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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी १९१
जहां शंभु विराजते हैं और उनके वाम अंग में चिति शक्ति शोभाय-
मान है । प्रयाण समय आज्ञा चक्र में लेजाकर प्राणों का त्याग
करने वाले योगी को शिवजी तारक मंत्र का उपदेश दे कर उसे
निज लोक प्रदान करते हैं, जो स्वयं प्रकाशमान है और जहां अग्नि
सूर्य और चन्द्र की गति नहीं ।
निरालोके लोके:—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेवभान्तमनुभातिसर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति ॥ (मु.२,२,१०)
मूलाधार स्वाधिष्ठान दोनों अग्नि मंडल के अन्तर्गत हैं, मणिपूर
अनाहत सूर्य मण्डल के अन्तर्गत और विशुद्ध आज्ञा चन्द्र मण्डल
के अन्तर्गत, आज्ञा से ऊपर सहस्रार में जो सदा पूर्ण ज्योति का
परम स्थान है, तीनों से ऊपर है । वहां जाकर साधक जन्म मरण के
आतंक से छूट जाता है ।
१४ श्लोकोक्त ६४ किरणें आधी परशंभु की और आधी
परचिति की किरणें जाननी चाहियें ।
विशुद्धचक्र
( ३७ )
विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोःकान्त्यायान्त्या शशिकिरण सारूप्य सरणि (णेः)
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥

२०० सौंदर्य लहरी
अर्थ:—तेरे विशुद्ध चक्र में आकाशतत्त्व के जनक, शुद्ध
स्फटिकवत् स्वच्छ शिव की और शिव के समान सुव्यवसित्
देवी की भी, मैं सेवा करता हूं। जिन दोनों की चन्द्रमा की
किरणों के सदृश कान्ति से जगत्, जिसका अन्तरन्धकार नष्ट
हो गया है, चकोरी की तरह आनन्दित होता है,

विशुद्ध चक्र में कुण्डलिनी शक्ति सोती है, वह योगियों
को मोक्षदायिनी होती है।

सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति ।
शांडिल्योपनिषत् (१.३७)

विशुद्ध चक्र आकाश तत्त्व का स्थान है, जिसके अधिष्ठातृ
देव सदाशिव हैं। आकाश तत्त्व के उपादान होने के कारण
उनको व्योमेश्वर और भगवती को व्योमेश्वरी कहते हैं। आकाश
के कारण स्वरूप चिदम्बर सदाशिव शुद्ध स्फटिक सदृश
कान्तिमान हैं। श्रुति का वचन है कि

सत्यंज्ञानमनन्तंब्रम्ह यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रम्हणा विपश्चितेति ।
एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः,
अग्नेरापः, उद्भ्य. पृथिवी। तै०ब्राम्हानन्दवल्ली प्रथमोऽनुवाकः।

सौन्दर्य लहरी २०१
──────────────────────────────────────────────
अर्थः— ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनन्त है,
जो उसको गुहा में निहित परमाकाशवत् जानता है वह ब्रह्म ज्ञान
सहित सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। इस आत्मा से आकाश
उत्पन्न होता है. आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और
जल से पृथिवी उत्पन्न होती है।
श्लोक १४ में बताई गई ७२ मयूखायें आधी २ व्योमेश्वर
और व्योमेश्वरी की समझनी चाहिये। बहुधा आकाश का अर्थ
अवकाश अथवा अभावात्मक शून्य किया जाता है। परन्तु अभाव से
भावात्मक वायु की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, इसलिये आकाश
को एक भावात्मक तत्व मानना पड़ेगा। पाश्चात्य भौतिक विज्ञानवादी
भी आकाश के स्थान पर एक तत्व की सत्ता मानते हैं जिस के माध्यम
द्वारा प्रकाश, उष्णता, विद्युत् और चुंबक ( magnetic rays )
की किरणें प्रसारित होती हैं। यह बात आधुनिक रेडियो विज्ञान
के अविष्कार से सर्व साधारण के सामने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध है।
उक्त किरणों का माध्यम भौतिक आकाश कहा जा सकता है।
भौतिक वायु की उत्पत्ति उससे किस प्रकार होती है, यह अभी
भौतिक विज्ञान नहीं समझ सका है। वायु को जमाकर गरमी
निकाली जा सकती है, जैसे भाप को जल के रूप में जमाने से
उष्णता निकाली जाती है, उसे वायुगत गुप्त तेज ( latent heat )
कहते हैं। और जल को बरफ के रूप में जमाने में भी उष्णता
खेंचनी पडती हैं। उसे जल का गुप्त तेज ( latent heat )
कहते हैं। भौतिक विज्ञान ने भिन्न २ तत्वों के गुप्त तेज का
कैलोरियों ( calories ) में नाप भी किया हुआ है। जब बरफ को

