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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

दशमोऽध्यायः ५३

दशमोऽध्यायः ५३

गर्भ धारण करती हैं। स्वर्ग लोक में सूर्य से जलरूप गर्भ धारण करके वर्षा ऋतु में भूतल पर जल प्रदान करती है। लौकिक जीविकार्थ शस्य उत्पन्न होता है।।६-७।।

सस्योपयोगसंहृष्टा आहुतिं जुह्वति द्विजाः।
स्वाहाकारैः वषट्कारैर्यजन्ते पितृदेवताः ॥८॥

शस्यलाभ से प्रसन्न होकर ब्राह्मणगण यज्ञ में भूतल पर आहुति देते हैं। स्वाहाकार तथा वषट्कार द्वारा पितृदेवों का यजन करते हैं।।८।।

निक्षुभा कुरुते यस्मादोषधीभिः स्वधामृतैः।
मर्त्यान् पितॄंश्च देवांश्च तेन भूर्निक्षुभा स्मृता ॥९॥

निक्षुभा औषधी ही स्वधा तथा अमृत द्वारा मनुष्य, पितृगण तथा देवताओं को स्वस्थ करती हैं, अतएव पृथिवी को निक्षुभा कहा गया है।।९।।

यथा राज्ञी द्विधा भूता यस्य चेयं सुता स्मृता।
अपत्यानि च यान्यस्यास्तानि वक्ष्यामि तच्छृणु ॥१०॥

जिस प्रकार से राज्ञी ने दो स्वरूप ग्रहण किया है और उन्हें कन्या कहा गया है और उनके जितने सन्तान हैं, उन सबको कहता हूँ; सुनो।।१०।।

मरीचिर्ब्रह्मणः पुत्रो मरीचेः कश्यपः सुतः।
तस्माद्धिरण्यकशिपुः प्रह्लादस्तस्य चात्मजः ॥११॥
प्रह्लादस्य सुतो नाम्ना विश्रुतोऽथ विरोचनः।
विरोचनस्य भगिनी सञ्ज्ञाया जननी तु सा ॥१२॥

मरीचि ब्रह्मा के पुत्र हैं। मरीचि के पुत्र हैं—कश्यप। उनके पुत्र थे—हिरण्यकशिपु एवं इनके पुत्र थे—प्रह्लाद। विरोचन नाम का विख्यात प्रह्लाद का पुत्र हुआ। विरोचन की बहन सञ्ज्ञा को उत्पन्न करने वाली हुई।।११-१२।।

हिरण्यकशिपोः पौत्री दितेः पुत्रस्य सा स्मृता।
सा विश्वकर्मणः पत्नी प्रह्लादी चोच्यते बुधैः ॥१३॥

हिरण्यकश्यप की पौत्री दिति विश्वकर्मा की पत्नी थी। उन्हें प्रह्लादी (प्रह्लाद की पुत्री) भी कहते हैं।।१३।।

अथ नाम्ना सुरूपेति मरीचेर्दुहिता शुभा।
पत्नी त्वङ्गिरसः सा तु जननी च बृहस्पतेः ॥१४॥
बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवनी ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तु सा पत्नी वसूनामष्टमस्य तु ॥१५॥

तदनन्तर सुरूपा नामक मरीचि की जो कन्या थीं, वे ऋषि अंगिरस की पत्नी तथा बृहस्पति की जननी थीं। बृहस्पति की भगिनी ब्रह्मवादिनी भुवनी अष्टम वसु प्रभास की पत्नी हैं।।१४-१५।।

५४
श्रीसाम्बपुराणम्

प्रसूता विश्वकर्माणं सर्वशिल्पवतां वरम्।
स वै नाम्ना पुनस्त्वष्टा त्रिदशानां स वर्धकिः॥१६॥

उन्होंने सभी शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को जन्म किया। वे पुनः देवताओं के संवर्धक त्वष्टा भी कहे जाते हैं॥१६॥

देवाचार्यस्य तस्यायं दुहिता विश्वकर्मणः।
सरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भाविनी ॥१७॥

