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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 511 में से

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पृष्ठ 103

पंचम पटल ] [ १०१
आसनं कल्पयित्वाग्नेर्मूर्ति तस्य विचिन्तयेत् ।
इष्टं शक्तिं स्वस्तिकाभीतिमुच्चै दीर्घंर्दोभिर्धारयन्तं जपाभम्
हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वह्निं बद्धमौलिं जटाभिः।३४
सहसाचि, सप्तपूर्ण, उत्तिष्ठ पुरुष, धूमव्यापी, सप्त जिह्वा,
धनुर्धरः—ये क्रम से छै जातियों के सहित अङ्ग मन्त्र कहे गये हैं।
आचार्य को चाहिये कि जात वेदा की आठ मूर्तियां का शरीर में न्यास
कराये ।२६-३०। मूर्द्धा, पार्श्व सहित कटि, अन्धु कटि पार्श्व और अस
में प्रदक्षिण वश से उनका क्रम के अनुसार न्यास करना चाहिये ।
उनको अब बतलाया जाता है ।३१। जात वेदा, सप्त जिह्व, हव्यवाहन,
अश्वोदरज, वैश्वानर, कौमार—तेजा, विश्वमुख, देव मुख, कहे गये
हैं। प्रणव और फिर अग्न में यह पद और अन्त में नमः यह पद होता
है । ये वह्नि की मूर्तियां हैं ।३२-३३। अग्नि के आसन की कल्पना करके
उसकी मूर्ति का ध्यान करना चाहिये। अब ध्यान बतलाया जाता है-
अपनी दीर्घ बाहुओं में अभीष्ट, शक्ति, स्वस्तिक, अभय दान को धारण
करने वाले-जपा के पुष्प की आभा से समन्वित-हेमा-कल्प, पद्म के
आसन पर विराजमान, तीन नेत्रों से संयुक्त और अस्त्रों से मस्तक को
ब धने वाले वह्नि का ध्यान करना चाहिये ।३४।
परिषिञ्चेत्ततस्तोयैर्विशुद्धैर्मेखलोपरि (१) ।३५
दर्भैरगर्भैर्मध्यस्थंमेखलायां परिस्तरेव् ।
निक्षिपेद्दिक्षु परिधीन् प्राचीवर्जं गुरुत्तमः ।३६
प्रादक्षिण्वेन सम्पूज्यास्तेषु ब्रह्मादिमूर्तयः ।
ध्यातं वह्निं यजेन्मध्ये गन्धाद्यैर्मनुनाऽमुना ।३७
वैश्वानरजातवेदपदे पश्चादिहावह ।
लोहिताक्षपदस्यांते सर्वकर्माणि साधय ।३८
वह्निजायावधिः प्रोक्तो मन्त्रः पावकवल्लभः ।
मध्ये षट्स्वपि कोणेषु जिह्वाज्वालारुचोयजन् ।३६