शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
सूत्रों को करे तो यह त्र्यस्र कुण्ड कहा गया है ।५८। बुद्धिमाने पुरुष
तृतीय पटल ] ६१
तन्त्र का ज्ञाता पुरुष ऊपर और नीचे एक एक अंश का त्यागकर
देवे । ज्यासूत्र का पालन करे फिर आगे उसके मान से भ्रमण करना
चाहिए ।५६। तो यह परम सुन्दर अर्धचन्द्र के तुल्य कुण्ड होता है ।
चार प्रकार से भेदित क्षेत्रमें दोनों पाश्र्वोंमें व्यास करे ।५७। फिर उसके
मानसे एक-एक अंशको आगे लांछित करना चाहिए । बुद्धिमान पुरुषदो
सूत्रों को करे तो यह त्र्यस्र कुण्ड कहा गया है ।५८। बुद्धिमाने पुरुष
को अष्टादशांश क्षेत्र में वाहिर एक का न्यास कर देना चाहिए । उस
-मान से भ्रमित करे तो परम श्रेष्ठ वृत्त कुण्ड होता है ।५६। मध्य में
इस भाग से एक-एक भाग का न्यास करे ।६०।
क यत्पाश्र्वयुगे (द्वयो) मत्स्यचतुष्क तन्त्रवित्तमः ।
सूत्रषट्कं ततो दद्यात्षडस्रं कुण्डमुत्तमम् ।६१
चतुरस्रीकृतं क्षेत्रं विभज्याष्टादशांशतः ।
एकं भागं वहिर्न्यस्य भ्रामयेत्तेन वर्तुलम् ।६२
वृत्तानि कर्णिकादीनां बहिस्त्रीणि प्रकल्पयेत् !
पद्मकुण्डमिति प्रोक्तं विलोचनमनोहरम् ।६३
पूर्वोक्तं विभजेत्क्षेत्रं चतुर्विंशतिभागतः ।
एकं भागं वहिर्न्यस्य चतुरस्रं प्रकल्पयेत् ।६४
अंतःस्थचतुरस्रस्य कोणार्द्धादर्द्धप्र णतः ।
वाह्यस्थतुरस्रस्य कोणांभ्यां परिलांछयेत् ।६५
दिशं प्रति यथान्यायमष्टौ सूत्राणि पातयेत् ।
अष्टास्रं कुण्डमेतद्धिद तन्त्रविद्भिरुदाहृतम् ।६६
यावांत्कुण्डस्य विस्तारः (१) खननं तावदीरितम् ।
कुण्डानां यादृश रूपं मेखलानां च तादृशम् ।६७
तन्त्र के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ पुरुष द्वारा दोनों पाश्र्वों में चार मत्स्यों
को बनाना चाहिए । फिर छै सूत्रों का करे तो उत्तम षडस्र कुण्ड हो
जाता है ।६१। चतुरस्रों कृत क्षेत्रको अठारह अंशसे विभाजन करके एक
६२ ] ' ! श्री शारदा तिलक
भाग को बाहिर न्यस्त करके भ्रामण करे तो वर्त्तुल होता है ।६२।
कर्णिका आदि के तीन वृत्तों को बाहिर कल्पना करनी चाहिए । यह
नेत्रों को मनोहर दिखाई देने वाला पद्म कुण्ड कहा गया है ।६३। पूर्व
में कहें हुए क्षेत्र को चौबीस भाग से विभक्त करना चाहिए । एक भाग
का बाहिर न्यास करके चतुरस्र की कल्पना करे ।६४। अन्दर स्थित
चतुरस्र का कोणाद्यर्ध प्रमाण से बाहिर में स्थित चतुरस्र के कोणों से
परिलाञ्छित करना चाहिए। ६५। न्यायानुसार दिशाकी ओर आठ सूत्रों
