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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 415 में से

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पृष्ठ 263

सौंदर्य लहरी २१३
ऊपर कहा जा चुका है कि ग्रंथियां तीन हैं-ब्रह्मग्रंथि, विष्णु-
ग्रंथि त्रय और ग्रंथि और रुद्रग्रंथि। ग्रंथि गांठ को कहते हैं।
अध्यास दो भिन्न वस्तुओं को जोड़ने या बांधने के
लिये गांठ से काम लिया जाता है और प्रायः
एक ही वस्तु में विकार आ जाने पर उलझनों की ग्रंथियां पड जाया
करती हैं। जैसे केशों अथवा धागों में। अध्यात्म ग्रंथि के स्वरूप
का वर्णन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी ने इन शब्दों में किया है—
जड चेतन की ग्रंथि पड गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
अर्थात् जड प्रकृति और चेतन आत्मा की गांठ पड गई है,
यद्यपि वह झूठी है, तौ भी बडी कठिनता से खोली जा सकती है।
आत्मा शुद्ध चेतन स्वरूप निर्विकारी है और देह इंद्रियों और
मनबुद्धि का संघात प्रकृति के विकार हैं, दोनों में गठबंधन होना
असंभव है, परन्तु दोनों का भिन्न-भिन्न स्तरों पर ऐसा तादात्म्य
दिखता है कि उनके पृथक होने का ज्ञान अति दुर्लभ हो रहा है।
जैसे देह के अभिमान से आत्मा अपने को देह के धर्मवाला
समझता है। दार्शनिक परिभाषा में इस मिथ्या प्रतीति को अध्यास,
विपर्यय ज्ञान अथवा ख्याति कहते हैं।
श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने अध्यास शब्द को इस प्रकार
समझाया है। आत्मा अहं अथवा अस्मत् पद है, और प्रकृति युष्मत्
पद है। पहिला विषयी है और दूसरा विषय दोनों प्रकाश और
तमवत् विरूद्ध स्वभाव वाले हैं परन्तु दोनों एक दूसरे के भाव को