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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

३२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सन्‍्त रज्जब के अनुसार—'वह सब में समान रूप से विद्यमान है। वह सदा
एक रस है। वह किसी से लिप्त नहीं है। रज्जब कहते हैं कि ऐसे जगपति की लीला
कोई विरला ही जानता है।’१
(१) करनी तथा कथनी में एकता—संतों ने व्यवहार और आदर्श के साथ
विचार और आचरण में सामंजस्य लाने पर बल दिया है। उन्होंने जो कुछ लिखा है
अपने अनुभव के आधार पर लिखा है। उन्होंने जैसा उपदेश दिया वैसा आचरण भी
किया। उनकी उक्ति तथा वृत्ति में कदाचित् ही कोई विरोध मिले। निर्गुण मत के
सभी सन्तों में इस ढंग की बात मिलती है। नामदेव ने भी करनी बिना कथनी की
आलोचना की।
'जब तक अंत करण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि से क्या लाभ ?
सांप केंचुली छोड़ता है परन्तु विष नहीं छोड़ता। पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते,
रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'२
'व्यक्ति बातें तो बहुत बढ़ा चढ़ाकर करता है किन्तु विरला ही कोई उनको
कार्यान्वित करता है।'३
'पाखंडपूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'४
कबीर ने भी "करनी बिना कथनी" की निंदा की है। उनके अनुसार जब
तक मनुष्य के वचन और कर्म में मेल नहीं होगा तब उसका सारा परिश्रम व्यर्थ है।
जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे नरक

१. सरवगो समसरि सब ठाहर काहू लिपित न होई ।
उन रज्जब जगपति की लीला, बूझै विरला कोई ॥
—संत काव्य, पृ० ३३२।
२. काहे कूं कीजै ध्यान जपना जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छोड़ै विष नहीं छाडै । उदिक में बग ध्यान माझै ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
३. कथनी वदनी सब कोई कहै।
करनी जन कोई विरला रहै।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७७।
४. पाखंड भगति राम नहीं रीझै।
बाहरि आधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव १२५

को प्राप्त होते हैं ।¹
कबीर साहब कहते हैं कि कथनी खाँड के समान मीठी है परन्तु करनी प्रत्यक्ष
जहर का घूट है। मनुष्य यदि लम्बी चौड़ी बातें करना छोड़ दे और कृति को महत्त्व
दे तो विष का अमृत बन जाय ।²
सहजावस्था की उपलब्धि होने पर अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णतः अपने कहने
में आ जाती हैं और ऐसा प्रतीत होने लगता है कि हमें स्वयं परमात्मा का ही स्पर्श
अथवा प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है।³ अब कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रह
जाता। जैसा मुख से निकलता है वैसा ही अपना दैनिक व्यवहार भी चलता है।
संत रज्जब भी करनी तथा कथनी की एकता पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि
औषधि बिना पथ्य की तथा पथ्य बिना औषधि किस काम की ? यदि नामस्मरण
और कृति में मेल न हो तो दोनों की प्रशंसा नहीं होती ।⁴
(१) भक्त की भगवान के प्रति मिलन-उत्कंठा—नामदेव के पदों में भक्त की
भगवान के प्रति मिलन की उत्कंठा की मधुर अभिव्यक्ति है। इसे वे "तालावेली"
शब्द से परिचित कराते हैं, जिसका अर्थ व्याकुलता है, ऐसी व्याकुलता जिसमें तीव्रता
है—आतुरता है। यह तालावेली उस प्रकार की है, जिस प्रकार की गाय की बछड़े के
बिना होती है और मछली की पानी के बिना होती है।⁵
१. जैसी मुखतैं नीकसै तैसी चालै नाहि।
मानिष नाहिं ते श्वान गति बाध्या जमपुर जाहिं॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३८।
२. कथनी मीठी खांडसी करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै विष तैं अमृत होय॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ २४।
३. जैसी मुखतैं नीकसै तैसी चालै चाल।
पारब्रह्म नेड़ा रहे पलमें करै निहाल॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३८।
४. औषध बिन पथ्य का करे, पथ्य बिन औषधि वादि।
यूं सुमिरन सुकृत अमिल, उभे न पावहिं दादि॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३४०।
५. मोहि लागति तालावेली॥
बछरे बिनु गाइ अकेली॥
पानीआ बिनु मीनु तलफे॥
ऐसे रामनामा बिनु बापुरो नामा॥ —पंजाबातील नामदेव, पृष्ठ १०७।