इन देवाचार्य विश्वकर्मा की कन्या सरेणु नाम से प्रख्यात है। ये त्रैलोक्य का उत्पादन करने वाली हैं॥१७॥

राज्ञी संज्ञा च सा स्त्री च प्रभा सैव तु भास्वतः।
तस्या एव सुता छाया निक्षुभा सा महीयसी ॥१८॥

राज्ञी, संज्ञा तथा प्रभा नाम से ख्यात ये सूर्यपत्नी हैं। उनकी कन्या है—छाया, जो पृथ्वीमयी निक्षुभा हैं॥१८॥

विशेष—पुराणों में छाया को सूर्यपत्नी कहा गया है—'छायामार्त्तण्ड सम्भूत'। छाया एवं सूर्यसम्भूत (पुत्र) शनि हैं। परन्तु यहाँ इस श्लोक के अनुसार छाया सूर्यपुत्री हैं। यह संदेहास्पद कथन है। हो सकता है कि यह पाठ की त्रुटि हो। इसका पाठान्तर है—तस्या एषा तु या छाया। विज्ञजन सत्यासत्य का निर्णय स्वयं करें।

सापि भार्या भगवतो मार्तण्डस्य महात्मनः।
साध्वी पतिव्रता देवी रूपयौवनशालिनी।
रन्तुं वै नररूपेण सूर्यो भवति वै पुरा ॥१९॥

वे भी भगवान् मार्तण्ड की भार्या हैं। वे साध्वी, पतिव्रता, रूप-यौवनशालिनी देवी हैं। पूर्व में सूर्य से रमण करने के लिये उन्होंने नररूप धारण किया था॥१९॥

आदित्यस्य तु यद्रूपं महता स्वेन तेजसा।
गात्रेषु प्रतिरुद्धेषु नातिकान्तमिवाभवत् ॥२०॥
अन्विष्यन्नेषु गात्रेषु भगं दृष्ट्वा पिताब्रवीत्।
आर्त्तत्त्वं भव मार्त्तण्ड मार्त्तण्डस्तेन न स्मृतः ॥२१॥

इति साम्बपुराणे राज्ञीनिक्षुभोत्पत्तिर्नाम दशमोऽध्यायः

निज के महान् तेज से आदित्य का जो रूप है, गात्र में प्रतिरुद्ध होकर वह अति कमनीय नहीं है। (उनके शरीर का) गात्र का अन्वेषण करके भग को देखकर (सूर्य को देखकर) पिता ने कहा है—मार्त्तण्ड! तुम आर्त न होओ, अतः उनका नाम मार्त्तण्ड पड़ा॥२०-२१॥

श्री साम्बपुराण में राज्ञी तथा निक्षुभा की उत्पत्ति-नामक दशम अध्याय समाप्त

एकादशोऽध्यायः

(सूर्यपुत्राणां विवरणम्)

नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रजास्तस्य महात्मनः।
त्रीण्यपत्यानि संज्ञायां जनयामास वै रविः॥१॥
द्वौ पुत्रौ तु महाभागौ कन्यां कालिन्दिमेव च।
मनुर्वैवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः॥२॥
ततो यमो यमी चैव यमलौ सम्बभूवतुः।
तेजस्त्वभ्यधिकं तस्य नित्यमेव विवस्वतः॥३॥

नारद कहते हैं—इसके पश्चात् महात्मा सूर्य के सन्तानों का वर्णन करता हूँ। रवि की संज्ञा नामक भार्या से तीन सन्तानें हुईं। महाभाग्यवान दो पुत्र हुये तथा कन्या कालिन्दी का जन्म हुआ। ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु तथा द्वितीय हैं—प्रजापति श्राद्धदेव। तत्पश्चात् यमज (जुड़वा) सन्तान हुई—यम तथा यमी। इस प्रकार इन सूर्य का तेज नित्य अधिक होने लगा॥१-३॥

तेनातितापयामास त्रींल्लोकान् सचराचरान्।
गोलाकारं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः।
असहन्ती तु तत्तेजः स्वां छायां प्रेष्य चाब्रवीत्॥४॥

