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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 415 में से

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पृष्ठ 262

२१२ सौन्दर्य लहरी
रूप अनित्य हैं, परन्तु आधार आधेय की अपेक्षा से आधार को
अचल कहते हैं। इसलिये कुण्डलिनी का प्रसुप्त रूप भी
अचल समझना चाहिये । कुछ लोगों की धारणा है कि कुण्डलिनी
जागकर सब सुषुम्ना में प्रवेश कर जाती है। परन्तु यह धारणा
गलत है, वह अपने आधार स्थान पर स्थिर स्थिति में नित्य रहकर
भी सुषुम्ना में शक्ति का संचार करती रहती है। और सुषुम्ना में भी
स्वाधिष्ठान चक्र पर जागृत अवस्था में नित्य रहती है, जैसे के चक्र
के नाम से स्पष्ट है, परन्तु इस चक्र पर उसका रूप पिण्डात्मक
होता है। कहा है
पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः ।
रूपं विन्दुरितिख्यातं रूपातीतस्तु चिन्मयः ॥
अर्थः— कुण्डलिनी, हंस, विन्दु, और चिति शक्ति सब
एक ही शक्ति के रूप हैं। पिण्ड रूपा कुण्डलिनी, त्राण पद*
स्वरूपा हंस, रूपात्मिका विन्दु और रूपातीता चिति शक्ति है।
प्रसुप्त कुण्डलिनी का स्थान आधार चक्र के नीचे, और जाग्रत
कुण्डलिनी का स्थान स्वाधिष्ठान में है। हंस रूपा हृदय चक्र में
रहती है। विन्दु के विषय में अन्यत्र लिखा जाना है, और चिति
शक्ति का स्थान सहस्रार है। विशुद्ध चक्र में शक्ति का विशुद्ध
स्वरूप रहता है। यद्यपि इन केन्द्रों पर जगाने के पश्चात् शक्ति सदा
रहती है परन्तु उनके विकास की तारतम्यता में अन्तर होता रहता है।