३२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने भी नामदेव के समान कान्ता भाव से अपने ' राम की कामना की
है और विरह में बिना जल की मछली के समान तड़पने की व्यथा व्यक्त की है। १
दादू तो तालाबेली की कामना भी करते हैं क्योंकि उसी से "दरसन" के रस
में मिठास आती है। २
संत रज्जब की कसक भी उसी कोटि की है। जैसे कुमुदिनी चंद्र को देखे बिना
कुम्हला जाती है वही हाल भक्त रूपी विरहिणी का है। ३
धर्मदास अपना "दरद" बुझाते हैं—"हे प्रिय ! अपनी व्यथा तुझे कैसे सुनाऊँ ?
तन तड़पता है । दिल को कुछ नहीं सुहाता । तेरे बिना मुझसे रहा नहीं जाता ।" ४
गरीबदास भी अपनी "विपत" सुनाते हैं ।५
१. जैसे जल बिन मीन तलपै ।
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलपै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६४ ।
२. तालाबेली प्यास बिन क्यो रस पीया जाय ।
बिरहा दरसन दरद सो हमको देहु खुदाई ॥
कहा करौ कैसे मिले रे तलपै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी कारण अपने पीव ॥
—संत सुधासार ।
३. विरहिण व्याकुल बेसवा निसिदिन दुखो विहाय ।
जैसे चंद कुमोदिनी बिन देखे कुम्हलाइ ॥
खिन खिन दुखिया दगधिये, विरह विथा बन पीर ।
घरी पलक में बिनसिये ज्यू मछली बिन नीर ॥
—संत सुधासार, पृष्ठ ५१६ ।
४. कहाँ बुझाय दरद पिया तोसे ।
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मोस रहत न जाय ।
—संत सुधासार—दूसरा खण्ड, पृष्ठ ८ ।
५. जब जब सुरति आवती मन में तब सब विरह अनल परजारै ।
नैननि देखौ वैन सुनौ कब यह वेदन जिय मारै ॥
सुनि री सखी यहु बिपत हमारी बिन दरसन अति बिरहा बारै ।
गरीबदास सुख तबही लेखौं जबही ज्योतिहि ज्योति निहारै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ४१० ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२७
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि नामदेव ने कबीर आदि अपने परवर्ती
संतो को किस तरह प्रभावित किया। क्योकि नामदेव की विचार-धारा और इन संतो
की विचारधारा में बहुत साम्य है। नामदेव कबीर आदि संतों से पूर्व हुए हैं। उन्होंने
उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का वर्षों प्रचार किया। अतः उन्हें निर्गुण मत का आद्य
प्रवर्तक मानने में विद्वानों को झिझक नही होनी चाहिए।

उपसंहार
निखिल ब्रह्माण्ड मानो एक बृहत् सगठन है। इस सगठन को देखकर उसके
संचालक के विषय में मन म विचार आता है। इस विश्व का सचालन अपने आप हो
रहा है अथवा उसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है ? इस सृष्टि में जो विधान पाया
जाता है वह नियम-नियन्त्रणविहीन नहीं है, उसमें एक क्रम है, सूत्रता है। इसके मूल
में एक चेतन सत्ता का हाथ दिखाई देता है। इस सर्वोपरि चेतन सत्ता अथवा नियामक
तत्त्व को ही ब्रह्म कहते है ।
महर्षि व्यास ने 'ब्रह्म सूत्र के प्रारम्भ में ही 'जन्माद्यस्य यतः' कहते हुए ब्रह्म
विषयक जिज्ञासा व्यक्त की है। आचार्य ने ब्रह्म के वास्तव स्वरूप के निर्णय के लिए
उसके 'स्वरूप' तथा 'तटस्थ' लक्षणो की कल्पना की है।
ब्रह्म के दो रूप माने गये हैं—एक सगुण तथा दूसरा निर्गुण। दोनो एक ही हैं
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं। सगुण ब्रह्म की कल्पना
उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से की गई है। पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण
है। ब्रह्म के सम्बन्ध में सभी सत कवियो ने प्राय एक सा विचार प्रकट किया है।
सत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार, अगम तथा
अगोचर कहा है ।
हिन्दी निर्गुण काव्य धारा का प्रारम्भ रूढिवादी अधविश्वास-प्रधान धार्मिक
सम्प्रदायो की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। निर्गुनिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमें
निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ
है। बुद्धिवादिता, सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचा-
रात्मकता आदि उनकी प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियां हैं। उनकी इन्ही विशेषताओ ने
उन्हें एक सूत्र में बांध रखा है। इसीलिए उनकी परम्परा अन्य भक्ति-परम्पराओ से
विलक्षण दिखाई देती है।
इस परम्परा के सर्वप्रथम हिन्दी कवि सत नामदेव हैं। नामदेव का जन्मकाल
भी एक विवादपूर्ण समस्या है। प्राप्त प्रमाणों के आधार पर २६ अक्तूवर १२७० ई०

