सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

ओ३म् नमो नमः सर्वविधात्रे जगदीश्वराय।
अथ संस्कारविधिं वक्ष्यामः
ओं स॒ह ना॑ववतु। स॒ह नौ॑ भुनक्तु। स॒ह वी॒र्यं॑ करवावहै।
ते॒ज॒स्विना॒वधी॑तमस्तु॒। मा वि॑द्विषा॒वहै॑।
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
—तैत्तिरीयआरण्यके, अष्टमप्रपाठके, प्रथमानुवाके
सर्वात्मा सच्चिदानन्दो विश्वादिविश्वकृद्विभुः।
भूयात्तमां सहायो नस्सर्वेशो न्यायकृच्छुचिः॥ १॥
गर्भाद्या मृत्युपर्यन्ताः संस्काराः षोडशैव हि।
वक्ष्यन्ते तं नमस्कृत्यानन्तविद्यं परेश्वरम्॥ २॥
वेदादिशास्त्रसिद्धान्तमाध्याय परमादरात्।
आर्यैतिह्यं पुरस्कृत्य शरीरात्मविशुद्धये॥ ३॥
संस्कारैस्संस्कृतं यद्यन्मेध्यमत्र तदुच्यते।
असंस्कृतं तु यल्लोके तदमेध्यं प्रकीर्त्यते॥ ४॥
अतः संस्कारकरणे क्रियतामुद्यमो बुधैः।
शिक्षौषधिभिर्नित्यं सर्वथा सुखवर्द्धनः॥ ५॥

८
संस्कारविधिः
कृतानीह विधानानि ग्रन्थग्रन्थनतत्परैः।
वेदविज्ञानविरहैः स्वार्थिभिः परिमोहितैः ॥ ६ ॥
प्रमाणैस्तान्यनादृत्य क्रियते वेदमानतः।
जनानां सुखबोधाय संस्कारविधिरुत्तमः ॥ ७ ॥
बहुभिः सज्जनैस्सम्यङ् मानवप्रियकारकैः।
प्रवृत्तो ग्रन्थकरणे क्रमशोऽहं नियोजितः ॥ ८ ॥
दयाया आनन्दो विलसति परो ब्रह्मविदितः
सरस्वत्यस्याग्रे निवसति मुदा सत्यनिलया।
इयं ख्यातिर्यस्य प्रततसुगुणा हीशशरणाऽ-
स्त्यनेनायं ग्रन्थो रचित इति बोद्धव्यमनघाः ॥ ९ ॥
चक्षूरामाङ्कचन्द्रेऽब्दे कार्त्तिकस्यान्तिमे दले।
अमायां शनिवारेऽयं ग्रन्थारम्भः कृतो मया ॥ १० ॥
बिन्दुवेदाङ्कचन्द्रेऽब्दे शुचौ मासेऽसिते दले।
त्रयोदश्यां रवौ वारे पुनः संस्करणं कृतम् ॥ ११ ॥
०-०
सब संस्कारों के आदि में निम्नलिखित मन्त्रों के पाठ और
अर्थ द्वारा एक विद्वान् वा बुद्धिमान् पुरुष ईश्वर की स्तुति-
प्रार्थना और उपासना स्थिरचित्त होकर परमात्मा में ध्यान लगाके
करे और सब लोग उसमें ध्यान लगाकर सुनें और विचारें—

अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः
ओ३म्॒ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव।
यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व ॥ १ ॥ —यजुः० अ० ३०। मं० ३।
अर्थ—हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता, समग्र
ऐश्वर्ययुक्त, (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर!
आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि)
दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (परा सुव) दूर कर दीजिए।
(यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण-कर्म-स्वभाव और
पदार्थ है, (तत्) वह सब हमको (आ सुव) प्राप्त कीजिए ॥ १ ॥
हिर॒ण्य॒गर्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ २ ॥
—यजुः० अ० १३। मं० ४॥
अर्थ—जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने
प्रकाश करनेहारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये
हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध
(पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था,
जो (अग्रे) सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्त्तमान
था, (सः) वह (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और
(द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है। हम लोग
उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए
(हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से
(विधेम) विशेष भक्ति किया करें ॥ २ ॥
यऽआ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ऽउ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः।
यस्य॑ छा॒याऽमृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ ३ ॥
—यजुः० अ० २५। मं० १३॥