२०२ सौंदर्य लहरी
तपाया जाता है तब जब तक सब वरफ नहीं पिघलती जल का ताप-
मान वरफवत् ही रहता है। श्रुति का भी वचन है कि 'आपो वा
अर्कस्तद्यदपां शर आसीत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्
तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ।' (वृ. १, २, २)
अर्थ:—जल सूर्य ही है, जो जल रूपी शर अर्थात् किरण थीं,
उनको उसने छोडा, वे पृथिवी बन गईं। उस परिश्रम से श्रान्त
और सन्तप्त उसका जो तेज रूपी रस निकला वह अग्नि थी।
यह पूर्व श्लोक के नीचे कहा जा चुका है कि सारा भौतिक
जगत् परमात्मा की सत् शक्ति का परिणाम है और उसपर चमकने
वाली चैतन्य सत्ता उसकी चित् शक्ति की छाया है। इस प्रकार
सारा चेतन अचेतन विश्व का उपादान कारण सच्चिदेकं ब्रह्म ही है।
हृदय कमल
( ३८ )
समुन्मीलत्संवित्कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति
र्यदादत्ते दोषाद्गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥
अर्थ:—हृद्देश में विकसित संवित् कमल से निकलने वाले
मकरन्द के एकमात्र रसिक उस किसी (अद्भुत) हंसों के जोडे का
मैं भजन करता हूं, जो महान् पुरुषों के मन रूपी मानसरोवर में

सौंदर्य लहरी २०३
विहार करता है, जिसका वार्तालाप का परिणाम १८ विद्याओं
की व्याख्या है, और जो दोषों से समस्तगुण को इस प्रकार
निकाल लेता है जैसे जलमिश्रित दूध से सब दूध को हंस
निकाल लेता है ।
संवित् का अर्थ ज्ञान है । १२ अरों का अनाहत् चक्र जो
संवित् कमल सुषुम्ना में स्थित है, उससे यह अष्टदल पद्म पृथक
है । इसका स्थान वक्षस् में है ।
अरुणाचल के विख्यात रमणमहर्षि की श्रीरमण गीता में इस
कमल का स्थान दक्षिण भाग में होना बताया गया है । रमणगीता
के तत्संबंधी श्लोक हम नीचे उद्धृत करते हैं ।
अहंवृत्तिः समस्तानां वृत्तीनां मूलमुच्यते ।
निर्गच्छति यतोऽहंधीर्हृदयं तत्समासतः ॥ (५, ४)
हृदस्य यदि स्थानं भवेच्चक्रमनाहतं ।
मूलाधारं समारभ्य योगस्योपक्रमः कुतः ॥ (५, ३)
अन्यदेव ततो रक्तपिण्डाद्धृदयमुच्यते
अहंहृदितिवृत्या तदात्मनो रूपमीरितम् ॥ (५, ५)
तस्य दक्षिणतो धाम हृत्पीठे नैव वामतः ।
तस्मात्प्रवहति ज्योतिः सहस्रारं सुषुम्नया ॥ (५, ६)
अर्थः—सब वृत्तियों का मूल अहम्-वृत्ति है, और जिस
स्थान पर अहम्-बुद्धि का उदय होता है, वह हृदय है । यदि हृदय

२०४ सौन्दर्य लहरी
का स्थान अनाहत् चक्र माना जाय, तो मूलाधार से आरम्भ होने
वाले योग का उपक्रम कहां रहता है (अर्थात् नहीं रहता)। इसलिये
हृदय उससे अन्य है, और वह रक्त पिण्ड से भी अन्य है। अयं हृद् इस
वाक्य से आत्मा का स्वरूप कहा गया है। (देखें छांदोग्योपनिषद्
(८, ३, ३), हृद्+अयम्=हृदयं, यहां 'अयम्' पद आत्मा के लिये
प्रयुक्त किया गया है)। उसका स्थान दक्षिण की ओर है, वाम ओर
नहीं। उस स्थान से ज्योति का प्रवाह उठ कर सुषुम्ना में जाकर
सहस्रार में जाता है।
अहंसंवित् अर्थात् अहंवृत्ति का ज्ञान जिस स्थान से उदय होता
हुआ अनुभव में आवे वह ही हृदय का स्थान जानना चाहिये ।
वह स्थान आत्मा का स्थान है, वहां पर ही मन का स्फुरण होता है
और वहां पर ही परमात्मा विराजते हैं। इस स्थान पर 'हंसः' मन्त्र
का जप किया जाता है।
हंसोपनिषद् में हंस का ध्यान इस प्रकार किया जाना कहा
गया है कि
हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् । अग्निषोमौ पक्षौ, ॐ कारः
शिरो विन्दुस्तुनेत्रं मुखो रुद्रो रुद्राणि चरणौ वाहूकालश्चाग्निश्च ...
एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशः ।
अर्थः— हृदय में अष्ट दल पद्म पर आत्मा स्वरूप हंस का
ध्यान करना चाहिये । अग्नि और चन्द्र उसके दो पंख हैं, ॐ कार
शिर, विन्दु नेत्र, मुख रुद्र, चरण रुद्राणी, अग्नि और काल बाहू । ऐसा