का पालन करे । इसको तन्त्र के ज्ञाता विद्वानों के द्वारा अष्टास्र कुण्ड
कहा गया है ।६६। जितना कुण्डों का विस्तार होवे उतना ही खनन
कहा गया है । और कुण्डों का जिस प्रकार का रूप होता है मेखलाओं
का भी उसी तरह का हुआ है।६७।
कुण्डानां खलास्तिस्रो मुष्टिमात्रे तु ताः क्रमात् ।
उत्सेधायामतो ज्ञेया ह्येकार्द्धाङ्गुलिसमिताः ।६८
अरत्निमात्रे कुण्डे स्युस्तास्त्रिद्व्येकांगुलात्मिकाः ।
एकहस्तमिते कुन्डे वेदाग्निनयनांगुलाः ।६६
मेखलानां भवेद्दन्तः परितो नेमिरंगुलात् ।
एकहस्तस्य कुण्डस्य वर्द्धयेत्तां क्रमात्सुधीः ।७०
दशहस्तान्तमन्येषामर्द्धांगुलशात्पृथक् ।
कुण्डे द्विहस्ते ता ज्ञेया रसवेदगुणांगुलाः । ७१
चतुर्हस्तेषु कुण्डेषु वसुतर्कयुगांगुलाः ।
कुण्डे रसकरे ताः स्युर्दशाष्टटर्वंगुलान्विताः । ७२
कुण्डों की तीन मेखलाएँ होती है और वे क्रम से मुष्टि मात्र
हुआ करती है। उत्सेध और आयाम से वे ह्येकार्द्ध अंगुलियोंके संमित
हुआ करती है ।१८। जो कुण्ड अरत्नि मात्र ही होता है उनमें वे तीन
दो और एक अंगुल मात्र के स्वरूप वाली हुआ करती हैं । एक हाथ
परिमाण वाले कुन्ड में चार-तीन और दो अंगुल के परिमाण से युक्त
होती है ।६६। मेखलाओंके अन्दर सभी ओर अंगुलके मानसे नेमि होती
तृतीय पटल ] [ ६३
है। सुधी पुरुष एक हाथ वाले कुण्ड को क्रम से वर्धित कर देवे ।७०।
अन्यों का अर्धांगुल वश से वृयक् दश हाथों के अन्त तक करे। दो
हाथ के कुन्डमें छै और चार अंगुल वाली उनको जानना चाहिये ।७१।
चार हाथ परिमाण वाले कुन्डो में आठ और चार अंगुलों के परिमाण
वाली हुआ करती है। छै हाथों वाले कुन्ड में वे दश-आठ और छै
अंगुलों वाली हुआ करती है ।७२।
वसुहस्तमिते कुण्डे भानुपङ्क्त्यष्टकांगुलाः ।७३
दशहस्तमिते कुण्डे मनुभानुदशांगुलाः ।
विस्तारोत्सेधतो ज्ञेया मेखला सर्वतो बुधैः । ७४
होतुरग्रे योनिरासामुपर्यश्वत्थपत्रवत् ।
मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां कुण्डानौ योनिरोरिता ।७५
षट्चतुर्ह्यङ्गुलायामविस्तारोन्नतिशालिनी ।
एकांगुल त योन्यग्रे कुयोदीषदधोमुखम् ।७६
एककांगुलतो योनि कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् ।
यवद्वयक्रमेणैव योन्यग्रमापे वर्द्धयेत् ।७७
आठ हाथ में परिमित कुन्ड में भानु पंक्ति आठअंगुल वाली मेखला
होती है। और दश हाथ परिमित कुन्ड के होने पर मेखला मनु-भानु
दश अंगुल वाली होनी चाहिये । बुधों के द्वारा मेखला सब प्रकार-से
विस्तार और उत्सेध अर्थात् ऊँचाई से जाननी चाहिए ।७३-७४। होता