१० संस्कारविधिः
अर्थ—(यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता,
(बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा,
(यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते)
उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष
सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं,
(यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक
है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)
मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप
(देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए
(हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात्
उसी की आज्ञा-पालन करने में तत्पर रहें॥३॥
यः प्रा॒ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑।
यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पद॒ः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥४॥
—यजुः० अ० २३। मं० ३॥
अर्थ—(यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः)
अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा
से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव)
है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः)
गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम
लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे
परमात्मा की उपासना अर्थात् (हविषा) अपनी सकल उत्तम
सामग्री को उसकी आज्ञा-पालन में समर्पित करके (विधेम)
विशेष भक्ति करें॥४॥
येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ढा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाक॑ः।
योऽअ॒न्तरि॑क्षे॒ रज॑सो वि॒मान॒ः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥५॥
—यजुः० अ० ३२। मं० ६॥

ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना:
अर्थ—(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तं
(द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि क...
(येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्)
और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण
किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब
लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे
आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता
और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक
(देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए
(हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥ ५ ॥
प्र॒जाप॑ते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ ६ ॥
—ऋ० मं० १०। सू० १२१। मं० १०॥
अर्थ—हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्!
(त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि)
इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को
(न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि
हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग
(ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्)
उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिससे
(वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी
(स्याम) होवें॥ ६ ॥
स नो॑ ब॒न्धुर्जनि॑ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद् भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ दे॒वाऽअ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॑ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥ ७ ॥
—यजुः० अ० ३२। मं० १०॥
अर्थ—हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों

१० संस्कारविधिः
अर्थ—(यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता,
(बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा,
(यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते)
उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष
सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं,
(यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक
है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)
मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप
(देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए
(हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात्
उसी की आज्ञा-पालन करने में तत्पर रहें॥ ३॥
यः प्रा॒ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑।
यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पदः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ४॥
—यजुः० अ० २३। मं० ३॥
अर्थ—(यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः)
अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा
से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव)
है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः)
गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम
लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे
परमात्मा की उपासना अर्थात् (हविषा) अपनी सकल उत्तम
सामग्री को उसकी आज्ञा-पालन में समर्पित करके (विधेम)
विशेष भक्ति करें॥ ४॥
येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ढा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाकः॑।
योऽअ॒न्तरि॑क्षे रज॑सो वि॒मानः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ५॥
—यजुः० अ० ३२। मं० ६॥

ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना: ११
अर्थ—(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाववाले
(द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढा) धारण,
(येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण
और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण
किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब
लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे
आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता
और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक
(देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए
(हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥५॥
प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥६॥
—ऋ० मं० १०। सू० १२१। मं० १०॥
अर्थ—हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्!
(त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि)
इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को
(न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि
हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग
(ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्)
उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिससे
(वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी
(स्याम) होवें॥६॥
स नो॑ बन्धुर्जनि॒ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वे॒द भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ दे॒वाऽअ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॑ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥७॥
—यजुः० अ० ३२। मं० १०॥
अर्थ—हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों

१२ संस्कारविधिः
को (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक, (जनिता) सकल
जगत् का उत्पादक, (सः) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण
करनेहारा, (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि)
नाम, स्थान, जन्मों को (वेद) जानता है, और (यत्र) जिस
(तृतीये) सांसारिक सुख-दुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त, (धामन्)
मोक्षस्वरूप, धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को
(आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग (अध्यैरयन्त)
स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य,
राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उसकी भक्ति
किया करें ॥७॥
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।
यु॒यो॒ध्यु॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम ॥८॥
—यजुः० अ० ४०। मं० १६॥
अर्थ—हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के
प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर! आप
जिससे (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्)
हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के
लिए (सुपथा) अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से
(विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय)
प्राप्त कराइए और (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त
(एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिए। इस कारण
हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप
(नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें
और सर्वदा आनन्द में रहें ॥८॥
॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम् ॥

