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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

२०० सौंदर्य लहरी
अर्थ:—तेरे विशुद्ध चक्र में आकाशतत्त्व के जनक, शुद्ध
स्फटिकवत् स्वच्छ शिव की और शिव के समान सुव्यवसित्
देवी की भी, मैं सेवा करता हूं। जिन दोनों की चन्द्रमा की
किरणों के सदृश कान्ति से जगत्, जिसका अन्तरन्धकार नष्ट
हो गया है, चकोरी की तरह आनन्दित होता है,

विशुद्ध चक्र में कुण्डलिनी शक्ति सोती है, वह योगियों
को मोक्षदायिनी होती है।

सा कुण्डलिनी कण्ठोर्ध्वभागे सुप्ता चेद्योगिनां मुक्तये भवति ।
शांडिल्योपनिषत् (१.३७)

विशुद्ध चक्र आकाश तत्त्व का स्थान है, जिसके अधिष्ठातृ
देव सदाशिव हैं। आकाश तत्त्व के उपादान होने के कारण
उनको व्योमेश्वर और भगवती को व्योमेश्वरी कहते हैं। आकाश
के कारण स्वरूप चिदम्बर सदाशिव शुद्ध स्फटिक सदृश
कान्तिमान हैं। श्रुति का वचन है कि

सत्यंज्ञानमनन्तंब्रम्ह यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रम्हणा विपश्चितेति ।
एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः,
अग्नेरापः, उद्भ्य. पृथिवी। तै०ब्राम्हानन्दवल्ली प्रथमोऽनुवाकः।