संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना:
अर्थ—(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तं
(द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि क...
(येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्)
और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण
किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब
लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे
आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता
और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक
(देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए
(हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥ ५ ॥
प्र॒जाप॑ते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ ६ ॥
—ऋ० मं० १०। सू० १२१। मं० १०॥
अर्थ—हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्!
(त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि)
इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को
(न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि
हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग
(ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्)
उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिससे
(वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी
(स्याम) होवें॥ ६ ॥
स नो॑ ब॒न्धुर्जनि॑ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद् भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ दे॒वाऽअ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॑ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥ ७ ॥
—यजुः० अ० ३२। मं० १०॥
अर्थ—हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों