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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

सप्तमोऽध्यायः ३५

सप्तमोऽध्यायः ३५

उद्धृत्य चोर्वीं सलिलात् प्रजासर्गमकल्पयत्।
विसृजन् मानसान् पुत्रानात्मनस्तेजसा समान्॥२९॥

सलिल से पृथ्वी का उद्धार करके प्रजासृष्टि-हेतु चिन्तन करके उन्होंने अपने तेज के समान तेजोमय मानस पुत्रगण की सृष्टि की॥२९॥

भृग्वङ्गिरसमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
मरीचिमथ दक्षं च वशिष्ठं नवमं तथा॥३०॥
नव प्रजापतीन् सृष्ट्वा ततः स पुरुषोत्तमः।
प्रादुर्भूतोऽदितेः पुत्रः प्रजानां हितकाम्यया॥३१॥

भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, दक्ष तथा वशिष्ठ—ये नौ प्रजापति हैं। ये सृष्टि करते हैं। तत्पश्चात् वे पुरुषोत्तम प्रजा की मङ्गलकामना के लिये अदिति के पुत्ररूप में प्रादुर्भूत हुये॥३०-३१॥

मरीचिः कश्यपं पुत्रं नावि वै जनयज्जले।
प्रजापतीनां दशमं तेजसा ब्रह्मणा समम्॥३२॥

जल में नौका के समान (जैसे जलोत्तरण में लोग नौका का सहारा लेते हैं) सहायता के लिये (सृष्टिकार्य में सहायता के लिये) मरीचि ने कश्यप नामक पुत्र को उत्पन्न किया। इनका तेज ब्रह्मा के समान था और ये दशम प्रजापति कहे जाते हैं॥३२॥

दक्षकन्यादितिर्नाम्ना पत्नी सा कश्यपस्य तु।
अण्डं सा जनयामास भूनभस्तलविस्तरम्॥३३॥
तत्रोत्पन्नः सहस्त्रांशुर्द्वादशात्मा दिवाकरः।
नवयोजनसाहस्रो विस्तारस्तस्य वै स्मृतः।
विस्तारत्रिगुणश्चास्य परिणाहस्तु मण्डले॥३४॥

दक्ष की अदिति नामक कन्या कश्यप की पत्नी थी। उन्होंने एक अण्डा उत्पन्न किया, जो पृथ्वी से आकाश तक विस्तार वाला था। उससे सहस्त्रांशु द्वादशात्मा (१२ मूर्त्तिरूप से प्रकट) दिवाकर उत्पन्न हुये। उनका विस्तार ९००० योजन प्रसिद्ध है। इसकी परिधि की विशालता त्रिगुण विस्तृत थी॥३३-३४॥

तथा पुष्पं कदम्बस्य समन्तात् केशरैर्वृतम्।
तथैव तेजसो गोलं समन्ताद् रश्मिभिर्वृतम्॥३५॥

जैसे कदम्बपुष्प चारो ओर केशर से परिवृत्त रहता है, उसी प्रकार उनका तेजोमय गोला (वर्त्तुलाकार) चारो ओर रश्मियों से घिरा रहता है॥३५॥

३६ श्रीसाम्बपुराणम्

सहस्रशीर्षा पुरुषः प्राङ्‌मया य उदाहृतः।
तेजसस्तस्य गोलस्य स तु मध्ये व्यवस्थितः॥३६॥

पहले जिन सहस्रशीर्षा पुरुष की कथा इस ग्रन्थ में कही गयी है, इस तेजोमय गोला के मध्य में वे स्थित हैं॥३६॥

आदित्यः स तपत्येष वियन्नापो गभस्तिभिः।
सहस्रपादस्त्वेषोऽग्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः॥३७॥
आदत्ते स तु रश्मीनां सहस्रेण समन्ततः।
आपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च॥३८॥
प्रभा सौरी तु पादेन ह्यस्तं याति दिवाकरे।
अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद् दूरात् प्रकाशते॥३९॥

वह आदित्य अपनी किरणों से द्युलोक तथा जलाशयों को ताप प्रदान करते हैं। वे वृत्ताकार कुम्भतुल्य सहस्रपाद युक्त अग्नि कहे जाते हैं। ये चारो ओर हजारों-हजारों रश्मियों द्वारा नदी, समुद्र, हृद तथा कूप से जल का आहरण करते हैं।

दिवाकर का सूर्यास्त होने पर रात्रि में सूर्य की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रवेश करता है, तब दूर से सूर्यप्रभा प्रकाशित होती है॥३७-३९॥

उदिते च पुनः सूर्यो चौष्ण्यमाग्नेयमाविशत्।
पादेन तेजसश्चाग्नेस्तथा तत्तपते दिवा॥४०॥
प्रकाशं च तथौष्ण्यञ्च सौर्याग्नेये च तेजसि।
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥४१॥

सूर्य के पुनः उदित होने पर उसमें अग्नि की उष्णता प्रवेश करती है। ऐसे ही अग्नि का तेज एक पाद से दिन में ताप देता है। सूर्य तथा अग्नि के दो तेज हैं—प्रकाशक धर्म तथा उष्णत्व अर्थात् सूर्य का तेज है—प्रकाशक धर्म तथा अग्नि का तेज है—उष्णत्व धर्म। ये परस्पर अनुप्रवेश द्वारा दिवा-रात्रि को प्रकाशित करते हैं॥४०-४१॥

नारद उवाच
व्यापकत्वं च रश्मीनां नामानि च निबोध मे।
हेतयः किरणा गावो रश्मयोऽथ गभस्तयः॥४२॥
अभीषवो वनान्युस्रा घृणयोऽथ मरीचयः।
नाड्यो दीधितयः साध्या मयूखा भानवोंऽशवः॥४३॥
सप्तर्षयः सुपर्णांश्च कराः पादास्तथैव च।
एवं नाम्ना तु पर्यायाः रश्मीनां विंशतिः स्मृता॥४४॥