शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ
५२ ] [ श्रीशारदा तिलक
तन्मध्यं किञ्चिदालम्ब्य मत्स्यौ द्वौ परितो लिखेत् ।
तयोर्मध्ये स्थितं सूत्रं विन्वसेद्दक्षिणोत्तरम् ।४
द्वाभ्यां द्वाभ्यां तथाऽग्राभ्यां कोणेषु मकारल्लिखेत् ।
मत्स्यमध्ये स्थिताग्राणि तत्र सूत्राणि पातयेत् ।५
चतुरस्रं भवेत्तत्र चतुष्कोष्ठसमन्वितम् ।
तत्पुनर्विभजेन्मन्त्री चतुः, षष्टिपदं यथा ।६
ईशानाद्राक्षसं यावद्यावदग्नेः प्रभञ्जनः ।
एवं सूत्रद्वयं दद्यात्कर्णसूत्रं समाहितः ।७
इसके उपरान्त वास्तु याग के पूर्वक दीक्षाङ्ग की बतलाया जायगा
जिसके किये जान से मन्त्र का ज्ञाता पुरुष दीक्षा के फलको प्राप्त किया
करता है ।१। अब वास्तु याग की उत्पत्ति बतलाई जातीं है-पूर्व में एक
महान् उग्र और समस्त प्राणियोंको भयंकर राक्षस जोदेवोके द्वारा निहत
हुआ था यही भूमि में वास्तु पुरुष कहा गया है । वास्तु नाम वाले
राक्षस का हनन करके उसके शरीर पर अधिष्ठित होकर तिरेपन देव
स्थित हैं । पहले उनके लिए वलिका हरण करना चाहिए ।२। इनका
वलिमण्डल ठीक-ठीक रीति से कहा जाता है—पूर्व और अपरमें आयत
सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ
आलम्बन करके दोनों ओर दो मत्स्यों में विन्यस्त करे ।३-४। दो-दो
अग्रभागों से एक-एक मत्स्य पूर्ववत् होता है । इसी प्रकार से दूसरी
ओर भी द्वितीय मत्स्य होता है । प्राची के सूत्रार्थ मित प्राची सूत्राणु
में स्थित सूत्र से ईशान और अग्नि कोण में अर्ध चन्द्र करना चाहिए ।
फिर उसी सूत्र से उत्तर सूत्राय में स्थित से ईशान और वायव्य कोण
में अर्ध चन्द्र लिखे । इस रीति से ईशान में मत्स्य उत्पन्न हो जाता है ।
पूर्व की ही भाँति पक्षिमार्र्ध स्थित सूत्र से वायव्य और नंऋंत्य कोण में
अर्ध चन्द्र बनावे । इस तरह से दोनों ही स्थलों में दो मत्स्य हो जाते
हैं ।५। वहाँ पर चार कोष्ठों से समन्वित चतुरस्र ( चौकोर ) होता है ।
तृतीय पटल ] [ ५३
उसको फिर मंत्रधारी चौंसठ पद वाला विभक्त करे ।६। ईशान से
राक्षस कोण तक और अग्नि से वायव्य कोण पर्यन्त परम सावधान
होकर इस प्रकार से सूत्रद्वय कोण सूत्र देवे । कोण सूत्र की कर्ण सूत्र
संज्ञा होती है ।७।
ब्रह्माणं पूजयेदादौ मध्ये कोष्ठचतुष्टये ।
दिक्चतुष्केषु पूर्वादि यजेदार्यमनन्तरम् ।८
विवस्वन्ततो मित्रं महीधरमतः परम् ।
कोणार्द्धकोष्ठद्वन्द्वेषु वहनयादिपरितः पुनः ।६
सावित्रं सवितारं च शक्रमिन्द्रजयं पुनः ।
रुद्रं रुद्रजय विद्वानापञ्चाथापवत्सकम् ।१०
तत्कर्णसूत्रोभयतः कोष्ठद्वन्द्वेषु देशिकः ।
शर्वं गृहं चार्यमणं जम्भकं पिलिपिच्छकम् ।११
चरकीं च विदारीं च पतनामर्चयेत्क्रमात्।
अर्चयेद्दिक्षु पूर्वादिसाद्धांर्च्यन्तदेष्विमान् ।१२
