रमादेते वर्णतः परिकीर्तिताः । ११५
वज्रं शक्तिं दण्डमसिं पाशमङ्कुशकं गदाम् ।
शूलं चक्रं पद्ममेषामायुधानि क्रमाद्विदुः । ११६
पीतशुक्लसिताकाशविद्युद्रक्तसितायिताः ।
कुरविन्दपाटलाभा वज्राद्याः परिकीर्तितः । ११७
अन्त में मूल परिषदों से समन्वित लोकपालों का यजन करना
चाहिये । इनका हेतिजात्यधिपों से समन्वित पूर्वादि क्रम से
दिशाओं में पूजन करे ।११३। इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, पवन,
चन्द्र, ईशान, पन्नगाधीश का नीचे और ऊपर पितामहका अर्चन करना
चाहिये । ये वर्ण के द्वारा क्रमसे पीत, रक्त, असित, धूम्र, शुक्ल, धूम्र
और सित दोनों, गौर और अरुण होते है ।११४-११५। इनके आयुध
क्रम से वज्र, शक्ति, दण्ड, असिपात, अंकुश, गदा, शूल, चक्र, और,
पद्म होते हैं ।११६। ये वज्र आदि आयुध पीत, शुक्ल, सित, आकाश,
विद्युत, रक्त, सितासित, कुरविन्द और पाटल की आभा वाले कीर्तित
किये गये हैं ।११७।
एवं संपूज्य विधिवन्निवेद्यान्तं ततोगुरुः ।
दक्षिणे स्थण्डिलं कृत्वा तत्राधाय हुताशनम् । ११८
संस्कृत्य विधिवद्विद्वान्वैश्वदेवं समाचरेत् ।
तत्र सम्पूज्य गन्धाद्यैर्देवतामुक्तविग्रहम् । ११९
तारव्याहृतिभिर्हुत्वा मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।
सर्पिष्मता पायसेन पञ्चविंशतिसंख्यया । १२०
हुत्वा व्याहृतिभिर्भूयो गन्धाद्यैः पुनरर्चयेत् ।
तां याजायित्वा पीठस्थमूर्तों वह्निं विसर्जयेत् । १२१

चतुर्थ पटल ] [ ६३
अवशिष्टेन हविषा विकिरेत्वरितो बलिम् ।
देवतायाः पार्श्वेभ्यो गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् ।१२२
ततो नैवेद्यमुद्धृत्य शोधयित्वा स्थल पुन ।
पञ्चोपचारैः संज्पूय दर्शयेच्छत्रचामरे । १२३
कर्परशकलोन्मिश्रं ताम्बलं च निवेदयेत् ।
सहस्रावृत्त्या सञ्जप्य मूलमन्त्रमनन्यधीः । १२४
इस रीतिसे भली भाँति अर्चन करके गुरुविधिके साथ अन्तमें नैवेद्य
निवेदन करके दक्षिण में स्थण्डिल की रचना करके वहाँ हुताशन का
आधान करे ।११८। विद्वान् पुरुष विधि के साथ वैश्वदेव का संस्कार
करके ही समाचरण करे । वहाँ पर उक्त विग्रह वाले देवताका गन्धादि
उपचारों के द्वारा पूजन करे मन्त्र का ज्ञान रखने वाला तार (प्रणव)
और व्याहृतियों के द्वारा होम करें । फिर मूलमन्त्रसे घृतयुक्त पायस
के द्वारा पच्चीस सख्या में हवन करे और फिर व्याहृतियों के द्वार
गन्धादि से अभ्यर्चन करे उसकी पीठ में स्थित मूर्ति में योजित करके
अग्नि का विसर्जन कर देना चाहिये ।११६-१२१। जो हति अवशिष्ट रह
जावे उससे सब ओर बलि का विकिरण करे । देवता के पार्षदों के लिये
गन्ध-पुष्पों ओर अक्षतों से अन्वित नैवेद्य को उद्धत करके फिर स्थल का
शोधन करना चाहिये । पाँच उपचारों के द्वारा पूजन करके छत्र और
चमर को दर्शित करे ।१२२-१२३। कपूर के खन्ड से उन्मिश्रित ताम्बूल
को निवेदित करे । अनन्य बुद्धि वाला होकर अर्थात् एकाग्रचित वाला
रहकर एक सहस्र बार मूल मन्त्र का जप करे ।१२४।
तज्जपं सर्वसम्पत्त्यै देववायै समर्पयेत् ।
ततः शम्भोर्दिशि गुरुर्विकिरेत्पूर्वसंचिते । १२५
हेमवस्त्रादिसंयुक्तां कर्करीतोयपूरिताम् ।
संस्थाप्य तस्यां सिंहस्यां खङ्गखेटकधारिणीम् । १२६
घोररूपां पश्चिमास्यां पूजयेदस्त्रदेवताम् ।
चलासनेन सम्पूज्य तामादाय गुरुः पुनः । १२७

६६ ] [ श्री शारदा तिलक
उसको करके गुरु इसके साथ वेदी में दर्भों के आस्तर में उस रात में
शयन करे । यह अधिवास कहा गया है ।१३८-१३६।

पंचम पटल

ततोऽग्निजननं वक्ष्ये सर्वतन्त्रानुसारतः ।
आचार्यकुण्डे विधिवत्संस्कृते शास्त्रवर्त्मना । १
अष्टादश स्युः संस्काराः कुण्डाना तन्त्रचोदिताः ।
वीक्षणं मूलमन्त्रेण शरेण प्रोक्षणं मतम् । २
तेनैव ताडन दर्भेर्वर्मथाऽभ्युक्षणं स्मृतम् ।
अस्त्रेण खननोद्धारो हृन्मन्त्रेण प्रपूरणम् । ३
समीकरणमस्त्रेण सेचन वर्मणा मतम् ।
कुट्टनं हेतिमन्त्रेण वर्ममन्त्रेण मार्जनम् । ४
विलेपनं कलारूपकल्पनं तदनन्तरम् ।
त्रिसूत्रीकरणं पश्चाद्वृद्धयेनार्चनं मतम् । ५
अस्त्रेण वज्रोकरणं हृन्मन्त्रेण कुशः शुभैः ।
चतुष्पथं तनुत्रेण तनुयादक्षपाटनम् ।६
यागे कुण्डानि संस्कुर्यात्संस्कारैरेभिरोरितैः ।
अथवा तानि संस्कुर्याच्चतुर्भीक्षणादिभिः । ७
इसके अनन्तर समस्त तन्त्रों के अनुसार शास्त्रों के निर्दिष्ट मार्ग
के द्वारा विधि के सहित संस्कार किये हुये कुन्ड में अग्नि के जनन को
बतलाया जाता है ।१। तन्त्रों में चोदित कुन्डों के अठारह संस्कार होते
हैं। मूल मन्त्र के द्वारा वीक्षण नामक संस्कार होता है। और शर के
द्वारा प्रोक्षण माना गया है ।२। उसी के द्वारा दर्भों से ताड़न नामक
संस्कार होता है। वर्म्म के द्वारा अभ्युक्षण कहा गया हैं। अस्त्र से