अथ स्वस्तिवाचनम्
अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्।
होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥ १ ॥
स नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सू॒पाय॒नो भ॑व।
सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑ ॥ २ ॥
—ऋ० मं० १ । सू० १ । मं० १, ९ ॥
स्व॒स्ति नो॑ मिमीताम॒श्विना॒ भग॑ः स्व॒स्ति दे॒व्य-
र्दि॑तिरन॒र्वण॑ः। स्व॒स्ति पू॒षा असु॑रो दधातु नः स्व॒स्ति
द्यावा॑पृथि॒वी सु॒चेतु॑ना ॥ ३ ॥
स्व॒स्तये॑ वा॒युमुप॑ ब्रवामहै॒ सोमं॑ स्व॒स्ति भुव॑नस्य॒
यस्पति॑ः। बृह॒स्पतिं॒ सर्व॑गणं स्व॒स्तये॑ स्व॒स्तय॑
आ॒दि॒त्यासो॑ भवन्तु नः॥ ४ ॥
विश्वे॑ दे॒वा नो॑ अ॒द्या स्व॒स्तये॑ वैश्वान॒रो वसु॑र॒ग्निः
स्व॒स्तये॑। दे॒वा अ॑वन्त्वृ॒भव॑ः स्व॒स्तये॑ स्व॒स्ति नो॑ रु॒द्रः
पा॒त्वंह॑सः ॥ ५ ॥
स्व॒स्ति मि॑त्रावरुणा स्व॒स्ति पंथ्ये रेवति। स्व॒स्ति न॒
इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ स्व॒स्ति नो॑ अदिते कृधि॥ ६ ॥
स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑ चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव।
पु॒नर्द॑द॒ताघ्न॑ता जा॒न॒ता सं ग॑मेमहि॥ ७ ॥
—ऋ० मं० ५। सू० ५१। ११-१५ ॥

१४.
संस्कारविधिः
ये दे॒वानां॑ य॒ज्ञिया॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मनो॒र्यज॑त्रा अ॒मृता॑
ऋ॒त॒ज्ञाः। ते नो॒ रास॑न्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त
स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥८॥
—ऋ० मं० ७। सू० ३५। ६५॥
येभ्यो॑ मा॒ता मधु॑मत् पिन्व॑ते॒ पयः॑ पी॒यूषं॒ द्यौरदि॑-
तिरद्रि॑बर्हाः। उ॒क्थशु॑ष्मान् वृष॒भरान्त्स्वर्ज॑स॒स्ताँ
आ॑दि॒त्याँ अनु॑ मदा स्व॒स्तये॑ ॥९॥
नृ॒चक्ष॑सो॒ अनि॑मिषन्तो॒ अर्ह॑णा बृ॒हद् दे॒वासो॑
अ॒मृ॒त॒त्वमा॑नशुः। ज्योति॑रथा॒ अहि॑माया॒ अना॑गसो
दि॒वो वर्ष्माणं॑ वसते स्व॒स्तये॑ ॥१०॥
स॒म्राजो॒ ये सु॒वृधो॑ य॒ज्ञमा॑य॒युरप॑रिह्वता॒ दधि॑रे दि॒वि
क्षय॑म्। ताँ आ वि॑वास॒ नम॑सा सु॒वृक्तिभि॑र्म॒हो
आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं स्व॒स्तये॑ ॥११॥
को वः॒ स्तोमं॑ राधति॒ यं जुजो॑षथ॒ विश्वे॑ देवासो
मनुषो॒ यति॒ ष्ठन॑। को वो॑ऽध्व॒रं तु॑विजाता॒ अरं॑ कर॒द्यो
नः॒ पर्षदत्यंहः॒ स्व॒स्तये॑ ॥१२॥
येभ्यो॒ होतां॑ प्रथ॒मामा॑ये॒जे मनुः॑ स॒मिद्धा॒ग्निर्मन॑सा
स॒प्त होतृ॑भिः। त आ॑दि॒त्या अभ॑यं॒ शर्म॑ यच्छत सु॒गा
नः॑ कर्त सु॒पथा॑ स्व॒स्तये॑ ॥१३॥
य ईशि॑रे॒ भुव॑नस्य॒ प्रचे॑तसो॒ विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तश्च
मन्त॑वः। ते नः॑ कृ॒तादकृ॑ता॒देन॑स॒स्पर्र्य॒द्या दे॑वासः
पिपृता स्व॒स्तये॑ ॥१४॥

