साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
द्वितीयं सप्तभिः प्रोक्तं परं यच्च प्रभाषते।
षष्टितमोऽध्यायः ३२७
द्वितीयं सप्तभिः प्रोक्तं परं यच्च प्रभाषते।
नाभिगर्भे स्थितं सप्तयोनिविष्टभ्यसूचिकाम् ॥७॥
त्रिशतं नवभिः षट्कं वर्णास्ते स्वके स्थिताः।
ग्रहनक्षत्रगर्भान्ता योनिविष्टभ्यपूर्विकाम् ॥८॥
त्रिशतं नवति त्रीणि गणना कीर्त्यतेऽधुना।
आरेषु शब्दाः पर्याप्तास्तेषु विंशत्प्रतिष्ठिताः ॥९॥
चतुर्विंशतिसंख्याका वर्द्धयंस्तेषु चार्पिताः।
भेदाः षोडशप्राप्तैषा द्विधा योनिश्च मध्यमा ॥१०॥
द्वितीय सात के साथ युक्त है। जिसे पर कहा गया, वह नाभिगर्भ में स्थित सप्त योनि को आवृत करके स्थित है। ३९६ वर्ण स्वर में स्थित हैं। वह ग्रह, नक्षत्र में स्थित है। वह योनि को आवृत करके स्थित है। यहाँ ३९३ की गई है और सब शब्दपर्यन्त रहते हैं। उनमें २० प्रतिष्ठित हैं। २४ संख्या वर्धित होकर उसमें अर्पित है। इसके १६ भेद हैं। इनके दो भाग में मध्यम योनि है॥७-१०॥
त्रिंशद्वैष्ट्याः प्रोक्ताः पञ्चानां द्विगुणा पदैः।
विद्येश्वरप्रसूत्यर्थं लक्षमध्ये भजेत् तथा ॥११॥
कारिकापरशुशक्तिरेते सप्त हृदये सिद्धाः। ॐ आं ईं ऊं व्योमव्यापिने ॐ— एते पञ्चविद्येश्वरप्रस्तावे सिद्धाः। अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः एतेषां षोडशतत्त्वज्ञाने सिद्धाः। क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह आकारासि ताः स्पर्शज्ञाने सिद्धाः। त्रयस्त्रिंशत्। आहवप्रतिमध्ये आसनं बोद्धव्यम्। एषा प्रधिप्रथमा सिद्धी। ऊं ऊं ऊं ऊं द्वादशेष्वपि बोद्धव्यः केवलं वर्णभेदः। पृथगेषा भवति अतः प्रसिद्धः प्रकृतकारणात्।
इति श्रीसाम्बपुराणे षष्टितमेऽध्याये ज्ञानोत्तरे सोमसूत्रे सप्तमं पटलम्
जो ३० तथा १२ कहा गया है, पञ्च भाग के द्विगुण पद द्वारा विद्येश्वर की उन्नति के लिये वह लक्ष में भजनीय है। कारिका पशु शक्ति है। यह सब सप्त हृदय में सिद्ध है। 'ॐ आं ईं ॐ व्योमव्यापिने ॐ' इससे पञ्च विश्वेश्वर प्रस्ताव सिद्ध होता है। 'अ' से 'अः' पर्यन्त १६ स्वर तत्त्वज्ञान में सिद्ध है। मूल में लिखित 'क' से लेकर 'ह' पर्यन्त आकार स्पर्श स्थान में सिद्ध हैं। ३३ आहवप्रति में आसन है। इससे प्रधिप्रथमा सिद्ध है। 'ॐ ॐ ॐ ॐ' इन चार को द्वादश में जानना चाहिये। यह केवल वर्णभेद है। यह पृथक् होता है, इसीलिये प्रकृत कारण में प्रसिद्ध है॥११॥
श्री साम्बपुराणोक्त साठवें अध्याय का ज्ञानोत्तर सोमसूत्र नामक सप्तम पटल समाप्त
एकषष्टितमोऽध्यायः
(शरीरसाधनम्)