सौन्दर्य लहरी २०५
यह परम हंस कोटि सूर्य के प्रकाश से युक्त है। हंसः इस मंत्र का एक
कोटि जप करने से यह कमल खिलता है। हं और सः दोनों को हंस
और हंसिनी का जोडा कहते हैं। हं पुमान् है और सः शक्ति
का रूप है। प्रत्येक दल के क्रम से आठों दलों पर उसके बैठने का
फल इस प्रकार है। पूर्व पर पुण्य मति, आग्नेय कोण पर निद्रा आलस्य,
दक्षिण पर क्रूर बुद्धि, नैर्ऋत्, पर पाप बुद्धि, पश्चिम पर क्रीडा की
इच्छा, वायव्य कोण पर यात्रा की इच्छा, उत्तर पर रति इच्छा और
ईशान कोण पर धनेच्छा, मध्य में वैराग्य, केशर पर जाग्रत, कर्णिका
में स्वप्न, सूक्ष्म में सुषुप्ति और पद्म का त्याग कर के ऊपर उडने पर
तुरीया समाधि की अवस्था होती है।
हंस का जोडा जब वार्तालाप करता है, तब योगियों को १८
विद्याएं आ जाती हैं, मानो दोनों की वार्ता का विषय उनकी
व्याख्या स्वरूप होती है। १८ विद्याओं के नाम ये हैं:— शिक्षा,
कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द, चार वेद, दोनों मीमांसा
दर्शन, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्व विद्या
और नीति शास्त्र। चारों वेदों की चार विद्याओं में और दोनों
मीमांसा दर्शनों की एक विद्या में गणना करनी चाहिये।
गौडपादाचार्य रचित सुभगोदय के भाष्य में श्री भगवत्पाद ने
हंसके जोडे का रूप एक दीप शिखा के सदृश बताया है। उसके
दक्षिण और वाम भाग ही हंसेश्वर और हंसेश्वरी हैं। हंसेश्वर को शिखी
और हंसेश्वरी को शिखिनी भी कहते हैं उनका ध्यान हृदय पद्म के
मध्य में करना चाहिये।

२०६ सौन्दर्य लहरी
नारायणोपनिषद् में भी हृद्देश में दीपशिखा का ध्यान करने
का उपदेश मिलता है। उसका वर्णन इस प्रकार है:—
तस्य मध्ये (हृदयस्य) वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता
नीलतोयदमध्यस्थाद्विद्युल्लेखेवभास्वरा, नीवारशूकवत्तन्वी
पीता भास्वत्यणूपमा। तस्याः शिखायामध्ये परमात्मा
व्यवस्थितः, सब्रह्मा, सशिवः, सहरिः, सेन्द्रः सोऽक्षरः
परमःस्वराट् (ना० खण्ड १२)
अर्थ:—उस हृदय कमल के मध्य में अग्नि की छोटीसी
शिखा है। नीलवर्ण के मेघों में चमकने वाली विद्युत् रेखा के सदृश
पीले रंग की धान्य के तिनके के अग्रभाग जैसी पतली होती है।
उस शिखा के मध्य में परमात्मा रहते हैं, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि,
इन्द्र और अक्षर परब्रह्म है। विद्युत् प्रकाश में दिखने वाले श्याम
मेघ सदृश रंग हंसेश्वर का और पीत वर्ण हंसेश्वरी का समझना
चाहिये। वैष्णव सम्प्रदाय में पीतवर्णा श्रीजी और श्यामवर्ण भगवान्
का हृदय में ध्यान इसी आधार पर बताया जाता है। १४ श्लोकोक्त
५४ वायव्य किरणें आधी हंसेश्वर की और आधी हंसेश्वरी की हैं।
बृहदारण्यकोपनिषद् में भी इसका वर्णन मिलता है, वह
इस प्रकार है:—
मनोमयोयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहि-
र्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं
प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ (५, ६, १)