स्वस्तिवाचनम् १५
भरे॑ष्विन्द्रं॑ सु॒हवं॑ हवामहे॒ऽहो॒मुचं॑ सु॒कृतं॑ दैव्यं॑
जन॑म्। अ॒ग्निं मित्रं वरु॑णं सा॒तये॒ भगं॒ द्यावा॑पृथि॒वी
म॒रुतः॑ स्व॒स्तये॑ ॥ १५ ॥
सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्यार्मनेहसं॑ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिं
सु॒प्रणी॑तिम्। दैवीं नावं॑ स्वरि॒त्रामना॑ग॒समस्र॑वन्ती॒मा
रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥ १६ ॥
विश्वे॑ यजत्रा॒ अधि॑ वोचतो॒तये॒ त्राय॑ध्वं नो दु॒रेवा॑या
अ॒भि॒ह्रुतः॑। स॒त्ययां॑ वो दे॒वहू॑त्या हुवेम शृण्व॒तो दे॑वा॒
अव॑से स्व॒स्तये॑ ॥ १७ ॥
अ॒पामी॑वा॒मप॒ विश्वा॒मना॑हुति॒मपारा॑तिं दु॒र्विद॑त्रा॒म-
घायु॒तः। आ॒रे दे॑वा॒ द्वेषो॑ अ॒स्मद् यु॑योतनो॒रु णः॒ शर्म॑
यच्छता स्व॒स्तये॑ ॥ १८ ॥
अ॒रि॒ष्टः स मत्तॊ॒ विश्व॒ एध॑ते॒ प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒
धर्म॑ण॒स्परि॑। यमा॑दित्यासो॒ नय॑था सु॒नी॒तिभि॒रति॒
विश्वा॑नि दु॒रिता स्व॒स्तये॑ ॥ १९ ॥
यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं शूर॑साता मरुतो हि॒ते
धने॑। प्रात॒र्यावा॑णं॒ रथ॑मिन्द्र सा॒नुसि॑मरि॒ष्यन्त॒मा
रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥ २० ॥
स्व॒स्ति नः॑ प॒थ्या॑सु॒ धन्व॑सु स्व॒स्त्य१॑प्सु वृ॒जने॑
स्व॑र्वति। स्व॒स्ति नः॑ पु॒त्रकृ॒थेषु॒ योनि॑षु स्व॒स्ति रा॒ये
म॑रुतो दधातन ॥ २१ ॥

१६ संस्कारविधिः
स्व॒स्तिरिद्धि प्रप॒थे श्रेष्ठ॒ा रेक्ण॑स्वत्य॒भि या वा॒ममेति॑ ।
सा नौ अमा॒ सो अर॑णे॒ नि पा॑तु स्वावे॒शा भ॑वतु
दे॒वगो॑पा ॥ २२ ॥
—ऋ० मं० १० । सू० ६३ । [ मं० ३-१६ ]
इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो व॑ः सवि॒ता प्रार्प॑यतु
श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्न्या॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गं
प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽअ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्ते॒नऽई॑शत॒
माघश॑ꣳसो ध्रुवाऽअ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मा-
नस्य प॒शून् पाहि॑ ॥ २३ ॥
—यजुः० अ० १ । मं० १
आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतो॒ऽदब्धा॑सो॒ऽ-
अप॑रीतास॒ऽउद्भिदः॑ । दे॒वा नो॒ यथा॒ सद॒मिद् वृ॒धेऽ-
अस॒न्नप्रायुवो रक्षि॒तारो॑ दि॒वेदि॑वे ॥ २४ ॥
दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वाना॑ꣳ रा॒तिर॒भि नो॒
नि व॑र्तताम् । दे॒वाना॑ꣳ स॒ख्यमुप॑सेदिमा व॒यं दे॒वा
न॒ऽआयुः॒ प्रति॑रन्तु जी॒वसे॑ ॥ २५ ॥
तमीशा॑नं॒ जग॑तस्त॒स्थुष॒स्पतिं॑ धियञ्जि॒न्वमव॑से
हूमहे व॒यम् । पू॒षा नो॒ यथा॒ वेद॑सा॒मस॑द्वृ॒धे र॑क्षि॒ता
पा॒युरद॑ब्धः स्व॒स्तये॑ ॥ २६ ॥
स्व॒स्ति न॒ऽइन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्व-
वे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ऽअरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒
बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥ २७ ॥