पंचम पटल ] [ ६७
खनन और उद्धार होते हैं और हृन्मन्त्र के द्वारा प्रपूरण संस्कार किया
जाता है ।३। अस्त्र से समीकरण और वर्म के द्वारा सचन नाम वाला
संस्कार सम्पन्न होता है । हेति मन्त्रसे कुट्टन तथा वर्मके मंत्र से मार्जन
किया जाता है ।४। विलेपन और कला रूप कल्पन उसके अनन्तर होता
है । पीछे त्रिसूतीकरण और इसके पश्चात् हृदय मंत्र से अर्चन माना
गया है ।५। अस्त्र से बाजीकरण और हृन्मन्त्र के द्वारा शुभ कुशाओं से
चतुष्पथ करे और तनुत्र के द्वारा अक्ष पाटल करना चाहिए ।६। इन
कथित संस्कारों से याग में कुण्डों का सत्कार करना चाहिए । अथवा
उनका चार वीक्षण प्रभृति के ही द्वारा संस्कार करे ।७।
तिस्रस्तिस्रो लिखेल्लेखा हृदा प्रागुदगग्रणाः ।
प्रागग्राणां स्मृता देवा मुकुन्देशपुरन्दराः ।८
रेखाणामुदगग्राणो ब्रह्मवैवस्वतेन्दुवः ।
अथवा षट्कोणावृतं त्रिकोण तव सीलखेत् ।६
सर्वाण्यभ्युक्ष्य तारेण योगपीठमथार्चयेत् ।
वागीश्वरीमृतुस्नानां नीलेन्दीवरसन्निभाम् ।१०
वागीश्वरेण संयुक्तामुपचारैः प्रपूजयेत् ।
सूर्यकांतादितम्भूतं यद्वा श्रोत्रियगेहजम् ।११
आनीय चाग्नि पात्रेण क्रव्यादांशं पसित्यजेत् ।
संस्कुर्यात्तं यथान्यायं देशिकोवीक्षणादिभिः ।१२
प्राक् अथवा पूर्व दिशा में अथवा उत्तर में हृदय मन्त्र के द्वारा
अग्रगामिनी तीन-तीन लेखायें लिखनी चाहिये । पूर्व में अग्रगामिनी
लेखाओं के-मुकुन्द-ईश और पुरन्दर देवता कहे गये हैं ।८। उत्तर की
ओर अग्रभागों वाली रेखाओंके देवता ब्रह्मा-वैवस्वत और इन्दु होते हैं।
अथवा षट् कोण से समावृत त्रिकोण वहाँ पर लिखना चाहिये ।६। इन
सबका प्रणव के द्वारा अभ्युक्षण करके इसके अनन्तर योगपीठका अर्चन
करे । ऋतुकाल के उपरान्त स्नान' की हुई-नील इन्दीवर के सदृश्य
वागीश्वरी का जो वागीश्वर से समन्वित होवे उपचारों के द्वारा पूजन

६८ ] [ श्रीशारदा तिलक
करना चाहिए। सूर्यकान्त आदि मणियों से समुत्पादित की हुई अथवा
किसी श्रोत्रिय के गृह में समुत्पन्न अग्नि का पात्र के द्वारा समानयन
करके, क्रव्यादाके अंश का परित्याग कर देना चाहिये। आचार्य वीक्षण
आदि के द्वारा न्यायानुसार उसका संस्कार करे ।१०-१२।
औदर्यबैन्दवाग्निभ्यां भौमस्यैक्यं स्मरन्वसोः ।
योजयेद्वह्निबीजेन चैतन्यं पावके तदा ।१३।
तारेण मन्त्रितं मन्त्री धेनुमुद्रामृतीकृतम् ।
अस्त्रेण रक्षितं पश्चात्तनुत्रेणावगुण्ठितम् ।१४
अर्चितं त्रिः परिभ्राम्य कुण्डस्योपरि देशिकः ।
प्रदक्षिणं तदा तारमन्त्रोच्चारणपूर्वकम् ।१५
आत्मनोऽभिमुख वह्नि जानुस्पृष्टमहीतलः ।
शिवबीजधिया देव्या योनावेव विनिः क्षिपेत् ।१६
पश्चाद्देवस्य देव्याश्च दद्यादाचमनीयकम् ।
ज्वालयेन्मनुनानेन तमग्निमथ देशिकः ।१७
औदर्य-वैन्दव अग्नियों से भौम वसु की एकता का स्मरण करते
हुए तब पावक मे वह्नि वीज के द्वारा चैतन्य को योजित करे ।१३।
मन्त्रधारी प्रणव के द्वारा अभिमन्त्रित-धेनु मुद्रा से अमृती कृत — अस्त्र
के द्वारा रक्षित और पीछे तनुत्र के द्वारा अवगुण्ठित को आचार्य कुण्ड के
ऊपर अर्चि तन्त्री को परिभ्रामित करके तब प्रदक्षिण तारमन्त्र से समु-
च्चारण के साथ भूमि तल में घुटनों का स्पर्श करने वाला अपने सामने
वह्नि को देवी के शिव बीज की बुद्धि से योनि में ही विनि-क्षिप्त करना
चाहिए ।१४-१६। इसके पीछे देवी को और देव को आचमनीय अर्पित
करे। देशिकको उसके अनन्तर उस अग्निको ज्वलित करना चाहिए।१७
चित्पिङ्गल' हनदहपचयुग्मान्त्युदीर्य च ।
सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा मन्त्रोऽय प्रागुदीरितः ।१८