उपसंहार ३२६
ही नामदेव की प्रामाणिक जन्मतिथि ठहरती है । नामदेव के जन्मस्थान के विषय में
भी अभी तक कोई एक धारणा नहीं बनाई जा सकी है । अधिकांश विद्वानों का रुझान
मराठवाड़ा के परभणी जिले की नरसी को नामदेव का जन्मस्थान मानने के पक्ष में
है । नामदेव के अयोनिज होने तथा उनके डाकू होने की बात का भी निराकरण किया
गया है । नाथपंथी संत विसोबा खेचर से उपदेश ग्रहण करने पर उनमें जो महान्
परिवर्तन हुआ उस पर भी प्रकाश डाला गया है । सगुणोपासक नामदेव अब निर्गुणो-
पासक हो गये ।
नामदेव के समाधि स्थान के बारे में भी विद्वान् सहमत नही है । उनकी दो
समाधियाँ बताई जाती है । एक पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर के महाद्वार पर तथा दूसरी
घोमान में । ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में डॉ० भगीरथ मिश्र का यह निष्कर्ष समी-
चीन जान पड़ता है कि उन्होंने घोमान में ही समाधि ली । नामदेव ने प्रचुर मात्रा में
मराठी में अभंगों की रचना की । उनके अभंगों की जो चार गाथाएँ मिलती है उनमें
ढाई हजार के लगभग अभंग मिलते हैं उनमेंसे छः सात

३३० नामदेव की हिन्दी कविता

उसको ओर आकर्षित हुआ। शंकराचार्य की अद्वैत भावना का भी संतों पर बहुत प्रभाव
पड़ा है।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता से संत बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने वैष्णव
धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ ठहराया। प्रेम-भक्ति
और भाव-भक्ति का उपदेश तो संतों ने अपनी रचनाओं में सर्वत्र दिया है। व्यक्तिगत
ईश्वर की भावना तथा इष्टदेव के प्रति रति की भावना इन दो वैष्णव भावनाओं का
प्रभाव संतों पर दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार निर्गुण विचारधारा अपने पूर्व प्रचलित
कई मतमतांतरों, दर्शनों और धार्मिक परंपराओं का सार रूप है।
निर्गुण भावना, गुरु-महिमा, मूर्तिपूजा तथा बाह्याडम्बर का खंडन, एकेश्वरवाद
का प्रतिपादन, कथनी तथा करनी में एकरूपता, भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता,
सत्संग की प्रधानता, हठयोग आदि निर्गुण मत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। ये पहले नामदेव
की रचनाओं में प्राप्त होती हैं और बाद में कबीर आदि परवर्ती संतों की रचनाओं में।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नामदेव के पश्चात् हिंदी संत काव्य की जो प्रवृत्तियाँ
हैं वे सब नामदेव की हिन्दी रचनाओं में पहले से ही मिलती हैं।
सभी भारतीय दर्शनों ने यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म का साक्षात्कार करने
का सबसे बड़ा उपाय आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार करना है। अतः
आत्मा का ज्ञान कराना हर एक दर्शन का लक्ष्य है।
विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांतों तथा अन्य दार्शनिक
विचारधाराओं का नामदेव पर प्रभाव है। संत नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय
के प्रभावशाली प्रचारकों में से थे। अतः उनके द्वारा वारकरी संप्रदाय के दार्शनिक
सिद्धांतों का प्रतिपादन स्वाभाविक ही है।
नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं। उनके अनुसार सभी जीवों की
उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। वह सब जीवों में समाया हुआ है। मोहिनी माया अज्ञानी जीव
को भुला-भुलाकर अपने पाश में जकड़ लेती है। माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के
नाम से प्रसिद्ध है। हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नहीं
पाते। माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया। अविद्या माया
के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है; विद्या माया जीव को
संसार के मोहजाल से छुड़ाकर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है।
व्यक्ति अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो
विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा।
भौतिक जीवन का केवल सुखोपभोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं है। संसार की
विभीषिका से आतंकित होकर नामदेव ने कहीं भी ऐसा उपदेश नहीं दिया कि इस दुख