स्वस्तिवाचनम् १७
भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्य-
जत्राः। स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाꣳस॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑महि दे॒वहि॑तं॒
यदायु॑ः ॥ २८ ॥
—यजुः० २५। १४, १५, १८, १९, २१ ॥
२ ३ १ २ ३ १ २ ३ २ ३ १ २
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।
२२ २२ ३ १ २
नि होता सत्सि बर्हिषि॥ २९ ॥
१ २ ३ २ ३ २ ३ १ २ ३ २
त्वमग्ने यज्ञानाꣳ होता विश्वेषाꣳ हितः।
३ २ ३ १ २ ३ १ २
देवेभिर्मानुषे जने॥ ३० ॥
—साम० पूर्वा० प्रपा० १। मं० १, २॥
ये त्रि॒षप्ताः परि॑य॒न्ति विश्वा॑ रू॒पाणि॑ बिभ्र॑तः।
वाच॒स्पति॒र्बला॒ तेषां॑ त॒न्वो॑ऽ अ॒द्य द॑धातु मे॥ ३१॥
—अथर्व० कां० १। सू० १। मं० १॥
॥ इति स्वस्तिवाचनम् ॥

अथ शान्तिकरणम्
शं न॑ इन्द्रा॒ग्नी भ॑वता॒मवो॑भिः॒ शं न॒ इन्द्रा॒वरु॑णा रा॒तह॑व्या ।
शमिन्द्रा॒सोमा॑ सु॒विताय॒ शं योः शं न॒ इन्द्रा॑पू॒षणा॒ वाज॑सातौ ॥ १ ॥
शं नो॒ भगः॒ शमु॑ नः॒ शंसो॑ अस्तु॒ शं नः॒ पुर॑न्धिः॒ शमु॑ सन्तु रा॒यः ।
शं नः॑ स॒त्यस्य॑ सु॒यम॑स्य॒ शंसः॒ शं नो॑ अ॒र्य॒मा पु॑रु॒जा॒तो अ॑स्तु ॥ २ ॥
शं नो॑ धा॒ता शमु॑ ध॒र्ता नो॑ अस्तु॒ शं न॑ उ॒रूची भ॑वतु स्व॒धाभिः॑ ।
शं रोद॑सी बृ॒हती शं नो॒ अद्रिः॒ शं नो॑ दे॒वानां॑ सु॒हवा॑नि सन्तु ॥ ३ ॥
शं नो॑ अ॒ग्निर्ज्योति॑रनीको अस्तु॒ शं नो॑ मि॒त्रावरु॑णाव॒श्विना॒ शम् ।
शं नः॑ सु॒कृतां॑ सुकृ॒तानि॑ सन्तु॒ शं न॒ इषि॑रो अ॒भि वा॑तु॒ वातः॑ ॥ ४ ॥
शं नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी पू॒र्वहू॑तौ॒ शम॒न्तरि॑क्षं दृ॒शये॑ नो अस्तु ।
शं न॒ ओष॑धी॒र्वनि॑नो भवन्तु॒ शं नो॒ रज॑स॒स्पति॑रस्तु जि॒ष्णुः ॥ ५ ॥
शं न॒ इन्द्रो॒ वसु॑भिर्दे॒वो अ॑स्तु॒ शमा॑दि॒त्येभि॒र्वरु॑णः सु॒शंसः॑ ।
शं नो॑ रु॒द्रो रु॒द्रेभि॒र्जला॑षः॒ शं न॒स्त्वष्टा॒ ग्नाभि॑रि॒ह शृ॑णोतु ॥ ६ ॥
शं नः॒ सोमो॑ भवतु॒ ब्रह्म॒ शं नः॒ शं नो॒ ग्रावा॑णः॒ शमु॑ सन्तु य॒ज्ञाः ।
शं नः॒ स्वरू॑णां मि॒तयो॑ भवन्तु॒ शं नः॒ प्रस्वः॒॑ शम्व॑स्तु वेदिः॑ ॥ ७ ॥
शं नः॒ सूर्य॑ उरु॒चक्षा॒ उदे॑तु॒ शं न॒श्चत॑स्रः॒ प्र॒दिशो॑ भवन्तु ।
शं नः॒ पर्व॑ता ध्रु॒वयो॑ भवन्तु॒ शं नः॒ सिन्ध॑वः॒ शमु॑ स॒न्त्वापः॑ ॥ ८ ॥