सौंदर्य लहरी २०७
अर्थः— यह मनोमय पुरुष प्रकाशमान सत्य स्वरूप है,
वह अन्तर्हृदय में धान अथवा जौ के सदृश चमकता है। वह सब
का ईश्वर, सबका अधिपति इस जगत में जो कुछ है सब पर शासन
करता है ।
छान्दोग्योपनिषद् के अष्टम अध्याय में जो दहर विद्या का
वर्णन है वह भी इस संवित् कमल में ही अहं संवित् के ध्यान पूर्वक
ज्योति दर्शन द्वारा ब्रह्म प्राप्ति की विद्या है ।
स्वाधिष्ठान चक्र
( ३९ )
तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महतिक्रोधकलिते
⁕दयार्द्राया दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥
⁕पाठान्तर—दयार्द्रामिर्दृग्भिः
अर्थः—हे जननि ! तेरे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्त्व को
अधिष्ठान (प्रभाव) में रखने के लिये जो संवर्ताग्नि रहता है,
उसकी और उस महती समया देवी की मैं स्तुति करता हूं,
जिस समय संवर्ताग्नि बडी क्रोध भरी दृष्टि से लोकों को जलाने
लगता है, उस समय समया देवी की दयार्द्र दृष्टि शीतल उपचार
करती है ।

२०८ सौंदर्य लहरी
स्वाधिष्ठान=स्व+अधि+स्थान, कुण्डलिनी शक्ति का जागने के
पश्चात् सुषुम्ना के भीतर रहने का अपना स्थान ।
संवर्ताग्नि=अच्छी तरह से वर्तमान रहने वाला अग्नि । प्रलयाग्नि
को संवर्ताग्नि कहते हैं । यह रुद्र का रूप है ।
समया देवी=समयाचार की देवी ।
कुण्डलिनी शक्ति के जागने का फल समाधि है । कुण्डलिनी
महायोग का एक अंग लययोग भी है और षट् चक्र वेध द्वारा तत्वों
का वेध पूर्वक प्रतिप्रसवक्रम भी एक अंग है । प्रतिप्रसवक्रम प्रसव के
उलट क्रम को कहते हैं । अर्थात् योगी प्रतिप्रसवक्रम का आश्रय लेकर
ही षट् चक्र वेध करता है और पंच महाभूतों पर जय प्राप्त करता
है । प्रलय के समय भी संवर्ताग्नि पृथिवी को जल में, जल को तेज
में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में लीन करता हुआ,
सब तत्वों को प्रकृति लीन कर देता है ।
सृष्टिक्रम में शक्ति प्रभवाभिमुख होकर फिर विविध रचना
करने लगती है, मानो वह देवी दयार्द्रदृष्टि से संवर्ताग्नि को शान्त
करके लोकानुग्रह करती है । वास्तव में सृष्टि स्थिति और संहार की
त्रिधा शक्ति निरंतर अणु २ में कार्य करती रहती है, परन्तु योगी
क षट्चक्र वेध के समय लयक्रम प्रधान रहता है इसलिये कहा गया
है कि स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्व का संयम पूर्वक प्रयोग होकर
पृथिवी और जल दोनों का वेध मूलाधार में होता है और अग्नि का
वेध मणिपूर में होता है । जैसा श्लोक ९ में समझाया जा चुका है ।
यदि यह लयक्रम तीव्र हो तो शरीर के नष्ट होने की सम्भावना

सौंदर्य लहरी २०९
हो सकती है; परन्तु ऐसा होता नहीं, शरीर ही तो दोनों मोक्ष का
और भोग का साधन है। जब तक जीवन मुक्ति की दशा की
प्राप्ति नहीं होती, शरीर की रक्षा करना परम कर्तव्य है। इसलिये
षट्चक्रवेध द्वारा लयक्रम और शरीर का पुनः निर्माण एवं संगठन अथवा
जीर्णोद्धार रूपी सृष्टि स्थिति क्रम भी युगपद् चलता रहता है।
इसी अभिप्राय से संवर्ताग्नि की संहार क्रिया को संयम में रखने के
लिये समयादेवी अपनी दयार्द्र दृष्टि से शीतल उपचार करती रहती है।
अनाहत् चक्र के नीचे नाभिस्थान में मणिपूर, और उसके नीचे
उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, और गुदा के पास मूलाधार की स्थिति
है। दोनों के बीच में योनि स्थान है, जो अग्नि की पीठ मानी
जाती है। योनिस्थान का संबंध स्वाधिष्ठान से भी है, इसलिये अग्नि
को स्वाधिष्ठान चक्र में रहने वाला कहा गया है। श्लोक ९ की
पद रचना, इस दृष्टिकोण को सामने रख कर, समझनी चाहिये।
यह कहा जा चुका है:—'महींमूलाधारे कमपि, मणिपूरे हुतवहं स्थितं
स्वाधिष्ठाने, इत्यादि भित्वा....। अर्थात् मूलाधार में पृथिवी और
जल को भी, और मणिपूर में अग्नि को, जो स्वाधिष्ठान में स्थित है,
बेध करके इत्यादि'। उस श्लोक में तत्वों के वेध का स्थान एवं क्रम
बताया गया है, और उनकी स्थिति के लिये केवल अग्नि तत्त्व के
स्थान का संकेत है, अन्य तत्वों के स्थान का नहीं, क्योंकि
अन्य तत्वों के स्थान और उनके वेध के स्थान एक ही हैं। केवल
स्वाधिष्ठान चक्र में जल और अग्नि दोनोंका संधि स्थान है। इसलिये
वायु के पश्चात् अग्नि का वर्णन करने के लिये पहिले उसकी स्थिति
के स्थान स्वाधिष्ठान का और फिर वेध के स्थान मणिपूर का अगले