पंचम पटल ] [ ६६
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् ।
सुवर्णवर्णममलं समिद्धं विश्वतोमुखम् । १६
उपतिष्ठेत विधिवन्मनुनाऽनेन पावकम् ।
विन्यसेदात्मनो देहे मन्त्रैर्जिह्वा हविर्भुजः ।२०
लिङ्गपायुशिरोवक्त्रघ्राणनेत्रेषु सर्वतः ।
वह्नीशार्धीशसंयुक्ताः सादियान्ताः सबिन्दवः ।२१
वर्णमन्त्राः समुद्दिष्टा जिह्वानां सप्तदेशिकैः ।
जिव्हास्तास्त्रिविधाः प्रोक्ता गुणभेदेन कर्मसु ।२२
चित् पिङ्गल और हल-दह-पच इनको दो-दो बार कहे फिर
सर्वज्ञा ज्ञापय स्वाहा यह कहे तो पहले कहा हुआ यह मन्त्र होता है ।
१८। प्रज्वलित अग्नि-जात वेदा-हुताशन-सुवर्ण वर्ण-अमल-
समिद्ध विश्वतोमुख की वन्दना करता हूँ । १६। विधि के साथ इस
मन्त्र से पावक का उप स्थान करे। अपने शरीर में मन्त्रों के द्वारा
हविर्भुक् की जिह्वा का विन्यास करना चाहिए । लिङ्ग-पायु-शिर-
मुख घ्राण और नेत्रों में सभी जगह विन्यास करे । वह्नि-रेफ, दूर
पकार, अधीश-ऊर्द्धं इनसे संयुक्त सकार से चकार के अन्त तक-ये
सभी वर्ण बिन्दु के सहित वर्ण मन्त्र देशिकों के द्वारा सात जिह्वाये
समुद्दिष्ट की गई हैं ।२०-२१। गुणों के भेद से कर्मों में वे तीन प्रकार
की जिह्वाएं कही गई हैं ।२२।
हिरण्या गगना रक्ता कृष्णाऽन्या सुप्रभा मता ।
--पाऽतिरक्ता च सात्त्विक्यो यागकर्मणि । २३
पद्मरागा सुवर्णाऽन्या तृतीया भद्रलोहिता ।
लोहितानन्तरं श्वेता धूमिनी च करालिका ।२४
राजस्योरसना वह्नेर्विहिताः काम्यकर्मसु ।
विश्वमूर्तिस्फुलिङ्गिन्न्यौ धूम्रवर्णा मनोजवा ।२५
लोहितान्या करालाख्या काली तामस्य ईरिताः ।
एताः सप्त नियुज्यन्ते क्रूरकर्मसु मन्त्रिभिः ।२६

१०० ] [ श्रीशारदा तिलक
स्वस्वनामसमाभाः स्युर्जिह्वाः कल्याणरेतसः ।
अमर्त्यपितृगन्धर्वयक्षनागपिशाचकाः ।२७
राक्षसाः सप्त जिह्वानामीरिता अधिदेवताः ।
वह्ने रङ्गमन्तून्स्येत्तनावुक्तेन वर्त्मना ।२८
हिरण्या, गगना, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, बहुरूपा, अतिरिक्ता,
ये सात्विकी है जो याग कर्म में होती है। पद्मरागा-सुवर्णा, भद्र-
लोहिता, लोहिता, श्वेता, धूमिनी, करालिका, राजस्यो, रसना से
वन्हिकी जिह्वायें हैं जो काम्य कर्मों में विहित कही गई हैं। विश्वमूर्ति
स्फुलिङ्गिनी, धूम्र वर्णा,मनोजवा, लोहिता, कराला काली,ये तामसी
जिह्वायें कही गई हैं। ये सात मन्त्र धारियों के द्वारा क्रूर कर्मों में
नियोजित की जाया करती है ।२२-२६। कल्याणरेतस वाली ये जिह्वाये
अपने-अपने नामों के समान आभा वाली होती है। अमर्त्य, पितृगण,
गन्धर्व, यक्ष, नाग, पिशाच और राक्षस ये सात जिह्वाओं के अधि=
देवता कहे गये हैं। शरीर में उक्त मार्ग के द्वारा वह्निके अङ्ग मन्त्रों
का न्यास करना चाहिए ।२७-२८।
सहसाचिः सप्तपूर्ण उत्तिष्ठपुरुषः पुनः ।
धूमव्यापी सप्तजिह्वो धनुर्धर इति क्रमात् ।२६
षडङ्गमन्त्राः प्रोक्ता जातिभिः सहस् यताः ।
मूर्तीरष्टौ तनौ न्यस्येद्देशिकोजातवेदसः ।३०
मूर्द्धासिपार्श्वकट्यन्धुकटिपार्श्वासिके पुनः ।
प्रदक्षिणवशानुस्तस्येदुच्यन्ते ता यथाक्रमात् ।३१
जातवेदाः सप्तजिह्वो हव्यवाहनसंज्ञकः ।
अश्वोदरजसंज्ञोऽन्यः पुनर्वैश्वानराह्वयः ।३२
कौमारतेजाः स्याद्विशनमुखो देवमुखः स्मृतः ।
ताराग्नयेपदाद्याः स्युर्नत्यन्ता वह्निमूत्तंयः ।३३

पंचम पटल ] [ १०१
आसनं कल्पयित्वाग्नेर्मूर्ति तस्य विचिन्तयेत् ।
इष्टं शक्तिं स्वस्तिकाभीतिमुच्चै दीर्घंर्दोभिर्धारयन्तं जपाभम्
हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वह्निं बद्धमौलिं जटाभिः।३४
सहसाचि, सप्तपूर्ण, उत्तिष्ठ पुरुष, धूमव्यापी, सप्त जिह्वा,
धनुर्धरः—ये क्रम से छै जातियों के सहित अङ्ग मन्त्र कहे गये हैं।
आचार्य को चाहिये कि जात वेदा की आठ मूर्तियां का शरीर में न्यास
कराये ।२६-३०। मूर्द्धा, पार्श्व सहित कटि, अन्धु कटि पार्श्व और अस
में प्रदक्षिण वश से उनका क्रम के अनुसार न्यास करना चाहिये ।
उनको अब बतलाया जाता है ।३१। जात वेदा, सप्त जिह्व, हव्यवाहन,
अश्वोदरज, वैश्वानर, कौमार—तेजा, विश्वमुख, देव मुख, कहे गये
हैं। प्रणव और फिर अग्न में यह पद और अन्त में नमः यह पद होता
है । ये वह्नि की मूर्तियां हैं ।३२-३३। अग्नि के आसन की कल्पना करके
उसकी मूर्ति का ध्यान करना चाहिये। अब ध्यान बतलाया जाता है-
अपनी दीर्घ बाहुओं में अभीष्ट, शक्ति, स्वस्तिक, अभय दान को धारण
करने वाले-जपा के पुष्प की आभा से समन्वित-हेमा-कल्प, पद्म के
आसन पर विराजमान, तीन नेत्रों से संयुक्त और अस्त्रों से मस्तक को
ब धने वाले वह्नि का ध्यान करना चाहिये ।३४।
परिषिञ्चेत्ततस्तोयैर्विशुद्धैर्मेखलोपरि (१) ।३५
दर्भैरगर्भैर्मध्यस्थंमेखलायां परिस्तरेव् ।
निक्षिपेद्दिक्षु परिधीन् प्राचीवर्जं गुरुत्तमः ।३६
प्रादक्षिण्वेन सम्पूज्यास्तेषु ब्रह्मादिमूर्तयः ।
ध्यातं वह्निं यजेन्मध्ये गन्धाद्यैर्मनुनाऽमुना ।३७
वैश्वानरजातवेदपदे पश्चादिहावह ।
लोहिताक्षपदस्यांते सर्वकर्माणि साधय ।३८
वह्निजायावधिः प्रोक्तो मन्त्रः पावकवल्लभः ।
मध्ये षट्स्वपि कोणेषु जिह्वाज्वालारुचोयजन् ।३६