उपसंहार ३३१
पूर्ण संसार से विमुख होकर संन्यास लिया जाय । उन्होंने ऐहिक तथा पारमार्थिक जीवन
में संतुलन बनाये रखने का परामर्श दिया है । विट्ठल के सगुण रूप की भक्ति करते हुए
उसके मूल निर्गुण स्वरूप को उनका मन यत्किंचित नहीं भूला । पंढरपुर के पांडुरंग की
मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की प्रतीक है, किसी एक
साम्प्रदायिक देवता की नही ।
संतों ने काव्य के महत्त्व को वही तक स्वीकार किया है जहाँ तक वह ब्रह्म के
स्मरण मे सहायक हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नही । उन्होंने आध्यात्मिक
जीवन की प्रगति एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । प्रतिभा,
व्युत्पन्नता तथा परिश्रम की अपेक्षा कविता के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक भावात्मकता है ।
नामदेव की कविता में स्थान-स्थान पर विरह वेदना, व्याकुलता, भावुकता तथा
भावोत्कटता के दर्शन होते हैं। उन्होंने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार
प्रतिमा का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनःस्थिति में काव्यरचना की । नामदेव परम
भावुक थे । उनके आत्मीयता से ओतप्रोत अभंगों में अनुभूति की घनता पाई जाती है ।
नामदेव की प्रेमाभक्ति तथा समाज की अभिवृत्ति में एक प्रकार का भावात्मक संतुलन
है । अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के अभंग 'पारमार्थिक भावगीत' है ।
संतो के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नही । फिर भी नामदेव के
काव्य का कला पक्ष पुष्ट है । उनके काव्य मे अनुप्रास का बाहुल्य है। उन्होंने अपनी
आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर उपयोग किया
है । उनकी उपमाओ की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत है। नामदेव
का दूसरा प्रिय अलंकार रूपक है। विभावना के भी सुन्दर तथा प्रभावशाली उदाहरण
उनके यहाँ मिलते है । नामदेव की कविता में भक्ति तथा शांत रस प्रधान है ।
विद्वानो ने ब्रजभाषा का निर्माण काल ११ वीं शताब्दी माना है । किन्तु यह
तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने १४ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही ब्रजभाषा
में पदों की रचना की है । नामदेव की भाषा मे संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग बहुत अधिक
संख्या मे हुआ है । उनकी हिंदी में कुछ प्रयोग ऐसे हैं जो रूप और अर्थ दोनों में विशिष्ट
है । कुछ विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग भी मिलता है । कई मूल हिंदी शब्दो में
मराठी का प्रत्यय जोड़ा गया है । नामदेव की भाषा में तत्सम शब्द कम हैं, तद्भव
अधिक । उनकी हिंदी में अरबी, फारसी, राजस्थानी और पजाबी के शब्द पाये जाते
हैं जो उनकी घुमक्कड़ी वृत्ति का ही परिणाम है ।
संत साहित्य से सम्बन्धित अधिकतर ग्रंथ कबीर को निर्गुण काव्य का प्रवर्तक
मानकर लिखे गये है किन्तु उनके अन्तर्गत निर्गुण साहित्य के विकास का पूरा विवेचन
मिलता है । डॉ० श्यामसुंदरदास, आचार्य शुक्ल, डॉ० गोविंद त्रिगुणायत, डॉ० राम-

