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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 511 में से

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पृष्ठ 102

१०० ] [ श्रीशारदा तिलक
स्वस्वनामसमाभाः स्युर्जिह्वाः कल्याणरेतसः ।
अमर्त्यपितृगन्धर्वयक्षनागपिशाचकाः ।२७
राक्षसाः सप्त जिह्वानामीरिता अधिदेवताः ।
वह्ने रङ्गमन्तून्स्येत्तनावुक्तेन वर्त्मना ।२८
हिरण्या, गगना, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, बहुरूपा, अतिरिक्ता,
ये सात्विकी है जो याग कर्म में होती है। पद्मरागा-सुवर्णा, भद्र-
लोहिता, लोहिता, श्वेता, धूमिनी, करालिका, राजस्यो, रसना से
वन्हिकी जिह्वायें हैं जो काम्य कर्मों में विहित कही गई हैं। विश्वमूर्ति
स्फुलिङ्गिनी, धूम्र वर्णा,मनोजवा, लोहिता, कराला काली,ये तामसी
जिह्वायें कही गई हैं। ये सात मन्त्र धारियों के द्वारा क्रूर कर्मों में
नियोजित की जाया करती है ।२२-२६। कल्याणरेतस वाली ये जिह्वाये
अपने-अपने नामों के समान आभा वाली होती है। अमर्त्य, पितृगण,
गन्धर्व, यक्ष, नाग, पिशाच और राक्षस ये सात जिह्वाओं के अधि=
देवता कहे गये हैं। शरीर में उक्त मार्ग के द्वारा वह्निके अङ्ग मन्त्रों
का न्यास करना चाहिए ।२७-२८।
सहसाचिः सप्तपूर्ण उत्तिष्ठपुरुषः पुनः ।
धूमव्यापी सप्तजिह्वो धनुर्धर इति क्रमात् ।२६
षडङ्गमन्त्राः प्रोक्ता जातिभिः सहस् यताः ।
मूर्तीरष्टौ तनौ न्यस्येद्देशिकोजातवेदसः ।३०
मूर्द्धासिपार्श्वकट्यन्धुकटिपार्श्वासिके पुनः ।
प्रदक्षिणवशानुस्तस्येदुच्यन्ते ता यथाक्रमात् ।३१
जातवेदाः सप्तजिह्वो हव्यवाहनसंज्ञकः ।
अश्वोदरजसंज्ञोऽन्यः पुनर्वैश्वानराह्वयः ।३२
कौमारतेजाः स्याद्विशनमुखो देवमुखः स्मृतः ।
ताराग्नयेपदाद्याः स्युर्नत्यन्ता वह्निमूत्तंयः ।३३