१०२ ] [ श्रीशारदा तिलक
इसके उपरान्त विशुद्ध जल में मेखला के ऊपर परि षिंचन करना
चाहिए। अगर्भ दर्भों से मेखला में मध्य में संस्थितका परिस्तरण करे ।
उत्तम गुरु को चाहिए कि प्राची को छोड़कर परिधियों का दिशाओं में
निःक्षेपण करे ।३५-३६। प्रादाक्षिण्य से अर्थात् दाहिनी ओर से उनमें
ब्रह्मा आदि मूर्त्तियों का भली-भाँति पूजन करना चाहिए। इस मन्त्र के
द्वारा ध्यान किए हुए अग्नि का मध्य में गन्ध आदि के द्वारा यजन
करे । ३०। वैश्वानर और जात वेदा -ये दो पद-फिर गर्व कर्म्माणि
साधय-यह पद, और अन्त में वह्निजाया अर्थात स्वाहा वह पद होता
है। यह मन्त्र पावक का परम प्रिय मन्त्र बताया गया है। मध्य में छं
कोणों में जिह्वा ज्वाला रुचि वाले का यजन करना चाहिये । २८-३६।
केसरेषूक्तमार्गेण पूजयेदङ्गदेवताः ।
दलेषु पूजयेन्मूर्तीः शक्तिस्वस्तिकधारिणीः ।४०
दलाग्रे मातरः पूज्याः सासिताङ्गादिभैरवाः ।
लोकपालांस्ततो दिक्षु पूजयेदुक्तलक्षणान् ।४१
पश्चादादाय पाणिभ्यां स्रुक्स्रुवौ तावधोमुखौ ।
त्रिः संप्रतापयेद्वह्नौ दर्भानादाय देशिकः ।४२
तदग्रमध्यमूलानि शोधयेत्तं र्यथाक्रमात् ।
गृहीत्वा वामहस्तेन प्रोक्षयेद्दक्षिणेन तौ ।४३
पुनः प्रताप्य तौ मन्त्री दर्भानग्नौ विनिःक्षिपेत् ।
आत्मनो दक्षिणे भागे स्थापयेत्तौ कुशास्तरे ।४४
आज्यस्थालीमयादाय प्रोक्षयेदस्त्रवारिणा ।
तस्यामाज्यं विनिःक्षिप्य संस्कृतं वीक्षणादिभिः ।४५
ऊपर में बताये हुए मार्ग से ही केसरों में अङ्ग देवताओं का पूजन
करे । दलों में शक्ति और स्वस्तिक धारण करने वाली मूर्त्तियों का
अर्चन करना चाहिए ।४०। दलों के अग्रभाग में असिताङ्ग भैरवों के
सहित मातृगण का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर दिशाओं में
उक्त लक्षणों से अन्वित लोकपालों का यजन करे ।४१। इसके पीछे नीचे

पंचम पटल ] [ १०३
की ओर मुखों वाले स्रुक् और स्रुव् का हाथों से आदान करे। उनको
तीन बार अग्नि में संतप्त करे और देशिक दर्भों को लेकर उनके द्वारा
क्रमानुसार उनके अग्रभाग का मध्यका और भूतों का शोभन करे ।
बाँये हाथ से ग्रहण करके उन दोनों का दाहिने से प्रोक्षण करना चाहिये
।४२-४३। मन्त्रधारी पुनः उन दोनों को प्रतप्त करके फिर दर्भों को
अग्नि में निक्षिप्त कर देवे । अपने दक्षिण भाग में कुशास्तर पर उस
दोनों को स्थापित कर देना चाहिए ।४४। इसके अनन्तर आज्य की
स्थाली को लाकर अस्त्र मन्त्र के द्वारा उसका प्रोक्षण करे। प्रोक्षण
आदि से संस्कार किये हुए आज्य (घृत) को उसमें निक्षिप्त कर देवे ।
।४५।
निरूह्य वायव्येऽङ्गारान् हृदा तेषु निवेशयेद् ।
इदं तापनमुद्दिष्टं देशिकैस्तन्त्रवेदिभिः ।४६
सन्दीप्य दर्भयुगलमाज्ये क्षिप्त्वाऽनलेक्षिपेत् ।
गुरुर्हृदयमन्त्रेण पवित्रीकरणं त्विदम् ।४७
दीप्तेन दर्भयुग्मेन नीराज्याज्यं स वर्मणा ।
अग्नौ विसर्जयेद्ददर्भमभिद्योतनमीरितम् ।४८
घृते प्रज्वलितान्दर्भान् प्रदर्श्यस्त्राणुना गुरुः ।
जातवेदसि तान्न्यस्येदुद्योतनमिदं मतम् ।४६
गृहीत्वा घृतमङ्गारान् प्रत्यूह्याग्नौ जलं स्पृशेत् ।
अङ्गुष्ठोपकनिष्ठाभ्यान्दर्भौ प्रादेशसंमितौ ।५०
घृत्वोत्पुनीयादस्त्रेण घृतमुत्पवनं त्विदम्
तद्वद्धृदयमन्त्रेण कुशाभ्यामात्मसम्मुखम् ।५१
वायव्य कोण में कुन्ड की अग्नि से अङ्गारों को पृथक्-करके
हृन्मन्त्र के द्वारा उनमें विनिवेशित कर देवे। मन्त्र के ज्ञाता आचार्यों
के द्वारा इसको तापन बताया गया है ।४६। दो दर्भो सन्दीप्त करके
आज्य में क्षिप्त करके फिर अनल में प्रक्षिप्त कर देना चाहिए । इसको
गुरु और हृदय मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । यह पवित्री