३३२ नामदेव की हिन्दी कविता
कुमार वर्मा, डॉ० बड़थ्वाल आदि विद्वानों ने कबीर को सत मत का प्रवर्तक मानते हुए
भी उसका प्रारम्भ नामदेव से स्वीकार किया है। आचार्य शुक्ल, डॉ० मोहनसिंह,
आचार्य विनयमोहन शर्मा, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, डा० बड़थ्वाल, डॉ० सरनामसिंह
आदि विद्वानों की रचनाओं में इस बात का संकेत मिलता है कि नामदेव कबीर से पहले
हो गये थे और उनकी रचना निर्गुण पंथ जैसी है।
सत नामदेव के सत मत के प्रवर्तक न माने जाने के दो कारण हो सकते हैं-
(१) नामदेव की रचनाओं का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना (२) कबीर
का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव। पर्याप्त काल तक बहुतों को यह
विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना की है। जिनको उनकी हिंदी रचनाओं
का ज्ञान था वे 'गुरु ग्रन्थ साहब' में संगृहीत ६१ पदों तक ही उनको सीमित समझते
थे। परन्तु अब नई खोज से कुल मिलाकर ऐसे २५० पद प्राप्त हो चुके हैं। हिंदी जगत्
में इन पदों का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात-रहित
दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के प्रसिद्ध छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है। कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म
और देश के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको निर्भीक चित्त से कहा।
उनके इन उपदेशों से लोग प्रभावित हुए बिना न रह सके। इन तथ्यों पर विचार करने
पर स्पष्ट होता है कि नामदेव को वह प्रधानता क्यों न मिल सकी जो कबीर को मिली।
फिर भी नामदेव और कबीर के कालक्रम को कोई इनकार नहीं सकता। नामदेव का
जन्मकाल स० १२७० ई० तथा मृत्युकाल स० १३५० ई० है। कबीर का जन्मकाल स०
१३९८ ई० तथा उनका मृत्युकाल स० १५१८ ई० है। इस प्रकार नामदेव का जन्म
कबीर से १२८ वर्ष पूर्व हुआ था। इतना ही नहीं नामदेव के मृत्यु काल और कबीर के
जन्मकाल में भी ४८ वर्षों का अंतर है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि नाम-
देव का काल कबीर के काल से एक शताब्दी पूर्व था। परवर्ती सतों ने भी सथ्रद्ध
नामदेव का स्मरण किया है। उनके कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सत मत का
बीजारोपण नामदेव के द्वारा हुआ। सत नामदेव की लगाई इस बेली को कबीर ने
सींचा, विकसित और पुष्ट किया।
वास्तव में नामदेव ही मध्ययुगीन नवजागरण के प्रणेता हैं। उन्होंने सत ज्ञाने-
श्वर के साथ उत्तर भारत की यात्रा में मुसलमानों द्वारा महानाश का जो ताण्डव नृत्य
देखा उसकी प्रतिक्रिया उनके अभंगों में स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित हुई है। अतः नामदेव
को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने हिंदुओं की धार्मिक त्रुटियों को ध्यान
में रखते हुए नये युग धर्म के अनुरूप एक अत्यंत सहिष्णु, उदार तथा क्राँतिकारी समा-

