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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 415 में से

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पृष्ठ 251

सौन्दर्य लहरी २०१
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अर्थः— ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनन्त है,
जो उसको गुहा में निहित परमाकाशवत् जानता है वह ब्रह्म ज्ञान
सहित सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। इस आत्मा से आकाश
उत्पन्न होता है. आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और
जल से पृथिवी उत्पन्न होती है।
श्लोक १४ में बताई गई ७२ मयूखायें आधी २ व्योमेश्वर
और व्योमेश्वरी की समझनी चाहिये। बहुधा आकाश का अर्थ
अवकाश अथवा अभावात्मक शून्य किया जाता है। परन्तु अभाव से
भावात्मक वायु की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, इसलिये आकाश
को एक भावात्मक तत्व मानना पड़ेगा। पाश्चात्य भौतिक विज्ञानवादी
भी आकाश के स्थान पर एक तत्व की सत्ता मानते हैं जिस के माध्यम
द्वारा प्रकाश, उष्णता, विद्युत् और चुंबक ( magnetic rays )
की किरणें प्रसारित होती हैं। यह बात आधुनिक रेडियो विज्ञान
के अविष्कार से सर्व साधारण के सामने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध है।
उक्त किरणों का माध्यम भौतिक आकाश कहा जा सकता है।
भौतिक वायु की उत्पत्ति उससे किस प्रकार होती है, यह अभी
भौतिक विज्ञान नहीं समझ सका है। वायु को जमाकर गरमी
निकाली जा सकती है, जैसे भाप को जल के रूप में जमाने से
उष्णता निकाली जाती है, उसे वायुगत गुप्त तेज ( latent heat )
कहते हैं। और जल को बरफ के रूप में जमाने में भी उष्णता
खेंचनी पडती हैं। उसे जल का गुप्त तेज ( latent heat )
कहते हैं। भौतिक विज्ञान ने भिन्न २ तत्वों के गुप्त तेज का
कैलोरियों ( calories ) में नाप भी किया हुआ है। जब बरफ को