१०४ ] [ श्रीशारदा तिलक
करण होता है ।४७। वह प्रदीप्त दो दर्भों से वर्म मन्त्र के द्वारा आज्य का
नीराजन करके दर्भ को अग्नि में विसर्जित कर देवे । यह अभिद्योतन
कहा गया है ।४८। गुरु घृत में अस्त्र मन्त्र के द्वारा प्रज्वलित दर्भों को
प्रदर्शित करके उनको अग्नि में न्यस्त कर देने का उद्योतन कहा गया
है ।४६। घृत को ग्रहण कर के अग्नि में अंगारों को संयोजित करके
जल का स्पर्श करना चाहिए । अंगुष्ठ और उपकनिष्ठिकासे प्रादेश संमित्
दर्भों को पकड़ कर घृत को अस्त्र मन्त्र के द्वारा पवित्र करे-यह
उत्पवन कहा जाता है। उसी भाँति हृदय मन्त्र से अपने सम्मुख कुशाओं
से घृत में सम्प्लवन करे । यह छै संस्कार बतायें गए हैं ।५०-५१।
घृतेसंप्लवनं कुर्युः संस्काराः षड्दीरिताः ।
प्रादेशमात्रं सग्रंथि दर्भयुग्मं घृतांतरे ।५२
निःक्षिप्य भागौ द्वौ कृत्वा पक्षौ शुक्लेतरी स्मरेत् ।
वामे नाडीमिडां भागे दक्षिणे पिंगलां पुनः ।५३
सुषुम्णां मध्यतो ध्यात्वा कुर्याद्धोमं यथाविधि ।
स्रुवेण दक्षिणाद्भागादादायाज्यं हृदा गुरुः ।५४
जुहुयादग्नये स्वाहेत्यग्नेर्दक्षिणलोच ।
वामहस्तद्वदादायात्रे वामे वह्निविलोचने ।५५
जुहुयादाय सोमाय स्वाहेति हृदयाणुना ।
मध्यादाज्य समादाय वह्नेर्चालविलोचने ।५६
जुहुयादग्नीषोमाभ्यां स्वाहेति हृदयाणुना ।
हृन्मन्त्रेण स्रुवेणाज्य भागादादाया दक्षिणात् ।५७
जुहुयादग्नये स्विष्टकृते स्वाहाहेति तन्मुखे ।
इति (१) सम्पातयेद्भागेऽथाज्यस्यान्वाहुति क्रमात् ।५८
इत्याग्निनेत्रचक्राणां कुर्यादुद्घाटनं गुरुः ।
सताराभिर्व्याहृतिभिराज्येन जुहुयात्पुनः ।५६
प्रादेश प्रमाण वाले और ग्रन्थि से युक्त दो दर्भों के घृतके अन्दर
डाल कर दो भाग करके कृष्ण और शुक्ल दो पक्षों का स्मरण करना

पंचम पटल ] [ १०५
चाहिए। वामभाग में इड़ा नाडी का और दक्षिण भाग में पिङ्गला का
और सुषुम्ना को मध्य भागमें ध्यान करके विधिके अनुसार होम करना
चाहिए। गुरु स्रुवा द्वारा दक्षिण भाग से घृत का आदान करके जो
हृन्मन्त्र के द्वारा अग्नि के दक्षिण लोचन में ‘अग्नये स्वाहा’—इससे
करे। उसी भांति वाम भाग से लेकर अग्नि के वाम लोचन में हवन
करना चाहिये। हृदय मन्त्र द्वारा इसके अनन्तर ‘सोमाय स्वाहा’ इससे
मध्य से घृत को लेकर वह्नि के भाग के नेत्र में होम करे। ५२-५६।
फिर ‘अग्नी षोमाभ्यां स्वाहा’—उस हृदय मंत्र के द्वारा स्रुव
के दक्षिण भाग से घृत का आदान करके हवन करे। ‘अग्नये स्विष्ट
कृते स्वाहा’—इससे सामने होम करना चाहिए। आज्य की आहुति को
क्रम से भाग में सम्पात करना चाहिये। ५८। इस प्रकार से गुरु अग्नि
के नेत्रों और मुख का उद्घाटन करे। फिर प्रणव के सहित व्याहृतियों
के द्वारा हवन करना चाहिए जो कि घृत से दिया जावे। ५६।
जुहुयादग्निमन्त्रेण त्रिवारं देशिकोत्तमः।
गर्भादिनादिकां वह्नेः क्रियां निर्वर्त्तयेत्क्रमात्। ६०
अष्टाभिराज्याहुतिभिः प्रणवेन पृथक् पृथक्।
गर्भाधानं पुंसवन सीमन्तोन्नयनं पुनः। ६१
अनन्तरं जात कर्म्म स्यान्नामकरणं तथा।
उपनिष्क्रमणं पश्चादन्नप्राशनमीरितम्। ६२
चौलोपनयने भूयोमहानाम्न्यं महाव्रतम्।
अथौपनिषदं पश्चाद्गोदानोद्वाहकौ मृतिः। ६३
शुभेषु स्युर्विवाहान्ताः क्रियास्ताः क्रूरकर्मसु।
मरणान्ताः समुद्दिष्टा वह्नेरागमवेदिभिः। ६४
देशिक श्रेष्ठ को चाहिए कि अग्नि के मंत्र के द्वारा तीन वार होम
करे। क्रम से वह्निकी गर्भाधान आदि क्रिया को पूर्ण करे। ६०। प्रणव
के द्वारा आठ आहुतियों से पृथक्-पृथक् गर्भाधान, पुंसवन सीमन्तो-
न्नयन, जातकर्म, नामकरण, उपनिष्क्रमण, अन्नप्राशन, चौल,

१०६ ] [ श्रीशारदा तिलक
उपनयन—महानाम्न्य महाव्रत-औपनिषद—गोदान—उव्दाह-मृत्यू
है। विवाह के अन्त तक शुभ क्रियाये होती है। वह्नि के आगमों के
ज्ञाताओं के व्दारा क्रूरकर्मों में मरणान्त क्रियायें होती हैं। ऐसा कहा
गया है ।६२-६४।
ततश्च पितरौ तस्न संपूज्यात्मनि योजयेत् ।
समिधः पञ्च जुहुयान्मूलाग्रघृतसंप्लुलांः ।६५
मन्त्रै जिह्वमूर्तीनां क्रमाद्वहनेर्यथाविधि ।
प्रत्येकं जुहुयादेकामाहुति मन्त्रवित्तमः ।६६
अवदाय स्रवेणाज्यं चतुः स्रुचि पिधाय ताम्।
स्रुवेण तिष्ठन्नेवान्नो देशिको यतमानसः ।६७
जुहुयाद्वहिनमन्त्रेण वौषडन्तेन सम्पदे ।
विघ्नेश्वरस्य मन्त्रेण जुहुयादाहुतीर्दश ।६८
सामान्य सर्वतन्त्राणामेतदग्निमुखं मतम् ।
ततः पीठं समभ्यर्च्य देवताया हुताशने ।६६
इसके अनन्तर उसके पितरों का पूजन करके आत्मा में योजित
करना चाहिए मूल के अग्रभागों को घृत में संप्लुत करके पाँच समि-
धाओं का होम करना चाहिए ।६५। मंत्रों के ज्ञाता को चाहिए कि
वाह्निकी जिह्वाङ्ग मूर्त्तियों को क्रम से विधि पूर्वक प्रत्येक के लिए
एक आहुति से होम करे ।६३। स्रुव से घृत का अवधान करके उसकी
चतुःस्रुक् में विधान करके स्रुव् से आचार्य यतमानस होकर खड़ा होना
हुआ ही अग्नि में हवन करे ।६७। जिसके अन्त में वौषट् होवे ऐसे
अग्नि के मंत्र को द्वारा सम्पदा को लिए हवन करे । विघ्नेश्वर को मत्र
के द्वारा आहुतियां देनी चाहिये ।६८। सभी तन्त्रों का सामान्य यही
मुख ताना गया है । हुताशन में देवता की पीठ का अर्चन करना
चाहिए ।६६।
अर्चयेद्वहिनरूपां ताँ देवतामिष्टदायिनीम् ।
तन्मुखे जुहुयान्मन्त्री पञ्चविंशतिसंख्यया ।७०