उपसंहार ३३३

धान हिंदुओं के सामने रखा ।
नामदेव के समकालीन तथा परवर्ती महाराष्ट्रीय तथा उत्तर भारत के उनके
परवर्ती संतो ने बड़ी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण किया है । इससे प्रतीत होता है कि
एक संत के नाते नामदेव कितने महान् थे । नामदेव का व्यक्तित्व वास्तव में महान् था ।
उन्होने उत्तर भारत में युगानुरूप अपने क्रांतिकारी विचारो से जहाँ युगान्तर उपस्थित
किया वही हिंदी साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली के पद्य को विभिन्न राग-रागिनियो की
पदशैली भी प्रदान की । सचमुच नामदेव युग प्रवर्त्तक थे । भागवत धर्म के प्रचार तथा
प्रसार को ही अपना जीवित कार्य मानकर नामदेव अपने जीवन के अंत तक पंजाब में
रहे और संत ज्ञानेश्वर का लोकोद्धार का कार्य उन्होने अखण्ड रूप से जारी रखा ।
अपने विचार उत्तर भारत की जनता को समझाने के लिए उन्होने हिन्दी को अपनाया ।
नामदेव अपने पूर्ववर्ती नाथ सिद्धो की बानियो से प्रभावित है । उन्होने उसी
प्रकार की बातें कही है जिस प्रकार की इन नाथो तथा सिद्धो ने कही है । यह बड़े खेद
की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नही होता । जो थोड़ी बहुत
फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते
हैं । कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का
प्रेरणा-स्रोत बनी और उसका अभिन्न अंग बन गईं ।
हिंदी निर्गुण काव्य का अध्ययन और मनन करने के पश्चात् नामदेव के संबंध
में प्रमुख रूप से तीन बातें कही जा सकती है । सर्वप्रथम यह कि नामदेव का व्यक्तित्व
एक क्रांतिकारी चिंतक का व्यक्तित्व था जिसने समाज को परिस्थितियो के अनुसार
अपने को बदल कर समाज को जाग्रत किया । महाराष्ट्र को छोड़कर पंजाब में जाना,
हिंदी भाषा में काव्य रचना करना, सगुण की भावना-विह्वल भक्ति को छोडकर निर्गुण
भक्ति को अपनाना आदि उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व के लक्षण है । दूसरी बात यह कि
अन्य भाषा-भाषी होते हुए भी नामदेव ने जिस हिंदी भाषा में काव्य रचना की वह
तत्कालीन संतो या साहित्यकारो में बहु-प्रचलित नही थी । लेकिन नामदेव में भाषा की
शक्ति और उसके विकास के लक्षण को पहचानने की सामर्थ्य थी जिसके कारण उन्होने
ऐसी भाषा अपनायी जिसमें आगे तीन चार सौ वर्षों तक संत काव्य लिखा जाता रहा ।
तीसरी बात हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तन से संबंधित है । इसका उल्लेख किया जा
चुका है और इसमें कोई संदेह नहीं कि संत नामदेव ही हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तक
है । निर्गुण काव्य के संदर्भ में संत नामदेव संबंधी यही मेरे निष्कर्ष हैं ।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
हिन्दी
अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय—डॉ० दीनदयाल गुप्त
हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।
उत्तरी भारत की संत परम्परा—पं० परशुराम चतुर्वेदी
भारती भंडार, लीडर प्रेस, सं० २००८।
ऊँच ते ऊँच नामदेव समदर्शी—बाबा बलवंतराय
कबीर ग्रन्थावली—(संपादक डॉ० श्यामसुंदरदास)
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी। सं० २०११।
कबीर वचनावली—संपादक अयोध्यासिंह उपाध्याय
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी। स० १९६६
कबीर की विचार-धारा—डॉ० गोविंद त्रिगुणायत
साहित्य निकेतन कानपुर। सं० २०१४।
कबीर दर्शन—ले० डॉ० रामखेलाल 'सहायक'
हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, स० १९६२
कबीर एक विवेचन—डॉ० सरनामसिंह
कबीर साहित्य का अध्ययन—पुरुषोत्तमलाल श्रीवास्तव
कबीर—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
हिंदी ग्रंथ रत्नाकर प्रा० लि० बंबई। स० १९

7 AD

  • 1962 AD
    All published between 1937 and 1966! This bibliography is from a book published around 1967-1970!
    This completely proves beyond any shadow of a doubt that the character is ९!

Let's do a careful line-by-line transcription.

Let's check the lines in the image:
उपसंहार ३३५
Wait, is "उपसंहार" and "३३५" on the same line?
Yes, running header.
गुरु ग्रन्थ साहब (नागरी लिपि मे) -- सर्व हिंद सिक्ख मिशन
Wait, let's look at the dash after लिपि मे):
गुरु ग्रन्थ साहब (नागरी लिपि मे) -- सर्व हिंद सिक्ख मिशन
In the image: (नागरी लिपि मे)-- सर्व हिंद सिक्ख मिशन (or with a single em-dash — सर्व हिंद सिक्ख मिशन or --सर्व हिंद सिक्ख मिशन).
Let's look at other lines:
गोरखनाथ और उनका युग - डॉ० रांगेय राघव
गोरखबानी संग्रह - डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल
दादू दयाल की बानी - बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग ।
दरिया सागर - बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग ।
नाथ संप्रदाय - डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
`नाथ सिद्धों की बान