के आगे इनकी योनि होती है जो पीपल के पत्र के ही समान
हुआ करती है। मुष्टि-अरत्नी एक हाथ वाले कुन्डों की योनि कही गयी
है ।७५। छै और चार अंगुलों के आयास विस्तार से उन्नति शालिनी
होती है-योनि को अधो मुख अन्य एक अंगुल करे ।७६। अन्य कुन्डों
में एक अंगुल से योनि को बढ़ा देना चाहिये । अन्योंमें दो यवों के मान
से ही योनि के अग्रभाग को बढ़ावे ।७७।
स्थलादारभ्य नालं स्याद्योन्या मध्ये सरन्ध्रकम् ।
नार्पयेत्कुण्डकोणेषु योनिं तां तन्त्रवित्तमः ।७८
६४ ] [ श्रीशारदा तिलक
कुण्डानां कल्पयेदन्तर्नाभिमम्बुजसन्निभाम् ।
तत्तत्कुण्डानुरूपं वा मानमस्य निगद्यते ।७६
मुष्ट्यरत्न्येकहस्तानां नाभिरुत्सेधतारतः ।
द्वित्रिवेडाङ्गुलोपेताः कुण्डेष्वन्येषु वर्द्धयेत् ।८०
यवद्वयक्रमेणैव नाभि पृथगुदारधीः ।
योनिकुन्डे योनिमब्जकुन्डे नाभि विवर्जयेत् ।८१
नाभिक्षेत्रं त्रिधा भित्वा मध्यो कुर्वीत कर्णिकाम् ।
वहिरंशयेनाष्टौ पत्राणि परिकल्पयेत् ।८२
योनि के मध्य में रन्ध्र के सहित स्थलसे आरम्भ करके नाल होना
चाहिए । तन्त्र शास्त्र का ज्ञाता विद्वान् उस योनि को कुण्ड के कोणोंमें
अर्पित न करे ।७८। कुण्डों के आदर अम्बुज के सदृश नाभि की कल्पना
करनी चाहिए । इस नाभि का परित्याग उस कुण्ड के ही अनुरूप
कहा जाया करता है ।७९। मुष्टि-रत्नी और एक हाथ वाले कुण्डों
की नाभि उत्सेधतार से होती है जो दो-तीन और चार अंगुलोंसे उपेत
हैं । अन्य कुण्डों में बढ़ा देवे ।८०। उदार बुद्धि वाले को चाहिए कि
दो यवों के क्रम से ही नाभि को पृथक् बनाये । जो योनि कुण्डहों और
जो अब्ज कुण्ड होवे वहाँ पर योनि और नाभि को वर्जित कर देना
चाहिए ।८१। नाभि के क्षेत्र को तीन भागों में भेदन करके मध्य में
कर्णिका करे । वाहिर दो अंश से आठ पत्रों की कल्पना करे ।८२।
मुष्टिमात्रमितं कुण्डं शतार्द्ध संप्रचक्षते ।
शतहोमेऽरत्निमात्रं हस्तमात्रं सहस्रके ।८३
द्विहस्तमयुते लक्षे चतुर्हस्तमुदीरितम् ।
दशलक्षे तु षड्ढस्तं कोटयमष्टकरं स्मृतम् ।८४
एकहस्तमितं कुण्डमेकलक्षे विधीयते ।
लक्षाणां दशकं यावत्तावद्धस्तेन वर्धयेत् ।८५
दशहस्तमितं कुण्डं कोटिहोमे (१) ऽपिशस्यते ।
सर्वसिद्धिंकर कुण्डं चतुरस्रमुदाहृतम् ।८६
तृतीय पटल ] [ ६५
पुत्रप्रदं योनिकुण्डमर्द्धेन्द्राभं शुभप्रदम् ।
शत्रुक्षयकरं त्र्यस्रं वर्त्तुलं शान्तिकर्मणि ।८७
एक मुष्टि मात्र परिमाण वाला कुण्ड अर्धशत का प्रसिद्ध है । जो