पञ्चम पटल ] [ १०७
आज्येन मूलमन्त्रेण वह्नियैकीकरणन्त्विदम् ।
वह्निदेवतयोरेक्यमात्मना सह भावयेत् ।७१
मूलमन्त्रेण जुहुयादाज्येनैकादशाहुतीः ।
नाडीसस्थानमुद्दिष्टमेतदागमवेदिभिः ।७२
जुहुयादंगमुख्यानामावृत्तीनामनुक्रमात् ।
एकैकामाहुति सम्यक सर्पिषा देशिकोत्तमः ।७३
ततोऽन्येऽपि कुण्डेषु संस्कृतेषु यथाविधि ।
आचार्योविहरेदग्निं पर्वादिषु समाहितः ।७४
त्विजो गन्धपुष्पाद्यै रंगाद्यावरणान्विताम् ।
तन्त्रोक्तदेवतामिष्ठा पञ्चविंशतिसंख्यया ।७५
भूलेनाज्येनजुहुयुः साज्येन चरुणा तथा ।
प्रातरुत्थाय जुहुयुः पुनराज्यान्वितैस्तिलैः ।७६
अभीष्ट पदार्थों के देने वाली वह्नि के स्वरूप वाली देवता का
मन्त्रधारी के सम्मुख में पच्चीस की संख्या में हवन करना चाहिये ।७०।
मूल मन्त्र से आज्य के द्वारा यह वह्नि का एकीकरण होता है ।
आत्मा के साथ वह्नि और देवता के एक्य की भावना करनी चाहिये
।७१। मूलमन्त्र के द्वारा आज्य से बारह आहुतियां देवे । इसको आगमों
के ज्ञाता पुरुषों के द्वारा नाड़ी संस्थान उद्दिष्ट किया गया है ।७२।
आकृतियो अनुक्रम से अङ्गमुख्यों को हवन करना चाहिये । देशिकों
में उत्तम को चाहिये कि वह भलो-भांति घृत से एक-एक आहुति देवे
।७३। पूर्वादि दिशाओं में समाहित होकर आचार्य फिर अन्य संस्कार
किये हुये कुण्डों में विधि के अनुसार अग्नि को विहृत करे ।७४।
ऋत्विज गन्ध-पुष्पादि के द्वारा अङ्गादि आवरणों से समन्वित-
मन्त्रोक्त देवता का यजन करके पच्चीस संख्या में आज्य के सहित चरु
से तथा मूल के द्वारा आज्य से हवन करना चाहिए । पुनः प्रात-काल
में उठकर आज्य से संयुत तिलों के द्वारा हवन करे ।७५-७६।

१०८ ] [ श्रीशारदा तिलक
द्रव्यैर्वा कल्पविहितै सहस्रं साष्टकं पृथक् ।
ततो सुधौतदन्तास्यं स्नातं शिष्यं समाहितम् ।७७
पाययित्वा पञ्चगव्यं कुण्डस्यान्तिकमानयेत् ।
विलोक्य दिव्यदृष्ट्या तं तच्चैतन्यं हृदम्बुजात ।७८
गुरुरात्मनि संयोज्य कुर्यादध्वविशोधनम् ।
उक्तं कलाध्वा तत्त्वाध्वा भुवनाध्वेति च त्रयम् ,७६
वर्णाध्वा च पदाध्वा च मन्त्राध्वेत्यपरं त्रयम् ।
निवृत्त्याद्याः कलाः पञ्च कलाध्वेति प्रकीर्त्तिताः ।८०
तत्त्वाध्वा बहुधाभिन्नः शिवाद्यागमभेदतः ।
षड्विंशच्छैवतत्त्वानि द्वाविंशद्वैष्णवानि तु ।८१
चतुर्विंशतितत्त्वानि मैत्राणि प्रकृतेः पुनः ।
तत्त्वानि शैवान्युच्यन्ते शिवशक्तिः सदाशिवः ।
ईश्वरोविद्यया सार्द्धं पञ्च शुद्धान्यमूनि हि ।८३
अथवा कल्प में विहित द्रव्यों से एक हजार आठ बार पृथक् होम
करना चाहिये । इसके अनन्तर भली-भाँति धुले हुए दाँत तथ मुखवाले
स्नान किये हुए-समाहित शिष्य को पञ्चगव्य का पान कराकर फिर
कुण्ड के समीप में ले आवे । दिव्य दृष्टि से उसका अवलोकन करके
उसके चैतन्य के हृदय कमल से गुरु आत्मा में संयोजित करके अध्व का
विशोधन करे । ये 'कलाध्वा'—तत्त्वाध्वा' और भुवनाध्वा' तीन बताये
गये हैं ।७७-७६। वर्णाध्वा पदाध्वा और मन्त्रध्ववा—वे दूसरे तीन
होते हैं । निवृत्ति आद्य पाँच कलायें कलाध्वा इस नाम से कीर्त्तित
हुए हैं ।८०। शिवादि आगम के भेद से तत्त्वाध्वा बहुधा भिन्न होता है ।
छब्बीस शिवतत्व होते हैं और बाईस वैष्णव तत्व होते हैं ।८१। फिर
प्रकृतिके मंत्र चोवीस तत्व होते हैं । दशब्रह्म तत्व कहेगये हैं और त्रिप-
दात्मा के सात हैं ।८२। अब शिव सम्बन्धित तत्व कहें जाते हैं—शिव-
शक्ति सदाशिव, विद्या के साथ ईश्वर ये पाँच शुद्ध हैं ।८.।

