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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

उल्लास वाली- रक्त कमल पर विराजमान-सुरगणों के द्वारा

नवम पटल ] [ २०७
ध्यान बतलाया जाता है—श्याम वर्ण के अंगों वाली-चन्द्र को
मस्तक में धारण करती हुई-अपने कर कमलों में रक्त कमल रत्नों से
संयुत चषक-वरदान-अभयदान को निरन्तर धारण करने वाली-
मोतियों के हार से सुशोभित स्तनों के भार से नत-तीव्र नेत्रों के द्वारा
उल्लास वाली- रक्त कमल पर विराजमान-सुरगणों के द्वारा
समर्पित भगवान् शंकर की प्रिया को मैं वन्दना करता हूँ ।७१। चौबीस
लाख मन्त्र का जप करना चाहिए और जप का दशांश भाग का पलाश
के पुष्पों से जो मधुर से अक्त होवें अथवा राजवृक्ष के पुष्पों से हवन
करना चाहिए । हृल्लेखा से विहित पीठ पर परमेश्वरी का अभ्यर्चन
करना चाहिए । मन्त्रधारी को मध्य और आदि में पहिले बताई हुई
हृल्लेखा आदि का पूजन करना चाहिए ।७२-७३। पूर्व के ही समान
षट्कोणों में मिथुनों का यजन करे । केसरों में अंगों की तथा पत्रों में
मातृगणों की पूजा करनी चाहिये ।७४। जो मातृगण भैरव के अंग से
समारूढ़ है जिनके मुख पर मन्द हास्य है और जो मद से अलस हैं ।
असितांग-रुरु-चण्ड-क्रोध-उन्मत्त भैरव-कपाली-भीषण-और संहार-ये
आठ भैरव होते हैं । शूल-कपाल और प्रेत को धारण करने वाले
क्षुद्रन्दुभि गज के त्वचा के अम्बर वाले भीम-कुटिल केशों से शोभित
दीर्घाद्य मातृगण बताई गई हैं और ह्रस्वाद्य भैरव कहे गये हैं ।७५-७६
७७।
पूज्याः षोडशपत्रेषु कराल्याद्याः पुरोहिताः ।
तद्बाह्यै ऽनंगरुपोध्याः लौकेशास्त्राणि तद्वहिः ।७८
एवमाराधयेद्देवीं शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
वशं नयति राजानं वनिताश्च मदालसाः ।७९
अन्नमाज्येन जुहुयाल्लभते वसु वाञ्छितम् ।
सुगन्धैः कुसुमैर्हुत्वा श्रियमाप्नोति वाञ्छिताम् ।८०
मन्त्रेणानेन संजप्तमश्नीयादन्नमन्वहम् ।
भवेदरोगी नियतं दीर्घमाप्नुयात् ।८१

