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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 415 में से

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पृष्ठ 264

२१४ सौंदर्य लहरी


प्राप्त हो जाते हैं, अर्थात् चिदात्मक आत्मा विषयी में युष्मत् प्रत्यय
की प्रतीति गोचर विषय और उसके धर्मों का भाव और इसके विपरीत
विषय और विषय के धर्मों में विषयी का और उसके धर्मों का आभास
दिखने लगता है। इस इतरेतर अध्यारोपण के मिथ्या ज्ञान को
अध्यास कहते हैं। यह स्मृतिरूप होता है और पूर्व दृष्ट अर्थात्
पहिले देखे हुए किसी पदार्थ के अन्यत्र अवभास द्वारा उत्पन्न हुआ
करता है। पूर्व मिमांसा वाले इसे अख्याति, वैशेषिक और नैयायिक
इसे अन्यथा ख्याति, शून्यवादी असत् ख्याति, बौद्ध लोग आत्म-
ख्याति, सांख्यवादी सद्सत् ख्याति और वेदान्तवादी उसे
अनिर्वचनीय ख्याति कहते हैं। परन्तु इस सिद्धांत में सब एक मत
हैं कि यह एक वस्तु का अन्यत्र मिथ्या अवभास मात्र है। उक्त
मिथ्या अवभास की निवृत्ति को और आत्म तत्व के शुद्धचेतन
ब्रह्म स्वरूप ज्ञान को ज्ञान कहते हैं। आत्मा में देहाध्यास अथवा
देह में आत्माध्यास की निवृत्ति स्वरूप ही जडचेतन की ग्रंथि का
छुड़ाना है, जिसका सुन्दर निरूपण श्रीगोस्वामीजी ने ज्ञान दीपक
में किया है। अध्यात्माध्यास प्रकृति के तीन गुणों के योग से तीन
स्तरों पर प्रतीत होता है, सत्वगुण के योग से उत्पन्न हुए अध्यास
को विष्णुग्रंथि, रजोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को ब्रह्म ग्रंथि
और तमोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को रुद्र ग्रंथि कहते हैं।
इसलिये स्थूल देहाध्यास को रुद्रग्रंथि, इंद्रियजनित अध्यास को
ब्रह्मग्रंथि और अन्तःकरण के योग से उत्पन्न अध्यास को विष्णुग्रंथि