संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० संस्कारविधिः
अर्थ—(यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता,
(बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा,
(यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते)
उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष
सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं,
(यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक
है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)
मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप
(देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए
(हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात्
उसी की आज्ञा-पालन करने में तत्पर रहें॥ ३॥
यः प्रा॒ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑।
यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पदः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ४॥
—यजुः० अ० २३। मं० ३॥
अर्थ—(यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः)
अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा
से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव)
है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः)
गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम
लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे
परमात्मा की उपासना अर्थात् (हविषा) अपनी सकल उत्तम
सामग्री को उसकी आज्ञा-पालन में समर्पित करके (विधेम)
विशेष भक्ति करें॥ ४॥
येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ढा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाकः॑।
योऽअ॒न्तरि॑क्षे रज॑सो वि॒मानः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ५॥
—यजुः० अ० ३२। मं० ६॥