२०८ ] [ श्री शारदा तिलक
अनन्तो बिन्दुसंयुक्तो माया ब्रह्माग्नितारवान् ।
पाशादित्र्यक्षरो मन्त्रः सर्ववश्यफलप्रदः । ८२
ऋष्याद्याः पूर्वमुक्ताः स्युर्बीजेनाङ्गक्रिया मता । ८३
वराङ्कुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् ।
बालार्ककोटिप्रतिमां त्रिनेत्रां भजेयमाद्यां भुवनेश्वरीताम् । ८४
सोलह पत्रों में पूर्व में वर्णित कराली आदि का पूजन करना
चाहिए। उनके बाहिर अनङ्ग रूपा आदि का यजन करे। उनके बाहिर
लोकपालों तथा उनके अस्त्रों का अर्चन करना चाहिए । ७८। इसी रीति
से शास्त्रों में कहे गए मार्ग के द्वारा ही देवी की अराधना करे। इसका
यह प्रभाव होता है कि साधक व्यक्ति इससे राजा को तथा मदालसा
वनिताओं को अपने वश में कर लिया करता है । ७६। आज्य (घृत) से
युक्त अन्न का होम करे तो अपना अभीष्ट धन प्राप्त कर लिया करता
है । सुगन्धित पुष्पों के द्वारा हवन करके मनोवाञ्छित श्री की प्राप्ति
कर लेता है ।८०। इस मन्त्र से अभिमन्त्रित अन्न का नित्य ही अशन
करे तो नियत रूप से रोग से रहित होता है और दीर्घायु को प्राप्त
किया करता है ।८१। अनन्त अर्थात् आकार जो बिन्दु से संयुत होवे-
माया बीज से युक्त ककार-अग्नि-रेफ और प्रणव के संयुत-पाश आदि
वाला तीन अक्षरों का मन्त्र होता है जो सबको वश्य करने के फल का
प्रदान करने वाला है ।८२। इसके ऋषि आदि पूर्व में ही कहे गए हैं
और बीज से अङ्ग क्रिया मानी गयी है ।८३। ध्यान बतलाया जाता है
करकमलों के द्वारा वरदान, अंकुश पाश और अभयदान को धारण
करने वाली, कमल के आसन पर विराजमान करोड़ों बाल सूर्यों के
तुल्य तेज से समन्वित तीन नेत्री वाली उस आद्य भुवनेश्वरी देवी का
मैं भजन करता हूँ ।८४।
हविष्यभुग् जपेन्मन्त्रं तत्त्वयक्षं जितेन्द्रियः ।
तत्सहस्रं प्रजुहुयाज्जपान्ते मन्त्रचित्तमः ।८५

नवम पटल ] [ २०६
दधिक्षौद्रघृताक्ताभिः समिद्भिः क्षीरभूरुहाम् ।
तत्संख्यया तिलैः शुद्धैः पयोक्तैजुहुयात्ततः।८६
हृल्लेखाविहिते पीठे नवशक्तिसमन्विते ।
अर्चयेत्परमेशानी वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् ।८७
हृल्लेखाद्या यजेदादौ कर्णिकायां यथाविधि ।
अङ्गानि केसरेषु स्युः पत्रस्था मातरः क्रमात् ।८८
इन्द्रादयः पुनः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः ।
एवं संपूजयेद्देवीं साक्षाद्वैश्रवणो भवेत् ।८६
दृश्यते मकलैर्लोकैस्तेजसा भास्करोपमः ।
अनेनाधिष्ठतं गेह निशि दीपशिखाकुलम् ।६०
दृश्यते प्राणिभिः सर्वैर्मन्त्रस्यास्य प्रभावतः ।
सर्षपैर्लोगसंमिश्रैराज्यक्तैर्जुहुयान्निशि ।६१
अपनी सब इन्द्रियों को जीत लेने वाला हविष्य का भोजन करने
वाला पुरुष यन्त्र का चौबीस लाख जप करे । मन्त्रोंका ज्ञान रखने वाला
जप के अन्त में उतना ही सहस्र होम करे । फिर दही, शहद और
घृत से अक्त करके दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से उसकी संख्या से शुद्ध
तिलों के द्वारा जो पय से अक्त होवें हवन करना चाहिए और उसकी
संख्याके ही अनुसार होम करे ।८५।८६। उस परमेशानी का आगे बताये
जाने वाले क्रम से नव शक्तियों से समन्वित हृल्लेखाविहित पीठ पर
अभ्यर्चन करना चाहिए ।८७। आदि में विधि के अनुसार कर्णिका में
हृल्लेखा आदि का यजन करे । केसरों में अङ्ग होवें और मातृगण क्रमसे
पत्रों में स्थित होनी चाहिए ।८८। फिर इन्द्र आदि का पूजन करे और
उनके बाहिर उनके अस्त्रों का यजन करे । इस प्रकार से देवी का अर्चन
करे तो साक्षात् वैश्रवण ही हो जाया करता है ।८६। वह मनुष्य तेजसे
समस्त लोकों के द्वारा सूर्यके ही तुल्य दिखलाई दिया करता है । इसके
द्वारा अधिष्ठित गेह रात्रि में दीप शिखा से समाकुल होता है ।६०। इस
मन्त्र के प्रभाव से सभी प्राणियों के द्वारा वह ऐसा दिखलाई दिया