२१० सौंदर्य लहरी
श्लोक में वर्णन किया गया है। जल तत्व का मूलाधार में बेध होकर वह
मणिपूर रूपी अन्तरिक्ष में मेघों के रूप में प्रकट होता है और मेघों
की सहायता से अग्नि का बेध होकर वह विद्युताग्नि में परिणत हो
जाती है। जिसका सुन्दर वर्णन अगले श्लोक में है।
स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि शिव स्वरूप है और समयादेवी जल
की शिवात्मिका शक्ति, और मणिपूर में मेघेश्वर पर्जन्य जल की
शिवात्मिका शक्ति है और सौदामिनी अग्नि की शक्त्यात्मिका
शक्ति। इसलिये स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि की ३१ और समयादेवी
की २६, और मणिपूर में मेघेश्वर की २६ और सौदामिनी की
३१ किरणें माननी चाहिये । परन्तु स्वाधिष्ठान में जल की ५२
किरणों का स्थान है और मणिपूर में अग्नि की ६२ किरणों का,
परन्तु दोनों का संक्रमण होने से विपरीतता दृष्टिगोचर होती है।
ब्रह्माण्ड और पिण्ड में शक्ति का अनुभव आधि भौतिक,
विभिन्न स्तरों पर आधि दैविक और आधित्यात्मिक दृष्टि से तीन
शक्ति के प्रकार का किया जाता है। सारा विश्व किसी
विभिन्न रूप शक्ति के आधार पर कार्य कर रहा है उस शक्ति
का हम अनुभव, ताप, शब्द, प्रकाश, चुम्बक,
और विद्युत् के रूप में सदा देखते हैं और उनकी सहायता से अनेक
कार्य करते हैं। परन्तु विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये
सब रूप किसी एक ही शक्ति के परिणाम है। शक्ति का यह रूप
अधि भौतिक ( physical ) कहलाता है। दूसरा रूप हम अपने
शरीर में अनुभव करते हैं, जो देह, इन्द्रियों और मन बुद्धि में काम
करता है। उसे हम अध्यात्म रूप कहते हैं। परन्तु अध्यात्म शक्तियां

सौंदर्य लहरी २११
बाह्य शक्तियों की अपेक्षा रखती हैं, जैसे दृष्टि सूर्य की, रसना जल
की इत्यादि। इस संबंध को अधि दैव कहते हैं। इसलिये प्रत्येक
इन्द्रिय का पृथक् २ अधिदेवता है। उनके नाम ये हैं अहंकार का
रुद्र, चित्त का क्षेत्रज्ञ, बुद्धि का ब्रह्मा, मन का चन्द्रमा, श्रवण का
आकाश, स्पर्श का वायु, दृष्टि का सूर्य, रसनेन्द्रिय का वरुण, गन्ध
का पृथिवी, वाणी का सरस्वती, हाथों का इन्द्र, पैरों का सर्वाधार
विष्णु, मैथुन का प्रजापति और मल त्याग का यमराज मृत्यु।
अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय में उक्त देवताओं की शक्तियां कार्य करती
हैं, जो उनका ब्रह्माण्ड से संबंध जोडती हैं। प्राण का सूर्य, अपान
का पृथिवी, समान का आकाश, व्यान का वायु और उदान का
अग्नि अधिदेव हैं। पृथिवी की आकर्षण शक्ति ( gravitation )
को ही अपान शक्ति कहा जाता है, उसका संबंध विष्णु और मृत्यु
दोनों से है, इसलिये उसे मर्त्य लोक भी कहते हैं। कहा है—
'पृथिवि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।' ऊपर उठाने
वाली शक्ति उसकी प्रति पक्षी शक्ति उदान है, उसका संबंध अग्नि
से है। अग्नि की ज्वालायं ऊपर उठती हैं, वायु तप्त होकर ऊपर
उठता है, इसी तरह मृत्यु के पश्चात् उदान ही जीव को कर्मानुसार
अन्य लोकों को ले जाता है।
जिस प्रकार बाह्य शक्तियों का एक आधार शेष नाग माना जाता
है, उसी प्रकार अभ्यन्तर शक्तियों का आधार कुण्डलिनी शक्ति
मानी जाती है। परन्तु सब शक्तियों का, जिनमें शेष नाग और
कुण्डलिनी रूपी आधार भी सम्मिलित है, उदय और अस्त पद
परमात्मा ही है। इसलिये परमात्मा की अपेक्षा से सब शक्तियों के