पंचम पटल ] [ १०६
माया कालश्च नियतिः कलाविद्याः पुनः स्मृता ।
रागः पुरुष एतानि शुद्धाशुद्धानि सप्त च ।८४
प्रकृतिर्बुद्ध्यहङ्कारौ मनोज्ञानेन्द्रियाण्यथ ।
कर्मेन्द्रियाणि तन्मात्राः पञ्च भूतानि देशिकः ।८५
एतान्याहुरशुद्धानि चतुर्विंशतिरागमे ।
शेवानामिति तत्त्वानां विभागोऽत्र प्रदर्शितः ।८६
जीवः प्राणाधिपश्चित्तं ज्ञानकर्मेन्द्रियाण्यथ ।
तन्मात्राः पञ्च भूतानि हृत्पद्मं तेजसां त्रयम् ।८७
वासुदेवाद्यश्चेति तत्त्वान्येतानि शार्ङ्गिणः ।
पञ्च तत्त्वानि तन्मात्रा इन्द्रियाणि मनस्तथा ।८८
गर्वो बुद्धिः प्रधानं च मैत्राणीति विदुर्बुधाः ।
निवृत्त्याद्याः कलाः पञ्च ततो बिन्दुकलाः पुनः ।८६
नादः शक्तिः सदा पूर्वः शिवश्च प्रकृतेर्विदुः ।
आत्मविद्या शिवः पश्चाच्छिवो विद्या स्वयं पुनः ।६०
सर्वतत्त्वं च तत्त्वानि प्रोक्तानि त्रिपदात्मनः ।
तत्त्वाध्वा कथितोह्येष तत्तदागमवेदिभिः ।६१
माया, काल, नियति पुनः कलाविद्या कही गई है। राग पुरुष ये
सात शुद्धाशुद्ध हैं ।८४। प्रकृति-बुद्धि अहङ्कार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ,
पञ्च तन्मात्राये और पाँच भूत ये आगम में चौबीस हैं। देशिक इनको
स द्ध कहते हैं। वहाँ शैव तत्त्वों का विभाग प्रदर्शित किया गया
है ।८५-८६। प्राणों का अधिप जीव चित्त, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ,
पाँच तन्मात्रायें, पाँच भूत हृदयका पद्म तीन तेज और वासुदेव प्रभृति
ये शार्ङ्गी के तत्त्व होते हैं। पंचभूत, तन्मात्रायें, इन्द्रियाँ-मन-अहङ्कार
बुद्धि और प्रधान-इनको बुध गण मैत्र कहते हैं। निवृत्ति आदि पाँच
कलायें फिर बिन्दु कलायें, नाद, शक्ति, सदाशिव ते प्रकृति के होते हैं।
आत्म विद्या, शिव पश्चात् शिव और पुनः स्वयं विद्या और सर्व सत्त्व

११० ] [ श्रीशारदा तिलक
ये त्रिपदात्मा के तत्त्व बताये गये हैं। इसकी आगमों के ज्ञाताओं के
द्वारा तत्त्वाध्वा ही कहा गया है । ८७-६१।
ईरितो भुवनाध्वेति भुवनानि मनीषिभिः ।
वर्णाध्वेति वदन्त्यर्णान्रादिक्षान्तान्मनीषिणः । ६२
वर्णसंघः पदाध्वा स्यान्मन्त्राध्वा मन्त्रराशयः ।
क्रमादेतान्पुनः षट् च शोधयेगुरुसत्तमः । ६३
पादान्धुनाभिहृद्भात्तलमूर्द्धस्वपि शिशोः स्मरेत् ।
यत कूर्चेन विधिवत्तं स्पृशञ्जुहुयाद्गुरुः । ६४
आचार्य कुण्डे संशुद्धैस्तलै राज्यपरिप्लुतैः ।
शोधयाम्यमुमध्वान स्वाहेति पृथगष्टनः ६५
तारादममाहतीरष्टौ क्रमात्तां विलयं नयेत् ।
शिवे, शिवान्तान्सँलीनाञ्जनये त्मृष्टिमार्गतः । ६६
मनीषियों के द्वारा भुवनों को ही भुवनाध्वा कहा गया है । मनी-
षीगण आदि से लेकर क्षकार पर्यन्त रहने वाले वर्णोंको वर्णाध्वा बोलते
हैं । ६२। वर्णों का संघ ही पदाध्वा होता है और मन्त्रों की राशियाँ ही
मन्त्राध्वा हैं । श्रेष्ठ गुरु को चाहिए कि क्रम से वह इन छहों का शोधन
करे । ६३। शिशु के पाद, अन्धु, नाभि, हृदय, भाल और मूर्धा में भी
स्मरण करे । फिर कूर्च से विधि के सहित गुरु उसका स्पर्श करते हुये
हवन करे । ६४। आचार्य कुण्ड में शुद्ध आज्य क परिप्लुत तिलों से 'अमु'
अध्वानं शोधयामि स्वाहा' इससे अध्वा के पृथक् प्रणव के आदि द्वारा
आठ आहुतियाँ देवे और क्रमसे उसको विलयको प्राप्त कर देवे । शिव
में संलीन शिवान्तों का सृष्टि मार्ग से जनन करना चाहिए । ६५-६६।
विलोक्यन्दिव्यदृष्टया तं शिशुं देशिकोत्तमः ।
आत्मस्थितं तच्चैतन्यं पुनः शिष्ये नियोजयेत् । ६७
स्रुचा पूर्णाहुतिं दत्वा मूलमन्त्रेण देशिकः ।
उद्वास्य देवतां कुम्भे साङ्गां सावरणां गुरुः । ६८

पंचम पटल ] i १११
पुनर्व्याहृतिभिस्त्वत्रा जिह्वादीनां विभावसोः ।
एकैकां महतिं दत्वा परिषिञ्चाद्द्भिरात्मनि ।६६
पावकं योजयित्वा स्वे परिधीन्सपर स्तरान् ।
नैमित्तिके दहेन्मन्त्री नित्यो तु न दहेदिमाम् । १००
नेत्रे शिष्यस्य वध्नीयान्नेत्रमन्त्रेण वाससा ।
करे गृहीत्वा तं शिष्यं कुण्डतो मण्डलं नयेत् । १०१
तस्याञ्जलिं पुनः पुष्पैः पूरयित्वा यथाविधि ।
कलशे देवताप्रीत्यै क्षेपयेन्मूलमुच्चरन् ।१०२
देशिकों में परम श्रेष्ठ को चाहिए कि उस शिलु को दिव्य दृष्टि के
द्वारा विलोकन करते हुए आत्मा में स्थित उस चैतन्य को फिर शिष्य
रूप में नियोजित करे ।६०। स्रुवासे पूर्णाहुति देकर देशिक (आचार्य) मूल
मंत्र के द्वारा गुरु अङ्गों के सहित तथा आवरणों से समन्वित देवता भी
कुम्भ में उद्वासित कर ओर व्याहृतियों के द्वारा होम करे जो कि
विश्र वसु की जिह्वादिक का है। एक-एक आहुति देकर आत्मा में
जल से परिषिञ्चन करना चाहिए ।६८-६६। अपने में पावक को योजित
करके सपरिस्तर परिधियों का मंत्रधारी नैमित्तिक में दहन करे। और
नित्य कर्म में इसका दहन न करना चाहिए ।१००। नेत्र मंत्र से वस्त्र के
द्वारा शिष्य के नेत्रों को बांध देवे। उस शिष्य को कर में ग्रहण करके
कुन्ड से मण्डल में ले जाना चाहिए । १०१। विधि के अनुसार उसकी
अंजलि को पुष्पों से भर देव और कलश में देवता की प्रीति के लिए
मूल मन्त्र को उच्चारण करते हुए क्षेपण करना चाहिए ।१०२।
व्यपोह्य तं नेत्रबन्धमासीनं दर्भसंस्तरे ।
आत्मयागक्रमाद्भूयः सङ्कृत्योत्पाद्य देशिकः । १०३
तत्तन्मन्त्रोदितान् न्यासान्कुर्याद्देहे शिशोस्तदा ।
पंचोपचारैः कुम्भस्थां पूजयित्वेष्टदेवताम् । १०४
तस्यां तन्त्रोक्तमार्गेण विदध्यात्सकलीकृतिम् ।
मण्डलेऽलङ्कृते शिष्यमन्यस्मिन्नुपवेशयेत् ।१०५