त्रिनाभ्यसन्तसम्भूतं बीजिनं प्रथमं पदम्।
प्रतिमध्येषु सर्वेषु स्थितं यत् परमं पदम्॥१॥
संपृक्तौ वायव्यैशान्यामोङ्कारेण प्रदीपितौ।
अकारान्तो मकारः स्याद्दिशि सर्वत्र निष्ठितः॥२॥
पूर्ववर्चवदीर्घान्तो नैर्ऋतिं दिशमाश्रितः।
इकारान्तः पकारोऽथ वायवीदिशमाश्रितः॥३॥
एकारान्तो नकारः स्यादैशान्याधिष्ठितो बहिः।
आद्यो वै दक्षिणस्तस्य द्वितीयस्तस्य दक्षिणः॥४॥
नाभि से उत्पन्न बीजधारी का प्रथम पद है। सबमें परमपद उपस्थित है। वायु तथा ईशान कोण में युक्त होकर ॐकार द्वारा प्रदीपित होता है। अकारान्त मकार सभी दिशाओं में अधिष्ठित है। पूर्ववर्च तथा दीर्घान्त नैर्ऋत्य दिशा का आश्रय लेकर स्थित है। इकारान्त पकार वायवी दिक् का आश्रय लेकर स्थित है। 'ए'कारान्त 'न'कार ईशान दिक् के बाहर स्थित है। आद्य निश्चित रूप दक्षिण है। द्वितीय उसके दक्षिण है॥१-४॥
पुनरष्टौ स्थितां बाह्यान्मकारस्तु द्वितीयके।
ऊकारो वा तथा रेफस्तृतीयं पद्ममाश्रितः॥५॥
आकाराद्दीपिताश्चैव पकारो नैर्ऋते पदे।
तस्योत्तरे पकारः स्याद्द्वितीयं पद्ममाश्रितः॥६॥
पुनः आठ बाहर हैं। मकार द्वितीय है। ऊकार अथवा रेफ तृतीय पद का आश्रय करके स्थित है। 'आ' से दीपित होकर मकार नैर्ऋत्य स्थान में अवस्थित है। उसके उत्तर में 'प'कार द्वितीय पद्म का आश्रय लेकर स्थित है॥५-६॥
बिन्दुरेवमधः पूर्वपक्षं च पूरयेच्छुभम्।
पूर्वपक्षो यथा ह्येष तद्वदेवोत्तरो भवेत्॥७॥
भेदस्त्वक्षरयोर्न स्यादक्षरे तस्य निश्चयः॥८॥
इस प्रकार निम्न बिन्दु शुभ पूर्वपक्ष का पूरण करके स्थित है। जिस प्रकार पूर्वपक्ष, उसी प्रकार उत्तर पक्ष होगा। अक्षर का (दोनों का) भेद नहीं होता, अक्षर में उसका निश्चय होता है॥७-८॥
एकषष्टितमोऽध्यायः ३२९
अकचटतपयशवर्गाः। आवह अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ॐ उ व य अ मा आ व य इ मा त न र च य अ मा उ व या अ म य ज र आ या अ य अ स अ र व आ व य—षोडशत्वं व्योमव्यापिने व्योम व्योमरूपाय सर्वव्यापि पूर्वपक्षः सिद्धः। प्रथमा अपि।
एनसावास्तु विज्ञेया मध्यमस्य विदिक् स्थिताः ।
इकारान्तो यशौ चापि तज्जारपुरुषः स्मृतौ ॥१९॥
'अ क च त ट प' वर्ण हैं। आवह नीचे से व्योम है। यह ऊपर से 'ॐ उ व' से लेकर 'आ व य' पर्यन्त मूल में अंकित वर्ण के षोडशत्व व्योमव्यापी तथा व्योमरूप पूर्व-पक्ष सिद्ध है। प्रथम भी वही है। मध्यम में विदिक् स्थित पापमुक्त पुरुष को जानना चाहिये। इकारान्त 'ष' तथा 'श'—ये जार पुरुष कहे गये हैं॥१९॥
ऐकारोऽथ स्वरश्चाद्यौ नकारो बिन्दुदीपितः ।
दीर्घान्तः प्रथमस्तस्य पश्चाद्यश्चायतश्च न ॥२०॥