२१२ सौन्दर्य लहरी
रूप अनित्य हैं, परन्तु आधार आधेय की अपेक्षा से आधार को
अचल कहते हैं। इसलिये कुण्डलिनी का प्रसुप्त रूप भी
अचल समझना चाहिये । कुछ लोगों की धारणा है कि कुण्डलिनी
जागकर सब सुषुम्ना में प्रवेश कर जाती है। परन्तु यह धारणा
गलत है, वह अपने आधार स्थान पर स्थिर स्थिति में नित्य रहकर
भी सुषुम्ना में शक्ति का संचार करती रहती है। और सुषुम्ना में भी
स्वाधिष्ठान चक्र पर जागृत अवस्था में नित्य रहती है, जैसे के चक्र
के नाम से स्पष्ट है, परन्तु इस चक्र पर उसका रूप पिण्डात्मक
होता है। कहा है
पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः ।
रूपं विन्दुरितिख्यातं रूपातीतस्तु चिन्मयः ॥
अर्थः— कुण्डलिनी, हंस, विन्दु, और चिति शक्ति सब
एक ही शक्ति के रूप हैं। पिण्ड रूपा कुण्डलिनी, त्राण पद*
स्वरूपा हंस, रूपात्मिका विन्दु और रूपातीता चिति शक्ति है।
प्रसुप्त कुण्डलिनी का स्थान आधार चक्र के नीचे, और जाग्रत
कुण्डलिनी का स्थान स्वाधिष्ठान में है। हंस रूपा हृदय चक्र में
रहती है। विन्दु के विषय में अन्यत्र लिखा जाना है, और चिति
शक्ति का स्थान सहस्रार है। विशुद्ध चक्र में शक्ति का विशुद्ध
स्वरूप रहता है। यद्यपि इन केन्द्रों पर जगाने के पश्चात् शक्ति सदा
रहती है परन्तु उनके विकास की तारतम्यता में अन्तर होता रहता है।

सौंदर्य लहरी २१३
ऊपर कहा जा चुका है कि ग्रंथियां तीन हैं-ब्रह्मग्रंथि, विष्णु-
ग्रंथि त्रय और ग्रंथि और रुद्रग्रंथि। ग्रंथि गांठ को कहते हैं।
अध्यास दो भिन्न वस्तुओं को जोड़ने या बांधने के
लिये गांठ से काम लिया जाता है और प्रायः
एक ही वस्तु में विकार आ जाने पर उलझनों की ग्रंथियां पड जाया
करती हैं। जैसे केशों अथवा धागों में। अध्यात्म ग्रंथि के स्वरूप
का वर्णन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी ने इन शब्दों में किया है—
जड चेतन की ग्रंथि पड गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
अर्थात् जड प्रकृति और चेतन आत्मा की गांठ पड गई है,
यद्यपि वह झूठी है, तौ भी बडी कठिनता से खोली जा सकती है।
आत्मा शुद्ध चेतन स्वरूप निर्विकारी है और देह इंद्रियों और
मनबुद्धि का संघात प्रकृति के विकार हैं, दोनों में गठबंधन होना
असंभव है, परन्तु दोनों का भिन्न-भिन्न स्तरों पर ऐसा तादात्म्य
दिखता है कि उनके पृथक होने का ज्ञान अति दुर्लभ हो रहा है।
जैसे देह के अभिमान से आत्मा अपने को देह के धर्मवाला
समझता है। दार्शनिक परिभाषा में इस मिथ्या प्रतीति को अध्यास,
विपर्यय ज्ञान अथवा ख्याति कहते हैं।
श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने अध्यास शब्द को इस प्रकार
समझाया है। आत्मा अहं अथवा अस्मत् पद है, और प्रकृति युष्मत्
पद है। पहिला विषयी है और दूसरा विषय दोनों प्रकाश और
तमवत् विरूद्ध स्वभाव वाले हैं परन्तु दोनों एक दूसरे के भाव को

