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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 415 में से

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पृष्ठ 254

२०४ सौन्दर्य लहरी
का स्थान अनाहत् चक्र माना जाय, तो मूलाधार से आरम्भ होने
वाले योग का उपक्रम कहां रहता है (अर्थात् नहीं रहता)। इसलिये
हृदय उससे अन्य है, और वह रक्त पिण्ड से भी अन्य है। अयं हृद् इस
वाक्य से आत्मा का स्वरूप कहा गया है। (देखें छांदोग्योपनिषद्
(८, ३, ३), हृद्+अयम्=हृदयं, यहां 'अयम्' पद आत्मा के लिये
प्रयुक्त किया गया है)। उसका स्थान दक्षिण की ओर है, वाम ओर
नहीं। उस स्थान से ज्योति का प्रवाह उठ कर सुषुम्ना में जाकर
सहस्रार में जाता है।
अहंसंवित् अर्थात् अहंवृत्ति का ज्ञान जिस स्थान से उदय होता
हुआ अनुभव में आवे वह ही हृदय का स्थान जानना चाहिये ।
वह स्थान आत्मा का स्थान है, वहां पर ही मन का स्फुरण होता है
और वहां पर ही परमात्मा विराजते हैं। इस स्थान पर 'हंसः' मन्त्र
का जप किया जाता है।
हंसोपनिषद् में हंस का ध्यान इस प्रकार किया जाना कहा
गया है कि
हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् । अग्निषोमौ पक्षौ, ॐ कारः
शिरो विन्दुस्तुनेत्रं मुखो रुद्रो रुद्राणि चरणौ वाहूकालश्चाग्निश्च ...
एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशः ।
अर्थः— हृदय में अष्ट दल पद्म पर आत्मा स्वरूप हंस का
ध्यान करना चाहिये । अग्नि और चन्द्र उसके दो पंख हैं, ॐ कार
शिर, विन्दु नेत्र, मुख रुद्र, चरण रुद्राणी, अग्नि और काल बाहू । ऐसा