शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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इसके उपरान्त विशुद्ध जल में मेखला के ऊपर परि षिंचन करना
चाहिए। अगर्भ दर्भों से मेखला में मध्य में संस्थितका परिस्तरण करे ।
उत्तम गुरु को चाहिए कि प्राची को छोड़कर परिधियों का दिशाओं में
निःक्षेपण करे ।३५-३६। प्रादाक्षिण्य से अर्थात् दाहिनी ओर से उनमें
ब्रह्मा आदि मूर्त्तियों का भली-भाँति पूजन करना चाहिए। इस मन्त्र के
द्वारा ध्यान किए हुए अग्नि का मध्य में गन्ध आदि के द्वारा यजन
करे । ३०। वैश्वानर और जात वेदा -ये दो पद-फिर गर्व कर्म्माणि
साधय-यह पद, और अन्त में वह्निजाया अर्थात स्वाहा वह पद होता
है। यह मन्त्र पावक का परम प्रिय मन्त्र बताया गया है। मध्य में छं
कोणों में जिह्वा ज्वाला रुचि वाले का यजन करना चाहिये । २८-३६।
केसरेषूक्तमार्गेण पूजयेदङ्गदेवताः ।
दलेषु पूजयेन्मूर्तीः शक्तिस्वस्तिकधारिणीः ।४०
दलाग्रे मातरः पूज्याः सासिताङ्गादिभैरवाः ।
लोकपालांस्ततो दिक्षु पूजयेदुक्तलक्षणान् ।४१
पश्चादादाय पाणिभ्यां स्रुक्स्रुवौ तावधोमुखौ ।
त्रिः संप्रतापयेद्वह्नौ दर्भानादाय देशिकः ।४२
तदग्रमध्यमूलानि शोधयेत्तं र्यथाक्रमात् ।
गृहीत्वा वामहस्तेन प्रोक्षयेद्दक्षिणेन तौ ।४३
पुनः प्रताप्य तौ मन्त्री दर्भानग्नौ विनिःक्षिपेत् ।
आत्मनो दक्षिणे भागे स्थापयेत्तौ कुशास्तरे ।४४
आज्यस्थालीमयादाय प्रोक्षयेदस्त्रवारिणा ।
तस्यामाज्यं विनिःक्षिप्य संस्कृतं वीक्षणादिभिः ।४५
ऊपर में बताये हुए मार्ग से ही केसरों में अङ्ग देवताओं का पूजन
करे । दलों में शक्ति और स्वस्तिक धारण करने वाली मूर्त्तियों का
अर्चन करना चाहिए ।४०। दलों के अग्रभाग में असिताङ्ग भैरवों के
सहित मातृगण का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर दिशाओं में
उक्त लक्षणों से अन्वित लोकपालों का यजन करे ।४१। इसके पीछे नीचे