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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचम पटल ] [ ६७
खनन और उद्धार होते हैं और हृन्मन्त्र के द्वारा प्रपूरण संस्कार किया
जाता है ।३। अस्त्र से समीकरण और वर्म के द्वारा सचन नाम वाला
संस्कार सम्पन्न होता है । हेति मन्त्रसे कुट्टन तथा वर्मके मंत्र से मार्जन
किया जाता है ।४। विलेपन और कला रूप कल्पन उसके अनन्तर होता
है । पीछे त्रिसूतीकरण और इसके पश्चात् हृदय मंत्र से अर्चन माना
गया है ।५। अस्त्र से बाजीकरण और हृन्मन्त्र के द्वारा शुभ कुशाओं से
चतुष्पथ करे और तनुत्र के द्वारा अक्ष पाटल करना चाहिए ।६। इन
कथित संस्कारों से याग में कुण्डों का सत्कार करना चाहिए । अथवा
उनका चार वीक्षण प्रभृति के ही द्वारा संस्कार करे ।७।
तिस्रस्तिस्रो लिखेल्लेखा हृदा प्रागुदगग्रणाः ।
प्रागग्राणां स्मृता देवा मुकुन्देशपुरन्दराः ।८
रेखाणामुदगग्राणो ब्रह्मवैवस्वतेन्दुवः ।
अथवा षट्कोणावृतं त्रिकोण तव सीलखेत् ।६
सर्वाण्यभ्युक्ष्य तारेण योगपीठमथार्चयेत् ।
वागीश्वरीमृतुस्नानां नीलेन्दीवरसन्निभाम् ।१०
वागीश्वरेण संयुक्तामुपचारैः प्रपूजयेत् ।
सूर्यकांतादितम्भूतं यद्वा श्रोत्रियगेहजम् ।११
आनीय चाग्नि पात्रेण क्रव्यादांशं पसित्यजेत् ।
संस्कुर्यात्तं यथान्यायं देशिकोवीक्षणादिभिः ।१२
प्राक् अथवा पूर्व दिशा में अथवा उत्तर में हृदय मन्त्र के द्वारा
अग्रगामिनी तीन-तीन लेखायें लिखनी चाहिये । पूर्व में अग्रगामिनी
लेखाओं के-मुकुन्द-ईश और पुरन्दर देवता कहे गये हैं ।८। उत्तर की
ओर अग्रभागों वाली रेखाओंके देवता ब्रह्मा-वैवस्वत और इन्दु होते हैं।
अथवा षट् कोण से समावृत त्रिकोण वहाँ पर लिखना चाहिये ।६। इन
सबका प्रणव के द्वारा अभ्युक्षण करके इसके अनन्तर योगपीठका अर्चन
करे । ऋतुकाल के उपरान्त स्नान' की हुई-नील इन्दीवर के सदृश्य
वागीश्वरी का जो वागीश्वर से समन्वित होवे उपचारों के द्वारा पूजन