अष्टावष्टौविभागेन देवान्देशिकसत्तमः ।
क्रमादीशानपर्जन्यजयन्ताः शक्रभास्करौ ।१३
सत्यो वृषान्तरिक्षौ च दिशि प्राच्यामवस्थिताः ।
अग्निःपूषा च वितथो यमश्च गृह्रक्षकः ।१४
गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगोदक्षिणदिग्गताः ।
निऋर्तिदौ वारिश्च सुग्रीववरुणौ ततः ।१५
पुष्पदन्तासुरौ शेषरोगौ प्रत्यग्दिशि स्थिताः ।
वायुनगिश्च मुख्यश्च सोमो भल्लाटएव च ।१६
अर्गलाख्यो दित्यदिता कुवेरस्य दिशि स्थिताः ।
उक्तानामपि देवानां पदान्य।पूर्य पञ्चभिः ।१७
समाहित होकर आदि के मध्य में चार कोष्ठों में ब्रह्माजीका पूजन
करे । पूर्वादि चारों दिशाओं में आर्य का यजन करना चाहिए । अर्थात्
आर्य का पूर्व दिशा में—विवस्वान् का दक्षिण दिशा में—मित्र का
५४ ] श्री शारदा तिलक
पश्चिम दिशा में और महीधर का उत्तर दिशा में पूजन करे । कोणार्ध
दो कोष्ठों में वह्नि आदिका पूजन करना चाहिए ।८-६। ऊर्ध्व कोष्ठमें
सावित्र का और अधः कोष्ठ में सविता का यजन करे । फिर विद्वान-
पुरुष शक्र, इन्द्र जय, रुद्र-रुद्र जय पाँच अववतसक का पूजन करे ।१०।
उस कोण सूत्र के दोनों ओर कोष्ठ द्वन्द्वों में आचार्य क्रम से शर्व-गुह
- अर्यमा-जम्भक पिलि पिच्छक-तरक्षी-विहारी और पूतना का
जमर्चन करे । पूर्वादि सार्ध आद्यन्त पदों में दिशाओं में इनका पूजन
करना चाहिए ।११-१२। उत्तम आचार्य काम में आठ-आठ के विभाग
से देवों का यजन करे । ईशान-मर्जन्य - अत्यन्त-शक्र-भास्कर -
सत्य-वृष-अन्तरिक्ष जो प्राची दिशा में अवस्थित है । अग्नि -
पूषा-वितथ-यम-गृह रक्षक-गन्धर्व-भृङ्गराज-मृग जो कि दक्षिण
दिशा में अवस्थित है । निर्ऋति-दौवारिक-सुग्रीव-वरुण-पुष्पदन्त-
असुर- शेष-रोग-जो प्रत्यग् दिशा में अवस्थित है । वायु-नाग-मुख्य-
सोम-भल्लाट-दिति-अदिति जो कि कुवेर की दिशा में स्थित हैं । इन
उक्त देवों के भी पदों को पाँचों से आपूरित करे ।१३-१७।
रजोभिस्तेष्वथैतेभ्यः पायसान्नैर्बलिं हरेत् ।
अयं वास्तुबलिः प्रोक्तः सर्वसम्पत्समृद्धिदः । १८
नक्षत्रराशिवारणामनुकूले शुभेऽहनि ।
ततो भूमितले शुद्धे तुषाङ्गारविवर्जिते ।१६
पुण्याहं वाचयित्वा तु मण्डपं रचयेच्छुभम् ।
पञ्चभिः सप्तभिर्हस्तैर्नवभिर्वामितान्तरम् ।२०
षोडशस्तम्भसंयुक्तं चत्वारस्तेषु मध्यगाः ।
अष्टहस्तसमुच्छायाः संस्थाप्या द्वादशाऽभितः ।२१
पञ्चहस्तप्रमाणास्ते निश्छिद्रा ऋजवः शुभाः ।
तत्पञ्चमांशं संन्यस्ये-(न्निखने) न्मेदिन्यां तन्त्रवित्तमः ।२२
तृतीय पटल ] [ ५५
नारिकेलदलैर्वंशैश्छादयेत्तत्समन्ततः ।
द्वारेषु तोरणानि स्युः क्रमात् क्षीरमहोरुहाम् ।२३
उनको रजों से पूरित करना चाहिए । इसके अनन्तर इसके लिए
पायस अन्नों के द्वारा बलिका समाहरण करना चाहिए । यही वास्तु-
बलिका बतायी गयी है जो सभी की समृद्धि के प्रदान करने वाली