शतहोम है । वहाँ पर कुण्डअरत्निमात्र होना चाहिये ओर सहस्र आहु-
तियों के लिये एक हाथ परिमाणं का कुण्ड होता है ।८३। दश हजार
आहुतियों के लिये दो हाथ का कुण्डऔर एक लाख में चार हाथों के
प्रमाण वाला कुण्ड होना चाहिये । दश लाख आहुतियाँ जहाँ पर होवें
वहाँ पर छै हाथ का और एक करोड़ आहुतियों के लिये आठ हाथ का
कुण्ड होना चाहिये ।८४। हाथ परिमाण का कुण्ड एक लाख के
लिये किया जाता है । जहाँ तक दश लाख है वहाँ पर उतने ही
हाथ बढ़ा देना चाहिये ।८५। दश हाथ परिमाण वाला कुण्ड एक करोड़
के होम में भी अशस्त माना जाया करता है । सब प्रकार की सिद्धियों
के करने वाला कुण्डचतुरस्र ( चौकोर ) ही उदाहृत किया गया है ।८६।
योनि-कुण्डपुत्र का प्रदान करने वाला होता है ओर अर्धचन्द्र की आभा
वाला कुण्ड शुभप्रद होता है । त्र्यस्र शत्रुओं के क्षय का करने वाला
है ओर जो कुण्ड वर्त्तुल होता उसको शान्ति कर्म में प्रयुक्त करना
चाहिये ।७८।
छेदमारणयोः कुण्डं षडस्रं पद्मसंन्निभम् ।
वृष्टिदं रोगशमनं कुण्डमष्टास्रमीरितम् । ८८
विप्राणां चतुरस्रं स्याद्राज्ञां वर्त्तुलमिष्यते ।
वैश्यानामर्द्धचन्द्राभं शूद्राणां त्र्यस्तमीरितम् ।८६
चतुरस्रं तु सर्वेषां केचिदिच्छन्ति (२) देशिकाः ।
कुण्ड (१) रूपं तु जानीयात्वा रमं प्रकृतेर्वपुः ।६०
प्राच्यां शिरः समाख्यातं बाहू दक्षिणसौम्ययोः ।
उदरं कुण्डमित्युक्तं योनिः (२) पश्चिमतर्भवेत् ।६१
नित्यं नैमित्तकं होमं (३) स्थण्डिले वा समाचरेत् ।
हस्तमात्रेण तत्कुर्याद्वालुकाभिः सुशोभनम् ।६२
६६ ] [ श्रीशारदा तिलक
अंगुलोत्सेधसंयुक्तं चतुरस्रं समं ततः ।
एवं प्रोक्तानि कथ्यन्ते स्रुक्स्रुवौ ततः ।६३
छेदन और मारण कर्मों में कूण्ड षडस्र पद्म के तुल्य होता है ।
अष्टास्र कुण्ड शान्ति के प्रदान करने वाला और रोगों का शयन करने
वाला होता है ऐसा कहा गया है ।८८। विप्रों का कुण्ड चतुरस्र और
क्षत्रियों का कुण्ड वर्त्तुल अर्थात् गोलाकार हुआ करता है । वैश्यों का
कुण्ड आधे चन्द्रमा के आकार के तुल्य तथा शूद्रों का कुण्ड त्र्यस्र हुआ
करता है ।८६। कुछ आचार्यों का मत है कि सबका कुण्ड चतुरस्र ही
होता है । कुण्ड का रूप प्रकृति का ही परम रूप कहा जाता है ।६०।
इसका शिर प्राची में अर्थात् पूर्व दिशा में कहा गया है तथा इसकी
बाहू दक्षिण और सौम्य दिशाओ में होती है। उदर कुण्ड है तथा योनि
पश्चिम की ओर होता है ।६१। नित्य और नैमित्तिक होम का समाच-
रण स्थन्डिल में करना चाहिये । उसने एक हाथ भर का वालुकाओं से