'ऐ'कार तथा स्वर, आदि में बिन्दु-दीपित 'न'कार, उसके दीर्घान्त के पश्चात् जो है, वह है—आयत॥२०॥
थकारश्च यकारः स्यात्प्रवृत्तः स्वर एव च ।
नकार आयतश्चैव विसर्गः सर्वतो मतः ॥२१॥
थकार तथा यकार हैं—प्रकृत स्वर। नकार तथा आयत—इन सब स्थानों में विसर्ग जानना चाहिये॥२१॥
यहवा अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। भाषा ऐन इशाम्ब यं अ य अ आ ना आ थ अ य अ आ न षोडशो विसर्गः। व्यापिने शिवाय अनन्ताय अनाथाय अनाथो मधुमासः। प्रथमोऽरसिद्धाद्द्वितीया प्रधिः।
मूल में अंकित 'य ह व' से 'अ आ न' पर्यन्त षोडश विसर्गव्यापी, शिव, अनन्त, अनाथ—मधुमास है। प्रथम 'अ' सिद्ध है। द्वितीय प्रधि (चक्र का धार—नेमि) है। रेफान्तस्थ (जिसमें अन्त में रेफ है), प्रकृत्यन्त (प्रकृति के अन्त में) तकार दीर्घयुक्त है।
रेफास्तस्यः प्रकृत्यन्तस्तकारो दीर्घसंयुतः ।
पश्चात्स्याद् ह्रस्व उकारो वकारश्च तथा मतः ॥२२॥
याद्य शान्ताः शाश्वतः स्युर्यश्चैवोङ्कारदीपितः ।
ग ष ठः सस्खविहून्त इकारान्तो द्वितीयकः ॥२३॥
बाद में ह्रस्व है, उसी प्रकार उकार तथा वकार को भी जानना चाहिये। यादि (जिसके आदि में 'य' है), शान्त (जिसके अन्त में 'श' है)—यह नित्य है। जो ॐकार से दीपित
३३० || श्रीसाम्बपुराणम् ||
है। ग-ष-ठ इत्यादि इकारान्त (जिसके अन्त में 'इ' है) द्वितीय है। यह द्वितीय प्रधि है। अ क च ट इत्यादि मूल में अंकित षोडशस्थित ध्रुव शाश्वत योगपीठ के लिये तृतीय प्रधि सिद्ध है॥१२-१३॥
अ क च ट त प य शान्ताः सर्वद्वितीयेनचाहवाराअधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात् इ श र आ त अ य उ ध र आ व अ यः आशः अ श व आत अ ष उ य अ ग इ य अ ठ अ समा षोडशस्थिताय ध्रुवाय शाश्वताय योगपीठायः सा सिद्धा तृतीया प्रधिः।
साध्यस्थः स्यात् प्रकृत्यन्त आपस्तस्य तथा यतः ।
यन्नित्यं योगिने चेत्वे विज्ञेयाः स्युर्यथोक्तवत् ॥१४॥
साध्यस्थ होगा प्रकृत्यन्त एवं उसका जल भी वहीं होगा। उस नित्य वस्तु को योगी के लिये पूर्वोक्त के समान जानना चाहिये॥१४॥
आद्या यतो यकारः स्यान्नाहताश्वस्वरेण वः ।
अन्तरं च नमस्कारो विसर्गश्चान्त्यतः पदे ॥१५॥
विन्द्वन्तः पूर्वपक्षोत्र विसर्गश्चोत्तरा ध्रुवः ।
वसन्त एष विज्ञेयस्त्वग्रे ग्रीष्मादयः शुभाः ॥१६॥
जो आद्य 'य'कार है, वह आहत अश्वस्वर के समान नहीं है। मध्य में है—नमस्कार एवं अन्त पद में है—विसर्ग। विन्द्वन्त पूर्वपक्ष है। उत्तर में (बाद में) निश्चित विसर्ग है। इसे वसन्त ऋतु जानना चाहिये। पहले शुभ ग्रीष्मादि की बात हो चुकी है॥१५-१६॥
