साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
सूर्य-उपासना का विवेचक ग्रन्थ
श्रीसाम्बपुराणम्
हिन्दी व्याख्याकार
श्री एस. एन. खण्डेलवाल
❖ पुस्तक परिचय ❖
स्रष्टा द्वारा सृष्ट इस भौतिक सृष्टि के व्यवस्थापक मानव के साथ आरम्भ से ही किसी न किसी रोग का साहचर्य रहा है । उसमें भी सामजिक दृष्टि से अत्यन्त हेय स्थान पर कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति की गणना की जाती है । इस रोग के निवारण हेतु अद्यावधि अनेकानेक उपाय किये जाते रहे हैं, फिर भी उनकी सफलता सन्दिग्ध ही रही है ।
किसी न किसी देवता-विशेष को उद्देश्य कर उनके विशेष प्रभाव तथा वैशिष्ट्य का विवेचन करना ही उप-पुराणों का प्रतिपाद्य विषय रहा है । इसी क्रम में साम्बपुराण में भगवान् भास्कर का वैशिष्ट्य प्रतिपादित करने के साथ-साथ उनकी उपासना के विविध रूपों का वर्णन किया गया है । इस ग्रन्थ के अनुसार तथा वेदों के अनुसार भी भगवान् भास्कर की उपासना से कुष्ठ रोग का समूल नाश होता है ।
चौरासी अध्यायों में निबद्ध साम्बपुराण में पिता द्वारा प्रदत्त शाप के फलस्वरूप उक्त भयंकर रोग से ग्रसित साम्ब द्वारा भगवान् सूर्य की सविधि उपासना कर कुष्ठ रोग से मुक्त होने का विवेचन किया गया है । साथ ही साथ सूर्य की उपासना के अधिकारियों का भी निर्देश किया गया है ।
ISBN : 978-93-81484-04-3
₹ 600
[मुद्रा (Seal):]
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान
सम्पादकीय विभाग
शान्ति कुंज, हरिद्वार
[हस्तलिखित:]
२६/१०५
(इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री नहीं है / पृष्ठ रिक्त है। केवल एक अस्पष्ट पुस्तकालय की मुहर अंकित है।)
॥ श्रीः ॥
चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला
श्रीसाम्बपुराणम्
भाषाटीकासहितम्
भाषाभाष्यकारः
श्री एस० एन० खण्डेलवाल
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
वाराणसी
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ISBN : 978-93-81484-04-3
प्रकाशक :
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
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निवेदन
अखिल ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्ण की अहैतुक लीला का एक विचित्र आयाम साम्बपुराण में अंकित है। साम्ब श्रीकृष्ण के पुत्र थे। उनकी पट्टमहिषियों में से अन्यतम जाम्बवती के पुत्र अनुपम रूपराशि के स्वामी होकर भी वे अदृष्टवशात् कुष्ठरोग से आक्रान्त हो गये। वे श्रीकृष्ण द्वारा ही शापित होकर इस दुर्गति को प्राप्त हुये थे। यह भगवान् के कठोर शासन का ही एक रूप है, जहाँ अपने प्रिय पुत्र को भी उन्होंने इतना कठोर दण्ड प्रदान किया।
इस शाप से मुक्ति-हेतु देवर्षि नारद की शरण में जाने पर उन्हें सूर्य की उपासना का उपदेश मिला। तन्त्र के ग्रन्थ साम्बपञ्चाशिका में भी यह वृत्तान्त वर्णित है; लेकिन उसमें साम्बपुराण की तरह बाह्य प्रक्रियात्मक उपासना न होकर स्वात्मदेवतारूप सूर्य की अभेद-रूप अद्वय भक्ति का, अहंविमर्शात्मक पराभक्ति का स्वरूप प्रत्यक्षीभूत होता है, जो शाक्तोपाय की चरम स्थिति है। लेकिन वह सर्वजनग्राह्य अथवा सबके मलिन चित्तमुकुर पर प्रतिच्छवित हो सकने वाली स्थिति नहीं है। पराहंतारूप विमर्श के लाखों करोड़ों में एकाध ही अधिकारी हो सकते हैं। जनसामान्य के लिये वह मार्ग सर्वदा अगोचर ही है। अतः साम्बपुराण के रूप में उसी उपासना का सार्वजनीन रूप प्रस्तुत किया गया है, जो सर्वजन-सुलभ है तथा अज्ञानी जीव भी उस मार्ग का अनुसरण करके क्रमशः अग्रसर हो सकते हैं।
आजकल बिहार में जिस ‘छठ पूजा’ का विशेष महत्त्व माना जाता है, उसका उत्स इसी साम्बपुराण में ही है। षष्ठी-पूजन तथा व्रत के अपूर्व माहात्म्य का इस पुराण में विशेष वर्णन प्राप्त होता है—
एकहारपरो भूत्वा षष्ठ्यां योऽर्चयते रविम्।
नियमव्रतधारी च रवेर्भक्तिसमन्वितः।
सप्तम्यां च महाप्राज्ञः सोश्वमेधफलं भवेत्।
अहोरात्रोपवासेन पूजयेद्यस्तु भास्करम्।
सप्तम्यामथ षष्ठ्यां च सूर्यलोकं स गच्छति।। (अध्याय-३८)
जो षष्ठी के दिन एक बार ही आहार करके सूर्यार्चन करते हैं और सप्तमी को भक्तिभाव से व्रतपालन करते हैं, वे अश्वमेध का फल प्राप्त करते हैं। जो सप्तमी अथवा षष्ठी को अहोरात्र उपवासोपरान्त सूर्योपासना करते हैं, उन्हें सूर्यलोक में स्थान मिलता है।
(४)
उपवासेन षष्ठ्यां च सर्वपापैः प्रमुच्यते।
प्रणिधाय शिरो भूम्यां नमस्कारं करोति यः।। (अध्याय-३८)