शान्तिकरणम् १९
शं नो॒ अदि॑तिर्भवतु व्र॒तेभिः॒ शं नो॑ भवन्तु म॒रुतः॒ स्वर्काः॑ ।
शं नो॒ विष्णुः॒ शमु॑ पू॒षा नो॑ अस्तु॒ शं नो॑ भ॒वित्रं॒ शम्व॑स्तु
वा॒युः ॥ ९॥
शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणः॒ शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ वि॒भातीः॑ ।
शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॒ शं नः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑रस्तु
श॒म्भुः ॥ १० ॥
शं नो॑ दे॒वा वि॒श्वदे॑वा भवन्तु॒ शं सर॑स्वती स॒ह धी॒भिर॑स्तु ।
शम॒भि॒षाचः॒ शमु॑ रा॒तिषाचः॒ शं नो॑ दि॒व्याः पार्थि॑वाः॒ शं नो॒
अप्याः॑ ॥ ११ ॥
शं नः॑ स॒त्यस्य॒ पत॑यो भवन्तु॒ शं नो॒ अर्व॑न्तः॒ शमु॑ सन्तु॒ गावः॑ ।
शं न॒ ऋभवः॑ सु॒कृतः॑ सु॒हस्ताः॒ शं नो॑ भवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु ॥ १२ ॥
शं नो॑ अ॒ज एक॑पाद् दे॒वो अ॑स्तु॒ शं नोऽहिर्बु॒ध्न्यः॑ । शं संमु॒द्रः ।
शं नो॑ अ॒पां नपा॑त् पे॒रुर॑स्तु॒ शं नः॒ पृश्नि॑र्भवतु दे॒वगो॑पा ॥ १३ ॥
—ऋ० मं० ७ । सू० ३५ । मं० १-१३ ॥
इन्द्रो॑ वि॒श्व॑स्य राजति । शं नो॑ऽअस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥ १४ ॥
शं नो॒ वातः॑ पवता॒ञ्च्शं न॑स्तपतु॒ सूर्यः॑ ।
शं नः॑ कनि॑क्रदद्देवः प॒र्जन्यो॑ऽअ॒भि व॑र्षतु ॥ १५ ॥
अहा॑नि॒ शं भ॑वन्तु नः॒ शꣳरात्रीः॒ प्रति॑ धीयताम् ।
शं न॑ऽइन्द्रा॒ग्नी भ॑वता॒मवो॑भिः॒ शं न॒ऽइन्द्रावरु॑णा रा॒तह॑व्या ।
शं न॑ऽइन्द्रापू॒षणा॒ वाज॑सातौ॒ शमिन्द्रा॒सोमा॑ सुवि॒ताय॒ शं
योः ॥ १६ ॥

२० संस्कारविधिः
शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शं योर॒भि स्र॑वन्तु
नः॥ १७॥
द्यौः शान्ति॑र॒न्तरि॑क्षँ शान्तिः॑ पृथि॒वी शान्ति॒रापः॒ शान्ति॒रोष॑धयः॒
शान्तिः॑। वन॒स्पत॑यः॒ शान्ति॒र्विश्वे॑ दे॒वाः शान्ति॒र्ब्रह्म॒ शान्तिः॒
सर्वँ॒ शान्तिः॒ शान्ति॑रे॒व शान्तिः॒ सा मा॒ शान्ति॑रेधि॥ १८॥
तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता᳝च्छु॒क्रमुच्चर॑त्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म
श॒रदः॑ श॒तँशृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः
स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥ १९॥
—यजुः० अ० ३६। मं० ८, १०-१२, १७, २४॥
यज्जाग्र॑तो दू॒रमु॒दैति॒ दैवं॒ तदु॑ सु॒प्तस्य॒ तथै॒वैति॑। दू॒र॒ङ्ग॒मं ज्योति॑षां॒
ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २०॥
येन॒ कर्म्मा॑ण्य॒पसो॑ मनी॒षिणो॑ य॒ज्ञे कृ॒ण्वन्ति॑ वि॒दथै॑षु॒ धीराः॑।
यद॑पू॒र्वं य॒क्षम॒न्तः प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २१॥
यत् प्र॒ज्ञान॑मु॒त चेतो॒ धृति॑श्च॒ यज्ज्योति॑र॒न्तर॒मृतं॑ प्र॒जासु॑।
यस्मा॒न्नऽऋ॒ते किं च॒न क॒र्म क्रि॒यते॒ तन्मे॒ मनः॑
शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २२॥
येने॒दं भू॒तं भुव॑नं भवि॒ष्यत् परि॑गृहीतम॒मृते॑न॒ सर्व॑म्।
येन॑ य॒ज्ञस्ता॒यते स॒प्तहोता॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु॥ २३॥
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजूं॑꣯षि॒ यस्मि॒न् प्रति॑ष्ठिता रथना॒भाविवाराः॑।
यस्मिँ॑श्चि॒त्त꣯सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शि॒व-
स॑ङ्कल्पमस्तु॥ २४॥