हवो अहवा अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। इशयः आस्त अ य इ न त प अ म उपज्ञा मम। आ ष य आ सा अ र च आ र अ य षोडशी विसर्गः। स्थिताय परित्यागिने ध्यानहाराय ॐ नमः सिद्धाः चतुर्थी प्रधिः; द्वितीयान्तः माधवो मासः। वसन्तर्तुः।
ह व अ ह व नीचे है। व्योम इसके ऊपर है। इ श य इत्यादि मूल में लिखित वर्ण षोडश विसर्ग हैं। 'स्थिताय' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र चतुर्थ प्रधि हैं। द्वितीयान्त है—माधव मास, वसन्त ऋतु।
विसर्गावांस्तु मः शुक्ले प्रकृत्यन्तः शावयुतः ।
स्वरवंतौ यशौ ज्ञेयौ रेफाद्यन्तौ पयौ स्मृतौ ।
भकारान्तो वकारस्तु प्रसवौ सर्वदैव हि ।
यश्चेञ्ज्ञानस्तथान्यश्च सृष्टो दिष्टः सबिन्दुकः ॥१७॥
अ क च त ट प य शा भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। अ म इ य आ व अ प अ म अ र अ प र अं भ अ ऐ व ई श आ य अ य इ आ स अ ग इ ॐ नमो नमः सर्वप्रभवे ईशानाय असिद्धा पञ्चमी प्रधिः।
एकषष्टितमोऽध्यायः । ३३१
उकारो दीपितो यः स्याद्रेफादिन्द्रायुधो धनुः।
स्वरवन्तौ यतौ तेन युयुक्त्यनु तथा भवेत्॥१८॥
उकार दीपित मकार होगा, रेफ के पश्चात् इन्द्र का आयुध धनुष। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होंगे (?)। ‘प’ तथा ‘च’ स्वरयुक्त तथा कादि रेफान्त-युक्त होंगे। उसके पश्चात् खद्योत तथा जैसे कहा गया हृदय जानना चाहिये।।१७-१८।।
स्वरवन्तौ पचौ कादिरेफान्तश्च यथा युतः।
पश्चात्खद्योतविज्ञेयो हृदयश्च यथोदितः॥१९॥
भवेदधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। य म आ र द ध न अ यः अ त त उ प भः अ सः अ व आ क त र अ य अ उ ध अ र ऋ ह अ दः षोडशो विसर्गः। मूर्धाय तत्पुरुषाय व्यक्ताय अघोरहृदयाय च। अतस्तृतीयोरः शुक्नो मासः सिद्धा षष्ठी प्रधिः।
ऊपर व्योम है। ‘य म आ’ से लेकर ‘ह अ दः’ पर्यन्त (मूल में अंकित) १६ विसर्ग हैं। मस्तकरूप तत्पुरुष व्यक्त है तथा अघोर हृदय के उद्देश्य से तृतीय शुक्र (ज्येष्ठ) मास है। यह षष्ठी प्रधि सिद्ध है।
असौ ययतोऽन्यश्च ह्रस्वो यश्चायतो यतः।
मदमामध्यमेकाराद्गुकारेणैव दीपिताः॥२०॥
अदीर्घश्चैव दीर्घः स्यात्स्वरवन्तौ यशौ ततः।
दकारादियर्तुश्च स्याद्दीर्घो यस्तः स्वरेण च॥२१॥
उकारवान् मकारः स्याद् रेफादिस्तन्मनोन्नतः।
यद्देहान्ते च बिन्दुः स्यात्पक्षे शुक्ले तु पूजितः॥२२॥
यह ‘य य’ एवं अन्य ह्रस्व ‘ष’ आयत है। ‘म द म’, मध्यम ‘ऐ’ ‘गु’कार से दीपित है। अदीर्घ तथा दीर्घ होगा। तत्पश्चात् स्वरयुक्त ‘य’ तथा ‘श’, दकारादि ‘य’ एवं ‘तु’ दीर्घ होगा। ‘य’ तथा ‘त’ स्वरयुक्त होगा। ‘उ’कार-युक्त मकार होगा। रेफादि उसका मनोन्नत होगा। जिसके देह में बिन्दु है, वह शुक्ल पक्ष में पूजित होता है।।२०-२२।।
