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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 415 में से

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पृष्ठ 255

सौन्दर्य लहरी २०५
यह परम हंस कोटि सूर्य के प्रकाश से युक्त है। हंसः इस मंत्र का एक
कोटि जप करने से यह कमल खिलता है। हं और सः दोनों को हंस
और हंसिनी का जोडा कहते हैं। हं पुमान् है और सः शक्ति
का रूप है। प्रत्येक दल के क्रम से आठों दलों पर उसके बैठने का
फल इस प्रकार है। पूर्व पर पुण्य मति, आग्नेय कोण पर निद्रा आलस्य,
दक्षिण पर क्रूर बुद्धि, नैर्ऋत्, पर पाप बुद्धि, पश्चिम पर क्रीडा की
इच्छा, वायव्य कोण पर यात्रा की इच्छा, उत्तर पर रति इच्छा और
ईशान कोण पर धनेच्छा, मध्य में वैराग्य, केशर पर जाग्रत, कर्णिका
में स्वप्न, सूक्ष्म में सुषुप्ति और पद्म का त्याग कर के ऊपर उडने पर
तुरीया समाधि की अवस्था होती है।
हंस का जोडा जब वार्तालाप करता है, तब योगियों को १८
विद्याएं आ जाती हैं, मानो दोनों की वार्ता का विषय उनकी
व्याख्या स्वरूप होती है। १८ विद्याओं के नाम ये हैं:— शिक्षा,
कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द, चार वेद, दोनों मीमांसा
दर्शन, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्व विद्या
और नीति शास्त्र। चारों वेदों की चार विद्याओं में और दोनों
मीमांसा दर्शनों की एक विद्या में गणना करनी चाहिये।
गौडपादाचार्य रचित सुभगोदय के भाष्य में श्री भगवत्पाद ने
हंसके जोडे का रूप एक दीप शिखा के सदृश बताया है। उसके
दक्षिण और वाम भाग ही हंसेश्वर और हंसेश्वरी हैं। हंसेश्वर को शिखी
और हंसेश्वरी को शिखिनी भी कहते हैं उनका ध्यान हृदय पद्म के
मध्य में करना चाहिये।