शान्तिकरणम् २१
सु॒षा॒र॒थिरश्वा॑निव॒ यन्म॑नु॒ष्या॒न्नेनी॒यते॒ऽभीशु॑भिर्वा॒जिन॑ इव।
हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यद॒जिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मन॑: शि॒वस॑न्कल्पमस्तु ॥ २५ ॥
—यजुः० अ० ३४। मं० १-६॥
१ २ ३ २उ ३ १ २२ ३ १ २२
स॑ नः॒ पव॑स्व॒ शं गवे॒ शं जना॑य॒ शमर्व॑ते।
१ २ ३ १ २
शं नो॒ राज॑न्नोष॑धीभ्यः ॥ २६ ॥
—साम० उत्तरा० प्रपा० १। मं० ३॥
अभ॑यं नः करत्यन्तरि॑क्षमभ॑यं द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे इ॒मे। अभ॑यं
प॒श्चादभ॑यं पु॒रस्ता॑दुत्त॒रादध॑रादभ॑यं नो अस्तु ॥ २७ ॥
अभ॑यं मि॒त्रादभ॑यम॒मित्रा॒दभ॑यं ज्ञा॒तादभ॑यं पु॒रोक्षा॑त्। अभ॑यं
नक्त॒मभ॑यं दिवा॑ नः॒ सर्वा॒ आशा॒ मम॑ मि॒त्रं भवन्तु ॥ २८ ॥
—अथर्व० कां० १९। सू० १५। मं० ५, ६ ॥
॥ इति शान्तिकरणम् ॥

अथ सामान्यप्रकरणम्
नीचे लिखी हुई क्रिया सब संस्कारों में करनी चाहिए,
परन्तु जहाँ कहीं विशेष होगा वहाँ सूचना कर दी जाएगी कि
यहाँ पूर्वोक्त अमुक कर्म न करना और इतना अधिक करना,
स्थान-स्थान में जना दिया जाएगा।
यज्ञदेश—यज्ञ का देश पवित्र, अर्थात् जहाँ स्थल, वायु
शुद्ध हो, किसी प्रकार का उपद्रव न हो।
यज्ञशाला—इसी को 'यज्ञमण्डप' भी कहते हैं। यह
अधिक-से-अधिक सोलह हाथ सम चौरस, चौकोण और
न्यून-से-न्यून आठ हाथ की हो। यदि भूमि अशुद्ध हो, तो
यज्ञशाला की पृथिवी और जितनी गहिरी वेदी बनानी हो, उतनी
पृथिवी दो-दो हाथ खोद अशुद्ध [मट्टी] निकालकर उसमें शुद्ध
मट्टी भरें। यदि सोलह हाथ की सम चौरस हो तो चारों ओर
बीस खम्भे और जो आठ हाथ की हो तो बारह खम्भे लगाकर
उनपर छाया करें।
वह छाया की छत्त वेदी की मेखला से दश हाथ ऊँची
अवश्य होवे और यज्ञशाला के चारों दिशा में चार द्वार रक्खें
और यज्ञशाला के चारों ओर ध्वजा, पताका, पल्लव आदि बाँधें।
नित्य मार्जन तथा गोमय से लेपन करें और कुंकुम, हल्दी,
मैदा की रेखाओं से सुभूषित किया करें। मनुष्यों को योग्य
है कि सब मङ्गलकार्यों में अपने और पराये कल्याण के लिए
यज्ञ द्वारा ईश्वरोपासना करें। इसीलिए निम्नलिखित सुगन्धित आदि
द्रव्यों की आहुति यज्ञकुण्ड में देवें।