क च ट त प य शाः चारिणि अधस्ताद् व्योम अयमुपरिष्टात्। आ य अ ष आ च अ म य प द अ व व उ आ इ य अ स उ द य आ य त उ म अ र तः पा य वामदेवगुह्याय सद्योजाताय मूर्त्तये। असिद्धा सप्तमी प्रधिः।
‘क च ट त प’ इत्यादि मूल में अंकित अक्षर वामदेवगुह्य सद्योजात मूर्ति के उद्देश्य से कहे गये हैं। यह है सप्तमी प्रधि।
ऐकारान्तो यकारः स्यादक्षरं परमं पदम्।
नकारो मौन मश्च स्यात्ततो गाभ्यादुकारवान्॥२३॥
३३२
श्रीसाम्बपुराणम्
हीद्यायतश्च यस्तस्मादिकारान्तस्तथैव यत्।
आवेद्भिद्धिः पुनर्यश्च गतकान्तः स उत्तमः॥२४॥
ऐकारान्त यकार अक्षय परम पद है। नकार मौन ‘म’ हो जाता है। तदनन्तर उकारयुक्त होगा। जो आयत है, वह रहता है विकारान्त। इस प्रकार पुनः गतकान्त उत्तम है। रेफयुक्त दो प़कारान्त उसके शेष स्वर हैं। ये दोनों ग्रीष्म मास हैं। अन्त में नमः शब्द कहना चाहिये॥२३-२४॥
पकारान्तौ सरेफौ द्वौ तदन्ते स्वर एव च।
तावेतौ ग्रैष्मिकौ मासौ नमोऽन्तः सम्प्रवक्ष्यते॥२५॥
चारिणि अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। ऐं ष ॐ ङ अ न ॐ ङ म अ न अ म ङ ग मा ह य त ह गमाहयः ॐ ङ य स्त ओ र अः षोडशो विसर्गः। ॐ यः ॐ नमो नमो नमः गुह्यातिगुह्याय गोप्तेन शा चतुर्थो चः। शुचिर्मासो ग्रैष्मऋतुः सिद्धा अष्टमी प्रधिः।
चारिणी नीचे है। ऊपर है व्योम। मूल मे अंकित ‘ऐं ष ॐ’ से लेकर ‘ओ र अः’ तक षोडश विसर्ग है। ‘ॐ यः ॐ नमो नमो नमः’ गुह्य से अतिगुह्य रक्षक है ‘न श’ चतुर्थ च। यह है—ज्येष्ठ मास, ग्रीष्म ऋतु तथा अष्टमी प्रधि सिद्ध॥२५॥
हकारान्तो नकारः स्याद्वस्तुत आयतः स्वरः।
स्वरवन्तौ यशौ तश्च रेफादीरोयुतश्च यः॥२६॥
हकारान्त नकार वास्तव में आयत स्वर है। स्वरवन्त ‘य श’ तथा ‘त’ है। रेफ के पश्चात् ‘ई र’ होगा ‘य’ से संयुक्त॥२६॥
गोदीर्घार्धः प्रकृत्यन्तः ककारस्तच्च दीर्घवान्।
यकारः स्वरवान् जादि यश्चैवोकारदीपितः॥२७॥
हकारान्तस्तथाकारो रेफ उकारवांस्ततः।
बिन्दुरित्यपदो ज्ञेयो नभस्यः पूर्वपक्षकृत्॥२८॥
गोदीर्घार्ध प्रकृत्यन्त तथा दीर्घयुक्त ककार, स्वरयुक्त यकार आदि तथा उकार दीपित यकार। हकारान्त ‘आ’कार, तदनन्तर ‘उ’कारयुक्त रेफ। बिन्दु को अपद जानना चाहिये। नभस्य (भाद्रमास) पूर्व पक्षकारक॥२७-२८॥
अ क च ट त प य शा आत्मतन्त्रे। अधस्ताद्व्योम अयमुपरिष्टात्। हे न अ घ आरी अ प अ सारव उप आ ग हे ध स क आत औ प उ जय हे त ऊ त निधनाय सर्वगोधकृता कठोऽतिरूपसिद्धा नवमी प्रधिः।