ही परम शोभन बनाना चाहिए ।६२। यह अंगुल के उत्सेधसे युक्त और
फिर समचतुरस्र बनावे । इस प्रकार से कुण्ड बतलाये गये हैं । इसके
उपरान्त स्रूक् और स्रूव कहे जाते ।६३।
प्रकल्पयेत्स्रूचं यागे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना।
श्रीपर्णीशिशपाक्षीरशाखिष्वेकमयं गुरुः ।६४
गृहीत्वा विभजेद्धस्तमात्रं षट्त्रिंशता पुनः ।
विंशत्यंशैर्भवेद्दण्डो वेदी तैरष्टभिर्भवेत् ।५६
एकांशेन मितः काण्ठः सप्तभागमितं मुखम् ।
वेदिद्व्यंशेन विस्तारः कण्ठस्य परिकीर्तितः ।६६
अग्रं कण्ठसमानं स्यान्मुखे मार्गं प्रकल्पयेत् ।
कनिष्ठांगुलिमानेन सर्पिषो निर्गमाय च ।६७
वेदिमध्ये विधातव्या भागेनैकेन कर्णिका ।
विदधीत वहिस्तस्या एकांशेनाभितोऽवटम् ।६८
तृतीय पटल ] [ ६७
याग में स्रुवको आगे बतलाये जाने वाले मार्गसे ही कल्पित करना
चाहिये। गुरु को चाहिये कि शिशपा-श्रीपर्णी और दूध वाले वृक्षों का
एक भाग ग्रहण करके उसको एक हाथ प्रमाण वाला भाग विभक्त
करे। फिर छत्तीस विभाजन करे। बीस अंश से दण्ड होता है उन
आठों से वेदी होतो है ।६४-६५। एक अंश से मित कण्ठ होता है और
सात भागों से मित मुख होता है। कण्ठ का विस्तार वेदी के तीन अंश
से कहा गया है।६३। अग्रभाग कण्ठ के समान होता है और मुख में
मार्ग की कल्पना करनी चाहिये। कनिष्ठिका अंगुलि के मान से घृत के
निर्गम के लिये वेदी के मध्य में एक भाग से कणिका की रचना करनी
चाहिये। उसके बाहिर एक अंश से दोनों ओर अवट बनावे ।६७-६८।
तस्य खातं त्रिभिर्भागैर्वृत्तं र्द्धांशतो भवेत् ।
अंशेनैकेन परितो दलानि परिकल्पयेत् ।६६
मेखला मुखवेत्रोःस्यात्परितोऽर्द्धाशमानतः ।
दण्डमूलाग्रयोः कुम्भौ गुणवेदांगुलै क्रमात् ।१००
गण्डीयुगं यमांशः स्याद्दण्डस्य नाह ईरितः ।
षड्भिरंशैः पृष्ठभागो वेद्याः कूर्माकृतिर्भवेत् ।१०१
उसका खात (गर्त) तीन भागों से और अध अंश से वृत होता
है। एक अंश से सब ओर दलों की परिकल्पना करनी चाहिये ।
।६६। चारों ओर अर्धांश मान से मुख वेदियो की मेखला होती है ।
क्रम से दण्ड के मूलाग्रो में गुण वेदांगुलो से दो कुम्भ बनावे । यमांश
गन्डी युग होता है यह दण्डका आनाह कहा गया है । छै अंशों से वेदी
का पृष्ठ भाग कूर्मकी आकृति वाला हुआ करता है ।१००-१०१।
हंसस्य वा हस्तिनो वा पोत्रिणो वा मुखं लिखेत् ।
मुखष्य पृष्ठभागेऽस्थाः संप्रोक्त लक्षणं स्रुचः ।१०२
स्रुक्चतुर्विंशतिभिर्भागैरारचयेत्स्रुवम् ।
शंविंशत्या दण्डमानमंशैरेतस्य कीर्तितम् ।१०३