३३६ नामदेव की हिन्दी कविता
मराठी का भक्ति साहित्य—डॉ० भी० गो० देशपांडे
चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी।
मध्यकालीन धर्मसाधना—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
साहित्य भवन (प्रा०) लि० इलाहाबाद । स० १६५६ ई०
मलूकदास की बानी—वेलवेडियर प्रेस, प्रयाग
मिश्रबंधु विनोद—भाग १—मिश्रबंधु
गंगा पुस्तक माला, लखनऊ।
योग प्रवाह—डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल
रामानन्द सम्प्रदाय तथा हिंदी साहित्य पर उसका प्रभाव—
डॉ० बदरीनारायण श्रीवास्तव
हिंदी परिषद्, प्रयाग विश्वविद्यालय, स० १६५७ ई०
शिवसिंह सरोज—स्व० ठाकुर शिवसिंह सेंगर
तेजकुमार बुक डिपो लखनऊ । स० १६६६ ई०
संत नामदेव की हिंदी पदावली—संपादक : डॉ० भगीरथ मिश्र तथा
डॉ० राजनारायण मौर्य
पूना विश्वविद्यालय, पूना । स० १६६४ ई०
संत काव्य—पं० परशुराम चतुर्वेदी
किताब महल, इलाहाबाद । स० २०१७ ।
संत कबीर—डॉ० रामकुमार वर्मा
साहित्य भवन प्रा० लि० इलाहाबाद । स० १६६६ ई० ।
संत साहित्य—डॉ० प्रेमनारायण शुक्ल
ग्रंथम्, रामबाग, कानपुर
संत नामदेव और हिंदी पद साहित्य—डॉ० रामचंद्र मिश्र
शैलेन्द्र साहित्य सदन, फर्रुखाबाद (उ० प्र०) स० १६६६ ई०
संत दर्शन—डॉ० त्रिलोकीनारायण दीक्षित
संत साहित्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि—डॉ० सावित्री शुक्ल
संत साहित्य—भुवनेश्वर मिश्र
संक्षिप्त संत सुधा-सार—संपादक : वियोगी हरि
सस्ता साहित्य मण्डल, स० १६५८ ई०
हिंदी और मराठी का निर्गुण संत काव्य—डॉ० प्रभाकर माचवे
चौखंबा विद्याभवन, वाराणसी, स० १६६२ ई०

उपसंहार ३३७
सिद्ध साहित्य—डॉ० धर्मवीर भारती
किताब महल, इलाहाबाद । स० १९६८ ई०
संत वानी संग्रह—भाग २—बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद
हिंदी को मराठी संतों की देन—आचार्य विनयमोहन शर्मा
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना । स० १९५७ ई०
हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय—डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल
अवध पब्लिशिंग हाऊस, लखनऊ । सं० २००७
हिंदी संत साहित्य—डॉ० त्रिलोकीनारायण दीक्षित, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ।
हिंदी साहित्य (द्वितीय खण्ड)—संपादक । डॉ० धीरेन्द्र वर्मा
भारतीय हिंदी परिषद्, प्रयाग । स० १९५६ ई०
हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि—
डॉ० गोविंद त्रिगुणायत
साहित्य निकेतन, कानपुर, स० १९५१ ई०
हिंदी साहित्य की भूमिका—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
हिंदी ग्रन्थ रत्नाकर (प्रा०) लि० बंबई—४ । स० १९५१
हिंदी साहित्य का इतिहास—आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी । सं० २०१५ ।
हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—
डॉ० रामकुमार वर्मा, रामनारायण लाल, प्रयाग । स० १९५८ ई०
हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास (चतुर्थ भाग)—संपादक : परशुराम चतुर्वेदी
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी । स० २०२५ ।
हिंदुई साहित्य का इतिहास—गार्सां द तासी
हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास—ग्रियर्सन अनुवादक किशोरीलाल गुप्त
हिंदी साहित्य—डॉ० श्यामसुंदरदास
हिंदी काव्य धारा—राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद ।
मराठी
कवि चरित्र—जनार्दन रामचंद्र
गणपत कृष्णाजी याचा छापखाना, मुबंई, सन् १८६०
गाथा पंचक (सकल संत गाथा)—त्र्यंबक हरी आवटे
इंदिरा प्रेस, पुणे, सन् १९२४ ई०
चिद्विलास आणि भक्ति तत्त्व—डॉ० वा० ना० पंडित
जोशी आणि लोखंडे प्रकाशन, पुणे, सन् १९६६

