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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 318 में से

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पृष्ठ 26

अथ सामान्यप्रकरणम्
नीचे लिखी हुई क्रिया सब संस्कारों में करनी चाहिए,
परन्तु जहाँ कहीं विशेष होगा वहाँ सूचना कर दी जाएगी कि
यहाँ पूर्वोक्त अमुक कर्म न करना और इतना अधिक करना,
स्थान-स्थान में जना दिया जाएगा।
यज्ञदेश—यज्ञ का देश पवित्र, अर्थात् जहाँ स्थल, वायु
शुद्ध हो, किसी प्रकार का उपद्रव न हो।
यज्ञशाला—इसी को 'यज्ञमण्डप' भी कहते हैं। यह
अधिक-से-अधिक सोलह हाथ सम चौरस, चौकोण और
न्यून-से-न्यून आठ हाथ की हो। यदि भूमि अशुद्ध हो, तो
यज्ञशाला की पृथिवी और जितनी गहिरी वेदी बनानी हो, उतनी
पृथिवी दो-दो हाथ खोद अशुद्ध [मट्टी] निकालकर उसमें शुद्ध
मट्टी भरें। यदि सोलह हाथ की सम चौरस हो तो चारों ओर
बीस खम्भे और जो आठ हाथ की हो तो बारह खम्भे लगाकर
उनपर छाया करें।
वह छाया की छत्त वेदी की मेखला से दश हाथ ऊँची
अवश्य होवे और यज्ञशाला के चारों दिशा में चार द्वार रक्खें
और यज्ञशाला के चारों ओर ध्वजा, पताका, पल्लव आदि बाँधें।
नित्य मार्जन तथा गोमय से लेपन करें और कुंकुम, हल्दी,
मैदा की रेखाओं से सुभूषित किया करें। मनुष्यों को योग्य
है कि सब मङ्गलकार्यों में अपने और पराये कल्याण के लिए
यज्ञ द्वारा ईश्वरोपासना करें। इसीलिए निम्नलिखित सुगन्धित आदि
द्रव्यों की आहुति यज्ञकुण्ड में देवें।