११२ ] [ श्रीशारदा तिलक
नदत्सु पञ्चवाद्येषु सार्द्धं विप्राशिषा गुरुः।
विधिवत्कुम्भमुद्धृत्य तन्मुखस्थान्सुरद्रुमान् ।१०६
शिशो शिरसि विन्यस्य मातृकां मनसा जपन्।
मूलेन साधितेस्तोयैरभिषिञ्चेत्तामात्मवित् ।१०७
फिर उस वस्त्र द्वारा नेत्रों के बन्धन को दूर हटाकर दर्भों के संस्त-
रण पर बैठे हुए शिष्य को फिर आत्म याग के क्रम से देशिक संहार
करके तथा उत्पादन करके उन-उन मन्त्रोंसे उदित न्यासों को उस समय
में शिशु के देह में करना चाहिए। पाँच उपचाओं के द्वारा कुम्भ में
संस्थित इष्ट देवता का पूजन करके उसमें फिर तन्त्र शास्त्र में कथित
मार्ग द्वारा सकलों कृति को करना चाहिए । अन्य समलंकृत मण्डल
में शिष्य की उपदिष्ट करा देवे ।१०३-१०५। पाँच वाद्यों के बजाये जाने
पर विप्रों के आशीर्वाद के साथ गुरु विधि पूर्वक कुम्भ को उठाकर
उसके मुख में स्थित सुरद्रुमों को शिशु के लिए में विन्यप्त करके मातृ-
काओं का मन द्वारा जप करता हुआ आत्म वेत्ता मूल मन्त्र के द्वारा
साधित जल से उनका अभिषिचन करे ।१०६-१०७।
पूजितां पुनराय वर्धनीमस्त्ररूपिणीम् ।
तस्यां सुसाधितैस्तोयैः सिञ्चेद्रक्षार्थमञ्जसा ।१०८
अविशिष्टेन तोयेन शिष्यमाचामयेद्गुरुः ।
ततस्तं सकलीकुर्याद्देवतात्माऽऽत्मवित् ।१०६
उत्थाय शिष्यो विमले वाससी परिधाय च ।
आचम्य वाग्यतो भूत्वा निषीदेत्सन्निधौ गुरोः ।११०
देवतामात्मनाः शिष्ये संक्रान्तां देशिकोत्तमः ।
पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यै रैक्यं सम्भावयंस्तयोः ।१११
दद्याद्विद्यां ततस्तस्मै विनीतायाम्बुपूर्वकम् ।
गुरोर्लब्धां पुनर्विद्यामष्टकृत्वो जपेत्सुधीः ।११२
गुरुविद्यादेवतानामैक्यं सम्भावयन्धिया ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूभौगुरुं तं देवतात्मकम् ।११३

पञ्चम पटल } [ २११
य पादाम्बुजद्वन्द्वं निजमूर्द्धनि योजयेत् ।
शरीरमर्थं प्राणं च (णांश्च) सर्वं तस्मै निवेदयेत् ।११४
फिर पूजित अस्त्र रूप वाली वर्धनी का आदान करके तुरन्त ही
उसमें सुसाधित जलों द्वारा रक्षा के लिए सिंचन करना चाहिए ।१०८।
गुरु बचे हुए जल के द्वारा शिष्य को आचमन करावे । इसके उपरान्त
आत्मवेत्ता देवता की आत्मा का सकलीकरण करे ।१०६। फिर शिष्य
उठकर वस्त्रों का परिधान करे-आचमन करके मौनी कहकर गुरुदेव
की सन्निधि से निष्षण हो जावे ।११०। देशिक वर शिष्य में आत्मा के
सङ्क्रान्त देवता का गन्ध पुष्पादिक के द्वारा अर्चन करे और उन दोनों
की एकता की भली भांति भावना करनी चाहिए ।१११। अस्त्रपूर्वक
विनीत उस शिष्य के लिए विद्या देवे । गुरु से प्राप्त हुई विद्याको सुधी
आठ बार जप करे ।११२। बुद्धिके द्वारा गुरु-विद्या और देवताकी एकता
की भावना करते हुए उस देवता के स्वरूप वाले गुरु को भूमि में पढ़-
कर दण्डे की भाँति होते हुए प्रणाम करना चाहिए अर्थात् साष्टाङ्ग
प्रणाम करे ।११३। शिष्य गुरु के दोनों चरण कमलों को अपने मस्तक
पर योजित करे, शरीर, अर्थ और प्राण सभी कुछ उस गुरु के लिये
निवेदन कर देवे ।११४।
ततः प्रभृति कुर्वीत गुरोः प्रियमनन्यधीः ।
ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दत्त्वा समग्रां प्रीतमानसः ।११५
ब्राह्मणांस्तर्पयेत्पश्चाद्भक्ष्यभोज्यैः सदक्षिणैः ।
एषा क्रियावती दीक्षा प्रोक्ता सर्वसमृद्धिदा ।११६
अथ वर्णात्मिकां वक्ष्ये दीक्षामागमचोदिताम् ।
पुम्प्रकृत्यात्मका वर्णाः शरीरमपि तादृशम् ।११७
यतस्तस्मात्तनी न्यस्ये द्वर्णान् शिष्यस्य देशिकः ।
तत्तत्स्थानगतांस्वर्णान्प्रतिलोमेन संहरेत् ।११८
स्वाज्ञया देवताभावाद्विधिना देशिकोत्तमः ।
तदा विलीमतत्त्वोऽयं शिष्योदिव्यतनुर्भवेत् ।११६