शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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करण होता है ।४७। वह प्रदीप्त दो दर्भों से वर्म मन्त्र के द्वारा आज्य का
नीराजन करके दर्भ को अग्नि में विसर्जित कर देवे । यह अभिद्योतन
कहा गया है ।४८। गुरु घृत में अस्त्र मन्त्र के द्वारा प्रज्वलित दर्भों को
प्रदर्शित करके उनको अग्नि में न्यस्त कर देने का उद्योतन कहा गया
है ।४६। घृत को ग्रहण कर के अग्नि में अंगारों को संयोजित करके
जल का स्पर्श करना चाहिए । अंगुष्ठ और उपकनिष्ठिकासे प्रादेश संमित्
दर्भों को पकड़ कर घृत को अस्त्र मन्त्र के द्वारा पवित्र करे-यह
उत्पवन कहा जाता है। उसी भाँति हृदय मन्त्र से अपने सम्मुख कुशाओं
से घृत में सम्प्लवन करे । यह छै संस्कार बतायें गए हैं ।५०-५१।
घृतेसंप्लवनं कुर्युः संस्काराः षड्दीरिताः ।
प्रादेशमात्रं सग्रंथि दर्भयुग्मं घृतांतरे ।५२
निःक्षिप्य भागौ द्वौ कृत्वा पक्षौ शुक्लेतरी स्मरेत् ।
वामे नाडीमिडां भागे दक्षिणे पिंगलां पुनः ।५३
सुषुम्णां मध्यतो ध्यात्वा कुर्याद्धोमं यथाविधि ।
स्रुवेण दक्षिणाद्भागादादायाज्यं हृदा गुरुः ।५४
जुहुयादग्नये स्वाहेत्यग्नेर्दक्षिणलोच ।
वामहस्तद्वदादायात्रे वामे वह्निविलोचने ।५५
जुहुयादाय सोमाय स्वाहेति हृदयाणुना ।
मध्यादाज्य समादाय वह्नेर्चालविलोचने ।५६
जुहुयादग्नीषोमाभ्यां स्वाहेति हृदयाणुना ।
हृन्मन्त्रेण स्रुवेणाज्य भागादादाया दक्षिणात् ।५७
जुहुयादग्नये स्विष्टकृते स्वाहाहेति तन्मुखे ।
इति (१) सम्पातयेद्भागेऽथाज्यस्यान्वाहुति क्रमात् ।५८
इत्याग्निनेत्रचक्राणां कुर्यादुद्घाटनं गुरुः ।
सताराभिर्व्याहृतिभिराज्येन जुहुयात्पुनः ।५६
प्रादेश प्रमाण वाले और ग्रन्थि से युक्त दो दर्भों के घृतके अन्दर
डाल कर दो भाग करके कृष्ण और शुक्ल दो पक्षों का स्मरण करना