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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 318 में से

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पृष्ठ 16

१२ संस्कारविधिः
को (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक, (जनिता) सकल
जगत् का उत्पादक, (सः) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण
करनेहारा, (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि)
नाम, स्थान, जन्मों को (वेद) जानता है, और (यत्र) जिस
(तृतीये) सांसारिक सुख-दुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त, (धामन्)
मोक्षस्वरूप, धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को
(आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग (अध्यैरयन्त)
स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य,
राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उसकी भक्ति
किया करें ॥७॥
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।
यु॒यो॒ध्यु॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम ॥८॥
—यजुः० अ० ४०। मं० १६॥
अर्थ—हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के
प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर! आप
जिससे (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्)
हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के
लिए (सुपथा) अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से
(विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय)
प्राप्त कराइए और (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त
(एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिए। इस कारण
हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप
(नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें
और सर्वदा आनन्द में रहें ॥८॥
॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम् ॥