होती है ।१८। नक्षत्र, राशि और वारों के अनुकूल किसी शुभ दिन में
परम शुद्ध भूमि तल में जो तुष और अङ्गार आदि से रहित होवे
पुण्याह वाचन कराके परत शुभ एक मण्डप की रचना करनी चाहिए ।
वह मंडप पाँच-सात अथवा नौ हस्त के अन्तर वाला होना चाहिए ।१९-
२०। उस मंडप में सोलह स्तम्भ होने चाहिए उन सोलह स्तम्भों में से
चार स्तम्भ मध्य गत होने चाहिए। इन स्तम्भों की ऊँचाई आठ हाथ
की होवे । परस्परिक स्तम्भोंके सब ओर बारहस्तम्भ संस्थापित होवे ।
इनका प्रमाण पाँच हाथ का ही होना चाहिए । ये सब छिद्र रहित—
सीधे और शुभ संस्थापित करे । तन्त्र वेत्ता पुरुष को चाहिए कि उन
स्तम्भों का पाँचवा भाग भूमि में खोदकर रक्खे ।२१-२२। नारियल के
पत्तों से और बाँसों से सभी ओर से उसका छादन कर देवे । द्वारों में
क्रम से दूध वाले वृक्षों के तोरण होने चाहिए ।२३।
स्तम्भोच्छायाः स्मृतास्तेषां सप्तहस्तैः पृथक् पृथक् ।
दशांगुलप्रमाणेन तष्परीणाह ईरितः ।२४
तिर्यक्फलकमानं स्यात्स्तम्भानामर्द्धमानतः ।
शूलानि कल्पयेन्मध्ये तोरणे हस्तमानतः ।२५
दिक्षु ध्वजान्निवध्नीताल्लोकपालसमप्रभान् ।
वितानदर्भमालाद्यैरलङ्कुर्वीत मण्डपम् ।२६
सात हाथों से पृथक्-पृथक् उन स्तम्भों की छाया कही गयी है ।
दश अंगुल प्रमाण से उनका परीणाह (परिमाण) कहा गया है ।२४।
दोनों स्तम्भों के मध्य में देहली के रूप से जो ऊपर में तिरछा फलक
है उसका मान स्तम्भों के अर्ध मान से ही होना चाहिए । एक हाथ
५६ ] [ श्रीशारदा तिलक
के मान से तोरण में मध्य में शूलों को कल्पना करे ।२५। दिशाओ में
लोक पालों के समान प्रभा वाली ध्वजाओं को बांध देवे । उस मण्डप
को वितान-दर्भ और मालाये आदि के द्वारा भली-भांति समलंकत
करना चाहिए ।२६।
तत्तिभागमिते क्षेत्रेऽरत्निमात्रसमन्विताम् ।
चतुरस्रां ततो वेदि मण्डलाय प्रकल्पयेत् । २७
प्रागेव दीक्षादिवसात्सप्तभिर्विधिवहितैः ।
सर्वमङ्गलसम्पत्यै विदध्यादङ्कुरार्पणम् ।२८
मण्डपस्योत्तरे भागे शालां पूर्वापरायताम् ।
मूढां कुर्यात्ततस्तस्यां मण्डलं रचयेत्सुधीः । २६
पञ्चहस्तप्रमाणानि पञ्चसूत्राणि पातयेत् ।
पूर्वापरायतान्येषामन्तरं द्वादशांगु लम् ।३०
दक्षिणोत्तासूत्राणि तद्वदेकादशार्पयेत् ।
पदानि तत्र जायन्ते चत्वारिंशत्प्रमार्जयेत् । ३१
षड्क्त्यावीथीश्चतस्रोऽतश्चतुष्कोभयपार्श्वयोः ।
वीथ्यौ द्वे च चतुष्कोष्ठत्रयमत्रावशिष्यते । ३२
उसके विभाग से परिमित क्षेत्र में अरत्नि मात्र से समन्वित चतु-
रस्र वेदी मण्डल के लिए कल्पित करे ।२७। दीक्षादि दिवस से पहिले
ही सात दिन में विधि के सहित सब प्रकार के मङ्गलों की सम्पत्ति के
लिए अंकुरों का आरोपण करना चाहिए ।२८। मण्डप के उत्तर भाग
में पूर्वापर में आयता गूढ़ डाला जनानी चाहिए । फिर उनके उपरान्त
