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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 11

अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः
ओ३म्॒ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव।
यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व ॥ १ ॥ —यजुः० अ० ३०। मं० ३।
अर्थ—हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता, समग्र
ऐश्वर्ययुक्त, (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर!
आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि)
दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (परा सुव) दूर कर दीजिए।
(यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण-कर्म-स्वभाव और
पदार्थ है, (तत्) वह सब हमको (आ सुव) प्राप्त कीजिए ॥ १ ॥
हिर॒ण्य॒गर्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ २ ॥
—यजुः० अ० १३। मं० ४॥
अर्थ—जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने
प्रकाश करनेहारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये
हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध
(पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था,
जो (अग्रे) सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्त्तमान
था, (सः) वह (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और
(द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है। हम लोग
उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए
(हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से
(विधेम) विशेष भक्ति किया करें ॥ २ ॥
यऽआ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ऽउ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः।
यस्य॑ छा॒याऽमृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ ३ ॥
—यजुः० अ० २५। मं० १३॥