संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ संस्कारविधिः
होम के चार प्रकार के द्रव्य—(प्रथम—सुगन्धित)
कस्तूरी, केशर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल,
जावित्री आदि। (द्वितीय—पुष्टिकारक) घृत, दूध, फल, कन्द,
अन्न, चावल, गेहूँ, उड़द आदि। (तीसरे—मिष्ट) शक्कर, सहत,
छुवारे, दाख आदि। (चौथे—रोगनाशक) सोमलता अर्थात्
गिलोय आदि ओषधियाँ।
स्थालीपाक—नीचे लिखे विधि से भात, खिचड़ी, खीर,
लड्डू, मोहनभोग आदि सब उत्तम पदार्थ बनावें। इसका
प्रमाण—
ओं देवस्त्वा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण वसोः
सूर्यस्य रश्मिभिः ॥
इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि होम के सब द्रव्य
को यथावत् शुद्ध अवश्य कर लेना चाहिए, अर्थात् सबको
यथावत् शोध-छान, देख-भाल, सुधार कर करें। इन द्रव्यों को
यथायोग्य मिलाके पाक करना। जैसेकि सेर घी के मोहनभोग
में रत्तीभर कस्तूरी, मासेभर केशर, दो मासे जायफल-जावित्री,
सेरभर मीठा, सब डालकर मोहनभोग बनाना। इसी प्रकार अन्य
मीठा भात, खीर, खीचड़ी, मोदक आदि होम के लिए बनावें।
चरु अर्थात् होम के लिए पाक बनाने का विधि:—
'ओम् अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि' अर्थात् जितनी आहुति
देनी हों, प्रत्येक आहुति के लिए चार-चार मूठी चावल आदि
लेके (ओम् अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि) अर्थात् अच्छे प्रकार
जल से धोके पाकस्थाली में डाल अग्नि से पका लेवें। जब
होम के लिए दूसरे पात्र में लेना हो, तभी नीचे लिखी
आज्यस्थाली में निकालके यथावत् सुरक्षित रक्खें और उसपर
घृत सेचन करें।
यज्ञपात्र—विशेषकर चाँदी, सोना अथवा काष्ठ के पात्र
होने चाहिएँ। निम्नलिखित प्रमाणे—