सूर्यषष्ठी के दिन उपवास द्वारा सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साम्बपुराणोक्त यही सूर्यषष्ठी व्रत परम्परागत रूप से बिहार में विशेष रूप से सम्पन्न किया जाता है, जो सर्वथा शास्त्रोक्त है।
इस पुराण की विशेषता यह है कि इसके साधन-विधान की कई श्रेणियाँ हैं। इसमें वैदिक रीति से उपासना के अतिरिक्त तन्त्रोक्त सूर्योपासना का स्वरूप भी दृष्टिगोचर होता है।
मातृका-विज्ञान की साधना से शरीर-साधन का जो प्रसङ्ग इसमें वर्णित है, उसका रहस्यमय स्वरूप इस पुराण के ६१वें अध्याय में दृष्टिगोचर होता है। साथ ही रोगापनयन, मारणाभिचार, देहगत रोग-चिकित्सा आदि प्रकरणों के अध्ययन से इस पुराण का तान्त्रिक स्वरूप प्रतिपन्न हो जाता है। यह ग्रन्थ सूर्योपासकों के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा अनुकरणीय है।
सूर्यषष्ठी सन् २०११ ई
एस. एन. खण्डेलवाल
अध्यायानुक्रमः
| अध्याया: | पृष्ठाङ्का: | अध्याया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| प्रथमोऽध्याय: | १ | अष्टाविंशोऽध्याय: | १३९ |
| द्वितीयोऽध्याय: | ५ | एकोनत्रिंशोऽध्याय: | १४३ |
| तृतीयोऽध्याय: | ९ | त्रिंशोऽध्याय: | १४७ |
| चतुर्थोऽध्याय: | १७ | एकत्रिंशोऽध्याय: | १५२ |
| पञ्चमोऽध्याय: | २१ | द्वात्रिंशोऽध्याय: | १५६ |
| षष्ठोऽध्याय: | २७ | त्रयस्त्रिंशोऽध्याय: | १६५ |
| सप्तमोऽध्याय: | ३१ | चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्याय: | १६८ |
| अष्टमोऽध्याय: | ४१ | पञ्चत्रिंशोऽध्याय: | १७७ |
| नवमोऽध्याय: | ४४ | षट्त्रिंशत्तमोऽध्याय: | १८० |
| दशमोऽध्याय: | ५२ | सप्तत्रिंशत्तमोऽध्याय: | १८७ |
| एकादशोऽध्याय: | ५५ | अष्टत्रिंशत्तमोऽध्याय: | १९२ |
| द्वादशोऽध्याय: | ६४ | एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २०० |
| त्रयोदशोऽध्याय: | ६८ | चत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २१० |
| पञ्चदशोऽध्याय: | ७५ | एकचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २१६ |
| षोडशोऽध्याय: | ७९ | द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २२१ |
| षोडशोऽध्याय: | ७९ | त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २२६ |
| सप्तदशोऽध्याय: | ८४ | चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २३४ |
| अष्टादशोऽध्याय: | ८७ | पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २४५ |
| एकोनविंशोऽध्याय: | ९६ | षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २५० |
| विंशोऽध्याय: | १०० | सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २५६ |
| एकविंशोऽध्याय: | १०४ | अष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: | २५९ |
| द्वाविंशोऽध्याय: | ११२ | एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय: | २६३ |
| त्रयोविंशोऽध्याय: | ११६ | पञ्चाशत्तमोऽध्याय: | २६५ |
| चतुर्विंशोऽध्याय: | १२२ | एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय: | २६९ |
| पञ्चविंशोऽध्याय: | १२७ | द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय: | २९७ |
| षड्विंशोऽध्याय: | १२९ | त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय: | ३०१ |
| सप्तविंशोऽध्याय: | १३६ | चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्याय: | ३०३ |
(६)
| अध्यायाः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ३०४ | सप्ततितमोऽध्यायः | ३६६ |
| षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ३१९ | एकसप्ततितमोऽध्यायः | ३६७ |
| सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ३२१ | द्विसप्ततितमोऽध्यायः | ३६९ |
| अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ३२४ | त्रिसप्ततितमोऽध्यायः | ३७० |
| एकोनषष्टितमोऽध्यायः | ३२५ | चतुःसप्ततितमोऽध्यायः | ३७२ |
| षष्टितमोऽध्यायः | ३२६ | पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः | ३७६ |
| एकषष्टितमोऽध्यायः | ३२८ | षट्सप्ततितमोऽध्यायः | ३७८ |
| द्विषष्टितमोऽध्यायः | ३४० | सप्तसप्ततितमोऽध्यायः | ३८१ |
| त्रिषष्टितमोऽध्यायः | ३४३ | अष्टसप्ततितमोऽध्यायः | ३८४ |
| चतुःषष्टितमोऽध्यायः | ३४५ | एकोनाशीतितमोऽध्यायः | ३८६ |
| पञ्चषष्टितमोऽध्यायः | ३४९ | अशीतितमोऽध्यायः | ३८८ |
| षट्षष्टितमोऽध्यायः | ३५१ | एकाशीतितमोऽध्यायः | ३९० |
| सप्तषष्टितमोऽध्यायः | ३५३ | द्व्यशीतितमोऽध्यायः | ३९५ |
| अष्टषष्टितमोऽध्यायः | ३५५ | त्र्यशीतितमोऽध्यायः | ३९८ |
| एकोनसप्ततितमोऽध्यायः | ३६२ | चतुरशीतितमोऽध्यायः | ४०३ |