२१४ सौंदर्य लहरी


प्राप्त हो जाते हैं, अर्थात् चिदात्मक आत्मा विषयी में युष्मत् प्रत्यय
की प्रतीति गोचर विषय और उसके धर्मों का भाव और इसके विपरीत
विषय और विषय के धर्मों में विषयी का और उसके धर्मों का आभास
दिखने लगता है। इस इतरेतर अध्यारोपण के मिथ्या ज्ञान को
अध्यास कहते हैं। यह स्मृतिरूप होता है और पूर्व दृष्ट अर्थात्
पहिले देखे हुए किसी पदार्थ के अन्यत्र अवभास द्वारा उत्पन्न हुआ
करता है। पूर्व मिमांसा वाले इसे अख्याति, वैशेषिक और नैयायिक
इसे अन्यथा ख्याति, शून्यवादी असत् ख्याति, बौद्ध लोग आत्म-
ख्याति, सांख्यवादी सद्सत् ख्याति और वेदान्तवादी उसे
अनिर्वचनीय ख्याति कहते हैं। परन्तु इस सिद्धांत में सब एक मत
हैं कि यह एक वस्तु का अन्यत्र मिथ्या अवभास मात्र है। उक्त
मिथ्या अवभास की निवृत्ति को और आत्म तत्व के शुद्धचेतन
ब्रह्म स्वरूप ज्ञान को ज्ञान कहते हैं। आत्मा में देहाध्यास अथवा
देह में आत्माध्यास की निवृत्ति स्वरूप ही जडचेतन की ग्रंथि का
छुड़ाना है, जिसका सुन्दर निरूपण श्रीगोस्वामीजी ने ज्ञान दीपक
में किया है। अध्यात्माध्यास प्रकृति के तीन गुणों के योग से तीन
स्तरों पर प्रतीत होता है, सत्वगुण के योग से उत्पन्न हुए अध्यास
को विष्णुग्रंथि, रजोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को ब्रह्म ग्रंथि
और तमोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को रुद्र ग्रंथि कहते हैं।
इसलिये स्थूल देहाध्यास को रुद्रग्रंथि, इंद्रियजनित अध्यास को
ब्रह्मग्रंथि और अन्तःकरण के योग से उत्पन्न अध्यास को विष्णुग्रंथि

कहते हैं। ब्रह्मग्रंथि का स्थान मूलाधार में, विष्णुग्रंथि का स्थान
हृदय में और रुद्रग्रंथि का स्थान आज्ञाचक्र में समझना चाहिये।
ललितासहस्रनाम में ग्रंथित्रय के स्थानों का वर्णन इस प्रकार है:—
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी ॥ ८९
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासारामिवर्षिणी ॥ ९०
भूतजय होने पर रुद्रग्रंथि का, इंद्रिय जय होने पर ब्रह्मग्रंथि का
और मनोजय होने पर विष्णुग्रंथि का बेध जानना चाहिये। भूतजय
होने पर मधुमतीका भूमिका का उदय होता है और इंद्रिय एवं
मनोजय होने पर मधुप्रतीका भूमिका का। इनसे पूर्व कुण्डलिनी
जागरणोपरान्त रजतमोमिश्रित सत्व गुण की भूमिका का नाम प्रारम्भ
कल्पिका और ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होनेपर शुद्धसत्व गुण प्रधान
भूमिका का नाम मधुमती भूमिका है। देखें योगदर्शन विभूतिपाद
सूत्र (५१) पर व्यास भाष्य और श्लोक १८ पृष्ठ (१३०)।
संवर्ताग्नि प्रलयाग्नि को कहते हैं, उसे पाताल स्थित कालाग्नि
भी कहते हैं। शंकर भगवत्पाद ने निम्न चक्रों में
[पार्श्व टिप्पणी: विद्यु त्रय / पंचाग्नि विद्या / और ब्रह्मचर्य] स्थित अग्नि को जो लयाभिमुख होकर सब तत्वों
को अपने २ कारण में लीन करता है, संवर्ताग्नि
कहा है। क्योंकि केवल तीन ही अग्नियों का
यहां वर्णन है, अर्थात स्वाधिष्ठानस्थ संवर्त अग्नि, मणिपूरस्थ विद्युताग्नि

२१६ सौन्दर्य लहरी
और हृदय में सूर्य अग्नि। वास्तव में ५ अग्नि जानना चाहिये।
इस विषय पर योग शिखोपनिषत् में पांच ही अग्नियों का ध्यान
बताया गया है। वह इस प्रकार है:—
स्थूलं सूक्ष्मं परंचेति त्रिविधं ब्रह्मणो वपुः।
स्थूलं शुक्रात्मकं विन्दुः सूक्ष्मं पञ्चाग्निरूपकम् ॥ (५,२८)
सोमात्मकः परः प्रोक्तः सदासाक्षी सदाच्युतः॥
अर्थ:— ब्रह्म का शरीर त्रिविध है — स्थूल, सूक्ष्म और
पर। शुक्र (वीर्य) स्थूल रूप है, पञ्चाग्नि सूक्ष्म रूप है और सोम
पर रूप है, जो अच्युत सदा साक्षी है। स्थूल विन्दु से पंचाग्नि का
संबंध प्रथम ग्रंथि है, पंचाग्नि से पर विन्दु का संबंध दूसरी ग्रंथि
है और पर विन्दु से आत्मा का संबंध तीसरी ग्रंथि है।
आगे पंचाग्नियों का वर्णन करते हैं:—
पातालानामधो भागे कालाग्निर्यः प्रतिष्ठितः ॥ (५,२९)
मूलाग्निः शरीरेऽग्निर्यस्मान्नादः प्रजायते।
वडवाग्नि शर्गरस्थो स्वाधिष्ठाने प्रवर्तते ॥ (५,३०)
काष्ठपाषाणयोर्वन्हिर्हास्थमध्ये प्रवर्तते।
काष्ठपाषाणजो वन्हिः पार्थिवो ग्रहणंगतः ॥ (५,३१)
अन्तरिक्षगतो वन्हिर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः।
नभःस्थः सूर्य रूपोऽग्नि र्नाभिमण्डलमाश्रितः ॥ (५,३२)
विषं वर्षति सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधोमुखः (५,३३)

