सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी २०७
अर्थः— यह मनोमय पुरुष प्रकाशमान सत्य स्वरूप है,
वह अन्तर्हृदय में धान अथवा जौ के सदृश चमकता है। वह सब
का ईश्वर, सबका अधिपति इस जगत में जो कुछ है सब पर शासन
करता है ।
छान्दोग्योपनिषद् के अष्टम अध्याय में जो दहर विद्या का
वर्णन है वह भी इस संवित् कमल में ही अहं संवित् के ध्यान पूर्वक
ज्योति दर्शन द्वारा ब्रह्म प्राप्ति की विद्या है ।
स्वाधिष्ठान चक्र
( ३९ )
तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महतिक्रोधकलिते
⁕दयार्द्राया दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥
⁕पाठान्तर—दयार्द्रामिर्दृग्भिः
अर्थः—हे जननि ! तेरे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्त्व को
अधिष्ठान (प्रभाव) में रखने के लिये जो संवर्ताग्नि रहता है,
उसकी और उस महती समया देवी की मैं स्तुति करता हूं,
जिस समय संवर्ताग्नि बडी क्रोध भरी दृष्टि से लोकों को जलाने
लगता है, उस समय समया देवी की दयार्द्र दृष्टि शीतल उपचार
करती है ।