उस शाला में सुधी व्यक्ति को चाहिए कि मण्डप की रचना करे ।२६।
फिर पाँच हाथों के प्रमाण वाले पाँच सूत्रों का पालन करे जो पूर्वा पर
आयत हों वे और जिनका अन्तर बारह अंगुल होवे ।३०। उसी भाँति
दक्षिण सूत्रों को ग्यारह वार करे । वहाँ पर चालीस पद उत्पन्न
होते हैं उसकी प्रमार्जित करना चाहिए । ३१। पांकुम चारों विधियों
का मार्जन करे । पूर्व से चार कोष्ठो वाली एकविधि आठ कोष्ठों वाली
तृतीय पटल ] [ ५७
दक्षिण विधि-फिर चार कोष्ठों वाली पश्चिम विधि-और आठ कोष्ठों
वाली उत्तर विधि का मार्जन करे । इस मण्डप में चतुष्कोष्ठ त्रय अव-
शिष्ट रहता है । ३२।
पदानि रञ्जयेत्तानि श्वेतपीतारुणासितैः ।
रजोभिः श्यामलेनाथ वीथीरापूरयेत्सुधीः । ३३
पात्राणि त्रिविधांयाहुरंकुरार्पणकर्मसु ।
पालिकाः पञ्च मुख्यश्च शरावाश्च चतुष्क्रमात् । ३४
प्रोक्ताः स्मृताः सर्वतन्त्रज्ञैर्हरिब्रह्मशिवात्मकाः ।
एषामुत्सेध (च्छाय) उन्नेयः षोडश द्वादशाष्टभिः । ३५
अंगुलैः क्रमशस्तानि शुभांयावेष्ट्य तंतुना ।
प्रक्षाल्य देशिकस्तेषु पदेष्वाहितशालिषु । ३६
सगन्धदर्भकूर्चेषु पश्चिमादि निवेशयेत् ।
करीषवालुकामृद्भिस्तानि पात्राणि पूरयेत् । ३७
उन पदों का श्वेत-पीत-अरुण और सितरज से तथा श्यामल रज
से सुधी पुरुष को विधि पूर्वक अपूरित करना चाहिए । ३३। अंकुरा-
र्पण कर्मों में तीन प्रकार के पात्र कहे गये हैं-पालिका-पाँच मुखी
और शराव ये क्रम से बताये गये हैं । ये सभी तन्त्रों के ज्ञाताओं के
द्वारा हरि ब्रह्मा और शिव के स्वरूप वाले कहे गये हैं । इनकी ऊँचाई
क्रम से षोड्श-द्वादश और अष्ट अंगुलों की समझनी चाहिए । वे शुभ
होती हैं । इनको तन्तु से आवेष्टित करके प्रक्षालन करके आचार्य
आहित शाली वाले गन्ध दर्भ कूर्च से युक्त उन पदों के पश्चिम आदि
निवेशित करना चाहिए । करीष बालुका-मृत्तिका से उन पात्रों को
पूरित कर देवे । ३४-३७।
सुधाबीजेन बीजानि दुग्धैः प्रक्षाल्य तन्त्रवित् ।
मूलमन्त्राभिजप्तानि पंचघोषपुरःसरम् । ३८
आशीर्वाग्भिर्द्विजातीनां मंगलाचारपूर्वकम् ।
निर्वपेत्तेषु पात्रेषु देशिको यतमानसः । ३६
५८ ] [ श्री शारदा तिलक
शालिश्यामाढकामुद्गतिलनिष्पावसर्षपाः ।
कुलत्थ कंगुमाषाश्च बीजान्यङ्.कुरर्मणि ।४०
हरिद्रद्भि समभ्युक्ष्य वस्त्रैराच्छाद्य देशिकः ।
बलिंत्रिविधपात्राणां दिक्षु पूर्वादिंतोहरेत् ।४१
प्रणवाद्यैर्नमोन्तैश्च रात्रौ रात्रीशनामभिः ।
भतानि पितरो यक्षा नागा ब्रह्मा शिवो हरिः ।४२
तन्त्रों का ज्ञाता सुधा बीज के द्वारा बीजों को दूध से प्रक्षालित
करके मूल मंत्र से अभिमंत्रित करे और पाँच घोषों के साथ-द्विजातियों
के आशीर्बचनों से मङ्गलाचार पूर्वक आचार्य संयत मंत्र वाला होकर