सौंदर्य लहरी २१७
भ्रूमध्य निलयो बिन्दुः शुद्ध स्फटिक संनिभः ।
महा विष्णोश्च देवस्य तत्सूक्ष्मं रूपमुच्यते ॥ (५. ३४)
एतत्पंचाग्निरूपं यो भावयेद्बुद्धिमान् धियः ।
तेन भुक्तंच पीतंच हुतमेव न संशयः ॥ (५. ३५)
अर्थः— पातालों के अधोभाग में जो कालाग्नि रहता है,
वह शरीर में मूलाधार का अग्नि है, जिससे नाद उत्पन्न होता है ।
स्वाधिष्ठान में वडवाग्नि रहता है । काष्ठ पाषाण का जो अग्नि है वह
अस्थियों में रहता है, उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं । अन्तरिक्ष में जाकर
अर्थात् मणिपूर में वह ही स्वान्तरात्मा स्वरूप विद्युत् अग्नि है ।
आकाशस्थ अग्नि सूर्य है वह नाभि (सूर्य) मण्डल में आश्रित है ।
यह सूर्य विष की वर्षा करता रहता है परन्तु उन्मुख होकर अमृत
का स्राव करता है । विन्दु भ्रूमध्य में लीन होकर शुद्ध स्फटिक
सदृश हो जाता है, जो महा विष्णु देव का सूक्ष्म रूप कहलाता है ।
इस प्रकार पंचाग्नि का जो बुद्धिमान ध्यान करता है, उसका खाया-
पीया हुआ आहुति के तुल्य है, इसमें सन्देह नहीं ।
छान्दोग्य उपनिषद् के पांचवे अध्याय के खण्ड ३ से नवम
खण्ड तक जिस पंचाग्नि विद्या का वर्णन मिलता है, उसीका
यहां लय क्रम बताया गया है । छान्दोग्य कथित पंचाग्नि विद्या की
गाथा इस प्रकार है । अरुणि के पुत्र श्वेतकेतु से पांचाल देश के
राजा प्रवाहण जैबलि ने ५ प्रश्न किये, परन्तु वह एक का भी उत्तर
न दे सका, तब उसने अपने पिता से पूछा, परन्तु वह भी नहीं
जानता था । इसलिये अरुणि अपने पुत्र को साथ लेकर राजा के

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पास गया और उससे उन प्रश्नों का उत्तर जानने की जिज्ञासा की ।
राजा ने कहा यह पंचाग्नि विद्या कहलाती है । वे प्रश्न इस
प्रकार हैं:-क्या तुम जानते हो कि सब जीव मरकर यहां से जाते हैं,
क्या तुम जानते हो कि फिर यहां लौटकर आते हैं, क्या पितृयान
और देवयान दोनों मार्गों को जानते हो, क्या जानते हो कि क्यों
यह लोक कभी नहीं भरता, अर्थात् इस अवागमन का चक्र कभी
बन्द क्यों नहीं होता, और क्या यह भी जानते हो कि पांचवीं
आहुति में जल से यह देह कैसे बनता है ? इन प्रश्नों को पूछने का
राजा का अभिप्राय स्पष्ट है कि जो मनुष्य प्रभव क्रम को जानता है,
वह ही आवागमन से छूटने के लिये देवयान मार्ग का द्वार खोलते
समय, इसका प्रतिकार स्वरूप प्रति प्रसव क्रम भी जानने का यत्न
करेगा, नहीं तो आवागमन का चक्र कभी बन्द नहीं होता ।
राजा न जो प्रभव क्रम बताया वह इस प्रकार है:—
(१) द्युलोक प्रथम अग्नि है, जिसमें सूर्य रूपी ईंधन जल रहा
है, उसमें देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, और उससे
सोम उत्पन्न होता है ।
(२) पर्जन्य दूसरी अग्नि है, उसमें सोम की आहुति दी जाती
है और वर्षा उत्पन्न होती है ।
(३) पृथिवी तीसरी अग्नि है, उसमें वर्षा की आहुति दी
जाती है और अन्न उत्पन्न होता है ।
(४) मनुष्य का देह चौथी अग्नि है, उसमें अन्न की आहुति
दी जाती है और शुक्र उत्पन्न होता है ।