सूर्य का वह तेज तीनों लोकों को तापित करने लगा। सूर्य का वह गोलाकार रूप देखकर संज्ञा उसे सहन न कर सकी। उन्होंने अपनी छाया से कहा॥४॥

संज्ञोवाच
भव नारीस्वरूपा त्वं लक्षणैः सदृशी मम॥५॥
एवमुक्त्वा समुत्तिष्ठत्तस्याः सदृशलक्षणा।
महीमयी तु सा संज्ञा तस्या च्छाया समुत्थिता॥६॥

संज्ञा कहती है—‘तुम मेरे समान नारीरूपा हो जाओ’। तत्पश्चात् संज्ञा पृथिवीमयी होकर छायारूपेण उत्थित हो गयीं॥५-६॥

प्राञ्जलिः प्रणता भूत्वा छाया संज्ञामभाषत॥७॥
यदर्थमहमुत्पन्ना तदाज्ञापय शोभने।
सर्वमेव करिष्यामि यद्यपि स्यात्तु दुष्करम्॥८॥

५६ | श्रीसाम्बपुराणम्

विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके छाया ने संज्ञा से कहा कि मैं जिस कार्य के लिये उत्पन्न हुई हूँ, मुझसे कहें। आप जो भी कहेंगी, वह सब मैं करूँगी, यद्यपि यह बहुत ही दुष्कर है॥७-८॥

संज्ञोवाच

अहं यास्यामि भद्रं ते स्वयमेव गृहं विभुः।
निर्विकारेण वक्तव्यं त्वयेह भवने मम ॥९॥
हेमौ च बालकौ ह्यङ्के कन्या च वरवर्णिनी।
सम्भाव्या नैव चाख्येयमिदं भगवतस्त्वया ॥१०॥

संज्ञा कहती है—तुम्हारा मंगल हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। तुम मेरे रूप में स्थिर भाव से अवस्थान करो। इन दो बालकों की तथा वरवर्णिनी गोद की कन्या की तुम देखभाल करो। तुम भगवान् सूर्य से कभी भी यह सब नहीं कहना॥९-१०॥

नाख्यास्यामि मतं तस्मै गच्छ देवि! यथासुखम्।
इत्युक्ता छायया संज्ञा जगाम भवनं पितुः ॥११॥
पितुः समीपे गत्वा तु व्रीड़िता सा तपस्विनी।
वर्षाणां तु सहस्रं वै वसमाना पितुर्गृहे ॥१२॥

छाया ने उत्तर दिया—मैं तुम्हारी बात को सूर्यदेव से कभी प्रकट नहीं करूँगी। हे देवि! तुम यथासुख जाओ। छाया द्वारा ऐसा कहने पर संज्ञा पिता के घर चली गयीं; किन्तु पिता के पास जाकर लज्जित होकर सहस्र वर्ष-पर्यन्त पिता के घर में रहती हुई तपस्या करने लगीं॥११-१२॥

भर्तुः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनः पुनः।
आगच्छत् बड़वा भूत्वा त्यक्त्वा रूपं यशस्विनी ॥१३॥

जब पिता ने बार-बार यह कहा कि स्वामी के पास जाओ, तब उन यशस्विनी ने अपना रूप छोड़कर घोड़ी का रूप धारण कर लिया॥१३॥

उत्तरांश्च कुरून् गत्वा तृणान्यथ चचार ह।
ततो गतायां संज्ञायां संज्ञायां वचनेन सा ॥१४॥
संज्ञारूपं ततः कृत्वा छाया सूर्यमुपस्थिता।
द्वितीयायां तु संज्ञायां संज्ञेयमित्यचिन्तयत् ॥१५॥

तदनन्तर संज्ञा उत्तर कुरु में जाकर तृण खाती हुई रहने लगी। इधर संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर छाया संज्ञा के कथनानुसार संज्ञा का रूप धारण करके सूर्य के पास गई और उन्हें भगवान् सूर्यदेव ने भी संज्ञा ही समझा॥१४-१५॥