नामदेव आध्यात्मिक चरित्र व ज्ञानदीप—ग० वि० तुलपुले
गुरुदेव रानडे आश्रम, निवाल, सन् १९५६
नामयाची अमृतवाणी—ह० भ० दोनोलिकर ह्वीनस प्रकाशन, पुणे सन् १९६६
नामदेव महाराज आणि त्याचे समकालीन सत—
लेखक व प्रकाशक जगन्नाथ रघुनाथ आजगांवकर (१९२७)
नामदेवाचो गाथा— संपादक विष्णु नरहरि जोग
चित्रशाला प्रेस, पुणे शके १८४७
नामदेवाचो आणि त्याचे कुटुम्बाचो व समकालीन साधूचे अभगाची गाथा—
तुकाराम तात्या घरत
तत्वविवेचक प्रेस, मुबई, शक १८४४
पजाबातील नामदेव—शकर पुरषोत्तम जोशी
केशव भिकाजी ढवळे, मुवई, सन् १९४०
पाँच सत कवी—डॉ० श० गो० तुलपुले, ह्वीनस प्रकाशन, पुणे सन् १९६२
भक्त विजय—महोपति,
निर्णयसागर छापाखाना, मुबई, सन् १९५०
भक लीलामृत—महोपति
गोपाल नारायण आणि कपनो, मुवई, सन् १९०

उपसंहार ३३६
संत नामदेव—डॉ० हे० वि० इनामदार, केसरी प्रकाशन, पुणे, सन् १९७०
संत वाङ्मयाची सामाजि फलश्रुति—गंगाधर बालकृष्ण सरदार
महाराष्ट्र साहित्य परिषद्, पुणे, सन् १९६२
संत वचनामृत—डॉ० रा० द० रानडे ह्वेनस प्रकाशन, पुणे, सन् १९६२
संत काव्य समालोचन—डॉ० गं० बा० ग्रामोपाध्ये
संत नामदेव—प्रा० ल० ग० जोग, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, सन् १९७०
श्री नामदेव गाथा—प्रसिद्धी संचालक, महाराष्ट्र शासन सन् १९७०
श्री संत नामदेवांची सार्थ हिन्दी पर्दे—माधव गोविंद वाटवेके
श्री नामदेव अभंग प्रकाशन समिति, पुणे, सन् १९६८
श्री महासाधु ज्ञानेश्वर महाराज यांचा काल निर्णय व संक्षिप्त चरित्र—
श्री पतिबुवा भिंगारकर
आर्यभूषण छापाखाना, पुणे, सन् १९००
श्री गुरु गोरखनाथ—रा० चिं० ढेरे
ज्ञानदेव आणि नामदेव—डॉ० शं० दा० पेंडसे
कॉन्टिनेण्टल प्रकाशन, पुणे, सन् १९६६
ज्ञानदेव व ज्ञानेश्वर—'भारद्वाज', चित्रशाला प्रेस, पुणे, सन् १९३१
अंग्रेजी
An Outline of Religious Literature of India : Farquhar
Constructive Basis for Theology : James Ten Brooke
India's Past : A. A. Macdonal
Kabir and Kabir Panth : Wescot
Kabir and the Bhakti Movement : Dr. Mohansingh
Kabir and His Followers : Dr. F. E. Kee
Mediaeval Mysticism of India : Kshiti Mohan Sen
Mysticism in Maharashtra Vol VII : Dr. R. D. Ranade
Pathway to God in Hindi Literature : Dr. R. D. Ranade
Prophets of India : Manmath Nath Gupta
Source Book of Pathway to God in Hindi Literature :
Dr. R. D. Ranade
Siddha Siddhant Paddhati and other Works of Nath Yogis :
Dr Kalyani Malik

३४० नामदेव की हिंदी कविता
The Idea of God Pringle Pattison
The Nature of the Physical World Eddington
The Descriptive Analysis of the Hindi Language of Namdev
Dr Raj Narayan Maurya
The Sikh Religion Vol VI (Oxford 1909) Macauliffe
Vaishnavism Shaivism and Other Minor Religious Systems
Dr R C Bhandarkar
Wilson Philological Lectures Prof V B Patwardhan
उर्दू
कबीर साहब मनोहरलाल जुत्शी
कबीर पथ शिवव्रतलाल
कबीर और उनकी तालीम शिवव्रतलाल
कबीर मन्सूर परमानन्द कृत उर्दू अनुवाद
संप्रदाय प्रोफेसर बी० थी० रॉय
पत्रिकाएँ
हिंदुस्तानी (प्रयाग)
सम्मेलन पत्रिका (प्रयाग)
नागरी प्रचारिणी पत्रिका (वाराणसी)
कल्याण (गोरखपुर)
माध्यम (इलाहाबाद)
वीणा (इंदौर)
परिषद निबंधावली (प्रयाग)
साहित्य संदेश (आगरा)
राष्ट्रवाणी (पूना)
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