सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १९१
जहां शंभु विराजते हैं और उनके वाम अंग में चिति शक्ति शोभाय-
मान है । प्रयाण समय आज्ञा चक्र में लेजाकर प्राणों का त्याग
करने वाले योगी को शिवजी तारक मंत्र का उपदेश दे कर उसे
निज लोक प्रदान करते हैं, जो स्वयं प्रकाशमान है और जहां अग्नि
सूर्य और चन्द्र की गति नहीं ।
निरालोके लोके:—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेवभान्तमनुभातिसर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति ॥ (मु.२,२,१०)
मूलाधार स्वाधिष्ठान दोनों अग्नि मंडल के अन्तर्गत हैं, मणिपूर
अनाहत सूर्य मण्डल के अन्तर्गत और विशुद्ध आज्ञा चन्द्र मण्डल
के अन्तर्गत, आज्ञा से ऊपर सहस्रार में जो सदा पूर्ण ज्योति का
परम स्थान है, तीनों से ऊपर है । वहां जाकर साधक जन्म मरण के
आतंक से छूट जाता है ।
१४ श्लोकोक्त ६४ किरणें आधी परशंभु की और आधी
परचिति की किरणें जाननी चाहियें ।
विशुद्धचक्र
( ३७ )
विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोःकान्त्यायान्त्या शशिकिरण सारूप्य सरणि (णेः)
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