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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 318 में से

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पृष्ठ 27

सामान्यप्रकरणम् २३
यज्ञकुण्ड का परिमाण—जो लक्ष आहुति करनी हों, तो
चार-चार हाथ का चारों ओर सम चौरस चौकोण कुण्ड ऊपर
और उतना ही गहिरा और चतुर्थांश नीचे, अर्थात् तले में एक
हाथ चौकोण लम्बा-चौड़ा रहे। इसी प्रकार जितनी आहुति
करनी हों, उतना ही गहिरा-चौड़ा कुण्ड बनाना, परन्तु अधिक
आहुतियों में दो-दो हाथ [अधिक] अर्थात् दो लक्ष आहुतियों
में छह हस्त परिमाण का चौड़ा और सम चौरस कुण्ड बनाना
और जो पचास हज़ार आहुति देनी हों, तो एक हाथ घटावे,
अर्थात् तीन हाथ गहिरा-चौड़ा सम चौरस और पौन हाथ नीचे
तथा पच्चीस हज़ार आहुति देनी हों, तो दो हाथ चौड़ा-गहिरा
सम चौरस और आध हाथ नीचे। दश हज़ार आहुति तक इतना
ही, अर्थात् दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ
नीचे रखना। पाँच हज़ार आहुति तक डेढ़ हाथ चौड़ा-गहिरा
सम चौरस और साढ़े आठ अंगुल नीचे रहे। यह कुण्ड का
परिमाण विशेष घृताहुति का है। यदि इसमें ढाई हज़ार आहुति
मोहनभोग, खीर और ढाई हज़ार घृत की देवें, तो दो ही हाथ
का चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे कुण्ड रक्खें।
चाहे घृत की हज़ार आहुति देनी हों, तथापि सवा हाथ
से न्यून चौड़ा-गहिरा सम चौरस और चतुर्थांश नीचे न बनावें
और इन कुण्डों में पन्द्रह अंगुल की मेखला अर्थात् पाँच-पाँच
अंगुल की ऊँची तीन बनावें और ये तीन मेखला यज्ञशाला
की भूमि के तले से ऊपर करनी। प्रथम पाँच अंगुल ऊँची
और पाँच अंगुल चौड़ी, इसी प्रकार दूसरी और तीसरी मेखला
बनावें।
यज्ञसमिधा—पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आंब
[आम], बिल्व आदि की समिधा वेदी के प्रमाणे छोटी-बड़ी
कटवा लेवें, परन्तु ये समिधा कीड़ा लगी, मलिन-देशोत्पन्न और
अपवित्र पदार्थ आदि से दूषित न हों। अच्छे प्रकार देख लेवें
और चारों ओर बराबर और बीच में चिनें।