सामान्यप्रकरणम् २३
यज्ञकुण्ड का परिमाण—जो लक्ष आहुति करनी हों, तो
चार-चार हाथ का चारों ओर सम चौरस चौकोण कुण्ड ऊपर
और उतना ही गहिरा और चतुर्थांश नीचे, अर्थात् तले में एक
हाथ चौकोण लम्बा-चौड़ा रहे। इसी प्रकार जितनी आहुति
करनी हों, उतना ही गहिरा-चौड़ा कुण्ड बनाना, परन्तु अधिक
आहुतियों में दो-दो हाथ [अधिक] अर्थात् दो लक्ष आहुतियों
में छह हस्त परिमाण का चौड़ा और सम चौरस कुण्ड बनाना
और जो पचास हज़ार आहुति देनी हों, तो एक हाथ घटावे,
अर्थात् तीन हाथ गहिरा-चौड़ा सम चौरस और पौन हाथ नीचे
तथा पच्चीस हज़ार आहुति देनी हों, तो दो हाथ चौड़ा-गहिरा
सम चौरस और आध हाथ नीचे। दश हज़ार आहुति तक इतना
ही, अर्थात् दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ
नीचे रखना। पाँच हज़ार आहुति तक डेढ़ हाथ चौड़ा-गहिरा
सम चौरस और साढ़े आठ अंगुल नीचे रहे। यह कुण्ड का
परिमाण विशेष घृताहुति का है। यदि इसमें ढाई हज़ार आहुति
मोहनभोग, खीर और ढाई हज़ार घृत की देवें, तो दो ही हाथ
का चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे कुण्ड रक्खें।
चाहे घृत की हज़ार आहुति देनी हों, तथापि सवा हाथ
से न्यून चौड़ा-गहिरा सम चौरस और चतुर्थांश नीचे न बनावें
और इन कुण्डों में पन्द्रह अंगुल की मेखला अर्थात् पाँच-पाँच
अंगुल की ऊँची तीन बनावें और ये तीन मेखला यज्ञशाला
की भूमि के तले से ऊपर करनी। प्रथम पाँच अंगुल ऊँची
और पाँच अंगुल चौड़ी, इसी प्रकार दूसरी और तीसरी मेखला
बनावें।
यज्ञसमिधा—पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आंब
[आम], बिल्व आदि की समिधा वेदी के प्रमाणे छोटी-बड़ी
कटवा लेवें, परन्तु ये समिधा कीड़ा लगी, मलिन-देशोत्पन्न और
अपवित्र पदार्थ आदि से दूषित न हों। अच्छे प्रकार देख लेवें
और चारों ओर बराबर और बीच में चिनें।

२४ संस्कारविधिः
होम के चार प्रकार के द्रव्य—(प्रथम—सुगन्धित)
कस्तूरी, केशर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल,
जावित्री आदि। (द्वितीय—पुष्टिकारक) घृत, दूध, फल, कन्द,
अन्न, चावल, गेहूँ, उड़द आदि। (तीसरे—मिष्ट) शक्कर, सहत,
छुवारे, दाख आदि। (चौथे—रोगनाशक) सोमलता अर्थात्
गिलोय आदि ओषधियाँ।
स्थालीपाक—नीचे लिखे विधि से भात, खिचड़ी, खीर,
लड्डू, मोहनभोग आदि सब उत्तम पदार्थ बनावें। इसका
प्रमाण—
ओं देवस्त्वा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण वसोः
सूर्यस्य रश्मिभिः ॥
इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि होम के सब द्रव्य
को यथावत् शुद्ध अवश्य कर लेना चाहिए, अर्थात् सबको
यथावत् शोध-छान, देख-भाल, सुधार कर करें। इन द्रव्यों को
यथायोग्य मिलाके पाक करना। जैसेकि सेर घी के मोहनभोग
में रत्तीभर कस्तूरी, मासेभर केशर, दो मासे जायफल-जावित्री,
सेरभर मीठा, सब डालकर मोहनभोग बनाना। इसी प्रकार अन्य
मीठा भात, खीर, खीचड़ी, मोदक आदि होम के लिए बनावें।
चरु अर्थात् होम के लिए पाक बनाने का विधि:—
'ओम् अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि' अर्थात् जितनी आहुति
देनी हों, प्रत्येक आहुति के लिए चार-चार मूठी चावल आदि
लेके (ओम् अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि) अर्थात् अच्छे प्रकार
जल से धोके पाकस्थाली में डाल अग्नि से पका लेवें। जब
होम के लिए दूसरे पात्र में लेना हो, तभी नीचे लिखी
आज्यस्थाली में निकालके यथावत् सुरक्षित रक्खें और उसपर
घृत सेचन करें।
यज्ञपात्र—विशेषकर चाँदी, सोना अथवा काष्ठ के पात्र
होने चाहिएँ। निम्नलिखित प्रमाणे—