उन पात्रोंमें निर्वपन करे ।३८-३६। शाली, श्यामा, आढकी, मुद्ग, तिल,
निष्पाव, सर्षप कुलत्थ कङ्गु, मास, इनके बीजों को अंकुर, कर्म्म में
ग्रहण करना चाहिए । आचार्य हल्दी से सभ्युक्षण करके वस्त्रसे आच्छा-
दित कर देवे । पूर्वादि दिशाओं में त्रिविध पात्रों की बलि का समाहरण
करे ।४०-४१। यह बलि रात्रीशके नामों द्वारा देवे जिनके आदिमें प्रणव
होवे और अन्त में नमः'–यह पद होवे । भूत, पित्रगण, यक्ष, नाग,
ब्रह्मा, शिव ओर हरि ये सातों रात्रियों के देवता कहे गये हैं ।४२।
सप्तानामपि रात्रीणां देवताः समुदीरिताः :
भूतेभ्यः स्यलजतिलहरिद्रादधिसक्तवः ।४३
सान्नाः पितृभ्यः सतिलास्तण्डुलाः परिकीर्तिताः ।
करम्भलाजा यक्षेभ्यो नारिके लोदकान्वितम् ।४४
सक्तुपिष्टं च नागेभ्यो ब्रह्मणे पंकजाक्षताः ।
सापूपमन्नं शर्वाय विष्णवे च गुडौदनम् ।४५
ततो लोकेश्वरेश्भ्योऽपि वितरेद्विधिवत्बलिम् ।
दीक्षायामभिषेकेषु नववेश्मप्रवेशने ।४६
उत्सवेषु च संपत्यै (त्तौ) विदध्यादङ्कुरापंणम् ।
प्राक् प्रोक्ते मण्डपे बिद्वान्वेदिकाया बहिस्त्रिधा ।४७
तृतीय पटल ] [ ५६
क्षेत्रं विभज्य मध्यांशे पूर्वादि परिकल्पयेत् ।
अष्टास्वाशासु कुण्डानि रम्याकाराण्यनुक्रमाद् ।४८
भूतों के लिए बलि में लाजा, तिल, हरिद्रा, दधि, सक्तु और अन्न
ये होते हैं। पितृभ्यों के लिए तिलों के सहित तण्डुल बताये गये हैं ।
यक्षों के लिए आरम्भ और लाजा ( खील ) होते हैं । नागों के लिए
नारियल के जल से सतन्वित सक्तुपिष्ट होता है और ब्रह्मा के लिये
पंकज तथा अक्षत है। शर्व के लिए पूजों के सहित अन्न तथा विष्ण
भगवान्की गुड़ और ओदन होता है ।४३-४५। उसके अनन्तर लोकपालों
के लिए भी विधि के साथ बलि का वितरण करना चाहिए । दीक्षा में,
अभिषेकों में, नवीन गृह के प्रवेश करने में, उत्सवों में सम्पदा के लिए
अंकुरार्पण करना ही चाहिए । पूर्व में वर्णित मण्डप में विद्वान् पुरुषको
वेदिका से बाहिर तीन भागों में क्षेत्र का विभाग करके मध्यांशमें पूर्वादि
दिशाओं की कल्पना कर लेनी चाहिए । और अनुक्रम से रम्य आकार
वाले कुण्डों की आठों दिशाओं में रचना करनी चाहिए ।४४-४८।
चतुरस्रं योनिमर्द्धचन्द्रं त्र्यस्रं सुवर्तुलम् ।
षडस्रं पंकजाकारमष्टास्रं तानि नामतः ।४६
आचार्य कुण्डं मध्ये स्यान्गौरीपतिमहेन्द्रयोः ।
हस्तमानमितां भूमि पूर्ववत्परिकल्पयेत् ।५०
समन्तात्कुण्डमेतत्सयाच्चतुरस्रं शुभावहम् ।
चतर्विशत्यंगुलाढयं हस्तं तन्त्रविदोविदुः ।५१
कर्तुर्दक्षिणहस्तस्य मध्यमांगुलिपर्व्वणः ।
मध्यस्य दीर्घमानेन मानांगुलमुदीरितम् ।५२
यवानामष्टभिः क्लृप्तं मानांगुलमुदीरितम् ।
चतुरस्त्रीकृतं क्षेत्रं पञ्चधा विभजेत्सुधीः ।५३
न्यसेत्पुरस्तादेकांशं कोणादर्द्धार्धतप्रमाणतः ।
भ्रामयेत्कोणमानेन तथान्यदपि मन्त्रवित् ।५४